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Archive for August, 2007

परमाणु करार का सच – 1

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 24, 2007

माकपा के पोलित ब्यूरो ने पार्टी नेतृत्व को यह फैसला लेने का हक दे दिया कि यूपीए सरकार को मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए. क्या होगा यह तो बाद की बात है, लेकिन यह बात गौर किए जाने की है कि पार्टी नेतृत्व ने पोलित ब्यूरो से तब ऐसा कोई हक मांगने की जरूरत नहीं समझी जब उसकी सहानुभूति का केंद्रीय वर्ग (लक्ष्य समूह इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि यह पूंजीवादी कोष का शब्द है) यानी सर्वहारा अपने को सबसे ज्यादा तबाह, थका-हरा और सर्वहारा महसूस कर रहा था. महंगाई और बेकारी, ये दो ऎसी मुसीबतें हैं जो इस वर्ग को जमींदोज कर देने के लिए काफी हैं और यूपीए सरकार के कार्यकाल में ये दोनों चीजें बेहिसाब बढ़ी हैं. ऐसा नहीं है कि अब ये घट गई हैं या नहीं बढ़ रही हैं, पर कामरेड लोगों ने इन मसलों पर थोडा-बहुत फूं-फां करने के अलावा और कुछ किया नहीं. यह बात भी सुनिश्चित हो गई कि परमाणु करार वाले मसले पर भी ये लोग इससे ज्यादा कुछ करेंगे नहीं. प्रकाश करात ने कह दिया है कि हम सरकार अस्थिर करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसके बाद भी सरकार को करार पर कदम बढाने से पहले अपने भविष्य का भी फैसला करना होगा. सवाल यह है कि जब आप सरकार अस्थिर करने के पक्ष में नहीं ही हैं तो सरकार को अपने भविष्य का फैसला करने की धमकी देने का क्या मतलब है? भाषा की जलेबी छानना इसे ही कहते हैं. ऐसा नहीं है कि मैं कामरेड लोगों की नीयत पर शक कर रहा हूँ. मेरा शक सरकार की नीयत पर भी नहीं है. बस कुछ छोटे-छोटे सवाल हैं, जिनसे मैं जूझ रहा हूँ और चाहता हूँ कि आप भी जूझें. क्योंकि भारत जितना मेरा है, उतना ही आपका भी है और उतना ही मनमोहन सिंह का भी है. सरकार का तर्क है कि वह यह करार इसलिए कर रही है कि इससे भारत में ऊर्जा उत्पादन बढ़ जाएगा. मान लिया, पर सवाल यह है कि उस बढ़े हुए ऊर्जा उत्पादन का हम क्या करेंगे? यह बात गौर करने की है कि भारत क्या वास्तव में ऊर्जा संकट से जूझ रहा है या ऊर्जा के कुप्रबंधन से जूझ रहा है? इस मसले पर नए सिरे से और गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए. ध्यान रहे भारत में तीस प्रतिशत से ज्यादा बिजली सिर्फ लाईन फाल्ट के चलते नष्ट हो जाती है. इस समझौते की जो कीमत भारत को चुकानी पडेगी उसकी तुलना में यह फाल्ट ठीक कराने पर बहुत मामूली लागत आएगी.
यह कौन नहीं जानता कि हमारे देश में बिजली को बरबाद करने की ही तरह उसकी चोरी भी एक शगल है. इस चोरी के लिए आम जनता और उनमें भी खास तौर से मलिन और दलित बस्तियों में रहने वाले गरीब लोग ज्यादा बदनाम हैं. हकीकत यह है कि यह चोरी सफेदपोश लोगों की बस्तियों में ज्यादा होती है. इस काम में कोई और नहीं बिजली विभाग और बदले परिदृश्य में कंपनियों के कर्मचारी ही सहयोग करते हैं. अव्वल तो बात यह है कि घरेलू कामकाज में बिजली की जो चोरी होती है वह भारत में होने वाली बिजली चोरी का दसवां हिस्सा भी नहीं है. बिजली की इससे ज्यादा चोरी सरकारी सेक्टर में होती है. कौन नहीं जानता कई सरकारी संस्थानों पर विभिन्न राज्यों में बिजली बोर्डों के अरबों रुपये बकाया पडे हैं. इस बकाये के चलते बोर्ड ग्रिडो को भुगतान नहीं कर पाते, ग्रिड बिजली घरों को भुगतान नहीं कर पाते, बिजली घर ऊर्जा स्रोतों का इंतजाम नहीं कर पाते और अंततः देशवासियों को बिजली नहीं मिल पाती.
क्या वर्षों से चला आ रहा अरबों रुपये का यह बकाया जिसके लौटने की अब कोई उम्मीद भी बेमानी है, चोरी से कम है. यह सरकारें देशवासियों से लेकिन नहीं कैसे करती हैं कि वे इसकी बकाया रकम का भुगतान कर दें? लेकिन नहीं बिजली की सरकारी चोरी भी बहुत बड़ी चोरी नहीं है. बिजली की सबसे ज्यादा चोरी दरअसल औद्योगिक क्षेत्र में हो रही है. यह चोरी छोटे-छोटे कर्मचारियों के जरिये नहीं हो रही है. इसमें बिजली विभाग के बडे अफसर शामिल होते हैं. औद्योगिक आस्थानों में बिजली चोरी की जांच-पड़ताल के लिए अगर कभी रेड भी पडी होती है तो उन्हें हफ्ता भर पहले से पता होता है और इस दौरान वे अपनी खाता बही तक सब कुछ दुरुस्त कर चुके होते हैं. जहाँ चोरी का यह आलम हो वहाँ कोई यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि ऊर्जा का उत्पादन बढ़ जाने भर से ही उसका संकट हल हो जाएगा?

