Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

…इसी सूरत लिखना

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 12, 2007

अपने सारे दर्द भुला कर औरों के दुःख सहता था.
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था.
आख़िरकार चला ही वो रूठ कर हम फर्जानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था.


हबीब जालिब का परिचय देने के लिए कतील शिफाई की ये पंक्तियां मेरे ख़याल से काफी हैं. आज ही दिन में मैंने जालिब साहब की एक रचना ‘पाकिस्तान का मतलब क्या‘ इयत्ता पर पोस्ट की है. यह रचना मुझे इंदिरा जी ने पढाई. वह उस वक़्त गूगल से कुछ सर्च रहीं थीं, जब उन्हें अनायास ही वह कविता दिखी. अच्छी लगी, अपने माना जैसी बात लगी. लिहाजा उन्होने यह कविता मुझसे शेयर की. रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी नामक साईट पर है यह रचना. हमने वह साईट और खंगाली. उस पर जालिब साहब की कुल दस रचनाएँ मिलीं, लेकिन उनके बारे में वहां कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी. संयोग कि इसके पहले तक मैं जालिब साहब के बारे में जानता भी नहीं था. इसे आप चाहे मेरी कम-अक्ली कह लें या बेखयाली, पर ये सच है कि मैंने अब तक उनका नाम भी नहीं सुना था. आज उनकी कुछ कविताएँ देखीं तो लगा कि गलती हुई. अफ़सोस हुआ. जो भी हो इस रचनाकार के बारे में जानना चाहिए. लिहाजा हम फिर गूगल के दरवाजे पहुंच गए. और जालिब के बारे में विकीपीडिया तथा कुछ और साइटों से पर्याप्त जानकारी हासिल हो गई.
बेशक वह अपने समय के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे. निहायत तंगदिल हुक्मरानों वाले पाकिस्तान जैसे देश में साफगोई के नतीजे क्या हो सकते हैं, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. शायद इसका ही नतीजा था जो उनकी उम्र का ज़्यादातर हिस्सा पाकिस्तान की जेलों में गुजरा. जेलों से बची ज़िंदगी उन्होने फुटपाथों पर गुजारी. आप पूछेंगे जनाब ऐसा क्यों? तो साहब जानिए. वैचारिक तल पर कम्युनिस्टों से बेहद करीबी के बावजूद व्यावहारिक तल पर वे उनसे बहुत समय तक जुडे नहीं रह सके. यही वजह थी जो पाकिस्तान के तमाम तरक्कीपसंद सियासत्दां और अदीब जब मलाई काटने में जुटे थे तब वह केवल ग़रीबों के हक की लड़ाई लड़ने में लगे हुए थे. अब ऐसे शायर को भला क्या मिलता, सिवा ग़ुरबत और जलालत के? तो कहा जाना चाहिए कि हबीब जालिब ने अपने लिए मुसीबतों का वरण खुद किया था. मुझे लगता है कि जालिब ने और जो भी किया हो, पर एक काम कभी नहीं किया होगा. वह है अपने शायर होने की बुनियादी शर्त से समझौता.
इस बात के दो प्रमाण हैं.पहला तो उनकी ज़िंदगी का असल सफ़रनामा (जितना और जैसा मैं जान सका हूँ) और दूसरा उनकी शायरी. उनकी साफगोई का किस्सा बयान करने के लिए मैं फिर उनका ही एक शेर उठा रहा हूँ-
सर सर को सबा

ज़ुल्मत को जिया
बन्दे को खुदा
क्या लिखना ?
पाकिस्तान के संविधान के प्रति उनके माना में कितना सम्मान था, इसका अंदाजा आप उनकी इन पंक्तियों से लगा सकते हैं-
ऐसे दस्तूर को

सुब्ह-ए- बयनूर को
मैं नहीं मानता
मैं नहीं जानता
कहना न होगा कि कमोबेश दुनिया के हर देश के संविधान की सच्चाई यही है. इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण लोक का अनुभव ही है कि कानून और इतिहास हमेशा सत्ता के साथ ही रहे हैं. वह चाहे भारत का हो या चीन का, या फिर रूस ही क्यों न हो. कोई भी संविधान हमेशा सत्ता के लिए, सत्ता के द्वारा, सत्ता का होता है. जनता संविधान के लिए सिर्फ एक झुनझुना है, जिसे बजाना बधिया लगता है. इसलिए वह इसे बजाता रहता है. हुक्मरानों के लिए आम आदमी की औकात मुहर से ज्यादा कुछ है नहीं. इस बात को बहुत लोगों ने बहुत तरह से समझा और महसूस किया है. जब आदमी कोई चीज महसूस करेगा तो भला उसे अभिव्यक्ति वह क्यों न देगा! यही बात थी जो प्रेमजी ने इस तरह कही है :
गरीबों और दुखियों के नाम पर न जाने कितने महान बनते रहे किंतु आज तक दुनिया से गरीबी नहीं गयी।- श्रीप्रेम
कानपुर यात्रा के दौरान राष्ट्रीय सहारा में मैंने यही बात पढी तो फुरसतिया जी से तुरंत ब्लागिया देने के लिए कहा था. यह बात शायर जालिब ने अपने ढंग से कही है :
हाल अब तक वही हैं ग़रीबों के.

