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चिंता से चतुराई घटे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 11, 2014

इष्ट देव सांकृत्यायन

भारत हमेशा से एक चिंतनप्रधान देश रहा है। आज भी है। चिंतन की एक उदात्त परंपरा यहाँ सहस्राब्दियों से चली आ रही है। हमारी परंपरा में ऋषि-मुनि सबसे महान माने जाते रहे हैं, इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण यही रहा है कि वे घर-बार सब छोड़ कर जंगल चले जाते रहे हैं और वहाँ किसी कोने-अँतरे में बैठकर केवल चिंतन करते रहे हैं। चिंतन से उनके समक्ष न केवल ‘इस’, बल्कि ‘उस’ लोक के भी सभी गूढ़तम रहस्य खुल जाते रहे हैं, जिसे वे समय-समय पर श्रद्धालुओं के समक्ष प्रकट करते रहे हैं। अकसर उनके चिंतन से बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी निकल आता रहा है। कालांतर में चिंतन से एक और चीज़ प्रकट हुई, जिसे चिंता कहा गया।

हालांकि यह चिंतन से अलग है, यह समझने में थोड़ा समय लगा। बाद में तो यहाँ तक पता चल गया कि यह चिंतन से बिलकुल अलग है, इतना कि चिंतन जितना फ़ायदेमंद है, चिंता उतनी ही नुकसानदेह। मतलब एक पूरब है तो दूसरी पश्चिम। इनमें एक पुल्लिंग और दूसरे के स्त्रीलिंग होने से इस भ्रम में भी न पड़ें कि ये एक-दूसरे के पूरक हैं। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है। ये कुछ-कुछ वैसा ही मामला है, जैसे किसी नामी कंपनी का प्रतिष्ठित उत्पाद कोई लोकल टाइप कारखाना मिलते-जुलते नाम से निकाल देता है। बुनियादी फ़र्क़ दोनों के बीच यह है कि एक विशिष्ट जनों द्वारा किया जाता रहा है, जबकि दूसरी सामान्य जन द्वारा। लेकिन, समय के साथ वर्ग-धर्म-जाति भेद मिटने और डुप्लीकेसी बढ़ने का नतीजा यह हुआ कि कई बार सामान्य जन भी चिंतन कर डालता है और विशिष्ट जन भी चिंता के जाल में फंस जाते हैं।

हाल में आई कौलीफेर्निया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के अनुसार विशिष्ट जन के चिंता के जाल में फंसने का सबसे पहला विवरण त्रेतायुग में पाया जाता है। भगवान राम के वनगमन के बाद महाराज दशरथ ग़लती से चिंता कर बैठे और उसका नतीजा अब आप जानते ही हैं। वास्तव में चिंता के साइड इफेक्ट का पता यहीं से चलना शुरू हुआ और इसके साथ ही इस पर शोध भी शुरू हुए। शोधों का निष्कर्ष यह निकला कि चिंता बहुत ही ख़तरनाक टाइप चीज़ है। इससे फ़ायदा कुछ नहीं है, जबकि नुकसान हज़ारों। और तो और, इससे कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। आयुर्विज्ञान विभाग वाले अनुसंधानकर्ताओं ने इससे हो सकने वाली बीमारियों की जो सूची दी, उसमें ब्लड प्रेशर और डायबिटीज़ से लेकर हार्ट अटैक तक का नाम शामिल था।

आनन-फानन जनकल्याण विशेषज्ञों और साहित्य के आचार्यों को बुलाया गया और इस विषय में जागरूकता फैलाने के लिए कोई प्रभावी उपाय निकालने को कहा गया। काफ़ी सोच-विचार के बाद उन्होंने एक स्लोगन निकाला और उसे हवा में तैरा दिया। वह स्लोगन है – चिंता से चतुराई घटे। वैसे इसे फैलाया तो हर ख़ासो-आम के लिए गया, पर जैसा कि आम तौर पर होता है, आम लोगों में इसे समझ कम ही पाए। अलबत्ता वे और ज़्यादा इसके फेर में फंस गए। जबकि ख़ास लोगों ने इसे ठीक से समझा और इसके फेर में फंसने से बचे। बाद में ग़ौर किया गया कि कुछ ख़ासजन भी इससे बच नहीं पाए। आम तो अकसर और कभी-कभी ख़ास जन भी किसी छोटी-मोटी ग़लती के कारण चिंता में फंसकर अपनी चतुराई घटाते रहे।

इसलिए ज़रूरी समझा गया कि इसके उपचार का कोई उपाय निकाला जाए। काफ़ी शोध-अनुसंधान के बाद मालूम हुआ कि दवा तो इसके मामले में कुछ ख़ास काम आती नहीं, हाँ एक उपाय ज़रूर है। उपाय यह है कि यह जैसे ही हो उसे जता दिया जाए। उस ज़माने में चूंकि कामकाज बहुत तेज़ गति से नहीं चलता था, इसलिए यह इतनी बात पता चलते-चलते बहुत देर लग गई। त्रेता से द्वापर युग आ गया। द्वापर में आपने देखा ही कि किस तरह चिंता ने पितामह भीष्म को आ घेरा। अच्छी बात यह रही कि उन्होंने लगातार आयुर्विज्ञानियों के निर्देशों का पालन किया और उन्हें जब-जब चिंता ने घेरा, वह उसे जता देते रहे।

उसके बाद तो हमारे देश में चिंता के फेर में पड़ते ही उसे जता देने का रिवाज़ सा चल पड़ा। हमारे नए दौर के विशिष्ट जन तो उसके फेर में पड़ने से पहले ही उसे जता देते हैं। आजादी के बाद से लेकर अब तक हम देखते आ रहे हैं कि विशिष्ट जन अकसर बहुत गंभीर मसलों पर सामान्य से लेकर गंभीर और कभी-कभी अति गंभीर टाइप की भी चिंता जताते रहते हैं। मामला चाहे बाढ़ का हो या अकाल का, महंगाई का हो या बेकारी का, दंगे का हो या आतंकवाद का, या फिर पड़ोसी देशों द्वारा हमारे देश में घुसपैठ का ही क्यों न हो… हमारे विशिष्टजन चिंता जताने में कोई कोताही नहीं बरतते। कई बार तो चिंता द्वारा घेरे जाने से पहले ही उसे जता देते हैं। हालांकि जनता टाइप लोगों को चिंता जताना पसंद नहीं आता। कई बार वे किसी विशिष्ट जन द्वारा चिंता जताए जाते ही चिढ़ जाते हैं। कहते हैं, ये तो पहले वाले भी कर रहे थे, फिर आपकी क्या ज़रूरत थी? असल में समझ ही नहीं पाते कि चिंता जताना अपने आपमें बहुत कुछ करना है। मेरी मानें तो आप भी इस पर अमल करें। यानी कोई चिंता आपको घेरे, इससे पहले ही उसे जता दें। क्योंकि चिंता से चतुराई घटे और आप जानते ही हैं, चतुराई घटने का आज के ज़माने में क्या नतीजा हो सकता है।

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रामेश्वरम में

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 17, 2011

हरिशंकर राढ़ी
दोपहर बाद का समय हमने घूमने के लिए सुरक्षित रखा था और समयानुसार ऑटोरिक्शा  से भ्रमण शुरू  भी कर दिया। पिछले वृत्तांत में गंधमादन तक का वर्णन मैंने कर भी दिया था। गंधमादन के बाद रामेश्वरम द्वीप पर जो कुछ खास दर्शनीय  है उसमें लक्ष्मण तीर्थ और सीताकुंड प्रमुख हैं। सौन्दर्य या भव्यता की दृष्टि  से इसमें कुछ खास नहीं है। इनका पौराणिक महत्त्व अवश्य  है । कहा जाता है कि रावण का वध करने के पश्चात्  जब श्रीराम अयोध्या वापस लौट रहे थे तो उन्होंने सीता जी को रामेश्वर  ज्योतिर्लिंग के दर्शन  के लिए, सेतु को दिखाने के लिए और अपने आराध्य भगवान शिव  के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पुष्पक  विमान को इस द्वीप पर उतारा था और भगवान शिव की पूजा की थी। यहाँ पर श्रीराम,सीताजी और लक्ष्मणजी ने पूजा के लिए विशेष  कुंड बनाए और उसके जल से अभिषेक  किया । इन्हीं कुंडों का नाम रामतीर्थ, सीताकुंड और लक्ष्मण तीर्थ है । हाँ,  यहाँ सफाई  और व्यवस्था नहीं मिलती और यह देखकर दुख अवश्य  होता है।
स्थानीय दर्शनों  में हनुमान मंदिर में (जो कि बहुत प्रसिद्ध और विशाल  नहीं है) तैरते पत्थरों के दर्शन करना जरूर अच्छा लगता है। पत्थर का पानी पर तैरना एक लगभग असंभव सी घटना मानी जाती है और इसे कुछ लोग ईश्वरीय  चमत्कार मानते हैं तो कुछ गल्प के अलावा कुछ नहीं। इसे सामान्यतः वैज्ञानिक तौर पर भी नकार दिया जाता है किन्तु यह सच है कि पत्थर पानी में तैरते हैं। इसे आप अपनी आँखों से देख सकते हैं, छू सकते हैं और दिल करे तो खरीदकार ला भी सकते हैं। यह वास्तव में पत्थर ही होते हैं जो दुर्लभ श्रेणी के होते हैं।
वस्तुतः तैरते हुए पत्थर भी प्रकृति के चमत्कारों में एक हैं। इनका पानी पर तैरना पता नहीं श्रीराम के स्पर्श  की कृपा पर आधारित था या नहीं किन्तु इसे प्रकृति का स्पर्श  जरूर मिला है। भूविज्ञान के अनुसार पत्थर का तैरना कोई चमत्कार या  ईश्वरीय शक्ति  नहीं है। हर प्रकार का पत्थर तैर नहीं सकता है। दक्षिण भारत पृथ्वी के सबसे पुराने भागों में है। वर्तमान हिमालय के अस्तित्व में आने से पूर्व एशिया , योरोप और आस्ट्रेलिया तक का अंश  एक ही खंड था। जहाँ आज हिमालय है वहाँ पहले टेथीस नामक एक छिछला सागर था। इस सागर के उत्तर में अंगारा लैण्ड नामक भूखंड था और दक्षिण में गोंडवाना लैण्ड। टेक्टॉनिक प्लेटों के खिसकने से कालान्तर में टेथीस सागर की जगह हिमालय का निर्माण हो गया। भारत का दक्षिणी भाग गोंडवाना लैण्ड का प्रमुख हिस्सा है जो मुख्यतः ज्वालामुखी से निर्मित आग्नेय शैलों  से निर्मित है। चूंकि आग्नेय शैलें  प्रायः ज्वालामुखी से निकले लावा के ठण्डे हो जाने से बनती हैं, इनमें कहीं -कहीं छिद्र रह जाते हैं जिनमें हवा भर जाती है। यही हवा जब अधिक हो जाती है तो पत्थर पानी में तैरने लग जाता है और आर्किमिडीज का सिद्धान्त यहाँ पूर्णतया लागू होता है। यह बात अलग है कि आग्नेय शैलों के अन्तर्गत आने वाला पूरा पत्थर परिवार तैर नहीं सकता, इसमें भी एक विशेष कोटि होती है जिसे हम झाँवाँ पत्थर कह सकते हैं।
हमारा रामेश्वरम भ्रमण लगभग तीन घंटे में पूरा हो गया था। उसी होटल पर हम आ चुके थे। शाम  के पांच बज रहे होंगे। अब आगे क्या किया जाए? अभी कुछ और महत्त्वपूर्ण स्थल रह गए थे । उनमें से एक था –  धनुषकोडि या धनुषकोटि। इस स्थल के विशय में हमने सुन रखा था और जाने की प्रबल इच्छा भी थी। ऑटो वाले से बात की गई तो पता लगा कि इस समय जाना असंभव था। यह वहाँ से लौटने का समय है और रात्रि में वहाँ जाना न तो लाभकर है और न ही अनुमोदित ही। यहाँ भी हमें अभी कुछ खरीदारी करनी थी, शंकराचार्य  मठ में जाना था और थोड़ा समन्दर किनारे घूमना भी था। वस्तुतः अब जो सबसे ज्यादा उत्कंठा हमारे मन में शेष  थी वह थी सेतु के दर्शन करना जो किधनुषकोडि में ही मिल सकता था। सच तो यह है कि सेतु का अब कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है और धनुषकोडि में भी इसके दर्शन नहीं हो सकते। यह तो अब सागर में समाहित हो चुका है, धनुषकोडि तो वह स्थान है जहाँ से इस सेतु का प्रारम्भ होता था।



