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Archive for June, 2007

…. भात पसाइये

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 25, 2007

भाई चंद्रभूषण जी और अफलातून जी ने इमरजेंसी वाले पोस्ट पर ध्यान दिलाया है कि ‘पढिये गीता’ वाली कविता रघुवीर सहाय की है. दरअसल लिखने के फ्लो में मुझसे भूल हो गयी. असल में उस समय मैं बाबा की ‘इंदु जी-इंदु जी क्या हुआ’ कविता भी याद कर रहा था और उसी फ्लो में ‘पढिये गीता’ के साथ नागार्जुन का नाम जुड़ गया. हालांकि कविता मुझे पूरी याद नहीं थी पर अब मैंने इसे तलाश लिया है और पूरी कविता पोस्ट भी कर रहा हूँ. तो आप भी अब पूरी पढिये रघुवीर सहाय की यह कालजयी रचना :
पढिये गीता
बनिए सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइये.

होंय कंटीली
आँखें गीली
लकडी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइये.

(‘इमरजेंसी चालू आहे’ के संदर्भ में मैं फिर जोड़ दूं : अपने या देश की जनता के लिए नहीं, आलाकमान के कुटुंब के लिए. वैसे भी कांग्रेसी इंदिरा इज इंडिया का नारा तो लगा ही चुके हैं. )
और हाँ, गलती की ओर ध्यान दिलाने के लिए भाई चंद्रभूषण और अफलातून जी धन्यवाद स्वीकारें. और समसामयिक संदर्भों के हिसाब से शीर्षक बदल रहा हूँ, इसके लिए क्षमा भी चाहता हूँ. यह बदला हुआ शीर्षक पोस्ट का है, कविता का नहीं.

इष्ट देव सांकृत्यायन

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इमरजेंसी चालू आहे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 25, 2007

आज २५ जून है. आज ही के दिन १९७५ में आपातकाल की घोषणा की गयी थी. यह घोषणा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने की थी. यह क्यों की गई थी और इसकी क्या प्रासंगिकता थी, इस पर बहुत बहस-मुबाहिसे हो चुके हैं. इसलिए मैं अब कुछ कहने की जरूरत नहीं समझता. लेकिन एक बात जरूर कहूँगा. वह यह कि अगर आपको थोडा भी याद हो या आपने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना हो तो जरा इतिहास पर गौर करिएगा. गौर करिए कि तब क्या हो रहा था और अब क्या हो रहा है. गौर करिए कि उस निहायत तानाशाही फैसले के पक्ष में और कोई नहीं केवल कम्युनिस्ट थे. यही थे जो उस वक़्त इंदिरा गांधी के साथ खडे थे. इसी बात पर पंजाबी के तेजस्वी कवि अवतार सिंह पाश ने एक कविता लिखी थी. पूरी रचना तो याद नहीं, पर उसकी कुछ पंक्तियां जो मुझे चुभती हैं और मुझसे ज्यादा उन तथाकथित कम्युनिस्टों को जो चौकी पर कुछ और चौके पर कुछ हैं, आज भी याद हैं मुझे.
‘ मार्क्स का
शेर जैसा सिर
दिल्ली की सड़कों पर
करना था
म्याऊँ-म्याऊँ
यह सब
हमारे ही समय में होना था.’
अपने समय के समाज के प्रति असंतोष, ऐसा विक्षोभ अन्यत्र दुर्लभ है. यह पीड़ा केवल उस महान कवि की नहीं, पूरे भारतीय समाज की है. हम फिर मार्क्स के शेर जैसे सिर को म्याऊँ-म्याऊँ करते देख रहे हैं. हम देख रहे हैं कि कितनी चालाकी से भारतीय इतिहास के शेरों को एक-एक कर गायब कर दिया गया है. अव्वल तो उनके इतिहास की किताबों से उनके पन्ने ही फाड़ दिए गए हैं. जो बचे रह गए, ऐसे जिन्हे नहीं मिटाया जा सकता था किसी भी तरह से कुछ खजैले कुत्तों और कुछ लिभड़े सूअरों को उनका वारिस बना दिया गया. इतिहास के पटवारियों की मदद से. फिर यह साबित कर दिया गया और जनता के मन में यह बात भर दी गयी कि आजादी हमें भीख में मिली है और जिन्होंने इसे भीख में माँगा है. वही हमारे माई-बाप है. हमें उनकी पूजा करनी चाहिए. आइए पूजें. गीदड़ों को शेर साबित करने और शेरों को धरती से गायब कर देने की जैसी उदात्त परम्परा भारतीय इतिहास में पिछले सौ सालों में कायम की गयी है वह और शायद ही कहीं मिले. अंगरेज बदनाम जरूर हैं और यह सच है कि इसकी शुरुआत उन्होंने ही की थी पर घालमेल का ऐसा दुस्साहस वे भी नहीं कर सकते थे. इससे सबसे बड़ी सुविधा यह हो गयी कि अब आजादी जब चाहे हमसे छीनी जा सकती है. अरे भाई भीख पर भी किसी का हक हो सकता है क्या? जिसने दिया है वह छीन भी सकता है. इंदिरा गांधी ने इसी सोच के आधार पर १९७५ में हमसे आजादी छीनी थी. उनकी छीनी हुई आजादी फिर हमें मिल गयी, ऐसा सोचना निरी बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं होगा. सल्तनतिया कानून के तहत राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बना दिए गए. शायद यही वजह थी जो पाश ने लिखा
…… अगर उसके मरने के शोक में
पूरा देश शामिल है
तो इस देश से
मेरा नाम काट दो.