और तो और, केंद्र सरकार भारत में ऊर्जा संकट को लेकर कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऊर्जा क्षेत्र के लिए नियामक का पद पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से खाली पड़ा है. जहाँ तक सवाल बिजली उत्पादन का है, इस पर ज़द (यू) नेता दिग्विजय सिंह की बात गौरतलब है. वह कहते हैं कि अगर यह समझौता हुआ तो 2020 तक देश में 20 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकेगी. लेकिन अगर सिर्फ नेपाल से आने वाली नदियों को बाँध कर जल विद्युत परियोजनाओं को दुरुस्त कर लिया जाए तो 60 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है. इससे हम बिहार और उत्तर प्रदेश को बढ़ की तबाही से बचाने के साथ-साथ अपने पड़ोसी देश नेपाल की गरीबी भी दूर कर सकेंगे.

मेरा ख़्याल यह है कि आप बिजली उत्पादन बढ़ा कर भी क्या करेंगे, अगर आप उसके पारेषण और वितरण की व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर सकते हैं तो? यह बात तो जगजाहिर है कि केवल यूपीए ही नहीं, हमारे देश की किसी भी पार्टी या गठबंधन की सरकार में किसी भी सेक्टर की व्यवस्था सुधारने के प्रति कोई इच्छाशक्ति नहीं है. अगर होता तो अब तक ऊर्जा संकट जैसी कोई बात ही भारत में नहीं बची होती. अब अगर केवल इतनी सी बात के लिए यह समझौता किया जा रहा हो, तब तो बहुत बुरी बात है. सच यह है कि उत्पादन बढाने के नाटक से ज्यादा जरूरी व्यवस्था में सुधार है और व्यवस्था में सुधार का मतलब किलो चोरों को परेशान कर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करना नहीं, टन डकैतों को पकड़ कर जनता के हक पर डकैती को रोकना है. पर ऐसा कोई सरकार क्यों करे?
(फिलहाल आप इस मुद्दे पर सोचें. परमाणु करार से जुडे अन्य मसलों का सच अगली कडी में)
इष्ट देव सांकृत्यायन
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हम ठहरे विश्वगुरू

