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परत-दर-परत

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 11, 2007

परत दर परत
छिपा आदमी-
परत डर परत
खुल रहा है कहीं.

प्याज की झिल्लियों से
सृष्टी के राज-
खुल रहे हैं अभी.
अलग हो-हो कर
कहीं ना कहीं –
मिल रहे हैं सभी.

आसमानों
हवाओं में
बादल –
परत दर परत
घुल रहा है कहीं.

अजब खेल है
अँधेरा-उजाला
उजाला-अँधेरा.
मौत के साथ
क्यों
न जाने है
ज़िंदगी का बसेरा.

हजार परतों में
सूखा हुआ
मन-
परत दर परत
धुल
रहा है कहीं.

भाई अनामदास जी कृपया नोटियाएं. मैं ईमानदारी से अक्सेप्टिया रहा हूँ. लिहाजा कापीराईट का मुकदमा न ठोंकेंगे. वरना आगे से अक्सेप्टियाऊंगा ही नहीं. वैसे यह सच है कि यह गीत उनके ही एक चिठारस से प्रेरित है.

इष्ट देव सांकृत्यायन

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2 Responses to “परत-दर-परत”

  1. कॉपीराइट का मतलब होता है, कॉपी करने का राइट. आपने तो कॉपी नहीं किया इसलिए कोई केस नहीं बनता. अच्छा है.

  2. परतदार कविता।

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