गंध मादन पर्वत पर 



धनुषकोडि ; धनुषकोडि या धनुषकोटि पम्बन से दक्षिण-पूर्व में लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। यहाँ पर विभीषण  का मंदिर हुआ करता था। कहा जाता है कि रावण दमन के बाद वापसी में विभीषण के कहने से श्रीराम ने इस पुल का सिरा अपनी धनुष से तोड़ दिया था। ‘कोडि’ का अर्थ तमिल भाषा  में अन्त या सिरा होता है। यह भी विश्वास है कि रामेश्वरम और काशी की यात्रा सेतु में स्नान किए बिना पूरी नहीं होती। धनुषकोडि को महोदधि (बंगाल की खाड़ी ) और रत्नाकर (हिन्द महासागर ) का मिलन स्थल भी कहा जाता है, हालाँकि आज का भूगोल इस बात को प्रमाणित नहीं करता । धनुषकोडि श्रीलंका के बीच में विश्व  की  सबसे छोटी सीमा का निर्माण भी करता है जो मात्र पचास गज की लंबाई की है। स्वामी विवेकानन्द ने भी 1893 के विश्व  धर्मसम्मेलन मे विजय पताका फहराने के बाद श्रीलंका के रास्ते इसी भूखंड पर भारत की धरती पर अपना पैर रखा था। 
धनुषकोडि अब एक ध्वन्शावशेष  बनकर रह गया है। 22 दिसम्बर 1964 की मध्यरात्रि में एक भयंकर समुद्री तूफान ने धनुषकोडि का गौरवशाली  अतीत और वैभवशाली वर्तमान को पूरी तरह निगल लिया था। इस भीषण  तूफान में लगभग 1800 जानें गईं थी और पूरा द्वीप शमशान  बनकर रह गया। यहाँ क्या कुछ नहीं था। इसका अपना एक रेलवे स्टेशन  था और एक पैसेन्जर ट्रेन (पम्बन-धनुषकोडि पैसेन्जर, ट्रेन नम्बर – 653/654) चक्कर लगाया करती थी। दैवी आपदा की उस रात भी वह पम्बन से 110 यात्रियों और 5 कर्मचारियों को लेकर चली थी। अपने लक्ष्य अर्थात धनुषकोडि रेलवे स्टेशन से कुछ कदम पहले ही तूफान ने उसे धर दबोचा और सभी 115 प्राणी आपदा की भेंट चढ़ गए। अब यह एक खंडहर मात्र रह गया है और सरकार ने इसे प्रेतनगर ( Ghost  Town ) घोषित  कर रखा है। यहाँ एक शहीद  स्मारक भी बनाया गया है। यहाँ छोटी नाव या पैदल भी पहुँचा जा सकता है । रेत पर चलने वाली जीपें और लारियाँ भी उपलब्ध हैं।

शंकराचार्य मठ :

रामनाथ मंदिर के मुख्य अर्थात पूर्वी गोपुरम के सामने जहाँ सागर में स्नान की रस्म शुरू करते हैं, वहीं शंकराचार्य का मठ भी स्थापित है। एक बार मुझे यह भ्रम हुआ कि यह आदि शंकराचार्य  द्वारा स्थापित चारो मठों में से एक होगा क्योंकि उन्होंने चार मठ चारो धाम में स्थापित किए थे और रामेश्वरम चार धामों में एक है। बाद में ध्यान आया कि उनके द्वारा स्थापित मठ चार धामों में नहीं अपितु चार दिशाओं  में थे। जहाँ उत्तर, पूरब और पश्चिम  के मठ धामों में स्थित हैं वहीं दक्षिण में स्थित शृंगेरी मठ तो कांची में है। अतः रामेश्वर  में स्थित शंकराचार्य  मठ महत्त्वपूर्ण तो है किन्तु प्रमुख चार मठों  में नहीं है। फिर भी मठ को देखने की इच्छा कम नहीं हुई थी। वहाँ पहुँचे तो अच्छी खासी भीड़ दिखी। कोई विशेष प्रयोजन मालूम हो रहा था। भाषा की समस्या तो थी ही । चाहा कि कुछ जानकारी लूँ, पर किससे लूँ? प्रश्न  का कोई समाधान नहीं दिख रहा था। सामान्य बातें या पता तक तो कोई विशेष परेशानी  नहीं थी। परन्तु यहाँ प्रश्न लेखकीय कीडे़ का था। जिज्ञासा का समाधान तो चाहिए ही था, यात्रा की समाप्ति के बाद वृत्तान्त भी तो लिखना था! ना हिन्दी ना अंगरेजी। संस्कृत में अपना  बहुत प्रवाह तो नहीं है किन्तु कामचलाऊ शक्ति जरूर है। पंडित जी से बात करूँ पर वहाँ भी असमर्थता ही थी। सोच -विचार कर ही रहा था कि एक सज्जन शारीरिक  भाषा से मुझे पढ़े – लिखे या अफसर से दिख गए। उनसे बात की तो बोले कि हिन्दी तो नहीं, अंगरेजी में वे बात कर सकते हैं। बातचीत में पता चला कि वे मदुराई के रहने वाले हैं और वहीं किसी सरकारी सेवा में हैं। नाम तो मैं उनका भूल गया, पर उनकी बातें, उनका ज्ञान और सज्जनता मुझे याद है। लम्बी बातचीत में उन्होंने जो कुछ बताया, उसमें मुझे एक बात बड़ी आश्चर्यजनक  लगी। वहाँ अश्विन  मास में एक विशिष्ट  उत्सव होता है जिसमें लोग अंगारों पर नाचते हैं और किसी का पैर नहीं जलता। उनका दावा था कि आप यह उत्सव स्वयं देख सकते हैं। हम भी वहाँआश्विन  मास में( नौरात्रों में) गए थे। परन्तु यह उत्सव पूर्णिमा के आस- पास  होता है। मुझे इस बात की सत्यता पर अभी भी पूरा विश्वास नहीं होता कि जुलूस बनाकर लोग आग पर नाचेंगे और पैर नहीं जलेंगे परन्तु किसी की धार्मिक आस्था को चुनौती देना भी कोई आसान कार्य नहीं है।

दिन डूबने को आ रहा था। मठ से निकलकर हम सागर किनारे की ओर चल पडे़। हवा की शीतलता  का कोई जवाब नहीं था। सागर किनारे जो दृश्य  सामान्यतः मिलता है – लोगों की भीड़, खोमचे वालों का जमावड़ा और बेतरतीब आते-जाते लोग, यहाँ भी था। यहाँ एक बार पुनः जिस चीज ने भगाने की ठानी वह थी यहाँ की गंदगी और बदबू!  रामेश्वरम  के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है मछली पकड़ना और बेचना। अब मछलियों के पकड़ने के बाद उनकी प्रॉसेसिंग और भंडारण के कारण बदबू निकलना तो सामान्य बात है (बेट द्वारिका यात्रा में मैंने यही पाया था), किन्तु तट पर फैली गंदगी, गोबर और मल से भी कम वितृष्णा  नहीं पैदा हो रही थी। आवारा पशुओं  के झुंड के झुंड अपनी गतिविधियों में व्यस्त और मस्त थे। कुल मिलाकर सागर किनारे दिल ये पुकारे वाली बात बनी नहीं। हाँ, थोड़ा बहुत इलाका जरूर ऐसा था जहाँ बैठा जा सकता था। अंधेरा घिरने लगा था। कुछ स्थानीय लोगों ने बताया कि इस दिशा  में लंका है और थोड़ी देर बाद श्रीलंका की बिजुलबत्तियाँ दिखाई देंगी। आखिर कुल दूरी यहाँ से तीस किमी ही तो है। 

पम्बन रेलवे पुल
– यह रेलवे पुल रामेश्वरम द्वीप को भारत के मुख्य भाग से जोड़ता है . यह इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है और इसकी विशेषता यह है कि जब बड़ी जहाजों को निकलना होता है तो रेल की पटरियों को उठा दिया जाता है और निकल जाता है. पुनः पटरी को नीचे कर दिया जाता है रेलगाड़ियाँ गुजरने लगती हैं .
क्या खरीदें –  रामेश्वरम  जाएं तो सामुद्रिक जीवों से निर्मित सामान अवश्य खरीदें। शंख , घोंघे और सीप के कवच  ( sea shell )  के सामान बहुत ही सुन्दर और सस्ते मिलते हैं। इनसे आप घर को सजा सकते हैं और  रामेश्वरम  यात्रा की स्मृति के तौर पर संजो भी सकते हैं। उपहार के लिए भी ये बहुत ही उत्तम होते हैं। साथ में परिवार था, अतः सामान खरीदने का चांस बनता ही था। एकाध अपने लिए और कुछ फरमाइशकर्ताओं के लिए खरीदा। वामावर्ती शंख तो मिलती ही है, दक्षिणावर्ती शंख के तमाम रूप उपलब्ध हैं। मैं तो उनकी उत्पत्ति और प्रकृति और कारीगरों की कारीगरी पर मुग्ध होता रहा जबकि पत्नी और बेटी गृहसज्जा के सामानों की खरीदारी में व्यस्त रहीं। बेटे को गाड़ी टाइप का कोई खिलौना मिल गया था। कभी उसमें व्यस्त हो जाता तो कभी जाँच आयोग के सक्रिय सदस्य की तरह अनेक प्रश्न लेकर आ जाता और मेरी सोच का दम तब तक घोंटता रहता जबतक उसे अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता। 
 रामेश्वरम  में हमारा ठहराव एक दिन का ही था। रात हो चली थी। दोपहर वाले ढाबे पर ही हमने उत्तर भारतीय भोजन किया  और इस निर्णय के साथ सो गए कि प्रातः जल्दी उठकर कन्याकुमारी वाली बस पकड़नी है। काश  ! एक दिन और होता हमारे पास  रामेश्वरम  में ठहरने के लिए! बस मन ही मन यह प्रार्थना गूंजती रही –
                              श्रीताम्रपर्णी जलराशियोगे 
                                       निबद्ध्यम सेतुम निशि विल्व्पत्रै .
                             श्रीरामचन्द्रेण समर्चितमतम
                                        रामेश्वराख्यं सततं नमामि . 

