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गधा आजाद है चरने को

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 14, 2007

आज सुबहे-सुबह हमको एक बार फिर एहसास हुआ कि हम आजाद हो गए हैं. पिछले कई साल से यह एहसास हो रहा है. क़रीब-क़रीब तबसे जबसे हम होस संभाले. हालांकि अइसा बिल्कुल नहीं है कि आजाद होने का ई एहसास हमको एक्के दिन होता हो. सही कहें तो रोजे हो जाता है. रस्ते में चलते हुए, दुकान में समान खरीदते हुए, स्कूलों में पढाई-लिखाई देखते हुए, न्यूज चैनलों पर ख़बरें देखते और अखबार पढते हुए …….. और जहाँ-जहाँ चाहें, वहाँ-वहाँ. देस तो हमारा आजाद हई है, इसमें कौनो दो राय नहीं है. कुछ हमारे मितऊ लोग हैं, जो बार-बार जाने क्यों और किससे जल-भुन के कहते हैं कि देस अजादे कहॉ हुआ. उन लोगों का असर है, कि कुछ अपनों दिल्जलापन है, कई बार हमहूँ अइसने सोच लेते हैं. कह भी देते हैं. पर आज हमको इस बात का बड़ा पक्का एहसास हुआ, एक जनी का मेल मिलने के बाद. ऊ मेल अंगरेजी में है और उसमें कहा गया है कि हम देसी-बिदेसी त्योहारी दिन तो ख़ूब मनाते हैं. इन दिनों पर एसेज-मेसेज भी भेजते हैं. एडवांस में सारा काम चलता है. पर ई जो अपना इन्डी-पिंडी-इन्सी डे है, इसको एडवांस में सेलेब्रेट करना अकसरे भूल जाते हैं. कौनो अधाई-बधाई नहीं देते हैं. पहिले तो मितवन सबका असर हुआ. तुरंते सवाल उठा मन में, कि भाई हमरा देस आजाद होबे कहाँ किया है कि आजादी की बात करें?
लेकिन फिर हमने गौर किया उस मेल पर. भीतर बड़ा जोरदार माल भरा था. अइसा कि उसने हमें सारे मसले पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया. अइसे कि जइसे किसी की समझ में न आने वाली कविताएं हिंदी के गोलबंद आलोचकों को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं. ठीके बात है भाई! जब कुछ समझ में आ जाएगा तब सोचने की मजबूरी भी कईसी? सोचने की मजबूरी वहीं होती है जहाँ कुछ समझने लायक नहीं होता है. ऊ मेल देख के हमको मालुम हुआ कि हम सच्मुचे नासमझ हैं. असल में था क्या कि उसमें नीचे मोटे-मोटे अच्छरों में लिखा था – सम्हाल के ले जाइएगा. अउर नीचे देखा तो ए ठो फोटो बना था. फोटो क्या था, तीन ठो झोला था. तीनों तीन रंग में था. पहिलका केसरिया – आप चाहैं तो भगवा कह लें. दुसरका उज्जर अउर तिसरका हरियर.
ई फोटो देखते ही संदेस हमरे समझ में आ गया. जाहिर है इस झोले में तौने भरा होगा जौन सूटकेस में भरा जाता है. लेकिन देखिए कितना सादगी से भरा है. सूटकेस में तनी तड़क-भड़क होता है न, तो सबकी नजर लग जाती है. हल्ला मचता है. ऐसहूँ गरीब देस की गरीब जनता का धन आप इतने सउक से तड़क-भड़क के साथ ले जाइएगा, जो देखेगा उसको बुरा तो लगबे करेगा. गान्ही बाबा एही नाते अपने चेलन को कहे होंगे कि खादी पहनो. एक जन की बात पर पूरा भरोसा करो. ओका भगवान मान लो. बात भले बिल्कुल बेमतलब अउर ग़लत लगे, पर कब्बो तरक मत करो. काहें से कि संस्किरित में लिखा है – संशयात्मा विनश्यते.
