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सवाल है प्राथमिकताओं का

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 27, 2007

पिछले दिनों वरिष्ठ टीवी पत्रकार दिलीप मंडल ने एक लेख लिखा था “एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति”. नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित इस लेख को दिलीप जी की अनुमति से इयत्ता पर लिया गया था. लेख पढा गया और हमारे प्रबुद्ध ब्लोगरों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दर्ज कराईं. संजय मिश्रा और दर्द हिंदुस्तानी तो जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के नाते दिलीप से सहमत थे, लेकिन इनमें एक प्रतिक्रिया रवि मिश्र की भी थी. रवि मिश्र ने अपनी यह प्रतिक्रिया अपने ब्लोग पर भी दी थी. दिलीप जी ने तुरंत उसका जवाब भी मुझे भेज दिया था. लेकिन मैं चाहता था कि रवि मिश्र की प्रतिक्रिया का हिंदी में अनुवाद कर उसे ब्लोग पर एक पोस्ट की ही तरह दिया जाए. इस बीच अन्यत्र व्यस्तताओं के कारण समय की कमी के नाते मैं यह कार्य नहीं कर सका था, पर अब यह सब इकट्ठे दे रहे हैं.
रवि मिश्र पेशे से चिकित्सक हैं. उनका आग्रह यह है कि एचआईवी/एड्स के नाम पर जो खर्च किया जा रहा है, उस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए. हाँ, अगर उसका उपयोग सही तरीके से न हो रहा हो तो जरूर आपत्ति दर्ज कराएं. बेशक वह एक चिकित्सक के नजरिए से सही सोच रहे हो सकते हैं, लेकिन भारत जैसे जटिल स्थितियों वाले देश को केवल चिकित्सकीय नजरिए से समझना मुश्किल है. एक ऐसे देश में जहाँ आधे से ज्यादा आबादी पोषक तत्वों की कमी के कारण कुपोषण से ग्रस्त हो, वहाँ एक फीसदी आबादी का मोटापे से परेशान होना सरकार की परेशानी का सबब नहीं होना चाहिए. दिलीप का आग्रह एचआईवी/एड्स संबंधी अभियान रोकने का नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि इस फेर में जिन बीमारियों की उपेक्षा की जा रही है वह भी कम त्रासद नहीं हैं और सरकार उन पर ध्यान दे. असली सवाल जमा-खर्च का नहीं, बल्कि गलत प्राथमिकताएँ तय करने का है.


