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देख लो अब भैया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 4, 2007

सच की खिंचती खाल देख लो अब भैया.
झूठ है मालामाल देख लो अब भैया..

आगजनी ही जिसने सीखा जीवन में ,
उनके हाथ मशाल देख लो अब भैया..

चोरी लूट तश्करी जिनका पेशा है,
वही हैं द्वारपाल देख लो अब भैया..

माली ही जब रात में पेड़ों पर मिलता है ,
किसे करें रखवाल देख लो अब भैया..

बंदूकों से छीन के ही जब खाना हो-
भांजे कौन कुदाल देख लो अब भैया..

विनय ओझा स्नेहिल

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2 Responses to “देख लो अब भैया”

  1. व्यवस्था पर इससे गहरा कटाक्ष और क्या हो सकता है…आपने तो धज्जियाँ उड़ा डाली. बहुत बेहतरीन. साधुवाद स्विकारें इस रचना के लिये.

  2. khud ko sametnaa bhee achha nahin hota-itna uthao khudko ki asmaan rashk kare.vinay ojha snehil.

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