देखिए न! गान्ही बाबा के चेला लोग आज तक ई बात पर पक्का भरोसा करते आ रहे हैं. उनके जमाने से लेकर आज तक लोग पहली तो बात ई कि काज-परोजन में हमेसा खादी पहिन रहा है. अब इतना तो आप जन्बे करते हैं कि हम लोग जिन्दगी भर पैंट-बूसट पहिनते हैं, लेकिन बियाह-सादी के काम पियरी धोतिए में होता है. अइसे साढे-चार साल उनके चेला लोग भले सूट-बूट में रहे, पर चुनाव के समय खादिये में आ जाते हैं. तियाग देखिए उन लोगन का. हमरे देस में कन्या लोग के भ्रूण हत्या हो रहा है. लड़की लोग के कमी है. देस के नौजवानों को दिक्कत न हो इसलिए ऊ लोग अपने लिए बिदेस से बहुरिया ला रहे हैं.
अउर-त-अउर खाने-पीने में भी देखिए लोग केतना सादगी पसंद हो गए हैं! चार सौ साल पहिले राणा परताप अकबर महान की महानता के क़दर में घास की रोटी खाए थे. उनका हम आज तक जस गाते हैं. आज हमारे नेता लोग सीधे जानवर के चरवे खा रहे हैं. उनका जस गाने के बजाय, उनको लोग बदनाम कर रहे हैं. पुलिस, सीबीआई, कोर्ट-कचहरी सब झेल रहे हैं बेचारे. अगर मंत्री की तरह उकील भी बिना पढे-लिखे बन पाते त नेताजी की उकालत हम करते अउर कहते हाईकोर्ट के जज से – मी लॉर्ड! पहिले राणा परताप की जांच कराई जाए. बाकी अकबर त महान रहबे किए. हमारे नेताजी को कायदे से तो सादगी के लिए कौनो इनाम-उनाम मिलना चाहिए.
जहाँ तक बात सादगी का है, त जौन लोग गान्ही बाबा के सलाह माने उनके कबो कौनो कष्ट नहीं हुआ. एकदम सतनरायन बाबा के कथा के जैसन गारंटी है ई. देखिए न, हमरे चारा खाने वाले नेताजी को भी इनाम मिलिए गया. जनता भले उनको धकिया दी, पर सेंटर में मनिस्टर हैं आजकल. अरे एके ठो नहीं कई ठो मिसाल हैं, सादगी अउर सादगी के इनाम के. खैर छोडिए. तुलसी बाबा भी कह गए हैं – जहाँ सुमति तहं संपत नाना. हमरे गुरूजी त इसका अर्थ ई बताए थे कि तुलसीदास की नानी का नाम सुमति था अउर उनके नाना थे संपत. हम एही सब लिखे भी थे अपने इंतहान में अउर अच्छे नम्मर से पास भी हो गए थे. पर हाले में पुराणिक मास्साब से चर्चा हो रही थी त ऊ इसका कुछ कमर्शियल अर्थ बताने लगे.
ओही अर्थ के आलोक में हम इसको रख के देखे त मालुम हुआ कि गान्ही बाबा काहें आत्मा के आवाज पर इतना जोर देते थे. देखिए न! बेद-पुरान-बाइबिल-कुरान-तिर्पिटक अउर इहां तक कि साक्षात भगवान …. कहू के बात ग़लती हो सकता है. लेकिन कंगरेस मुखिया के फूंक भी ग़लती होना नामुमकिन है. कौनो गान्हिए न रहे त बात दीगर है, नहीं त ऊ होगा वही जिसके नाम में गान्ही लगा रहे. चाहे तड़के भर के सही. केतना बढिया फरमूला है! मंगल-बुध-बिर्हस्पती या कौनो दूसरे अकास्गंगा से भी आ के कौनो एलियन भी अगर अपने नामे में गान्ही लगा ले त ई पक्का है कि ऊ भारत देस के इतिहास, भूगोल,अर्थ्सास्त्र, संस्कृति, राजनीति अउर लोगन के जरूरत …… सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठीक समझ जाएगा. अगर नहियों समझेगा त हमरे कामरेड लोग उसको समझा लेंगे अउर स्वयमसेवक लोग सिखा भी देंगे. अरे ऊ देस के पिता के मूल खानदान में सामिल हो जाएगा भाई, कौनो मजाक बात है क्या? भारत देस आज तक सही पूछिए तो गन्ही बाबा के बताए रस्ते पर ही चल रहा है. बाबा के तीन बन्दरन ने ही देस सम्हाल रखा है. तीनों आज तक हर हाल में बाबा के उपदेस निभा रहे हैं. पहिलका