भारत नाम का जो देश था, वह अब प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में तब्दील हो चुका है. कोई बावेला न हो, जनता अचानक उठ कर जूतम-पैजार शुरू न कर दे, इसलिए अभी प्रधानमंत्री-राष्ट्रपति जैसे पद बने हुए है. लेकिन अब ये लोग चुने नहीं जा रहे हैं. कान पकड़ कर बैठा दिए जा रहे हैं. कोई भरोसा नहीं कि कल को सोनिया गांधी सड़क चलते किसी ऐरे-गैरे का कान पकड़े और कहें कि चल बैठ वहाँ. वो प्रधान मंत्री की कुर्सी खाली पडी है. राष्ट्रपति पद के साथ तो यह प्रयोग पहले भी हो चुका है. असल में असली शासकों के लिए अपने हित साधना तब सबसे आसान होता है जब वे जिम्मेदार पदों पर दूसरों को बैठा देते हैं. शर्त यह है कि ये दूसरे ऐसे लोग कतई न हों, जिनका अपना कोई वजूद हो. ये हमेशा ऐसे लोग ही होने चाहिए जिनकी काबिलियत ‘यस् माई बाप’ के अलावा और कुछ न हो. अभी तक थोडा संतुलन था. राष्ट्रपति पद पर एक पढ-लिखा आदमी था, जिसका राजनीति से बहुत लेना-देना नहीं था और देश उसकी चिन्ता का विषय था. लेकिन देखते रहिए. नौटंकी लोकतंत्र चालू आहे. इस नाटक के अगले अंक में प्रधानमंत्री तो वही मनोनीत वाला रहेगा और राष्ट्रपति पद पर शायद नागार्जुन की एक कविता होगी :

‘…… पढिये गीता
बनिए सीता ‘

और
‘भर-भर भात पसाइये’

