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ख्वाहिश

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on August 17, 2007

सिर्फ चाहे से पूरी कोई भी ख्वाहिश नहीं होती.
जैसे तपते मरुस्थल के कहे बारिश नहीं होती..

हमारे हौसलों की जड़ें यूँ मज़बूत न होतीं –
मेरे ऊपर जो तूफानों की नवाज़िश नहीं होती..

हमे मालूम है फिर भी सँजोकर दिल मे रखते हैं-
जहाँ मे पूरी हर एक दिल की फरमाइश नहीं होती..

कामयाबी का सेहरा आज उनके सिर नहीं बंधता –
पास जिनके कोई ऊँची सी सिफारिश नहीं होती..

हज़ारों आंसुओं के वो समंदर लाँघ डाले हैं-
दूर तक तैरने की जिनमे गुंजाइश नहीं होती..

खुदा जब नापता है तो वो फीता दिल पे रखता है-
उससे इन्सान की जेबों से पैमाइश नहीं होती..
-विनय ओझा स्नेहिल

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3 Responses to “ख्वाहिश”

  1. अरे विनय भाई, हमारी टिप्पणी ही खो गई…खैर,बेहतरीन रचना की बधाई स्विकारें.

  2. Ratan said

    भाई बधाई स्वीकारें. गजल अच्छी कही. मजा आया.

  3. सुन्दर ग़ज़ल, आपके ब्लॉग पर आज पहली बार आया हूँ (शायद), थोड़ा इसकी सजावट पर भी ध्यान दीजिये विनयजी. 😉

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