रवि मिश्र की प्रतिक्रिया
मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, इसलिए मैं इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा कि कौन क्या लाभ कमा रहा है.
लेकिन एक बाल रोग विशेषज्ञ होने के नाते मैं यह जानता हूँ कि ब्लड प्रेशर या टीबी की तुलना में एचआईवी एक खतरनाक बीमारी है. क्योंकि इसने कई देशों में कहर बरपाया है, लोगों के पीछे सिर्फ अनाथ छूटे हैं। हम भारत में वह स्थिति आने तक इंतज़ार नहीं कर सकते. हाँ, संख्या में कमी-बेसी हो सकती है, लेकिन वह अलग-अलग तरह की आबादी में किए गए अध्ययन के कारण है. पहले आए आंकडे हाई रिस्क ग्रुप से हैं. मसलन वेश्यालयकर्मियों के बीच इसका असर ज्यादा देखा गया. मौजूदा आंकडे जनसामान्य पर किए किए गए अध्ययन का नतीजा हैं. इसके लिए ज्यादा नमूने लिए गए हैं और संभव है कि यह वास्तविक स्थिति बयान कर रहा हो. हालांकि यह कोई संतोषजनक जवाब नहीं है, क्योंकि इस दिशा में कुछ ज्यादा किए जाने की जरूरत है.
क्यों?
इसका कारण शिक्षा और जागरूकता की कमी है और यह खुशफहमी है कि इसका असर आप तक नहीं पहुंच सकता है.
उदाहरण के लिए, बिहार में ७८ प्रतिशत जच्चगी घर पर ही होती है. और अफ़सोस की बात है कि ७८ प्रतिशत यही नहीं जानती हैं कि कंडोम एच आई वी/एड्स से बचाव का एक उपाय है. (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण २००६, वही आंकड़ा जिसमें एच आई वी संक्रमण का प्रकोप घटा हुआ बताया गया है). इसी तरह युवा पुरुषों का एक बड़ा वर्ग मेहनत-मजदूरी करने और स्त्रियों का बड़ा वर्ग घरेलू नौकरानियों के तौर पर काम करने बाहर बडे शहरों में जाता है. इनमें कई अपने साथ एच आई वी लेकर वापस बिहार जाते हैं. अब ऐसे किसी व्यक्ति को अपने घर में बतौर नौकर या नौकरानी रखना कितना सुरक्षित समझेंगे, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि एच आई वी संक्रमण का असर वर्षों तक स्पष्ट नहीं दिखाई देता? विभिन्न राज्यों में ट्रक ड्राइवरों की स्थिति भी यही है.
यह भी दर्ज करें कि एच आई वी के संक्रमण का माध्यम केवल सेक्स ही नहीं है.
उनके बारे में सोचिए जिन्हे प्रसव, या किसी दुर्घटना के दौरान रक्त की जरूरत पडी और उन्हें किसी अस्पताल या निजी क्लिनिक में या किसी अनजान आदमी से खरीद कर एच आई वी संबंधी जांच किए बग़ैर ही ख़ून चढ़ा दिया गया. उस छोटे बच्चे के बारे में सोचिए जो किसी मैदान में खेल रहा हो और अचानक उसे किसी ड्रग एडिक्ट की इस्तेमाल की हुई सुई चुभ जाए. विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में आप क्या सोचते हैं? (एनडीटीवी के अनुसार १८ वर्ष से कम उम्र के ४० प्रतिशत बच्चे यौन संबंध बना चुके होते हैं. इस आंकडे में अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन टीवी, केबिल, मोबाइल और बोलीवुड की बदन उघाडू संस्कृति इसे बढावा तो दे रही है)
हाँ, हमें उस राशि को लेकर कोई अचम्भा नहीं होता जो अभिनेत्रियों को स्क्रीन पर शोबाजी के लिए दिया जाता है, लेकिन मुफ़्त उपचार पर कुछ लोगों को अफ़सोस है.
यह कारुणिक है.
टीबी और मलेरिया के बजाय पश्चिम एचआईवी और एड्स के लिए क्यों धन दे रहा है?
यह सही नहीं है. क्योंकि बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन टीबी और मलेरिया जैसी उपचारयोग्य बीमारियों के लिए दुनिया भर में बड़ी राशि खर्च कर रहा है. लेकिन इससे ज्यादा वे इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि अगर इस बीमारी को नहीं रोका गया तो यह दुनिया भर में फैल सकती है. और चूंकि एचआईवी/एड्स का कोई समुचित इलाज अभी तक नहीं संभव है इसलिए इससे बचने के उपायों की शिक्षा ही इससे लड़ने का एकमात्र उपाय है.
आंकडे कहते हैं कि किसी व्यक्ति के एचआईवी से संक्रमित होने की आशंका ३०० में से केवल १ के अनुपात में है. पर इससे क्या? उस व्यक्ति और उसके परिवार के लिए तो यह सौ प्रतिशत बर्बादी है.
मेरा ख़्याल है कि आपत्ति फंडिंग पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि इस फंड का समुचित उपयोग हो. इसका जहाँ-जिस रुप में प्रयोग हो रहा है वह जाहिर हो और इसके लिए हर स्तर पर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया जाए. जरूरतमन्द शख्स को बाहर का रास्ता न दिखाएँ, उसे यह बताएं कि उसके लिए जांच और उपचार के केंद्र सक्रिय हैं और यह सब केवल कागज़ों में नहीं है. स्थानीय केंद्रों के कार्य के आंकडे आम जानता को उपलब्ध कराए जाएँ. अखबार अगर इस तरह मदद करें तो यह ज्यादा सही होगा बनिस्बत ध्यान दूसरी अप्रासंगिक जगह हटाने के.
ऐसा अकारण नहीं है. मैंने यह महसूस किया है कि एचआईवी-एड्स के संदर्भ में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हिंदी में एक अच्छी वेबसाईट भी नहीं है.
धन्यवाद
रवि मिश्र, एमडी, ऍफ़एएपी

