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…. भात पसाइये

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on June 25, 2007

भाई चंद्रभूषण जी और अफलातून जी ने इमरजेंसी वाले पोस्ट पर ध्यान दिलाया है कि ‘पढिये गीता’ वाली कविता रघुवीर सहाय की है. दरअसल लिखने के फ्लो में मुझसे भूल हो गयी. असल में उस समय मैं बाबा की ‘इंदु जी-इंदु जी क्या हुआ’ कविता भी याद कर रहा था और उसी फ्लो में ‘पढिये गीता’ के साथ नागार्जुन का नाम जुड़ गया. हालांकि कविता मुझे पूरी याद नहीं थी पर अब मैंने इसे तलाश लिया है और पूरी कविता पोस्ट भी कर रहा हूँ. तो आप भी अब पूरी पढिये रघुवीर सहाय की यह कालजयी रचना :
पढिये गीता
बनिए सीता
फिर इन सबमें लगा पलीता
किसी मूर्ख की हो परिणीता
निज घरबार बसाइये.

होंय कंटीली
आँखें गीली
लकडी सीली, तबियत ढीली
घर की सबसे बड़ी पतीली
भरकर भात पसाइये.

(‘इमरजेंसी चालू आहे’ के संदर्भ में मैं फिर जोड़ दूं : अपने या देश की जनता के लिए नहीं, आलाकमान के कुटुंब के लिए. वैसे भी कांग्रेसी इंदिरा इज इंडिया का नारा तो लगा ही चुके हैं. )
और हाँ, गलती की ओर ध्यान दिलाने के लिए भाई चंद्रभूषण और अफलातून जी धन्यवाद स्वीकारें. और समसामयिक संदर्भों के हिसाब से शीर्षक बदल रहा हूँ, इसके लिए क्षमा भी चाहता हूँ. यह बदला हुआ शीर्षक पोस्ट का है, कविता का नहीं.

इष्ट देव सांकृत्यायन

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