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 23, 2007

चाय की गुमटी पर बैठे-बैठे ही अच्छी-खासी बहस छिड़ गई और सलाहू एकदम फायर. सारे बवेले की जड़ में हमेशा की तरह इस बार भी मौजूद था मास्टर. कभी-कभी तो मुझे लगता है इस देश में विवादों की ढ़ेर की वजह यहाँ मास्टरों की बहुतायत ही है. ज्यादा विवाद हमारे यहाँ इसीलिए हैं क्योंकि यहाँ मास्टर बहुत ज्यादा हैं. एक ढूँढो हजार मिलते हैं. केवल स्कूल मास्टर ही नहीं, ट्यूशन मास्टर, दर्जी मास्टर, बैंड मास्टर, बिजली मास्टर ….. अरे कौन-कौन से मास्टर कहें! जहाँ देखिए वहीँ मास्टर और इतने मास्टरों के होने के बावजूद पढ़ाई रोजगार की तरह बिल्कुल नदारद. तुर्रा यह कि इसके बाद भी भारत का विश्वगुरू का तमगा अपनी जगह बरकरार. ये अलग बात है कि मेरे अलावा और कोई इस बात को मानने के लिए तैयार न हो, पर चाहूँ तो मैं खुद भी अपने को विश्वगुरू मान सकता हूँ. अरे भाई मैं अपने को कुछ मानूं या कहूं, कोई क्या कर लेगा? हमारे यहाँ तो केकेएमएफ (खींच-खांच के मेट्रिक फेल) लोग भी अपने को एमडी बताते हैं और कैंसर से लेकर एड्स तक का इलाज करते हैं और कोई उनकी डिग्री चेक करने की जरूरत भी नहीं समझता. तो विश्वगुरू बनने की तो कोई डिग्री भी नहीं होती. बहरहाल विवाद की जड़ अपने को विश्वगुरू से एक दर्जा ऊपर मानने वाले मास्टर की एक स्थापना थी. स्थापना थी नेताजी की पिटाई के संदर्भ में, जिसे वह वैधानिक, संसदीय, नैतिक, पुण्यकार्य और यहाँ तक कि वक़्त की सबसे जरूरी जरूरत बता रहा था. जबकि सलाहू की मान्यता इसके ठीक विपरीत थी. मास्टर कह रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब देश के सारे नेता पीटे जाएँगे और सलाहू कह रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब देश की सारी जनता पीटी जाएगी. मैं ठहरा एक अदद अदना कलमघिस्सू जिसकी औकात में कभी कुछ तय करना रहा ही नहीं. सामने घटी घटना और जगजाहिर हालात के बारे में लिखने के लिए भी जिसे विश्वसनीय, जानकार और उच्चपदस्थ सूत्रों के हवाले का सहारा लेना पड़ता है. पहले से ही संपादक से लेकर पाठक तक के भय से आक्रांत और उस पर भी यह भरोसा नहीं कि कब कौन सा नया कानून लाकर इसके सिर लाद दिया जाए. लिहाजा अपन ने कोई राय देने-मानने के बजाय चुपचाप सुनने और गुनने में ही भलाई समझी. मास्टर फिरंट था. पक्के तौर पर यह माने बैठा था कि देश की सारी समस्याओं की जड़ में नेता हैं. सलाहू ने पूछा भाई वह कैसे? मास्टर शुरू हो गया – भाई देखो झूठे वादे जनता से ये करते हैं. कफ़न से लेकर तोप खरीदने तक के सौदों में दलाली ये खाते हैं. आरक्षण से लेकर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक तुष्टीकरण तक के नाम पर जनता को ये बरगलाते हैं ……
‘बस-बस-बस’ वाली तर्ज पर बात पूरी होने से पहले ही सलाहू बोल पड़ा, ‘यही तो मैं भी कहता हूँ. जनता क्या दूध पीती बच्ची है जो उसे कोई बरगलाए और वह बरगला जाए? आख़िर क्यों बरगला जाती है वह?’
‘बरगला इसलिए जाती है कि उसे बनाया ही इस तरह गया है कि वह बरगला जाती रहे.’
‘वाह जी वाह! तुम्हारा मतलब यह कि वह पैदा ही बरगलाए जाने के लिए होती है !’
‘कम से कम हिंदुस्तान की तो सच्चाई यही है.’ ‘जब यही सच्चाई है तो फिर कष्ट क्यों है भाई? फिर तो उसे बरगलाया ही जाना चाहिए.’
‘तुम्हारे जैसे वकील तो कहेंगे ही यही.’
‘हाँ, और यह भी कहेंगे कि यह देन है तुम्हारे जैसे मास्टरों की.’
‘तुम्हारी तो भाई आदत है मास्टरों को कोसना. अपराधी को महापुरुष साबित करने का काम तुम करो और बदनाम हों मास्टर.’ ‘कभी यह भी सोचा सलाहू ने ऐसे घूर जैसे ?’
‘मास्टर अपराधी नहीं बनाता समझे’ मास्टर गाँव की बिजली की तरह फ्लक्चुएट होने लगा था, ‘मास्टर जिन बच्चों को पढाता है उन्ही में से कुछ अफसर भी बनते हैं, कुछ डॉक्टर और इंजीनियर भी बनते हैं ………..’
‘अरे बस कर यार’ सलाहू वकील से अचानक थानेदार बन गया था, ‘आख़िर सब बन कर सब करते क्या हैं, घपले-घोटाले और जनता के हक पर डकैती ही तो ….’
‘और उन्हें इस बात के लिए मजबूर कौन करता है?’
‘अब तो मन करता है कि कह दूं वकील.’
‘तुम्हारे कहने से क्या होता है? कौन मानता है तुम्हारी बात?’
‘क्या?’ एक बारगी तो मास्टर का चेहरा बिल्कुल फक्क पड़ गया. शायद उसे लगा कि कहीं सलाहू घर की बात बाहर न करने लगे. बीवी की याद आते ही उस बेचारे बीस साला पति के पास हथियार डालने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. सलाहू इस बात को जानता है कि बीवी का जिक्र मास्टर पर वैसे ही काम करता है जैसे गठबंधन सरकार पर समर्थन वापसी की धमकी. पर वह भी कामरेड लोगों की तरह अपनी ताकत का सिर्फ एहसास ही देता है, हथियार का इस्तेमाल नहीं करता. sadhe हुए वकील का अगला वाक्य था, ‘स्कूल के बच्चे तक तो तुम्हारी बात मानते नहीं.’
पर मास्टर मौका नहीं चूका. उसने तुरंत एक्का फेंका, ‘हाँ! अगर सारे बच्चे मास्टरों की बात मान जाते तो नेता और वकील कहॉ से आते?’
‘नहीं, आते तो तब भी. लेकिन तब इनमें भी ईमानदार लोग आते.’ सलाहू ने सुधार किया, ‘पर सवाल यह है कि वे मानें क्यों? जो देख रहा है कि गुरुजी क्लास में पढाने के बजाय सोते हैं, कहते हैं सच बोलने को और खुद बोलते हैं झूठ …….’
‘मतलब यह कि स्कूल की किताबें भी कानून की किताबों की तरह हो गई हैं.’ यह नया निष्कर्ष शर्मा जी का था.
सलाहू ने ऐसे घूरा जैसे अभी ‘आर्डर-आर्डर’ करने जा रहा हो. बिना पैसे लिए उसने सवाल उठा दिया, ‘जहाँ जनता खुद कानून का सम्मान न करती हो वहाँ भला कानून की किताबों का इसके अलावा और क्या हाल होगा?’
‘जनता को कानून का सम्मान करने लायक छोड़ा कहॉ गया है?’ मास्टर ने यह सवाल वैसे ही किया था जैसे सलाहू कोर्ट में दलीलें देता है. ‘अब क्या सड़क पर चलने, लाल बत्ती पर थोड़ी देर रुकने, कूड़ा गली में न फेंकने, अपना काम सलीके से न करने और अपना वोट जाति-धर्म से प्रभावित होकर न देने से भी हमें रोका गया है?’
‘पर एक के यह सब करने से क्या होता है?’
‘यह बात कानून तोड़ते समय क्यों नहीं सोचते गुरू ? एक तोड़ता है तोड़े, पर उसे क्यों तोडें? खास तौर से तब जब इसके लिए सिर्फ थोड़े से धैर्य की जरूरत होती है? हम जैसे हैं हमारे नेता भी वैसे ही तो होंगे!जब कानून का सम्मान नहीं करेंगे तो संसद और विधान सभाओं में भेजेंगे भी क्यों? वे तो हमारे लिए ही परेशानी के सबब बन जाएंगे.’ मास्टर के पास इस बात का जवाब शायद नहीं था. वह वैसे ही खिसक लिया जैसे किसी सवाल का जवाब न आने पर अपनी क्लास से खिसक लेता है.
मैं सोच रहा था कि बात तो ठीक है, पर हम विश्वगुरू जो ठहरे. गुरू का काम उपदेश देना है, उस पर अमल करना थोड़े ही. अगले ही क्षण सलाहू भी उठा. उसने अद्दलत के चिन्ह वाले स्टीकर से युक्त बिना नंबर वाली अपनी गाड़ी उठाई और आगे बढ़ गया.
इष्ट देव सांकृत्यायन