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Beyond popular outrage

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 6, 2011

मैं मानता हूं कि टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक सार्थक शुरुआत की है. मैं अन्ना के मुद्दे और आंदोलन दोनों के पक्ष में रहा हूं और आगे भी रहूंगा. मेरे कुछ मित्र इस विषय पर ज़रा हटकर सोचते हैं. एक आदर्श लोकतंत्र की यह शर्त है कि वहां जितना महत्व समर्थन के लिए है, विरोध के प्रति उतना ही सम्मान होना चाहिए. हमारे विरुद्ध सोचने वालों के भी अपने तर्क हैं और अपनी चिंताएं हैं. वरिष्ठ पत्रकार विशाल दुग्गल इस मुद्दे और आंदोलन के विरुद्ध तो नहीं हैं, लेकिन अलग ढंग से सोचते हैं. अब जब इस पर हल्ले का माहौल बीत चुका है, मेरा मानना है कि अगर हम वाक़ई भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं तो इन मुद्दों पर भी सोचा जाना चाहिए. श्री दुग्गल का पूरा लेख आपके विचार के लिए:

इष्ट देव सांकृत्यायन
Corruption today has seeped into the vitals of India’s body politic, acquiring frighteningly menacing proportions to the extent that any fresh disclosure of a scam has ceased to shock the people any more. What has accentuated the citizens’ growing disenchantment with the system is the connivance of top functionaries — holding high offices — in perpetuating the uninterrupted saga of institutional turpitude. The prevailing mood in the nation is an agonising quest to find ways and means to somehow stem the rot, which is threatening to undermine India’s rising political, economic stature and clout in the world.
 Pertinently, the relentless anti-corruption movement launched by Anna Hazare-led civil society to set up Jan Lokpal has captured the popular imagination. The campaign has struck a sympathetic chord, as manifested in the protagonists of the anti-graft brigade finding positive, even larger-than life, projection in the media.  However, the moot point here is that the whole issue of the scourge of corruption requires a dispassionate analysis and a vibrant public discourse.  For, corruption is a too complex and serious issue to be resolved through an outright emotional reaction,  as it runs the danger of  the root cause getting drowned in the cacophony of mass protests being graphically captured on multiple media platforms.
Hazare’s protest assumes significance in the wake of  the deluge of corruption cases in the recent times, exposing the cracks in the political and administrative edifice of the country. With fires of corruption cauldron extending beyond the likes of Suresh  Kalmadi and company  to singe the intensely articulated image of a ‘suave, urbane and progressively-minded’ Delhi Chief Minister, while not even leaving the office of the Prime Minister beyond reproach, have brought into focus the open and shameless plunder of the national exchequer. 
 Also when the DMK leader and the former tainted telecom minister A Raja defended his allocations of 2G licenses  by stating that the telecom policy was pursued by his ministry while constantly updating and apprising the Finance Ministry and PMO, the highest office of the land couldn’t escape criticism. Clearly, the current UPA dispensation cannot wash its hands off the scams  rocking its regime by unfailing regularity, by simply finding scapegoats.
While the nation is aghast at the sheer magnitude of corrupt practices afflicting the government and political machinery, there is also something that goes to redeem the pervasive darkness.  As a matter of fact, the instances of the misdeeds committed by the high and the mighty have been brought to light and then pursued with uncompromising pace by few other institutions of the same mode of democracy, which has been exploited by sections of bureaucracy and political class.
 The government’s own auditor, the Comptroller and Auditor General of India (CAG), has been performing its constitutional duty with aplomb in bringing to light the grave lapses and transgressions in matters of governance, be it the taint of venality surrounding the Commonwealth Games or the controversial allocations of 2G spectrum. Then, the judiciary too has severely dealt with all the high profile corruption cases brought to its cognizance.
Not surprisingly, we find  the major protagonists of the fraudulence tales scripted in the recent past, cooling their heels in jails, far removed from the cosy ambience of their lives, hitherto submerged in depths of sickening luxury. All this cleansing, though limited and yet to reach a sense of finality, can be expedited further by setting up the institution of Lokpal to mitigate, if not remove, the institutional flaws that have come to afflict the country today.
Of course, there is a crying  need and  justification for having a really strong and effective Lokpal. At the same time, we should not be oblivious to the fact that the so-called functioning anarchy that India is being projected to be, is not void of positive features like the Right to Information Act and robust institutions like CAG, Election Commission, CVC, and on top of  it the courts, which have been functioning in a no-nonsense manner, preventing the country’s slide into the recesses of a failed state.
Sadly, anyone with a different view on Hazare-led anti-corruption drive runs the danger of  being misconstrued as a PR person of the establishment. However, my submission is to have a Lokpal which functions within the country’s democratic political culture and strengthens and co-operates with the other aforesaid untainted institutions in waging a relentless war against corruption. 
It needs to be debated whether it will further serve the cause of fair play and justice, if we set up a Jan Lokpal over and above other anti-corruption institutions. Notably, a provision in the draft of Jan Lokpal bill requires that the CVC and the CBI’s anti-corruption unit be scrapped and merged into the Jan Lokpal, which will combine the roles of investigator, judge and prosecutor.
The projected Jan Lokpal, if  and when it comes into existence, would be the most powerful institution in India, having under its purview even the conduct of the Prime Minister and the Chief Justice of India. Will it be feasible, nay desirable, to entrust the Jan Lokpal with this humongous task, even before the proposed system of supreme ombudsman has run some course to become a tried and tested institution?
The Indian media, in its propensity to create a spectacle, has seized upon the opportunity of applauding Hazare’s anti-graft campaign.  Through extensive print and audio-visual coverage, it has been relentlessly capturing the audience’s euphoria of participating in a ‘revolutionary struggle for true freedom, post-independence.  Tragically, instead of  acting as a platform for a serious, rational and substantive public discourse on  the scourge  of corruption, including a debate on the potentially authoritarian text  of the Jan Lokpal draft and the inflexible posturing of Team Anna on  it, the media has chosen to float along the current of emotional upsurge against corruption.
Faith is far too precious an emotion to be reposed in pontiffs of morality and integrity, occupying exalted planks but we the  people have always allowed ourselves to be swayed by gurus, godmen and avowed champions of public good, purportedly on a mission to cleanse society of decadence and evil.  Though it would be unfair to draw comparisons, the raging controversies surrounding Swami Ramdev – as evident by his political ambitions, investigations into the working of his trusts, coupled with the dubious background of his crony Acharya  Balkrishnan — have contributed towards diminishing his hallowed stature.
One shudders to think about the tragedy when people discover that some of the crusaders against felony may themselves not be above board.  Before the masses take to a blind following, it will be a good idea to pause and analyse whether it is all worth it; whether their present day idols are anywhere near attaining the self-effacing heights of Mahatma Gandhi, Lal Bahadur Shastri, or Jai Prakash Narayan.
The groundswell of nationwide support to Anna Hazare’s crusade reaffirms the power of people’s will in bringing about a revolution. But there also exist  apprehensions with regard to the uphill task of  sustaining this revolution. For, it would require extraordinary skills, expertise and unalloyed integrity to manage the institution of a supreme ombudsman vested with absolute powers, chartering its own course, independent of the constitutional mechanism.

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Samarthan ka Sailaab

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 22, 2011



समर्थन का सैलाब 
                   -हरिशंकर राढ़ी
अनुमान था कि होगा ऐसा ही।  देशवासियों को एक इंजन मिल गया है और वे अब किसी भी ब्रेक से रुकने वाले नहीं। आज तो जैसे दिल्ली के सारे रास्ते रामलीला मैदान की ओर जाने के लिए ही हों , जैसे दिल्ली मेट्रो केवल अन्ना समर्थकों के लिए ही चल रही हो और हर व्यक्ति के पास जैसे एक ही काम हो- रामलीला मैदान पहुँचना और अन्ना के बहाने अपनी खुद की लड़ाई को लड़ना । साकेत मेट्रो स्टेशन  पर जो ट्रेन बिलकुल खाली आई थी वह एम्स जाते-जाते भर गई और सिर्फ भ्रष्टाचार  विरोधी बैनरों और नारों से। नई दिल्ली स्टेशन से बाहर निकलता हुआ हुजूम आज परसों की तुलना में कई गुना बड़ा था। सामान्य प्रवेश द्वार पर ही हजारों  की भीड़ केवल प्रवेश की प्रतीक्षा में पंक्तिबद्ध थी। किसी भी चेहरे पर कोई शिकन  नहीं, कोई शिकायत  नहीं।
ऐसा शांतिपूर्ण प्रदर्शन  मैंने तो अब तक नहीं देखा था। सच तो यह है कि प्रदर्शनों  से अपना कुछ विशेष  लेना -देना नहीं। राजनैतिक पार्टियों का प्रदर्शन  भंड़ैती से ज्यादा कुछ होता नहीं, मंहगाई  और बिजली पानी के लिए होने वाले प्रदर्शन  जमूरे के खेल से बेहतर नहीं और तथाकथित सामाजिक आन्दोलन भी रस्म अदायगी के अतिरिक्त किसी काम के नहीं। लोग अनशन  भी करते हैं पर सिर्फ और सिर्फ अपने लिए। अब स्वार्थ में डूबे एकदम से निजी काम के लिए परमार्थ वाले समर्थन कहाँ से और क्यों मिले? अगर ऐसे प्रदर्शनों  से दूर रहा जाए तो बुरा ही क्या ? आज पहली बार लगा है कि कोई निःस्वार्थ भाव से देशरक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग के लिए तत्पर है तो लोगों में चेतना जागना स्वभाविक और अपरिहार्य भी है। 
सारा कुछ पूर्णतया नियोजित और अनुशासित  है। इस तरह के आन्दोलन का परिणाम क्या होगा, यह तो अभी समय बताएगा पर ऐसे आन्दोलन होने चाहिए। जिस तरह से लोकतंत्र से  लोक गायब हो चुका है और उसका एकमात्र उपयोग मतपेटियाँ भरना रह गया है, यह किसी भी सत्ता को मदहोश  कर देने के लिए पर्याप्त है। अपनी उपस्थिति स्वयं दर्ज करानी पड़ती है और लोकतंत्र के लोक को अब जाकर महसूस हुआ है कि अपनी उपस्थिति दर्ज करा ही देनी चाहिए। 
ऐसे प्रदर्शनों के अपने मनोरंजक पक्ष भी हुआ करते हैं। भारतीय मस्तिष्क  की उर्वरता को कोई जवाब तो है ही नहीं, यह आपको मानना पड़ेगा । पहले तो विरोध नहीं, और जब विरोध तो ऐसे -ऐसे तरीके कि विस्मित और स्मित हुए बिना तो आप रह ही नहीं सकते। सरकारी तंत्र के एक से एक कार्टून और एक से एक नारे! अविश्वसनीय  !! कुछ तो अश्लीलता  की सीमा तक भी पहुँचने की कोशिश  करते हुए तो कुछ जैसे दार्शनिक  गंभीरता लिए हुए। 
हर तरह की व्यवस्था के लिए लोग न जाने कहाँ से आ गये हैं। बाहर से भोजन के पैकेट निवेदन करके दिए जा रहे हैं। अंदर भी कुछ कम नहीं। अनेक निजी और संगठनों के लंगर लगातार – चावल-दाल, छोले, राजमा , पूड़ी- सब्जी ही नहीं, जूस तक का भी इंतजाम बिलकुल सेवाभाव से। 
शायद  यही अपने देश की सांस्कृतिक और सह अस्तित्व की विशेषता  है। अपने – अपने हिस्से का प्यार बाँटे बिना लोग रह नहीं पाते। जैसे कहीं से लोगों को पता चल गया हो कि कोई यज्ञ हो रहा है और अपने हिस्से की समिधा डाले बिना जीवन सफल ही नहीं होगा। है तो यह एक यज्ञ ही । परन्तु वापस  आते – आते एक प्रश्न  ने कुरेदना शुरू  ही कर दिया । अन्ना का यह आंदोलन तो सफल होगा ही, सम्भवतः राजनैतिक , प्रशासनिक और सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार का एक बड़ा भाग समाप्त भी हो जाए, किन्तु क्या हम अपने निजी जीवन में भी  भ्रष्टाचार  से मुक्त हो पाएंगे? क्या ऐसा भी दिन आएगा जब तंत्र के साथ लोक भी अपने कर्तव्य की परिभाषा  और मर्यादा समझेगा?
खैर, अभी तो अन्ना जी और उनके आन्दोलन में भाग लेने वाले असंख्य जन को सफलता की शुभकामनाएँ !
अब कुछ झलकियाँ भी जो रविवार के दिन देखी गईं-