(देश के लिए नहीं, तथाकथित गाँधी परिवार के लिए)
फिर परदे के पीछे बैठी एक सूत्रधार भयावह आश्वस्ति से उपजे अंहकार के साथ मुस्कराएगी. अब लो, कर दिए हर तरफ अपने गोटे फिट. इसके साथ ही यह देश प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में पूरी तरह तब्दील हो जाएगा. इस बात पर अपने कामरेड लोग थोडा फूं-फां करेंगे. इसके बाद भोज पर बुला लिए जाएंगे. थोडा भोज-भात होगा. बोद्का-शोद्का चलेगी. बस. इसके बाद उनकी सारी नाराजगी दूर हो जाएगी और लौटकर वो बिल्कुल चकाचक होंगे. इमरजेंसी को फिर अनुशासन पर्व बताएँगे. और मस्त हो जाएंगे. वो तो खैर चलिए वही करेंगे जो करने लायक हैं. आख़िर बेचारे और कर भी क्या सकते हैं? लेकिन ये बताइए, ये देश थोडा बहुत-आपका भी तो है न! तो अब इस लिहाज से तो थोडा-बहुत आपका भी कर्तव्य बनता है! अब बताइए आप क्या कर रहे हैं?……..

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इमरजेंसी के ही दौरान अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात हुआ था. तब कुछ अखबारों ने अपना सम्पादकीय स्तम्भ खाली छोड़ दिया था. बीच वाली जगह को आप उसी परम्परा का हिस्सा समझिए. लेकिन यह जगह चुप रहने के लिए नहीं, आपके लिए छोड़ी गयी है. इसलिए कि ताकि आप अपनी भूमिका तय कर सकें. किधर जाना है? क्या करना है? कैसे करना है?
और अंत में श्रीकृष्ण तिवारी की एक पंक्ति :
भीलों ने लूट लिए वन
राजा को खबर तक नहीं
रानी हुई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं.

अब बताइए भाई. अभी भी आपको कुछ खबर हुई कि नहीं?

(बेहतर होगा कि भूख पर सत्येंद्र श्रीवास्तव की कहानी लोकतंत्र का राजा भी पढ़ लें.)
इष्ट देव सांकृत्यायन


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असली फुरसतिया शिरी लालू जी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 23, 2007

अभी दो दिन पहले ही एक पोस्ट पढा था. मसिजीवी भाई का. मन बना था कि पहले उसी पर लिखूंगा. उन्होने बात गांवों को शहरों में बदले जाने के समर्थन में की है. जिस लेख से प्रभावित होकर उन्होने इसका समर्थन किया है अतानु का वह लेख भी पढ़ लिया. तर्क तो मेरे पास ख़ूब हैं, लेकिन इस पर बाद में लिखूंगा. पहले ग़ुस्सा निकल जाए तब, ताकि अगले के साथ कम से कम अन्याय तो न हो! अहा ग्राम्य जीवन भी ख़ूब है, की जमीनी हकीकत मैं बहुत करीब से जानता हूँ. जिस गाँव में मैं पला बढ़ा हूँ वह बाढ और सूखे से ग्रस्त तो नहीं है, लेकिन सरकारी और राजनीतिक लूट-खसोट का जो तांडव वहां मचा है और उसके चलते गाँव के भीतर की सुख शांति जिस तरह छिन्न-भिन्न हो रही है, उसे जानते हुए भी ग्राम्य जीवन के प्रति किसी का आकर्षण बचा रह जाए, यह लगभग नामुमकिन है. इससे भी ज्यादा भयावह स्थिति उस गाँव की है जहाँ से हमारे पूर्वज आए और आकर महराजगंज (तब गोरखपुर) जिले के बैकुंठपुर गाँव में बसे थे. वह गाँव मलांव है. यही वह गाँव है जहाँ से राहुल जी के पूर्वज आजमगढ़ चले गए थे और वहां कनैला गाँव में बस गए थे. मलांव अभी भी गोरखपुर जिले में ही है और हर साल बाढ वहां जैसी तबाही मचाती है और साथ ही सरकारी तंत्र बाढ के नाम पर जैसी लूट-खसोट मचाता है उसे देखने के बाद तो कोई भी यही कहेगा कि इस देश से गाँव नेस्तनाबूद कर दिए जाने चाहिए. लेकिन मैं फिर भी ऐसा नहीं कहूँगा, पर इस मुद्दे पर पूरी बात बाद में.
अभी फ़िलहाल ग्राम्य जीवन के बजाय रेल जीवन पर …. अहा रेल जीवन भी क्या ख़ूब है! लालू जी इसे फायदे में चाहे जितना दिखाएँ और उनके फायदे नुकसान के आंकड़ों की असलियत चाहे जो हो, पर वह उसे यात्री के चलने लायक अभी भी नहीं बना सके हैं. शायद कभी भी …..
यह बात है १९-२० जून की है. पूरी रात कानपुर रेलवे स्टेशन पर टहलते गुज़री. जो ट्रेन रात साढ़े नौ बजे आनी थी वह भोर में करीब चार बजे आयी. पहले से पता रहा होता कि रेलिया इतनी बैरी है तो मैं वहाँ वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव जी के घर ही चला गया होता. एक आत्मीय बडे भाई के साथ का सुख थोडा और ले लिया होता. या फिर तुरन्त ही मिले और आत्मीय हो गए भाई फुरसतिया जीं के साथ थोडा और समय गुजर लिया होता तो यह संकट नहीं आता. अगर रात जागते भी बीती होती तो भी कष्ट नहीं होता क्योंकि बोर तो न होना पड़ता. पर क्या करिएगा? मेरे एक लतीफेबाज पत्रकार मित्र विनोद बंधु, जो इन दिनों शायद पटना में कहीँ पाए जाते होंगे का कहना है कि भारत की रेल न तो ड्राइवर चलाता है न गार्ड चलाता है, इसे तो बस गाड चलाता है. मुझे मनाना पड़ा कि किस्मत में यही लिखा था. बहरहाल यह भी किस्मत ही बात थी जिसके चलते भाई फुरसतिया जी, यानी ब्लोग बाबा अनूप शुक्ल जीं से मेरी मुलाक़ात हो गयी और इसमें भी जितनी बड़ी भूमिका हमारे संस्थान यानी दैनिक जागरण ने निभाई, रेल की भूमिका को उससे रत्ती भर भी कम करके नहीं आका जा सकता है। यह रेल ही थी जिसने यह संयोग बनाया कि हमारी बैठक शुक्लाजी के साथ हो गयी। हुआ यह कि हमारी ट्रेन इधर यानी दिल्ली से ही कानपुर तक पहुंचते-पहुंचते एक-डेढ़ घंटे देर हो चुकी थी। जैसे-तैसे भागते-भागते कार्यालय पहुंचा तो पता चला कि समूह अध्यक्ष योगेंद्र मोहन जी कहीँ और चले गए. अब वह शाम को आएंगे. ५ बजे. मीटिंग भी तभी होगी.
सवाल उठा कि तब क्या हो? अब यह तीन घंटे कैसे और कहॉ गुजारे जाएँ. राव साहब ने तय किया लक्ष्मी देवी ललित कला संस्थान चला जाए. वहीं कुछ खा भी लिया जाएगा, आराम भी कर लेंगे और कुछ मुद्दों पर चर्चा भी हो जाएगी. इसके पहले कि हम संस्थान पहुंचते रास्ते में गाडी में ही साहित्य के इन्तेर्नेतिया मध्यम पर चर्चा शुरू हो गयी. इसी चर्चा के क्रम में विनोद जी ने बताया कि हिंदी mein ब्लोगिन्ग के दादा अनूप शुक्ल तो यही रहते हैं. मैंने कहा अच्छा , वह बोले हाँ. विनोद ने पूछा मिलना चाहेंगे, मैंने कहा भाई मिलवाइए. संस्थान पहुंच कर फोना-फानी हुई और थोडी ही देर में शुक्ल जी हमारे सामने थे. फुरसतिया से अपना परिचय तो पुराना था. श्रीलाल शुक्ल जी के ब्लोग रागदरबारी के माध्यम से. श्रीलाल जी व्यक्तित्व पर भाई फुरसतिया ने जैसा लिखा है, वह फुर्सत में ही लिखा जा सकता है. फुर्सत में ही एक कृती व्यक्तित्व को उस तरह से समझना भी संभव है.
वह लेख पढने के बाद मैंने उनके कई और लेख भी पढे, पर उसका असर मन पर से गया नहीं. जाने क्यों?चर्चा चली तो इलाहाबाद भी चली गयी और फिर पुरानी एकता के सूत्रभी
जुड़ गए. खैर, ख़ूब गुज़री जब मिल बैठे दीवाने दो. पर मेरा दुर्भाग्य देखिए जिस समय मैं कानपुर स्टेशन पर परकटे पंछी की तरह अकेले तड़फड़ा रहा था और ती वी चैनलों पर दिखाए जाने वाले प्रेतात्माओं की तरह भटक रहा था तब किसी भी तरफ से यह आवाज नहीं आयी कैश सेहरा में अकेला है, मुझे जाने दो. बहरहाल यह तो बाद की बात है. उसके पहले हमारी लम्बी बातचीत हुई. साहित्य, संस्कृति, समाज, राजनीति; हर जगह जो भ्रष्टाचार और कदाचार व्याप्त है वह और उसमें ब्लोगिये जो सार्थक भूमिका निभा सकते हैं उसकी संभावनाएं …….. जो कुछ… तकनीकी दिक्कतें मुझे ब्लागियाने के दौरान झेलनी पडती हैं उन पर भी चर्चा हुई.

अभी हमारी बातचीत पूरी भी नहीं हुई थी कि मीटिंग का समय हो गया और हम संस्थान से कार्यालय की ओर कूच कर गए. ढाई-तीन घंटे की बैठक के बाद सवाल उठा कि अब। राव साहब चाहते थे कि मैं उनके घर की ओर चलूँ और मुझे ट्रेन पकड़नी थी। अव्वल तो बहुत थोड़े ही समय में राव साहब से जैसी आत्मीयता हुई, कम ही लोगों से हो पाती है। जो सहज और पारिवारिक व्यवहार उनका है, वह उनके साथ-साथ कानपुर से लगाव लगाने लगता है. इसलिए जाना तो मैं चाहता था, पर रेल का टाइम हो गया था और मैं उसकी अनदेखी नहीं कर सकता था. लिहाजा चलना पड़ा. कार्यालय से संस्थान तक फिर भी हम लोग साथ-साथ आए और वहाँ थोड़ी देर तक ठहरे भी. इसके बाद पौने नौ होते ही मैं स्टेशन की ओर चल पड़ा. ठीक सवा नौ बजे मैं वहाँ पहुंच भी गया.
असली त्रासदी यहीं से शुरू हुई. रेलवे स्टेशन पहुंचने के बाद. मालूम हुआ कि जिस रेल से मुझे जाना है वह दो घंटे विलंब से आ रही है.थोड़ी देर तक इधर-उधर टहलने के बाद मैं वेटिंग रूम में चला गया और वहीं एक खाली पडी कुर्सी पर कब्जा जमा कर नरेन्द्र मोहन जी की नई आई किताब ‘संस्कृति और राष्ट्रवाद’ पढने लगा. मैं पढने में मगन हो गया तो फिर रेल और समय की फिक्र भी जाती रही. हाँ कान ट्रेनों के आवागमन संबंधी घोषणाओं पर जरूर लगे हुए थे. करीब एक घंटे यानी ११ बजे तक मेरे लिए कोई मुश्किल नहीं थी. ११ बजे यह घोषणा हुई कि गाडी संख्या ४१५ अपने निर्धारित समय से पौने तीन घंटे देर है. तो भी मैंने कहा कोई बात नहीं. अब १२ बजे तक आराम से पढेंगे. इसके बाद ही उठेंगे. मैं पढने में लगा रहा. १२ बजे फिर घोषणा हुई कि यह ट्रेन अब चार घंटे विलंब से आ रही है. लेकिन साहब चार घंटे विलंब होने यानी रात के डेढ़ बजने तक जब ट्रेन नंबर ४१५ के संबंध में कोई और घोषणा नहीं हुई तो मुझे लगा कि यह क्या ट्रेन नंबर ४२० हो गई.
आख़िर मैं वहाँ से उठा और इन्क्वायरी काउंटर गया. वहाँ मालूम हुआ साहब अभी कोई सूचना नहीं है, हाँ आएगी वह प्लेटफार्म नंबर दो पर ही. मैंने सोचा जब कोई सूचना नहीं है तो क्या भरोसा, अचानक आ ही जाए? बेहतर यही है कि प्लेटफार्म नंबर दो पर ही चला जाए. वहाँ हमारे जैसे सैकड़ों रेलपीडित अतृप्त आत्माओं की तरह इधर-उधर भटक रहे थे. सबका दर्द यही था कि रेल को दो-चार-छः नहीं चौबीस घंटे देर से भी आना हो तो कोई बात नहीं, पर हाकिमान यह बता तो दें कि कितनी देर लगेगी.
इस गलतबयानी का नतीजा यह होता है कि तमाम यात्री आ कर स्टेशन पर अनायास टपकते रहते हैं. न तो उनका कोई पुरसाहाल होता है और न कोई उद्देश्य ही हल होता है. इंतज़ार की इस लें में ऐसे मरीज भी हो सकते हैं जिनके लिए इधर-उधर भटकना नुकसानदेह हो सकता है. यूँ तो यह स्वस्थ आदमी के लिए भी नुकसानदेह है. और यात्रियों की छोड़िये, यह तो रेल के लिए भी नुकसानदेह है. इसे गलतबयानी या सही आकलन की क्षमता का अभाव, जो भी कह लें, का ही नतीजा है जो प्लेट्फार्मों पर अनावश्यक भीड़ हमेशा दिखाई देती है. ठीक समय मालूम न होने के नाते यात्रियों को वहाँ भटकना पड़ता है. और कई यात्रियों के साथ उन्हें पहुँचाने आए लोगों को भी भटकना पङता है. बेमतलब ही भीड़ बढती जाती है और शोर बढ़ता जाता है.
इस भीड़ का फायदा अराजक तत्त्व उठाते हैं. ऎसी ही स्थितियों में कभी कहीँ विस्फोट होता है तो कहीँ भगदड़ मचाती है और इस सबमें सैकड़ों लोगों की जानें जाती हैं. रेल कुछ न करे, केवल समय से सही सूचनाओं की लेन-देन का इंतजाम भर बना ले तो न केवल रेल, बल्कि यात्रियों और देश की भी आधी समस्यायें हल हो जाएंगी. बहरहाल साहब, अपने राम वहाँ घूमते रहे. चूंकि ठसाठस भरे प्लेटफार्म पर बैठाने के लिए कोई जगह थी नहीं, लिहाजा पढाई भी नहीं की जा सकती थी. मजबूरन इधर-उधर घूमते रहे. रात के साढ़े तीन बज गए. इस बीच कई दूसरी ट्रेनें उसी प्लेटफार्म से आईं-गईं. पर ४१५ के बारे में कोई घोषणा तक नहीं हुई.