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अखबार की बातें

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 21, 2007

है मन में इनकार की बातें

ऊपर से इकरार की बातें

मतलब की है दुनिया सारी

हर जगहा व्यापार की बातें

हो भद्दी सी गाली कहते
हैं प्यारी सरकार की बातें

हत्या लूट डकैती चोरी

यह सब है अखबार की बातें

आये सुकूं जो बातें सुनकर

मुद्दत हो गईं यार की बातें

गुल गुलशन गुलफ़ाम की बातें

आओ कर लें प्यार की बातें

रतन

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फिर क्या कहना ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 21, 2007

लोकतंत्र में अपराधी को माल्यार्पण फिर क्या कहना ?
जेल से आकर जनसेवा का शपथग्रहण फिर क्या कहना ?

जिनके हाथ मे ख़ून के धब्बे चौरासी के दंगो के-
बापू की प्रतिमा का उनसे अनावरण फिर क्या कहना ?

एक
विधेयक लाभों के पद पर बैठाने की खातिर।
लाभरहित सूची मे उसका नामकरण फिर क्या कहना ?

फाँसी पर झूले थे कितने जिस आज़ादी की खातिर –
सिर्फ दाबती खादी ही के आज चरण फिर क्या कहना ?

बार बार मैं दिखलाता हूँ अपने हाथों मे लेकर –
नहीं देखते अपना चेहरा ले दर्पण फिर क्या कहना ?

विनय ओझा स्नेहिल

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बन टांगिया मजदूरों की दुर्दशा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 19, 2007

सरकारें देश भर में वृक्षारोपण के लिए करोडो रुपये खर्च करती है, लेकिन वन समाप्त होते जा रहे हैं. वनों को लगाने वाले बन टांगिया मजदूरों का आज बुरा हाल है जिन्होंने अंग्रेजों के ज़माने मे गोरखपुर मंडल को पेड लगाकर हरा भरा किया था. मंडल मे ३५ हजार से अधिक बन टांगिया मजदूर अपने ही देश मे निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं. उन्हें राशनकार्ड, बेसिक शिक्षा,पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नही हैं.आख़िर स्वतंत्र भारत में भी ये परतंत्र हैं.