अन्ना जी मंच पर : भजन गाते कलाकार 
भ्रष्टाचार के विरुद्ध छोटों की बड़ी जंग 
इस ज़ज्बे को देखिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध हनुमानजी और उनकी सेना 
बिन बुलाए हम भी आए :देश हमारा भी तो है 
हम भी हैं जोश में : देश के लिए 

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आज़ादी की दूसरी लड़ाई

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 19, 2011

-हरिशंकर राढ़ी
नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से बाहर निकलते ही एक आदमी ने पूछा-‘‘ भाई साहब, ये रामलीला मैदान किधर है ?’’ मन में कुछ प्रसन्नता सी हुई और उसे रास्ता बताया- ‘‘ बस इधर सामने से निकल जाइए, ये रहा रामलीला मैदान! वैसे आज तो सभी रास्ते रामलीला मैदान ही जा रहे हैं। किसी भी हुजूम को पकड़ लीजिए, रामलीला मैदान पहुँच जाएंगे। इतने दिनों बाद पहली बार तो असली रामलीला हो रही है वहाँ ! वरना रावणलीला से किसे फुरसत मिलती है यहाँ ? वैसे मैं भी वहीं चल रहा हूँ, अगर डर न लग रहा हो तो मेरे साथ चले चलिए। ’’श्रीमान जी मुस्कराए- ‘‘ डर से बचने के लिए ही तो यहाँ आया हूँ। अगर आज भी हम डर गए तो डर से फिर कभी बच नहीं पाएंगे। जहाँ देश  इतने संकट से गुजर रहा हो, वहाँ भी डरने के लिए  बचता क्या है? और डर तो नहीं रहा है एक सत्तर पार का बुजुर्ग जिसका अपना कोई रक्तसंबन्धी ही नहीं है, जो पूरे देश को अपना संबन्धी समझ बैठा है तो मैं क्यों डरूँ?’’
गेट से बाहर निकलकर कमला मार्किट वाली सड़क पर पहुँचा तो जुलूस ही जुलूस । मै भी एक अनजाने जुलूस का हिस्सा बन गया । शायद  पहली बार भीड़तंत्र अच्छा लग रहा था। हर वर्ग, हर उम्र और हर प्रकार के व्यक्ति एक साथ। नारों की आवाज के नीचे ट्रैफिक के शोर  का कोई पता ही नहीं। अगले चौराहे पर पुलिस की बैरीकेडिंग और साथ -साथ स्वयंसेवकों के पानी और खाद्य सामग्री से भरे छोटे ट्रक आगन्तुकों का स्वागत कर रहे थे। हल्की – हल्की बारिश  हो रही थी और प्रवेश  द्वार पर पानी भरा हुआ था-बेहद डबरीला । लेकिन जैसे आज किसी को अपने फैशन  की जैसे चिन्ता ही नहीं। गौरांगी आधुनिकाएं भी इस डबरीले पानी का जैसे उपहास उडा रहीं थीं । उन्हें न तो अपने प्यारे पैरों के गन्दे हो जाने की चिन्ता थी और न ही कीमती सैंडिलों के खराब हो जाने की। आज तो बिलकुल बराबर का साथ था उनका भी । अपनी सुरीली आवाज में नारे और लगा रही थीं। 
पुलिस बल तो भारी संख्या में तैनात था ही। पर यह पुलिस जैसे कुछ अलग सी लग रही थी – बिलकुल शांत  और सहयोगी। न तो कोई अपशब्द और न चेहरे पर धौंस की कोई अभिव्यक्ति । यह कहीं से नहीं लगता था कि अभी चार दिन पहले इसी पुलिस ने इसी अन्ना को बिला वजह गिरफ्तार किया होगा। वह शक्ति  तो कोई और ही रही होगी जिसने इस शक्ति को संचालित किया होगा वरना ऐसा कौन होगा इस देश में जिसे आजादी के बाद भ्रष्टाचार  ने न रुलाया होगा। रही सही कसर जनता के नारे पूरी कर रहे थे- ‘‘ये अन्दर की बात है, पुलिस हमारे साथ है। वर्दी छोड़ के आएंगे , अन्ना – अन्ना चिल्लाएंगे ।’’ सघन जाँच के बाद अन्दर जाने दिया जा रहा था। अच्छा लगा और आज किसी को कोई शिकायत  नहीं थी। आदमी खुश  हो तो क्या – क्या सह लेता है! पर अब शायद भ्रष्टाचार न सहे!
लगभग ढाई बज रहे थे और अन्ना जी मंच पर विराज रहे थे। इन्द्रदेव पता नहीं खुश थे या नाराज क्योंकि सामान्य बारिश हो रही थी । रामलीला मैदान पहले की बारिश से गीला हो चुका था पर पब्लिक को कोई फरक ही नहीं पड़ रहा था। मेरे एक मित्र कहते थे कि हिन्दुस्तान की पब्लिक को फरक बहुत देर से पड़ता है। पर एक बार जब पड़ जाता है तो वह मानती नहीं । पहले शिकार  होती है फिर शिकार करती है। यहाँ के धर्म की यह विशेषता  है। यह बचने का उपाय तबतक नहीं ढूँढ़ती जब तक पानी नाक से ऊपर नहीं आने लगता । इसकी दूसरी विशेषता  यह है कि यह भारतीय रेल के डिब्बे की तरह। पूरी तरह टिकाऊ और मजबूत लेकिन इंजन की तलाश  में है। एक बार एक इंजन लग जाए, कैसा भी, तो यह कितना भी बोझ खींच ले जाए। उनकी बात आज मुझे सही लग रही थी। उसे एक इंजन मिल गया था और अब वह इस इंजन के पीछे-पीछे कहीं तक और कोई भी वजन लेकर जाने को बेताब है।
हुजूम ही हुजूम और नारे ही नारे। मैं कोई रिपोर्ट नहीं कर रहा हूँ। यह तो सभी ने मीडिया की कृपा से प्रतिक्षण देखा ही है। मैं तो इस देश की जनता की देर आयद, दुरुस्त आयद की भावना को पढ़ने की कोशिश  कर रहा हूँ। लोग तो ऐसे भी थे जिन्हें यह नहीं मालूम कि ये जनलोकपाल क्या होता है और कानून बनाता कौन है। हाँ, इस व्यवस्था और मंहगाई से परेशान  थे और ये सोचकर आए थे कि कोई अच्छा काम हो रहा है और इसमें शरीक  होना कोई पुण्य है। भजन पर लोग नाच रहे थे और सुर मिला रहे थे – ये सुर संगीत के नहीं बल्कि समर्थन के थे। हाँ, अपना निराला हिन्दुस्तान वहाँ अपने व्यंग्यात्मक रूप में भी जिन्दा था – भीड़ में जहाँ मैं खड़ा था , वहीं किसी सज्जन का बटुआ अपने किसी हिन्दुस्तानी कलाकार भाई ने मार लिया था। 
चाहता था कि अन्ना को पास जाकर देखूँ। नजदीक जाना प्रतिबंधित था। एक गोल सा घेरा बनाया गया था। मंच के आगे मीडिया वालों का घेरा दिखा तो लगा कि प्रेस वालों के लिए कोई रास्ता तो जरूर है । सैकड़ों फोटोग्राफर और संवाददाता इधर- उधर आना- जाना मचाए हुए थे। परिचय पत्र दिखाने पर प्रेस दीर्घा में  प्रवेश मिल गया । न जाने कितने समारोहों में आना -जाना हुआ है इस आधार पर किन्तु आज जैसे पहली बार लगा कि यह परिचय पत्र सही जगह काम आया है और बहुत प्यारा है।
शाम  के लगभग चार बजे तक रामलीला मैदान आधा भर चुका था। उमड़े हुए संख्या बल को देखकर लग रहा जैसे मुझे भी आजादी की लड़ाई देखने का एक मौका मिल गया हो। अन्ना जी के पास तक पहुँच नहीं सका नहीं तो कहता कि आज सचमुच में भावनात्मक और संकलनात्मक रूप में एक सौ पचीस करोड़ माइनस पाँच सौ तैंतालीस (जो चयनित होने के बाद माननीय हो गए हैं ) तो आपके ही साथ हैं । ( फोटो भी थे पर मोबाइल धोखा दे गया और यहाँ प्रस्तुत नहीं कर पा रहा हूँ।)

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-3 (ओरछा)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
रानी महल के झरोखे से चतुर्भुज मंदिर का दर्शन
व्यवस्था और अव्यवस्था

कालिदास का मेघदूत हम पर मेहरबान था। पूरे रास्ते मूसलाधार बारिश का मज़ा लेते दिन के साढ़े दस बजे हम ओरछा पहुंच गए थे। पर्यटन स्थल होने के नाते यह एक व्यवस्थित कस्बा है। टैक्सी स्टैंड के पास ही बाहर से आने वाले निजी वाहनों के लिए भी अलग से व्यवस्थित पार्किंग है। सड़क के दाईं ओर मंदिरों का समूह है और बाईं ओर महलों व अन्य पुरातात्विक भवनों का। मध्यकालीन स्थापत्य कला के जैसे नमूने यहां चारों तरफ़ बिखरे पड़े हैं, कहीं और मिलना मुश्किल है। सबसे पहले हम रामराजा मंदिर के दर्शन के लिए ही गए। एक बड़े परिसर में मौजूद यह मंदिर का$फी बड़ा और अत्यंत व्यवस्थित है। अनुशासन इस मंदिर का भी प्रशंसनीय है। कैमरा और मोबाइल लेकर जाना यहां भी मना है। दर्शन के बाद हम बाहर निकले और बगल में ही मौजूद एक और स्थापत्य के बारे में मालूम किया तो पता चला कि यह चतुर्भुज मंदिर है। तय हुआ कि इसका भी दर्शन करते ही चलें। यह वास्तव में पुरातत्व महत्व का भव्य मंदिर है। मंदिर के चारों तर$फ सुंदर झरोखे बने हैं और दीवारों पर आले व दीपदान। छत में जैसी नक्काशी की हुई है, वह आज के हिसाब से भी बेजोड़ है। यह अलग बात है कि रखरखाव इसका बेहद कमज़ोर है। इन दोनों मंदिरों के पीछे थोड़ी दूरी पर लक्ष्मीनारायण मंदिर दिखाई देता है। आसपास कुछ और मंदिर भी हैं। हमने यहां भी दर्शन किया।

चतुर्भुज मंदिर के बाईं तरफ़ है श्री रामराजा मंदिर

नीचे उतरे तो रामराजा मंदिर के दूसरे बाजू में हरदौल जी का बैठका दिखा। वर्गाकार घेरे में बना यह बैठका इस रियासत की समृद्धि की कहानी कहता सा लगता है। आंगन के बीच में एक शिवालय भी है। सावन का महीना होने के कारण यहां स्थानीय लोगों की का$फी भीड़ थी। इस पूरे क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा बाज़ार भी है। यह सब देखते-सुनते हमें का$फी देर बीत गई। बाहर निकले तो 12 बज चुके थे। भोजन अनिवार्य हो गया था, लिहाजा रामराजा मंदिर के सामने ही एक ढाबे में भोजन किया।

जहांगीर महल
स्थापत्य के अनूठे नमूने

मंदिरों के ठीक सामने ही सड़क पार कर राजमहल थे। भोजन के बाद हम उधर निकल पड़े। मालूम हुआ कि यहां प्रति व्यक्ति दस रुपये का टिकट लगता है। कई विदेशी सैलानी भी वहां घूम रहे थे। इस किले के भीतर दो मंदिर हैं, एक संग्रहालय और एक तोपखाना भी। पीछे कई और छोटे-बड़े निर्माण हैं। अनुमान है कि ये बैरक, अधिकारियों के आवास या कार्यालय रहे होंगे। मुख्य महलों को छोड़कर बा$की सब ढह से गए हैं। सबसे पहले हम रानी महल देखने गए। मुख्यत: मध्यकालीन स्थापत्य वाले इस महल की सज्जा में प्राचीन कलाओं का प्रभाव भी सा$फ देखा जा सकता है।

जहांगीर महल के आंगन में बना हम्माम
इस महल में वैसे तो कई जगहों से चतुर्भुज मंदिर की स्पष्टï झलक मिल सकती है, पर एक ख़्ाास झरोखा ऐसा भी है जहां से चतुर्भुज मंदिर और रामराजा मंदिर दोनों के दर्शन किए जा सकते हैं। कहा जाता है कि इसी जगह से रानी स्वयं दोनों मंदिरों के दर्शन करती थीं। यह अलग बात है कि अब उस झरोखे वाली जगह पर भी कूड़े का ढेर लगा हुआ है। यह राजा मधुकर शाह की महारानी का आवास था, जो भगवान राम की अनन्य भक्त थीं और यहां स्थापित भगवान राम का मंदिर उनका ही बनवाया हुआ है। महल का आंगन भी बहुत बड़ा और भव्य है। बीचोबीच एक बड़ा सा चबूतरा बना हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि यहां रानी का दरबार लगता रहा होगा। जबकि राजमंदिर का निर्माण स्वयं राजा मधुकर शाह ने अपने शासनकाल 1554 से 1591 के बीच करवाया था।

इसके पीछे जहांगीर महल है। इसका निर्माण 17वीं शताब्दी में मु$गल सम्राट जहांगीर के सम्मान में राजा बीर सिंह देव ने करवाया था। वर्गाकार विन्यास में बने इस महल के चारों कोनों पर बुर्ज बने हैं। जालियों के नीचे हाथियों और पक्षियों के अलंकरण बने हैं। ऊपर छोटे-छोटे कई गुंबदों की शृंखला बनी है और बीच में कुछ बड़े गुंबद भी हैं। हिंदू और मु$गल दोनों स्थापत्य कलाओं का असर इस पर सा$फ देखा जा सकता है और यही इसकी विशिष्टïता है। भीतर के कुछ कमरों में अभी भी सुंदर चित्रकारी देखी जा सकती है। कुल 136 कक्षों वाले इस महल के बीचोबीच एक बड़े से हौजनुमा निर्माण है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे कुएं जैसी अष्टकोणीय आकृतियां हैं। हालांकि इनकी गहराई बहुत मामूली है। अंदाजा है कि इसका निर्माण हम्माम के तौर पर कराया गया होगा।

जहांगीर महल से पीछे दिख रही बेतवा की ख़ूबसूरत घाटी

महल की छत से पीछे देखने पर पीछे मीलों तक फैली बेतवा नदी की घाटी दिखाई देती है। दूर तक फैली इस नीरव हरियाली के बीच कई छोटे-बड़े निर्माण और कुछ निर्माणों के ध्वंसावशेष भी थे। ध्यान से देखने पर बेतवा की निर्मल जलधारा भी क्षीण सी दिखाई दे रही थी। भीतर गाइड किसी विदेशी पर्यटक जोड़े को टूटी-फूटी अंग्रेजी में बता रहा था, ‘पुराने ज़माने महल के नीचे से एक सुरंग बनी थी, जो बेतवा के पार जाकर निकलती थी।’ आगे उसने बताया कि इस महल का निर्माण 22 साल में हुआ था और जहांगीर इसमें टिके सि$र्फ एक रात थे। राढ़ी जी गाइड के ज्ञान से ज्य़ादा उसके आत्मविश्वास पर दंग हो रहे थे।

ख़ैर, सच जो हो, पर ‘ओरछा’ का शाब्दिक अर्थ तो छिपी हुई जगह ही है। इसका इतिहास भी अद्भुत है। इसकी स्थापना टीकमगढ़ के बुंदेल राजा रुद्र प्रताप सिंह ने 1501 में की थी, पर असमय कालकवलित हो जाने के कारण वे निर्माण पूरा होते नहीं देख सके। एक गाय को बचाने के प्रयास में वे शेर के पंजों के शिकार हो गए थे। बाद में राजा बीर सिंह देव ने अपने 22 वर्षों के शासन काल में यहां के अधिकतर मनोरम निर्माण कराए। उन्होंने पूरे बुंदेल क्षेत्र में 52 किले बनवाए थे। दतिया का किला भी उनका ही बनवाया हुआ है। बाद में 17वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में ही ओरछा के राजा मु$गल साम्राज्य से विद्रोह किया। फिर शाहजहां ने आक्रमण करके इस पर $कब्ज़ा कर लिया, जो 1635 से 1641 तक बना रहा। बाद में ओरछा राज्य को अपनी राजधानी टीकमगढ़ में करनी पड़ी।

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो…

महलों के बहाने कुछ देर तक अतीत में जीकर हम उबरे तो सीधे बेतवा की ओर चल पड़े। मुश्किल से 10 मिनट की पैदल यात्रा के बाद हम नदी के तट पर थे। महल की छत से दिखने वाली घाटी से भी कहीं ज्य़ादा सुंदर यह नदी है। नदी की अभी शांत दिख रही जलधारा के बीच-बीच में खड़े लाल पत्थर के टीलेनुमा द्वीप अपने शौर्य की कथा कह रहे थे या बेतवा के वेग से पराजय की दास्तान सुना रहे थे, यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा था। यूं मुझे नाव चलाने का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस पर नाव चलाना आसान काम नहीं होगा। पानी के तल के नीचे कहां पत्थर के टीलों में फंस जाए, कहा नहीं जा सकता। मैंने मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘बेतवा बहती रहीÓ का जिक्र किया तो राढ़ी जी कालिदास के मेघदूत को याद करने लगे-

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानीं


गत्वा सद्य: फलमविकलं कामुकत्वस्य लब्धा।


तीरोपांत स्तनित सुभगं पास्यसि स्वादु यस्मात्

सभ्रूभंगं मुखमिव पयो वेत्रवत्याश्चलोर्मि।।

कालिदास का प्रवासी यक्ष अपने संदेशवाहक मित्र मेघ को रास्ते की जानकारी देते हुए कहता है- हे मित्र! जब तू इस दशार्ण देश की राजधानी विदिशा में पहुंचेगा, तो तुझे वहां विलास की सब सामग्री मिल जाएगी। जब तू वहां सुहानी और मनभावनी नाचती हुई लहरों वाली वेत्रवती के तट पर गर्जन करके उसका मीठा जल पीएगा, तब तुझे ऐसा लगेगा कि मानो तू किसी कटीली भौहों वाली कामिनी के ओठों का रस पी रहा है।

बेतवा के घाट पर

बेतवा का ही पुराना नाम है ‘वेत्रवतीÓ और संस्कृत में ‘वेत्रÓ का अर्थ बेंत है। कालिदास का यह वर्णन किसी हद तक आज भी सही लगता है। प्रदूषण का दानव अभी बेतवा पर वैसा $कब्ज़ा नहीं जमा सका है, जैसा उसने अपने किनारे महानगर बसा चुकी नदियों पर जमा लिया है। इसके सौंदर्य की प्रशंसा बाणभट्टï ने भी कादंबरी में की है। वैसे वराह पुराण में इसी वेत्रवती को वरुण की पत्नी और राक्षस वेत्रासुर की मां बताया गया है। शायद इसीलिए इसमें दैवी और दानवीय दोनों शक्तियां समाहित हैं। गंगा, यमुना, मंदाकिनी आदि पवित्र नदियों की तरह बेतवा के तट पर भी रोज़ शाम को आरती होती है। लेकिन बेतवा की आरती में हिस्सेदारी हमारी नियति में नहीं था। क्योंकि हमें झांसी से ताज एक्सप्रेस पकडऩी थी, जो तीन बजे छूट जाती थी। मौसम पहले ही ख़्ाराब था। बूंदाबांदी अभी भी जारी थी। समय ज्य़ादा लग सकता था। लिहाजा डेढ़ बजते हमने ओरछा और बेतवा के सौंदर्य के प्रति अपना मोह बटोरा और चल पड़े वापसी के लिए टैक्सी की तलाश में।