घोषणा हुई साढ़े तीन बजे और वह भी सिर्फ इतनी कि अब वह प्लेटफार्म नंबर २ नहीं १ पर आएगी. इस पर जो कुछ लोग परिवार समेट आकर दो नंबर प्लेटफार्म पर बैठ चुके थे और जिनके साथ ज्यादा सामान भी थे उन्होने रेल के अफसरों-कर्मचारियों से अपने निकट संबंधों के दावे शुरू कर दिए. काश बिना किसी माइक के की जाने वाली यात्रियों की ये प्रीतिकर घोषणाएँ रेल की व्यवस्था के कान तक पहुंच पाते. आखिरकार वह चिर-प्रतीक्षित शुभ मुहूर्त आ ही गया जब रेल आ गयी. भोर के चार बजे. सारे यात्रियों के साथ मैं भी भागा और जैसे-तैसे अपना डिब्बा तलाश कर उसमें लदा. लद कर व्यवस्थित होते ही एक यात्री ने अपने साथी से सवाल किया जब देर से आयी है तो पहुँचेगी भी देर ही से? ‘अरे आ गयी यही क्या कम है, जो अब पहुँचाने की भी सोचने लगे? देर की बात छोड़ दो. पहुंच जाओ बस यही मनाओ. यूँ तो रेल में तब तक बैठो ही नहीं जब तक फुरसतिए न हो. भारतीय रेल फुरसतियों की ही है.’ जबकि मैंStatic transliteration help हतबुद्धि, सोच रहा था कि फुरसतिया जी को तो मैं छोड़ आया था. यहाँ आकर पता चला कि भारत की तो रेल ही उनकी ही है. मुझे लगा कि शायद यह ठीक कह रहे हैं. वर्त्तमान रेलमंत्री, यानी लालू जी अपने बारे में लीक से हट कर काम यानी प्रयोग करने के प्रचार कराने में माहिर हैं. जबकि अपने फुरसतिया भाई लीक से हटकर प्रयोग करने में माहिर हैं और वह भी बिना बताए. अरे भाई, लालू जी सुना आपने, छोड़ न दीजिए सिंहासन और नईं तो मान लीजिए कि आप ही फुरसतिया हैं. बेचारे रेलपीडित तो ऐसा ही मानते हैं.
इष्ट देव सांकृत्यायन