घर के मारल बन मे गइली, बन में लागल आग.
बन बेचारा का करे , करमवे फूटल बाय.
ये अभिव्यक्ति एक बन टांगिया किसान की सहज अभिव्यक्ति है। महाराजगंज और गोरखपुर जिले के ४५१५ परिवारों के ३५ हजार बन टांगिया किसान दोनो जिलों के जंगलों मे आबाद हैं. नौ दशक पहले इनके पुरखों ने जंगल लगाने के लिए यहाँ डेरा डाला था. इस समय इनकी चौथी पीढ़ी चल रही है. सुविधाविहिन हालत मे घने जंगलों कि छाव मे इनकी तीन पीढी गुजर चुकी है. इनके गाव राजस्व गावं नही हैं इसलिये इन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ नही मिलता है. हम स्वतंत्रता की ६० वी वर्षगांठ मना चुके , लेकिन अपने ही देश मे बन टांगिया मजदूरों की त्रासदी देख रहे हैं. आख़िर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
ये मजदूर अपने गावं मे पक्का या स्थाई निर्माण नही करा सकते, न तो हन्द्पम्प न पक्का चबूतरा — फूस की झोपड़ी ही डाल सकते हैं. सरकारी स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र के बारे मे तो सोचा भी नही जा सकता है. आज ये उन अधिकारों से भी वंचित हैं जो इन्हें देश का सामान्य नागरिक होने के नाते मिलना चाहिए. बैंक मे इनका खाता नही खुलता, तहसील से अधिवास प्रमाण पत्र नही मिलता,जाति प्रमाण पत्र भी नही मिलता जिससे इन्हें पिछड़े या अनुसूचित होने का लाभ मिल सके.
हालांकि राजनीतिक दलों ने वोट के लिए कुछ इलाक़ों मे इन्हें मतदाता सूची मे दर्ज करा दिया है, लेकिन कुछ इलाक़ों मे वे वोटर भी नही बन पाए हैं. इनके साथ एक समस्या ये भी है की बन टांगिया विभिन्न जातियों के हैं इसलिये इनका कोई वोटबैंक नही है और ना ही ये संगठित हैं.गोरखपुर के तिन्कोनिया रेंज मे ५ महाराजगंज के लक्ष्मीपुर, निचलोल ,मिठौरा ,कम्पिअरगंज ,फरेंदा,श्याम्दयूरवा व पनियारा विकासखंड मे बन टांगिया मजदूरों के गावं आबाद हैं. इसमे ५६% केवट व मल्लाह ,१५ % अनुसूचित जाति व १०% पिछडी जाति के लोग हैं. ये लोकसभा व विधान सभा मे तो वोट दे सकते हैं लेकिन अपनी ग्राम पंचायत नही चुन सकते हैं.
आख़िर ये कब गुलामी से मुक्त होंगे और कब मिलेगी इन्हें भारत की नागरिकता ? ७० साल के जयराम कहते हैं की उन्हें तो पता भी नही की देश और दुनिया की प्रगति क्या है ? जवान लड़के लडकियां मजदूरी करते हैं जिससे पेट की आग बुझ जाती है लेकिन दुखों का कोई अंत नही दिखाई देता लेकिन इनकी उमीदें अभी भी बरकरार हैं कि कही दो गज जमीन मिल जाये जिसे ये अपना कह सकें. अख़्तर “वामिक” ने सही ही कहा है :
ख्वाबों को अपनी आखों से कैसे जुदा करें?
जो जिंदगी से खौफजदा हो वो क्या करे?
सत्येंद्र प्रताप

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रू-ब-रू पाया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 18, 2007

तुमको अपने है चारसू पाया
पल में इन्सान और जादू पाया
मौत तुमको भी है पसंद नहीं
जींद की तुझमें आरजू पाया
सबकी खातिर है तेरे दिल में जगह
न जुबां पर है दू-ब-दू पाया
सीधे कहते हैं सब तुम्हें लेकिन
मैंने तुझमें वो जन्गजू पाया
बताएं किसको तेरे बारे में
हर मुसीबत में चाह्जू पाया
बदल चुकी है ये सारी दुनिया
पर तुम्हें मैंने हू-ब-हू पाया
मैं जानता हूँ कि हो योजन दूर
यार तुमको है कू-ब-कू पाया
सभी कहते हैं तुम जहाँ में नहीं
याद जब आई रू-ब-रू पाया
रतन

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ख्वाहिश

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 17, 2007

सिर्फ चाहे से पूरी कोई भी ख्वाहिश नहीं होती.
जैसे तपते मरुस्थल के कहे बारिश नहीं होती..

हमारे हौसलों की जड़ें यूँ मज़बूत न होतीं –
मेरे ऊपर जो तूफानों की नवाज़िश नहीं होती..

हमे मालूम है फिर भी सँजोकर दिल मे रखते हैं-
जहाँ मे पूरी हर एक दिल की फरमाइश नहीं होती..

कामयाबी का सेहरा आज उनके सिर नहीं बंधता –
पास जिनके कोई ऊँची सी सिफारिश नहीं होती..