http://hivcare.blogspot.कॉम


दिलीप मंडल का जवाब

डॉक्टर रवि मिश्रा,
लोगों की सेहत को लेकर आपकी चिंता जायज है और मैं इसकी कद्र करता हूं. लेकिन आपने अपने कमेंट में कहीं भी उन फैक्ट्स को गलत नहीं बताया, जिसके आधार पर मैं ये संदेह जता रहा हूं कि एड्स से लड़ाई के नाम पर एक साजिश रची गई है.
– आपने लिखा है कि बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन सिर्फ एड्स के लिए एनजीओ को पैसे नहीं देता। टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए भी वो ढेर सारी रकम खर्च करता है. अगर ऐसा है तो कृपया बताएं कि वो रकम कितनी है? और भारत में अगर आप टीबी के इलाज के लिए एक एनजीओ खोलें तो क्या आपको इस फाउंडेशन से पैसे मिलेंगे?
– देश के सभी बड़े हॉस्पिटल ऑपरेशन से पहले सभी मरीजों की एचआईवी इनफेक्शन के लिए स्क्रीनिंग करते हैं. इस मुद्दे में दिलचस्पी रखने वालों को क्या आप बताएंगे कि इस स्क्रीनिंग में कितने पॉजीटिव केस सामने आते हैं। मैं दिल्ली के बड़े हॉस्पीटल्स के अपने मित्रों के अनुभव के आधार पर बता सकता हूं कि ऐसे मामले ना के बराबर आते हैं.
– और फिर सवाल ये भी नहीं है कि एड्स कितनी खतरनाक बीमारी है। मैं ये मुद्दा उठा रहा हूं कि एड्स से लड़ने के नाम पर देश का बढ़िया टेलेंट और बदलाव लाने में सक्षम युवाओं की ऊर्जा नष्ट हो रही है। खासकर लेफ्ट पॉलिटिक्स करने वाले युवाओं को एड्स वाले एनजीओ जिस तरह से अपने घेरे में ले रहे हैं, वो बात मुझे विचलित करती है.
-मुझे ये बात भी चिंतित करती है कि भारत जैसे गरीब देश में केंद्र सरकार हर साल एक हजार करोड़ रुपए ऐसी बीमारी पर खर्च कर रही है जिसे बेहद खतरनाक बताते हुए ये आंकड़ा दिया जा रहा है कि इससे 20 साल में साढ़े दस हजार लोगों की जान गई है। यानी हर साल 500 मौतें.
– और फिर सवाल हेल्थ सेक्टर में गलत प्रायोरिटी तय किए जाने का है. लेकिन ये गलत प्रायोरिटी सरकारी अफसरों, दवा कंपनियों, कुछ हेल्थ प्रोफेशनल्स, कुछ मीडिया प्रोफेशनल्स और एनजीओ के लिए फायदे का सौदा है.
-दिलीप मंडल

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One Response to “सवाल है प्राथमिकताओं का”

  1. Dear sir,you putted both ideas on same board.It is right that at the name of aids , the organisations creating terror. Same situation is in the field of water pollution.I am writing a desi kahawat ” aadmi ke paas ek hi lota paani hai, chahe to wo pee le, aachman kar le yaa niptaan ke baad ….shuddhi kar le.satyendraUP News, Gorakhpur

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