                                                                      — इति–

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र-2 (सोनागिरि)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन



सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का विहंगम दृश्य



चल पड़े सोनागिरि

मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद यह तय नहीं हो पा रहा था कि आगे क्या किया जाए। तेज सिंह इसके निकट के ही कसबे टीकमगढ़ के रहने वाले हैं। उनकी इच्छा थी कि सभी मित्र यहां से दर्शनोपरांत झांसी चलें और ओरछा होते हुए एक रात उनके घर ठहरें। जबकि राढ़ी जी एक बार और मां पीतांबरा का दर्शन करना चाहते थे। मेरा मन था कि आसपास की और जगहें भी घूमी जाएं। क्योंकि मुझे विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारी के अनुसार दतिया कसबे में ही दो किले हैं और संग्रहालय है। इसके अलावा यहां से 15 किमी दूर जैन धर्मस्थल सोनागिरि है। 17 किमी दूर उनाव में बालाजी नाम से प्रागैतिहासिक काल का सूर्य मंदिर, करीब इतनी ही दूर गुजर्रा में अशोक का शिलालेख, 10 किमी दूर बडोनी में गुप्तकालीन स्थापत्य के कई अवशेषों के अलावा बौद्ध एवं जैन मंदिर, भंडेर मार्ग पर 5 किमी दूर बॉटैनिकल गार्डन, 4 किमी दूर पंचम कवि की तोरिया में प्राचीन भैरव मंदिर और 8 किमी दूर उडनू की तोरिया में प्राचीन हनुमान मंदिर भी हैं। दतिया कसबे में ही दो मध्यकालीन महल हैं। एक सतखंडा और दूसरा राजगढ़। इनमें राजगढ़ पैलेस में एक संग्रहालय भी है। दतिया से 70 किमी दूर स्यौंधा है। सिंध नदी पर मौजूद वाटरफॉल के अलावा यह कन्हरगढ़ फोर्ट और नंदनंदन मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। 30 किमी दूर स्थित भंडेर में सोन तलैया, लक्ष्मण मंदिर और पुराना किला दर्शनीय हैं। महाभारत में इस जगह का वर्णन भांडकपुर के नाम से है। मैं दतिया के आसपास की ये सारी जगहें देखना चाहता था। समय कम था तो भी कुछ जगहें तो देखी ही जा सकती थीं। मंदिर में ही खड़े-खड़े देर तक विचार विमर्श होता रहा और आख़्िारकार यह तय पाया गया कि आज की रात दतिया में गुजारी जाए। हम सब तुरंत मंदिर के पीछे मेन रोड पर आ गए। वहीं एक होटल में कमरे बुक कराए और फ्रेश होने चल पड़े। फ्रेश होकर निकले तो मालूम हुआ कि तेज और तोमर जी अपने किसी रिश्तेदार से मिलने कस्बे में चले गए हैं। वे लोग आ जाएं तो हम घूमने निकलें। पर वे लोग आए $करीब दो घंटे इंतज़ार के बाद। फिर का$फी देर विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि अब हमें सोनागिरि चलना चाहिए। आख़्िारकार दो सौ रुपये में एक टैंपो तय हुआ और हम सब सोनागिरि निकल पड़े।

दतिया से सोनागिरि के बीच एक नयनिभिराम दृश्य
अलौकिक अनुभूति
क़रीब 5 किमी ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलने के बाद ग्वालियर हाइवे मिल गया। हालांकि यह मार्ग भी अभी बन ही रहा था, पर फिर भी शानदार था। दृश्य पूरे रास्ते ऐसे ख़ूबसूरत कि जिधर देखने लगें उधर से आंखें किसी और तर$फ घुमाते न बनें। दूर तक पठार की ऊबड़-खाबड़ ज़मीन पर फैली हरियाली और ऊपर धरती की ओर झुकते बादलों से भरे आसमान में अस्ताचल की ओर बढ़ते सूरज की लालिमा। किसी को भी अभिभूत कर देने के लिए यह सौंदर्य काफ़ी था। थोड़ी देर बाद सड़क छोड़कर हम फिर लिंक रोड पर आ गए थे। हरे-भरे खेतों के बीच कहीं-कहीं बड़े टीलेनुमा ऊंचे पहाड़ दिख जाते थे और वे भी हरियाली से भरे हुए। हर तरफ़ फैला हरियाली का यह साम्राज्य शायद सावन का कुसूर था।

दूर से ही सोनागिरि पहाड़ी पर मंदिरों का समूह दिखा तो हमारे सुखद आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। पहाड़ी पर रंग-बिरंगी हरियाली के बीच श्वेत मंदिरों का समूह देख ऐसा लगा, गोया हम किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हों। साथ के सभी लोग कह उठे कि आज यहां ठहरना वसूल हो गया। मालूम हुआ कि इस पहाड़ी पर कुल 82 मंदिर हैं और नीचे गांव में 26। इस तरह कुल मिलाकर यहां 108 मंदिरों का पूरा समूह है।


सोनागिरि में श्री नंदीश्वर द्वीप के समक्ष एन प्रकाश, तेज सिंह और अजय तोमर. पीछे खड़े हैं हरिशंकर राढ़ी

 यह जैन धर्म की दिगम्बर शाखा के लोगों के बीच अत्यंत पवित्र धर्मस्थल के रूप में मान्य है। यहां मुख्य मंदिर में भगवान चंद्रप्रभु की 11 फुट ऊंची प्रतिमा प्रतिष्ठित है। भगवान शीतलनाथ और पाश्र्वनाथ की प्रतिमाएं भी यहां प्रतिष्ठित हैं। श्रमणाचल पर्वत पर स्थित इस स्थान से ही राजा नंगानंग कुमार ने मोक्ष प्राप्त किया था। इनके अलावा नंग, अनंग, चिंतागति, पूरनचंद, अशोकसेन, श्रीदत्त तथा कई अन्य संतों को यहीं से मोक्ष की उपलब्धि हुई। $करीब 132 एकड़ क्षेत्रफल में फैली दो पहाडिय़ों वाले इस क्षेत्र को लघु सम्मेद शिखर भी कहते हैं। यहीं बीच में एक नंदीश्वर द्वीप नामक मंदिर भी है, इसमें कई जैन मुनियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। इन पहाडिय़ों पर हम $करीब दो घंटे तक घूमते रहे। आते-जाते श्रद्धालुओं के बीच नीरवता तोडऩे के लिए यहां सि$र्फ मयूरों तथा कुछ अन्य पक्षियों का कलरव था। इन पहाडिय़ों पर मोर जिस स्वच्छंदता के साथ विचरण कर रहे थे, वह उनकी निर्भयता की कहानी कह रहा था। सुंदरता के साथ शांति का जैसा मेल यहां है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इहलोक में ही अलौकिक अनुभूति देते इस दिव्य वातावरण को छोड़ कर आने का मन तो नहीं था, पर हमें वापस होटल पहुंचना भी था। क्योंकि अगले दिन बिलकुल सुबह ही ओरछा के लिए निकलना था।

आप चाहें तो इसे दतिया की नाइटलाइफ कह सकते हैं

एक बार फिर दर्शन

रात में क़रीब साढ़े सात बजे हम दतिया पहुंच गए थे। लौटते समय जिस रास्ते से टैक्सी वाले हमें ले आए, वह रास्ता शहर के भीतर से होते हुए आता था। गलियों में व्यस्त यहां के जनजीवन का नज़ारा लेते हम होटल पहुंचे। कई जगह निर्माण चल रहे थे और शायद इसीलिए जि़ंदगी का$फी अस्त-व्यस्त दिखाई दे रही थी। होटल से तुरंत हम फिर पीतांबरा मंदिर निकल गए। रात की मुख्य आरती 8 बजे शुरू होती है। उसमें शामिल होने के बाद काफी देर तक मंदिर परिसर में ही घूमते रहे। इस समय भीड़ बहुत बढ़ गई थी। मंदिर से लौटते समय तय किया गया कि खाना बाहर ही खाएंगे। हालांकि बाहर भोजन बढिय़ा मिला नहीं। बहरहाल, रात दस बजे तक होटल लौट कर हम सो गए।

सुबह उठते ही मैं सबसे पहले कैमरा होटल की छत पर गया। पीछे राजगढ़ किले का दृश्य था और आगे दूर तक फैला पूरे शहर का विहंगम नज़ारा। इसे कैमरे में $कैद कर मैं नीचे उतरा और तैयारी में जुट गया। साढ़े सात बजे तक दतिया शहर छोड़ कर झांसी के रास्ते पर थे। झांसी पहुंच कर तेज सिंह ने न तो ख़ुद कुछ खाया और न हमें खाने दिया। उनका इरादा यह था कि सबसे पहले ओरछा में रामराजा के दर्शन करेंगे। इसके बाद ही कुछ खाएंगे। ख़्ौर, ओरछा के लिए झांसी बस स्टैंड से ही टैक्सी मिल गई।
जारी……….

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अतीत का आध्यात्मिक सफ़र

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 12, 2011

इष्ट देव सांकृत्यायन
हम दतिया पहुंचे तो दिन के करीब सवा बज चुके थे। ट्रेन बिलकुल सही समय से थी, लेकिन भूख से हालत खराब होने लगी थी। चूंकि सुबह पांच बजे ही घर से निकले थे। चाय के अलावा और कुछ भी नहीं ले सके थे। ट्रेन में भी सिर्फ एक कप चाय ही पी। उतर कर चारों तरफ नज़र दौड़ाई तो लंबे प्लैटफॉर्म वाले इस छोटे स्टेशन पर सिर्फ़ ताज एक्सप्रेस से उतरा समूह ही दिख रहा था। जहां हम उतरे उस प्लैटफॉर्म के बिलकुल बगल में ही टैंपुओं का झुंड खड़ा था। इनमें प्राय: सभी पीतांबरा पीठ की ओर ही जा रहे थे। तेज सिंह ने एक टैंपू ख़ाली देखकर उससे पूछा तो मालूम हुआ कि सि$र्फ पांच सवारियां लेकर नहीं जाएगा। पूरे 11 होंगे तब चलेगा। तय हुआ कि कोई दूसरी देखेंगे। पर जब तक दूसरी देखते वह भर कर चल चुका था। अब उस पर भी हमें इधर-उधर लटक कर ही जाना पड़ता। बाद में जितने टैंपुओं की ओर हम लपके सब फटाफट भरते और निकलते गए। क़रीब बीस मिनट इंतज़ार के बाद आख़िर एक टैंपू मिला और लगभग आधे घंटे में हम पीतांबरा पीठ पहुंच गए।
दतिया का महल
वैसे स्टेशन से पीठ की दूरी कोई ज्य़ादा नहीं, केवल तीन किलोमीटर है। यह रास्ते की हालत और कस्बे में ट्रैफिक की तरतीब का कमाल था जो आधे घंटे में यह दूरी तय करके भी हम टैंपू वाले को धन्यवाद दे रहे थे। टैंपू ने हमें मंदिर के प्रवेशद्वार पर ही छोड़ा था, लिहाजा तय पाया गया कि दर्शन कर लें, इसके बाद ही कुछ और किया जाएगा। फटाफट प्रसाद लिए, स्टैंड पर जूते जमा कराए और अंदर चल पड़े। दोपहर का वक्त होने के कारण भीड़ नहीं थी। मां का दरबार खुला था और हमें दिव्य दर्शन भी बड़ी आसानी तथा पूरे इत्मीनान के साथ हो गया। अद्भुत अनुभूति हो रही थी।
वल्गा से बगला

इस पीठ की चर्चा पहली बार मैंने $करीब डेढ़ दशक पहले सुनी थी। गोरखपुर में उन दिनों आकाशवाणी के अधीक्षण अभियंता थे डॉ. शिवमंदिर प्रधान। उनके ससुर इस मंदिर के संस्थापक स्वामी जी के शिष्य थे। डॉ. उदयभानु मिश्र और अशोक पाण्डेय ने मुझे इस पीठ और बगलामुखी माता के बारे में का$फी कुछ बताया था। हालांकि जो कुछ मैंने समझा था उससे मेरे मन में माता के प्रति आस्था कम और भय ज्य़ादा उत्पन्न हुआ था। इसकी वजह मेरी अपनी अपरिपक्वता थी। बाद में मालूम हुआ कि ‘बगला’ का अर्थ ‘बगुला’ नहीं, बल्कि यह संस्कृत शब्द ‘वल्गा’ का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ ‘दुलहन’ होता है। उन्हें यह नाम उनके अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण दिया गया। पीतवसना होने के कारण इन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है।

स्थानीय लोकविश्वास है कि दस महाविद्याओं में आठवीं मां बगलामुखी की यहां स्थापित प्रतिमा स्वयंभू है। पौराणिक कथा है कि सतयुग में आए एक भीषण तू$फान से जब समस्त जगत का विनाश होने लगा तो भगवान विष्णु ने तप करके महात्रिपुरसुंदरी को प्रसन्न किया। तब सौराष्टï्र क्षेत्र (गुजरात का एक क्षेत्र) की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीत देवी के हृदय से दिव्य तेज निकला। उस तेज के चारों दिशाओं में फैलने से तू$फान का अंत हो गया। इस तरह तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं और गृहस्थों के लिए यह समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। मंदिर में स्थापित प्रतिमा का ही सौंदर्य ऐसा अनन्य है कि जो देखे, बस देखता रह जाए।

अनुशासन हर तरफमुख्य मंदिर के भवन में ही एक लंबा बरामदा है, जहां कई साधक बैठे जप-अनुष्ठान में लगे हुए थे। सामने हरिद्रा सरोवर है। बगल में मौजूद एक और भवन के बाहरी हिस्से में ही भगवान परशुराम, हनुमान जी, कालभैरव तथा कुछ अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। इस मंदिर के अंदर जाते ही सबसे पहले पुस्तकों की एक दुकान और फिर शिवालय है। यहां मैंने पहला ऐसा शिवालय देखा, जहां शिव पंचायतन में स्थापित श्रीगणेश, मां पार्वती, भगवान कार्तिकेय एवं नंदीश्वर सभी छोटे-छोटे मंदिरनुमा खांचों में प्रतिष्ठित हैं। अकेले शिवलिंग ही हैं, जो यहां भी हमेशा की तरह अनिकेत हैं। वस्तुत: यह तंत्र मार्ग का षडाम्नाय शिवालय है, जो बहुत कम ही जगहों पर है। इस भवन के पीछे एक छोटे भवन में सातवीं महाविद्या मां धूमावती का मंदिर है। यहां इनका दर्शन सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए निषिद्ध है। महाविद्या धूमावती की प्रतिमा की प्रतिष्ठा महाराज जी ने यहां भारत-चीन युद्ध के बाद कराई थी। असल में उस समय स्वामी जी के नेतृत्व में यहां राष्ट्ररक्षा अनुष्ठान यज्ञ किया गया था।



दतिया कसबे का एक विगंगम दृश्य



बाईं तरफ एक अन्य भवन में प्रतिष्ठित हनुमान जी की प्रतिमा का दर्शन दूर से तो सभी लोग कर सकते हैं, लेकिन निकट केवल वही जा सकते हैं जिन्होंने धोती धारण की हुई हो। यह नियम बगलामुखी माता के मंदिर भवन में प्रवेश के लिए भी है। पैंट, पजामा या सलवार-कुर्ता आदि पहने होने पर सि$र्फ बाहर से ही दर्शन किया जा सकता है। भवन के अंदर सि$र्फ वही लोग प्रवेश कर सकते हैं, जिन्होंने धोती या साड़ी पहनी हो। कैमरा आदि लेकर अंदर जाना सख्त मना है। मंदिर में अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि न तो यहां कहीं गंदगी दिखती है और न हर जगह चढ़ावा चढ़ाया जा सकता है। तंत्रपीठ होने के कारण अनुशासन बहुत कड़ा है। पूजा-पाठ के नाम पर ठगी करने वालों का यहां कोई नामो-निशान भी नहीं है।
संस्कृत और संगीत की परंपरा

मुख्य मंदिर के सामने हरिद्रा सरोवर है और पीछे मंदिर कार्यालय एवं कुछ अन्य भवन। इन भवनों में ही संस्कृत ग्रंथालय है और पाठशाला भी। मालूम हुआ कि पीठ संस्थापक स्वामी जी महाराज संस्कृत भाषा-साहित्य तथा शास्त्रीय संगीत के अनन्य प्रेमी थे। हालांकि स्वामी जी की पृष्ठभूमि के बारे में यहां किसी को कोई जानकारी नहीं है। लोग केवल इतना जानते हैं कि सन 1920 में उन्होंने देवी की प्रेरणा से ही यहां इस आश्रम की स्थापना की थी। फिर उनकी देखरेख में ही यहां सारा विकास हुआ। शास्त्रीय संगीत की कई बड़ी हस्तियां स्वामी जी के ही कारण यहां आ चुकी हैं और इनमें कई उनके शिष्य भी हैं।

मां बगलामुखी के दर्शन की वर्षों से लंबित मेरी अभिलाषा आनन-फानन ही पूरी हुई। हुआ कि मंगल की शाम हरिशंकर राढ़ी से फोन पर बात हुई। उन्होंने कहा, ‘हम लोग दतिया और ओरछा जा रहे हैं। अगर आप भी चलते तो मज़ा आ जाता।’ पहले तो मुझे संशय हुआ, पर जब पता चला कि केवल दो दिन में सारी जगहें घूम कर लौटा जा सकता है और ख़र्च भी कुछ ख़ास नहीं है तो अगले दिन सबका रिज़र्वेशन मैंने ख़ुद ही करवा दिया। राढ़ी के साथ मैं, तेज सिंह, अजय तोमर और एन. प्रकाश भी।  

ज़ारी……..

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रामेश्वरम : जहाँ राम ने की शक्तिपूजा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 5, 2011

हरिशंकर राढ़ी
(रामेश्वरम और दक्षिण भारत की यात्रा के लगभग दो साल पूरे होने वाले हैं . तबसे कई  यात्राएं और हुई  पर यह यात्रा विवरण अधूरा ही रह गया . इसे पूरा करने का एक और प्रयास …)
बाईस कुंडों का स्नान पूरा हुआ तो लगा कि एक बड़ा कार्य हो गया है। परेशानी जितनी भी हो घूम-घूम कर नहाने में, परन्तु कुल मिलाकर यहाँ अच्छा लगता है। परेशानी तो क्या , सच पूछा जाए तो इसमें भी एक आनन्द है। अन्तर केवल दृष्टिकोण  का है। आप वहाँ घूमने गए हैं तो वहाँ की परम्पराओं का पालन कीजिए और इस प्रकार उसे समझने का प्रयास भी।

स्नानोपरांत हम वापस अपने होटल आए और वस्त्र बदले । गीले वस्त्रों में दर्शन  निषिद्ध  है। अब हम मुख्य गोपुरम से दर्शनार्थ  मंदिर में प्रवेश  कर गए। एक जगह लिखा था- स्पेशल दर्शन । हमें  लगा कि यह कोई वीआईपी व्यवस्था या लाइन होगी । ज्यादा पूछताछ नहीं क्योंकि भाषा  की समस्या तो थी ही। न तो ठीक से हिन्दी जानने वाले और न अंगरेजी ही। तमिल से हमारा कोई दूर-दूर का रिश्ता नहीं ! वैसे भी मेरा मत यह रहता है कि मंदिर में दर्शन  लाइन में लगकर ही करना चाहिए।

खैर , लाइन में लगे- लगे बिल्कुल  आगे पहूँचे तो पता चला कि हमारा प्रसाद, फूल और हरिद्वार से लाया गया गंगाजल तो यहाँ से चढ़ेगा ही नहीं।  यह सामान्य लाइन है और यहाँ से आप केवल शिवलिंग के दर्शन कर सकते हैं। दर्शन तो हमने खूब किया था क्योंकि गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग पंक्ति में दूर से ही होने लग जाता है। अब प्रश्न  यह था कि हम अपना अर्घ्य, नैवेद्य आदि किस प्रकार अर्पित करें ? इस लाइन में तो अनावष्यक ही हमारा समय खराब हो गया । फिर भी राम द्वारा स्थापित शिव  की इस नगरी में आना एक लम्बी प्रतीक्षा के बाद हुआ था और सारे कार्य पूर्ण करके ही जाना था। अतः मैंने मित्र महोदय से आग्रह किया कि हम स्पेशल दर्शन की पंक्ति में पुनः लगें , गंगाजल अर्पित करें और पूजा करवा के ही चलें । अब दुबारा आना फिर न जाने कब हो। गोस्वामी तुलसी दास जी ने रामचरित मानस में इस ज्योतिर्लिंग के सम्बन्ध में श्रीराम के मुख से कहलाया है-
रामनाथ मंदिर गोपुरम ( चित्र गूगल से साभार )
       जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ।।

       जो  गंगाजल आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य  मुक्ति  नर  पाइहि ।।