हज़ारों आंसुओं के वो समंदर लाँघ डाले हैं-
दूर तक तैरने की जिनमे गुंजाइश नहीं होती..

खुदा जब नापता है तो वो फीता दिल पे रखता है-
उससे इन्सान की जेबों से पैमाइश नहीं होती..
-विनय ओझा स्नेहिल

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ऐसे पत्थर ख़ूब हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2007


खो गए वीरानियों में ऐसे भी घर ख़ूब हैं
कट रहे रानाई में दिन वो मुकद्दर ख़ूब हैं
आना है जाना है सबको देख कर कुछ सीख लो
खंडहर हैं कुछ महल दीवार जर्जर ख़ूब हैं
राह दिखलाने की बातें लेखनी करती ही है
जो सियासत को हिला दे ऐसे आखर ख़ूब हैं
कहते हैं हर कोई देखो हम सिकंदर हम सिकंदर


है खबर उनको नहीं ईश्वर पयम्बर ख़ूब हैं
हो तसल्ली आंख को तस्वीर ऐसी तो दिखा

देखने को दुनिया भर में यों तो मंजर ख़ूब हैं
कांच के घर में बसें हो मत भुला इस बात को
तोड़ जो डालेंगे पल में ऐसे पत्थर ख़ूब हैं
साथ तेरे हमकदम जो गौर कर उन पर नजर
शकुनी मामा ख़ूब हैं और मीर जाफ़र ख़ूब हैं
है कवच सीने पे लेकिन रखना इसका भी ख़्याल
पीठ में घुस जाने वाले यारों खंजर ख़ूब हैं
रतन