दिन फिरे हैं फकत वजीरों के.
मकरूज़ है देस का हर बिलावल
पांव नंगे हैं बेनज़ीरोँ के.
जालिब सिर्फ उन अदीबों के लिए ही मिसाल नहीं हैं जिन्होंने हुक्मरानों से समझौते किए हैं, वह उनके लिए भी नजीर हैं जो कहीं की भी राजनीति के तथाकथित विपक्ष के साथ भी खडे हैं. क्योंकि राजनीति और खास तौर से संसदीय राजनीति में पक्ष-विपक्ष छलावे के अलावा कुछ और होते नहीं. भारतीय राजनीति में पिछले बीस वर्षों का इतिहास देख लेना ही यह बात समझने के लिए काफी होगा. सियासत का लक्ष्य कभी जनता का हित नहीं होता है. उनका चरमलक्ष्य सत्ता है और सत्ता का एकमात्र लक्ष्य स्वयम सुख.
अपना सुख हासिल करने के लिए जो करोड़ों की संख्या वाली जनता के हित-अहित और बौद्धिक-भावनात्मक आघात के बारे में भी सोचने की जरूरत नहीं समझता, उसे चार लेखकों-कवियों-कलाकारों के माना-सम्मान और भावनाओं की क्या परवाह हो सकती है? रचनाकारों से उनकी अपेक्षा सिर्फ वही होती है, जो गुलामों से मालिकों की हुआ करती थी. वह नहीं चाहते कि कोई अपने ढंग से सोचे. यह बात दुनिया की कोई सियासत बर्दाश्त कर ही नहीं सकती कि कोई आम को आम और इमली को इमली कहे. सियासत कातिल पर नहीं, कतील के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने का नाम है. मेरा ख़याल है कि जालिब ने इस हकीकत को बहुत करीब से समझ लिया था.
शायद इसीलिए उन्हें अपने समकालीनों पर यह तंज करना पड़ा :

और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
रह गया काम हमारा ही बगावत लिखना

लेकिन जालिब को इस बात पर भी कोई पछतावा नहीं है. न विफलता पर, नहीं मुहिम की विफलता पर और न अपनी जाती मुश्किलों पर. अलबत्ता उन्हें नाज है अपने शायर की खुदी को बचाए रखने का। तभी वह कहते हैं :
कुछ भी कहते हैं कहे शाह के मुसाहिब ‘जालिब’
रंग रखना यही अपना इसी सूरत लिखना.
तो साहब मैं जानता हूँ कि ब्लोगिन्ग की दुनिया का लेखक डबल रोल निभा रहा है. लेखक-पाठक दोनों वही है. लिहाजा ये आख़िर वाला शेर हमारे-आपके लिए.

इष्ट देव सांकृत्यायन

Advertisements

4 Responses to “…इसी सूरत लिखना”

  1. इष्टदेव जीसाधुवाद, जालिब से परिचय तो था लेकिन भूल सा रहा था, आपने बड़े करीने से याद दिलाया.

  2. बहुत ही सुन्दरता से आपने हबीब जालिब साहेब के बारे में लिखा. पढ़कर आनन्द आ गया. बहुत बढ़िया.और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाकत लिखनारह गया काम हमारा ही बगावत लिखना -क्या बात है!! कुछ पूरी रचनायें पढ़वायें उनकी. ज्यादा नहीं तो एक दो सही. अगर संभव हो पाये.

  3. जालिब साहब से परिचय करवाने के लिये शुक्रिया।

  4. इष्टदेव जी, हबीब जालिब पर इतनी सुंदर टिप्पणी लिखने के लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद। दक्षिण एशिया की रेडिकल वाम धाराओं में इस शायर की बड़ी कदर की जाती रही है लेकिन फैज के रूमान की धुंध हबीब जालिब को इस कदर खा गई कि आज उनके बारे में जानने के लिए हमें ब्लॉग पर उनका परिचय पढ़ने की जरूरत पड़ रही है। यहां सहारा में अपनी टेबल पर मैं जालिब की छोटी बहर की एक गजल कोई तीन साल लगाए रहा। फिर जब टेबल छूटी तो गजल भी छूट गई। उसी के दो-चार शेर याददाश्त के आधार पर लिख रहा हूं-फिरंगी का जो मैं दरबान होतातो जीना किस कदर आसान होतामेरे बच्चे भी अमरीका में पढ़तेमैं हर गर्मी में इंगलिस्तान होताझुका के सर को बन जाता जो सर मैंतो लीडर भी अजीमुश्शान होताजमीनें मेरी हर सूबे में होतींमैं वल्ला सदरे पाकिस्तान होता

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: