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तुम नहीं हो दूर मुझ से

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 23, 2007

मन तुम्हारा जब भरे तब नयन मेरे भीग जाते ,
शूल चुभता जब तुम्हें तब पांव मेरे टीस पाते,
तुम नहीं हो दूर मुझ से मुझ में ही हो तुम समाये,
तुम हंसो जब खिलखिलाकर जन्म कई गीत जाते.
अनिल आर्य

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7 Responses to “तुम नहीं हो दूर मुझ से”

  1. manya said

    sweet!!!

  2. सुन्दर!

  3. बहुत बढिया!

  4. very nice, Gorakhpur ki jhamajham barish me in lins ne bahut majja diya.satyendra

  5. Neeraj said

    cute one dear

  6. तुम नहीं हो दूर मुझ से मुझ में ही हो तुम समाये,तुम हंसो जब खिलखिलाकर जन्म कई गीत जाते.इसमे जन्म कई गीत जाते.समझ नही आया या तो बीत जाते हो या गीत गाते होना चाहिये या शायद मै समझ नही पा रही हूँ…वैसे भाव बहुत सुन्दर है मेरी कविता पढ़ने के लिये बहुत-बहुत शुक्रिया।सुनीता(शानू)

  7. Anil Arya said

    सुनीता जीं, धन्यवाद… प्रिय की ख़ुशी से तन- मन आल्हादित हो उठता है… उनकी ख़ुशी न केवल कई नए गीतों को जन्म देने वाली होती है वरन अंग-प्रत्यंग को पुलकित कर कुछ नया नूतन रचने के लिए प्रेरित करती है…. यही तो प्यार है जो जीने की ललक पैदा करता है…

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