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गधा आजाद है चरने को

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2007

आज सुबहे-सुबह हमको एक बार फिर एहसास हुआ कि हम आजाद हो गए हैं. पिछले कई साल से यह एहसास हो रहा है. क़रीब-क़रीब तबसे जबसे हम होस संभाले. हालांकि अइसा बिल्कुल नहीं है कि आजाद होने का ई एहसास हमको एक्के दिन होता हो. सही कहें तो रोजे हो जाता है. रस्ते में चलते हुए, दुकान में समान खरीदते हुए, स्कूलों में पढाई-लिखाई देखते हुए, न्यूज चैनलों पर ख़बरें देखते और अखबार पढते हुए …….. और जहाँ-जहाँ चाहें, वहाँ-वहाँ. देस तो हमारा आजाद हई है, इसमें कौनो दो राय नहीं है. कुछ हमारे मितऊ लोग हैं, जो बार-बार जाने क्यों और किससे जल-भुन के कहते हैं कि देस अजादे कहॉ हुआ. उन लोगों का असर है, कि कुछ अपनों दिल्जलापन है, कई बार हमहूँ अइसने सोच लेते हैं. कह भी देते हैं. पर आज हमको इस बात का बड़ा पक्का एहसास हुआ, एक जनी का मेल मिलने के बाद. ऊ मेल अंगरेजी में है और उसमें कहा गया है कि हम देसी-बिदेसी त्योहारी दिन तो ख़ूब मनाते हैं. इन दिनों पर एसेज-मेसेज भी भेजते हैं. एडवांस में सारा काम चलता है. पर ई जो अपना इन्डी-पिंडी-इन्सी डे है, इसको एडवांस में सेलेब्रेट करना अकसरे भूल जाते हैं. कौनो अधाई-बधाई नहीं देते हैं. पहिले तो मितवन सबका असर हुआ. तुरंते सवाल उठा मन में, कि भाई हमरा देस आजाद होबे कहाँ किया है कि आजादी की बात करें?
लेकिन फिर हमने गौर किया उस मेल पर. भीतर बड़ा जोरदार माल भरा था. अइसा कि उसने हमें सारे मसले पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया. अइसे कि जइसे किसी की समझ में न आने वाली कविताएं हिंदी के गोलबंद आलोचकों को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं. ठीके बात है भाई! जब कुछ समझ में आ जाएगा तब सोचने की मजबूरी भी कईसी? सोचने की मजबूरी वहीं होती है जहाँ कुछ समझने लायक नहीं होता है. ऊ मेल देख के हमको मालुम हुआ कि हम सच्मुचे नासमझ हैं. असल में था क्या कि उसमें नीचे मोटे-मोटे अच्छरों में लिखा था – सम्हाल के ले जाइएगा. अउर नीचे देखा तो ए ठो फोटो बना था. फोटो क्या था, तीन ठो झोला था. तीनों तीन रंग में था. पहिलका केसरिया – आप चाहैं तो भगवा कह लें. दुसरका उज्जर अउर तिसरका हरियर.
ई फोटो देखते ही संदेस हमरे समझ में आ गया. जाहिर है इस झोले में तौने भरा होगा जौन सूटकेस में भरा जाता है. लेकिन देखिए कितना सादगी से भरा है. सूटकेस में तनी तड़क-भड़क होता है न, तो सबकी नजर लग जाती है. हल्ला मचता है. ऐसहूँ गरीब देस की गरीब जनता का धन आप इतने सउक से तड़क-भड़क के साथ ले जाइएगा, जो देखेगा उसको बुरा तो लगबे करेगा. गान्ही बाबा एही नाते अपने चेलन को कहे होंगे कि खादी पहनो. एक जन की बात पर पूरा भरोसा करो. ओका भगवान मान लो. बात भले बिल्कुल बेमतलब अउर ग़लत लगे, पर कब्बो तरक मत करो. काहें से कि संस्किरित में लिखा है – संशयात्मा विनश्यते.
देखिए न! गान्ही बाबा के चेला लोग आज तक ई बात पर पक्का भरोसा करते आ रहे हैं. उनके जमाने से लेकर आज तक लोग पहली तो बात ई कि काज-परोजन में हमेसा खादी पहिन रहा है. अब इतना तो आप जन्बे करते हैं कि हम लोग जिन्दगी भर पैंट-बूसट पहिनते हैं, लेकिन बियाह-सादी के काम पियरी धोतिए में होता है. अइसे साढे-चार साल उनके चेला लोग भले सूट-बूट में रहे, पर चुनाव के समय खादिये में आ जाते हैं. तियाग देखिए उन लोगन का. हमरे देस में कन्या लोग के भ्रूण हत्या हो रहा है. लड़की लोग के कमी है. देस के नौजवानों को दिक्कत न हो इसलिए ऊ लोग अपने लिए बिदेस से बहुरिया ला रहे हैं.
अउर-त-अउर खाने-पीने में भी देखिए लोग केतना सादगी पसंद हो गए हैं! चार सौ साल पहिले राणा परताप अकबर महान की महानता के क़दर में घास की रोटी खाए थे. उनका हम आज तक जस गाते हैं. आज हमारे नेता लोग सीधे जानवर के चरवे खा रहे हैं. उनका जस गाने के बजाय, उनको लोग बदनाम कर रहे हैं. पुलिस, सीबीआई, कोर्ट-कचहरी सब झेल रहे हैं बेचारे. अगर मंत्री की तरह उकील भी बिना पढे-लिखे बन पाते त नेताजी की उकालत हम करते अउर कहते हाईकोर्ट के जज से – मी लॉर्ड! पहिले राणा परताप की जांच कराई जाए. बाकी अकबर त महान रहबे किए. हमारे नेताजी को कायदे से तो सादगी के लिए कौनो इनाम-उनाम मिलना चाहिए.
जहाँ तक बात सादगी का है, त जौन लोग गान्ही बाबा के सलाह माने उनके कबो कौनो कष्ट नहीं हुआ. एकदम सतनरायन बाबा के कथा के जैसन गारंटी है ई. देखिए न, हमरे चारा खाने वाले नेताजी को भी इनाम मिलिए गया. जनता भले उनको धकिया दी, पर सेंटर में मनिस्टर हैं आजकल. अरे एके ठो नहीं कई ठो मिसाल हैं, सादगी अउर सादगी के इनाम के. खैर छोडिए. तुलसी बाबा भी कह गए हैं – जहाँ सुमति तहं संपत नाना. हमरे गुरूजी त इसका अर्थ ई बताए थे कि तुलसीदास की नानी का नाम सुमति था अउर उनके नाना थे संपत. हम एही सब लिखे भी थे अपने इंतहान में अउर अच्छे नम्मर से पास भी हो गए थे. पर हाले में पुराणिक मास्साब से चर्चा हो रही थी त ऊ इसका कुछ कमर्शियल अर्थ बताने लगे.