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दोहे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 19, 2007

शेख ज़हीरा देखती कठिन न्याय का खेल ।
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल ॥

खलनायक सब खड़े हैं राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।

क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे है स्वाद में दोनो माँस समान॥

-विनय ओझा स्नेहिल

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 18, 2007

झूठे सिक्कों में भी उठा देते हैं अक्सर सच्चा माल
शक्लें देख के सौदा करना काम है इन बाजारों का.

******** ******** ********
एक जरा सी बात थी जिसका चर्चा पहुँचा गली-गली
हम गुमनामों ने फिर भी एहसान न माना यारों का.
******** ******** ********
दर्द का कहना चीख उठो दिल का तकाजा वजा निभाओ
सब कुछ सहना चुप-चुप रहना काम है इज्ज़तदारों का.
इब्न-ए-इंशा

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 17, 2007

कुदरत को नामंज़ूर थी सख्ती ज़बान में.
इसीलिये हड्डी न अता की ज़बान में.
-अज्ञात
चमक शीशे के टुकड़े भी चुरा लाते हैं हीरे की ,
मुहब्बत की नज़र जल्दी में पहचानी नहीं जाती.
जिधर वो मुस्कराकर के निगाहें फेर लेते हैं –
क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नहीं जाती.
-अज्ञात
यूं ज़िन्दगी में मेरे कोई कमी नहीं-
फिर भी ये शामें कुछ माँग रही हैं तुमसे.
फिराक गोरखपुरी
ये जल्वागहे खास है कुछ आम नहीं है.
कमजोर निगाहों का यहाँ काम नहीं है.
तुम सामने खुद आए ये इनायत है तुम्हारी,
अब मेरी नज़र पर कोई इलज़ाम नहीं है.

-अज्ञात

बारिश हुई तो फूलों के दिल चाक़ हो गए.

मौसम के हाथों भीग कर शफ्फाक हो गए.

बस्ती के जो भे आबगज़ीदा थे सब के सब-

दरिया ने रुख़ बदला तो तैराक हो गए.