मैं यहाँ इस बहस में नहीं पड़ना चाहता कि इस कथन में कितना सत्य है और कितना नहीं। मैं इस पर भी कोई निर्णय नहीं देना चाहता कि मैं धार्मिक हूँ,इश्वरवादी  हूँ या अनीश्वरवादी । पर हाँ , इतना तो तय है कि मैं अन्ध विश्वासी  या पोंगापंथी नहीं हूँ। यह भी सत्य है कि आस्था और विश्वाश  विज्ञान की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता। कुछ भी न हो , आत्मिक शान्ति  के लिए कुछ चीजों को बिना तर्क ही मान लेना बुरा नहीं होता , विषेशतः जब कोई हानि न हो रही हो। अंततः हम इस बार पूरी जानकारी लेकर स्पेशलदर्शन की लाइन में लगे। वस्तुतः इस लाइन में लगने के लिए प्रति व्यक्ति पचास रुपये का टिकट लेना पड़ता है। हमलोग कुल आठ प्राणी थे और इस प्रकार चार सौ रुपये का टिकट लेकर आगे बढ़े। यहाँ कोई भीड़ नहीं थी और दर्शनार्थियों  को समूह में अन्दर लिया जाता है। उनसे सामान्य पूजा करवाई जाती है और प्रसाद वगैरह चढ़वाया जाता है।

हमारा भी क्रम आया । रामेश्वरम  ज्योतिर्लिंग मेंदर्शनार्थियों को गर्भगृह में जाने की अनुमति नहीं है। ऐसी अनुमति दक्षिण भारत के किसी भी मंदिर में नहीं है। अब पूजा तो हो गई और पुजारियों ने हमारी गंगाजल की बोतल भी ले ली,किन्तु इसके पहले यह छानबीन जरूर की कि हमने कुल कितने टिकट लिए हैं। मेरे परिवार की चार टिकटें देखकर उन्होंने हमारा गंगाजल स्वीकार कर लिया और उसे अपने पात्र में डालकर शिवलिंग पर समर्पित भी कर दिया ( यह या तो उनकी भूल थी या फिर सदाशयता ) किन्तु मेरे मित्र का गंगाजल उन्होंने स्वीकार नहीं किया । दरअसल वहाँ गंगाजल के लिए पचास रुपये का टिकट अलग से लेना पड़ता है और इस सम्बन्ध में भी जानकारी के अभाव में हमसे भूल हो गई थी । अगर आपका कोई कार्यक्रम रामेश्वर  दर्शन का बनता है तो कृपया विशेष   दर्शन  और चढ़ावे का शुल्क  अलग से जमा कराकर रसीद ले लें।
दर्शनोपरांत हमारा ध्यान मंदिर की भव्यता पर गया और हम अवलोकन करने लगे । इसके वास्तु का जितना भी वैज्ञानिक विश्लेषण कर दिया जाए, इसकी शैली एवं विशालता की जितनी भी प्रशंसा कर दी जाए, पर इसको निहारने के अलौकिक आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है। इसके विशाल गलियारे, मजबूत स्तंभ और किसी किले जैसी दीवारें भारतीय संस्कृति के गौरव की गाथा स्वयं कहती हैं।मंदिर लगभग पंद्रह एकड़ क्षेत्र में फैला है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता  इसके गलियारे हैं जो लगभग चार हजार फीट लंबे हैं और चार हजार खंभों पर खड़े हैं । मंदिर का पूरबी गोपुरम 126फीट ऊँचा है और कुल नौ माले का बना है। पश्चिमी  गोपुरम भी अत्यन्त शानदार  है किन्तु इसकी ऊँचाई पूरबी गोपुरम से कम है।

मुझे लगा कि इस मंदिर का भव्य होना तो नितान्त आवश्यक ही है। यह वो जगह है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने आवश्यकता पड़ने पर शक्तिपूजा की थी । अपने समय के महाशक्तिशाली राजा रावण को परास्त करने के लिए उन्हें भी अतिरिक्त शक्ति की आवश्यकता थी । शिव तो कल्याणकारी, अपराजेय और औघड़ हैं ही, किन्तु मुझे लगता है कि राम की शिवपूजा राजनैतिक महत्त्व भी रखती है। आखिर राक्षसराज रावण किसकी शक्ति से इतना प्रभावशाली बन पाया? किस शक्ति ने उसे अजेय बना दिया और वह लगभग विश्वविजयी बन पाया! वह शक्ति तो शिव की ही थी! अतः इसमें राम की श्रद्धा के साथ एक कुशल राजनीति भी थी कि रावण को उसी के अस्त्र, उसी की शक्ति से मारा जाए। उसके ऊपर से शिव का वरदहस्त हटाया जाए और जब शिव ही साथ नहीं तो शिव होगा कैसे? अतः राम ने अपने सद्गुणों से, अपनी श्रद्धा से और अपनी विनम्रता से सर्वप्रथम शिव की पूजा की और अपना मार्ग प्रशस्त कर विजय अभियान पर चल दिए।

यह वही स्थल है जहाँ राम ने शक्तिपूजा की ।

ऐसा कहा जाता है कि बारहवीं षताब्दी तक शिवलिंग एक झोंपड़ी में स्थापित था। पहली बार इसके लिए पक्की इमारत श्रीलंका के पराक्रम बाहु द्वारा बनवाई गई। तदनन्तर इसे रामनाथपुरम के सेतुपर्थी राजाओं ने पूरा किया। मंदिर के कुछ विमान पल्लव राजाओं के काल में निर्मित विमान से साम्य रखते हैं। गलियारों का निर्माण कार्य अट्ठारहवीं शताब्दी  तक चलता रहा है। त्रावणकोर और मैसूर के राजाओं से मंदिर को प्रभूत आर्थिक सहायता मिलती रही है।

जैसा कि हमारे यहाँ प्रायः होता है,रामेश्वरम  या रामनाथ लिंगम से सम्बन्धित कुछ अन्य कथाएं भी प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार जब रावण का वध करके सीता सहित श्रीराम अयोध्या वापस आ रहे थे तो उन्होंने यहाँ शिव पूजा का मन बनया और उनका आभार प्रकट करना चाहा। वैसे भी वे सीताजी को अयोध्या वापसी तक अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों को दिखाते आए थे। गंधमादन पर्वत के पास उतरकर उन्होंने शिवपूजा की इच्छा प्रकट तो  शिव की प्रिय नगरी वाराणसी से शिवलिंग लाने का कार्य पवनपुत्र हनुमान को सौंपा गया।( एक कथा के अनुसार हनुमान जी को शिवलिंग कैलास पर्वत से लाना था।) जब तक हनुमान जी वाराणसी से शिवलिंग लेकर आते , पूजा का मुहूर्त निकला जा रहा था। अस्तु सीता जी ने रेत का शिवलिंग बना दिया और उसी की पूजा की गई। कुछ समय पश्चात  जब हनुमान जी वाराणसी से दूसरा शिवलिंग लेकर वापस आए तो समस्या हुई कि इसका क्या किया जाए। अन्ततः उस शिवलिंग की भी स्थापना कर दी गई और वह आज भी विश्वेश्वर , विश्वनाथ  , काशीलिंगम या हनुमान लिंगम के नाम से सुपूजित है और नियमानुसार इस लिंग की पूजा सर्वप्रथम होती है।
गंध मादन पर लेखक सपरिवार  (छाया : लेखक )

मंदिर के तीर्थ-  मंदिर के अन्दर स्थित बाइस कुंड अपने आप में तीर्थ हैं। इनका प्रभाव अलौकिक माना जाता है । समासतः इनके प्रभाव एवं नाम का उल्लेख इस प्रकार है-
1 -महालक्ष्मी तीर्थ( यहाँ कुबेर ने स्नान करके नवनिधियाँ प्राप्त कीं ),2- सावित्री तीर्थ,  3-गायत्री तीर्थ, 4- सरस्वती तीर्थ, 5- माधवतीर्थ,6- गंधमादन 7-कलाक्ष, 8-कलाय,9-नलतीर्थ, 10-नीलतीर्थ,11 – चक्रतीर्थ,12-शंखतीर्थ, 13-ब्रह्महत्या विमोचन तीर्थ ,14-सूर्यतीर्थ, 15- चन्द्रतीर्थ,16- गंग तीर्थ ,17-जमुना तीर्थ, 18- गयातीर्थ (त्चचा रोगों से मुक्ति का विश्वास ),19-साध्यामृत तीर्थ, 20- सर्वतीर्थ (इसे शंकराचार्य ने बनवाया है और इसमें स्नान से समस्त नदियों में स्नान का पुण्य मिलता है।), 21- शिवतीर्थ , 22- कोटि तीर्थ (इसे श्रीराम ने शिवाभिशेक के लिए अपने धनुष  से खोदकर बनाया था।)
यहाँ भी अन्य पर्यटन स्थलों की भांति अनेक छोटे-बड़े दर्शनीय  स्थान हैं जिनमें कुछ ऐतिहासिक और पौराणिक  महत्त्व के हैं। पूजा अर्चना और भोजन के उपरान्त हम लोगों ने इन स्थलों के भ्रमण का कार्यक्रम रखा। सहायता के लिए थ्रीव्हीलर वाले मिल गए। रामेष्वरम की सीमा में स्थित सात-आठ स्थलों को घुमालाने के लिए एक ऑटो ने डेढ़ सौ रुपये लिया। दो परिवार , दो ऑटो । इसी में गाइड की भूमिका निःशुल्क  शामिल  थी। ( मेरे मित्र ने यात्रा व्यय का पूरा लेखा-जोखा बड़ी कुषलता से बना रखा था। इस मामले में उनका कोई जवाब नहीं। सारे खर्चे एक साथ, एक परिवार सा और बाद में हिसाब का आधा-आधा। यह वृतान्त लिखने से पूर्व रामेष्वरम दर्षन की पुस्तक में वह व्यय विवरणी मिल गयी, इसलिए किराए की जानकारी पक्की समझें। मैंने सूची को अभी संभाल रखा है – यादें ताजी हो जाती हैं।) यात्रा क्रमशः  जारी ……

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मकरन्द छोड़ जाऊँगा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 14, 2011

-हरि शंकर राढ़ी

जहाँ भी जाऊँगा, मकरन्द छोड़ जाऊँगा।
हवा में प्यार की इक गन्ध छोड़ जाऊँगा।
करोगे याद मुझे दर्द में , खुशी भी
निभा के उम्र भर सम्बन्ध छोड़ जाऊँगा।
तुम्हारी जीत मेरी हार पर करे सिजदे
निसार होने का आनन्द छोड़ जाऊँगा।
मिलेंगे जिस्म मगर रूह का गुमाँ होगा
नंशे में डूबी पलक बन्द छोड़ जाऊँगा।
बगैर गुनगनाए तुम न सुकूँ पाओगे
तुम्हारे दिल पे लिखे छन्द छोड़ जाऊँगा।
जमीन आसमान कायनात छोटे कर
बड़े जिगर में किसी बन्द छोड़ जाऊँगा।
बिछड़ के भी न जुदा हो सकोगे ‘राढ़ी’ से
तुम्हारे रूप की सौगन्ध छोड़ जाऊँगा।

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