ओही अर्थ के आलोक में हम इसको रख के देखे त मालुम हुआ कि गान्ही बाबा काहें आत्मा के आवाज पर इतना जोर देते थे. देखिए न! बेद-पुरान-बाइबिल-कुरान-तिर्पिटक अउर इहां तक कि साक्षात भगवान …. कहू के बात ग़लती हो सकता है. लेकिन कंगरेस मुखिया के फूंक भी ग़लती होना नामुमकिन है. कौनो गान्हिए न रहे त बात दीगर है, नहीं त ऊ होगा वही जिसके नाम में गान्ही लगा रहे. चाहे तड़के भर के सही. केतना बढिया फरमूला है! मंगल-बुध-बिर्हस्पती या कौनो दूसरे अकास्गंगा से भी आ के कौनो एलियन भी अगर अपने नामे में गान्ही लगा ले त ई पक्का है कि ऊ भारत देस के इतिहास, भूगोल,अर्थ्सास्त्र, संस्कृति, राजनीति अउर लोगन के जरूरत …… सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठीक समझ जाएगा. अगर नहियों समझेगा त हमरे कामरेड लोग उसको समझा लेंगे अउर स्वयमसेवक लोग सिखा भी देंगे. अरे ऊ देस के पिता के मूल खानदान में सामिल हो जाएगा भाई, कौनो मजाक बात है क्या? भारत देस आज तक सही पूछिए तो गन्ही बाबा के बताए रस्ते पर ही चल रहा है. बाबा के तीन बन्दरन ने ही देस सम्हाल रखा है. तीनों आज तक हर हाल में बाबा के उपदेस निभा रहे हैं. पहिलका जौन बुरा न देखने का संकलप लिए था, ऊ बुरा नहीं देखता तो नहिये देखता. सूरज पछिम से उगें, पूरा देस अपने देह में आग लगा के घूमे, बेकारी बढ़े कि महंगाई आ कि भ्रष्टाचार ओ चहे देस की सबसे बड़की पंचैत में जूता-चप्पल चले …. ऊ न देखता है न देखेगा. कौनो लुच्चा-लफंगा है का कि सब देखता रहे? दुसरका जौन न सुनाने का संकलप लिया था उसके कान पे जून नहीं चहे त अजगर रेंग जाए, ऊ नाहीं सुनता त नहिये सुनता. ऊ सुनता है त केवल अपने बडे भाई के बात. ओ बड़का उहे देखता है जौन ई दिखाता है.
रह गई बात तिसरका के त ओके बुरा बोल त देना पड़ता है कभी-कभी. लेकिन उसके बुरा फैसले से बुरा हो नीं सकता कभी ई गारंटी बड़का देता है, बुरा न देखने वाला. एक त जेतना बड़ा अपराध ओतने देर से फैसिला. अगर एतनों देर में कौनो गदहा साक्ष्य नहिंये मिटा पावे त फांसी के माफी पर महामहिम के मंशा आते-आते तक तो ऊ भगवान क प्यारा होइए जाएगा. बाबा के चेला सब उनके उपदेस पर अमल के मामले में उनसे भी दस कदम आगे बढ़ गए. बाबा कहे थे – पाप से घृणा करना पापी से नहीं. चेला सब पाप तक से घृणा करना छोड़ दिए. इहे न ह उपदेस के सार्थकता!
एक ठो ससुर चौथका भर तनी बिगाड़ गया, बाबा के घर के बच्चन की तरह. लेकिन क्या करिएगा, बिगड़ने का खामियाजा भी भुगत रहा है. गल्ली-गल्ली दौड़ रहा है. ठोकर खा रहा है. खबर जुटा रहा है. कुछ छाप रहा है त कबो स्टिंग आपरेसन कर रहा है. बस गोसाईं जी के बात सही साबित कर रहा है – कपि चंचल सबहीं गुन हीना. आख़िर इससे हो का रहा है? बाकिर उनमें भी जौन ई समझ लिया ऊ त मलाई काट रहा है. दिक्कत ई है कि हमरे अधिकतर मितवे सब ओही चौथका वाले बन्दर्वन में हैं सब. उनका दिमाग त खराब हैये है, हमारा भी खराब कर देते हैं सब.
कहते हैं सब आजादी कहाँ है? अरे भाई सड़क पर चलो त जहाँ चाहो बीच सड़क पर गाडी रोक के खडे हो जाओ. करती रहे पब्लिक पी-पीं-पीं………………………… का कर लेगा कोई? दुकान चला रहे हो, बेच लो सौ रुपिया किलो पियाज, बाबू हो ले लो सुविधा शुल्क जितना चाहो, गुंडा हो ले लो किसी की भी जान, राजनेता हो करो जनता से अनाप-शनाप वादे …………. का कर लेगा कोई माई का लाल? भाई इहे तो आजादी है न! जहाँ खेत आजाद हो पूरा बढ़ने के लिए और गदहा आजाद हो पूरा चरने के लिए. आजादी और का है?
त भई अगर आपको लगता हो, सहिए में आपका देस आजाद है त आपके मुबारकबाद ई गंवार के तरफ से. मन करे त एक्सेप्टिये आ नाहीं त …..
इष्ट देव सांकृत्यायन

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तकदीर ले आना मेरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2007

मुस्कुराऊँ ख्वाब की ताबीर ले आना मेरी
जो खबर सबको करे ताईर ले आना मेरी
कर न पाओ ग़र भला तो क्यों बुरा हो सोचते
है खलल मुझसे अगर शमशीर ले आना मेरी
देख
कर जिनको मेरे गुजरे ज़माने याद आये

पास
तेरे हैं जो वो तस्वीर ले आना मेरी

सांस उखड़ी जा रही है धड़कनें भी मन्द हैं
बाँध कर रखे इन्हें जंजीर ले आना मेरी
लूट कर जो ले गए परछाई भी तनहाई में
बोझ तो कुछ होगी ओ जागीर ले आना मेरी
ग़र खुदा के पास जाना तो करम करना रतन
मेरी खातिर भी थोड़ी तकदीर ले आना मेरी
रतन

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