जौन बुरा न देखने का संकलप लिए था, ऊ बुरा नहीं देखता तो नहिये देखता. सूरज पछिम से उगें, पूरा देस अपने देह में आग लगा के घूमे, बेकारी बढ़े कि महंगाई आ कि भ्रष्टाचार ओ चहे देस की सबसे बड़की पंचैत में जूता-चप्पल चले …. ऊ न देखता है न देखेगा. कौनो लुच्चा-लफंगा है का कि सब देखता रहे? दुसरका जौन न सुनाने का संकलप लिया था उसके कान पे जून नहीं चहे त अजगर रेंग जाए, ऊ नाहीं सुनता त नहिये सुनता. ऊ सुनता है त केवल अपने बडे भाई के बात. ओ बड़का उहे देखता है जौन ई दिखाता है.
रह गई बात तिसरका के त ओके बुरा बोल त देना पड़ता है कभी-कभी. लेकिन उसके बुरा फैसले से बुरा हो नीं सकता कभी ई गारंटी बड़का देता है, बुरा न देखने वाला. एक त जेतना बड़ा अपराध ओतने देर से फैसिला. अगर एतनों देर में कौनो गदहा साक्ष्य नहिंये मिटा पावे त फांसी के माफी पर महामहिम के मंशा आते-आते तक तो ऊ भगवान क प्यारा होइए जाएगा. बाबा के चेला सब उनके उपदेस पर अमल के मामले में उनसे भी दस कदम आगे बढ़ गए. बाबा कहे थे – पाप से घृणा करना पापी से नहीं. चेला सब पाप तक से घृणा करना छोड़ दिए. इहे न ह उपदेस के सार्थकता!
एक ठो ससुर चौथका भर तनी बिगाड़ गया, बाबा के घर के बच्चन की तरह. लेकिन क्या करिएगा, बिगड़ने का खामियाजा भी भुगत रहा है. गल्ली-गल्ली दौड़ रहा है. ठोकर खा रहा है. खबर जुटा रहा है. कुछ छाप रहा है त कबो स्टिंग आपरेसन कर रहा है. बस गोसाईं जी के बात सही साबित कर रहा है – कपि चंचल सबहीं गुन हीना. आख़िर इससे हो का रहा है? बाकिर उनमें भी जौन ई समझ लिया ऊ त मलाई काट रहा है. दिक्कत ई है कि हमरे अधिकतर मितवे सब ओही चौथका वाले बन्दर्वन में हैं सब. उनका दिमाग त खराब हैये है, हमारा भी खराब कर देते हैं सब.
कहते हैं सब आजादी कहाँ है? अरे भाई सड़क पर चलो त जहाँ चाहो बीच सड़क पर गाडी रोक के खडे हो जाओ. करती रहे पब्लिक पी-पीं-पीं………………………… का कर लेगा कोई? दुकान चला रहे हो, बेच लो सौ रुपिया किलो पियाज, बाबू हो ले लो सुविधा शुल्क जितना चाहो, गुंडा हो ले लो किसी की भी जान, राजनेता हो करो जनता से अनाप-शनाप वादे …………. का कर लेगा कोई माई का लाल? भाई इहे तो आजादी है न! जहाँ खेत आजाद हो पूरा बढ़ने के लिए और गदहा आजाद हो पूरा चरने के लिए. आजादी और का है?
त भई अगर आपको लगता हो, सहिए में आपका देस आजाद है त आपके मुबारकबाद ई गंवार के तरफ से. मन करे त एक्सेप्टिये आ नाहीं त …..
इष्ट देव सांकृत्यायन
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5 Responses to “गधा आजाद है चरने को”

  1. एक्सेप्ट लिये भईया. अब आपहू ले लेहिल जाहि तनी हमार बधाई और सुभकामनायें इ वर्षगँठवा के अबसर पर.

  2. सांकृत्यायन जी के मुखमण्डल से ऐसी वाणी.. समझ में आ गई असली आज़ादी.. बहुतै नीके लिखै हो भैया..

  3. भैया एकरपटेड नहीं ए.क.से.प.टे.ड. लिखना चाहता था…सो दया करके accpecpted पढ़े.

  4. मारू च धारु

  5. “मारू च धारु” आलोक बड़े खिसियाईके लिखत हयें. ओनकर दुकनिया बन्द होइ क खतरा बा असस दुई चारि पोस्ट अऊर आइ जाइं त! 🙂

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