– परवीन शाकिर

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चतुष्पदी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 17, 2007

हम मुश्किलों से लड़के मुकद्दर बनाएँगे.
गिरती हैं जहाँ बिजलियाँ वहाँ घर बनाएँगे.
पत्थर हमारी राह के बदलेंगे रेत में –
हम पाँव से इतनी उन्हें ठोकर लगाएंगे..
विनय स्नेहिल

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समझती नहीं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 16, 2007

एक दिन मेरे एक बहुत पुराने दोस्त मेरे घर आए. बचपन के साथी थे तो बड़ी देर तक बातें होती रहीं. कई यार-दोस्तो के चर्चे हुए. अब बातें तो बातें हैं, उनका क्या? जहाँ चार अच्छी बातें होती हैं, दो डरावनी बातें भी हो ही जाती हैं. तो बातें चली और यार-दोस्तो से होते हुए बीवियों तक भी आ गईं. दोस्त ने बताया कि मेरी बीवी तो यार अपने आप से ही बातें करती है.
‘ अपने आप से बातें तो मेरी बीवी भी करती है, पर वह इस बात को समझती नहीं है. उसे लगता है कि मैं सुन रहा हूँ.’ मैंने उन्हें बताया.

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मौसम का सुरूर मेरा कुसूर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 16, 2007

मैंने अब तक यह सुना था कि आज मौसम बड़ा बेईमान है. हकीकत का आज पता चल गया. लंबे इंतज़ार के बाद जब आज बारिश हुई तो लगा सिर मुड़ते ही ओले बरसने लगे. हुआ यूं कि जल्दी उठकर दफ्तर पहुंचने की तैयारी की और रिमझिम फुहारों का सिलसिला बंद होने के आसार नजर नहीं तो अपने तीन मंजिले ऊपर के मकान से नीचे उतरे. ज्यों ही गाडी स्टार्ट की, उसका स्टार्टिंग बटन चलने को राजी ही नहीं हो रह था. करते-करते मैं आधे से अधिक भीग गई, जितना कि ऑफिस पहुचने पर भी न भीगती. साथ ही सोसाइटी के कम से कम 8 लोगों ने आजमाइश भी की लेकिन अपनी धन्नो टस से मस न हुई. बाद मे पता चला कि पड़ोस मे रखी दूसरी उसी प्रजाति की गाडी बगल मे मुह बाए खडी मौसम का मजा ले रही थी. ऐसे में धन्नो मेरे साथ जाने को तैयार न थी. मौसम का सुरूर देखिए. लेकिन भला बताइए इसमे मेरा कुसूर क्या था? आख़िर वो मुझसे बेईमानी कर ही गया. जय बाबा भोलेनाथ. जय राम जी की.
इला श्रीवास्तव

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निराश क्यों होता है मन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 15, 2007

अपने हाथों से
जब होगा
अपनी स्थिति में परिवर्तन,
फिर निराश
क्यों होता है मन?

हमने ही
तारों की
सारी क्रिया बनाई,
हमने ही
नापी
जब सागर की गहराई;

हमने ही
जब तोड़े
अपनी सारी सीमाओं
के बन्धन –

फिर निराश
क्यों होता है मन?

मेरी
पैनी नज़रों ने ही
खोज निकाले
खनिज
अंधेरी घाटी से भी;
हमने
अपने मन की गंगा
सदा बहाई
चीर के
चट्टानों की छाती से भी;

कदम बढ़ाओ
लक्ष्य है आतुर
करने को तेरा आलिंगन.
फिर निराश
क्यों होता है मन?

मत सहलाओ
पैर के छालों को
रह- रह कर.
ये तो
सच्चे राही के

पैरों के जेवर.
मत घबराओ
तूफानों से या बिजली से
नहीं ये शाश्वत
क्षण भर के
मौसम के तेवर.

धीरे-धीरे
सब बाधाएँ
थक जाएँगी,
तब राहों के
अंगारे भी
बन जाएँगे शीतल चंदन.
फिर निराश
क्यों होता है मन?
विनय स्नेहिल

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