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ऐसे पत्थर ख़ूब हैं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 16, 2007


खो गए वीरानियों में ऐसे भी घर ख़ूब हैं
कट रहे रानाई में दिन वो मुकद्दर ख़ूब हैं
आना है जाना है सबको देख कर कुछ सीख लो
खंडहर हैं कुछ महल दीवार जर्जर ख़ूब हैं
राह दिखलाने की बातें लेखनी करती ही है
जो सियासत को हिला दे ऐसे आखर ख़ूब हैं
कहते हैं हर कोई देखो हम सिकंदर हम सिकंदर


है खबर उनको नहीं ईश्वर पयम्बर ख़ूब हैं
हो तसल्ली आंख को तस्वीर ऐसी तो दिखा

देखने को दुनिया भर में यों तो मंजर ख़ूब हैं
कांच के घर में बसें हो मत भुला इस बात को
तोड़ जो डालेंगे पल में ऐसे पत्थर ख़ूब हैं
साथ तेरे हमकदम जो गौर कर उन पर नजर
शकुनी मामा ख़ूब हैं और मीर जाफ़र ख़ूब हैं
है कवच सीने पे लेकिन रखना इसका भी ख़्याल
पीठ में घुस जाने वाले यारों खंजर ख़ूब हैं
रतन
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3 Responses to “ऐसे पत्थर ख़ूब हैं”

  1. रतन जी,बहुत बेहतरीन रचना है।बधाई।है कवच सीने पे लेकिन रखना इसका भी ख़्याल पीठ में घुस जाने वाले यारों खंजर ख़ूब हैं

  2. जबरदस्त भाई, बहुत सही. बधाई.

  3. वाह गुरू क्या ख़ूब लिखा है आपने।

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