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Archive for September, 2007

और भाग चले बापू

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 30, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन

अभी कल ही मैने एक कविता पढी है. चूंकि कविता मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैने उस पर टिप्पणी भी की है। कवि ने कहा है कि उनका मन एक शाश्वत टाईप का नाला है. उससे लगातार सड़ांध आती है. हालांकि उस मन यानी नाले का कोई ओर-छोर नहीं है. उसका छोर क्या है यह तो मुझे भी नहीं दिखा, लेकिन ओर क्या है वह मुझे तुरंत दिख गया. असल में मैं कलियुग का संजय हूँ न, तो मेरे पास एक दिव्यदृष्टि है. अपने कुछ सुपरहिट टाइप भाई बंधुओं की तरह चूंकि मुझे उस दिव्यदृष्टि का असली सदुपयोग करना नहीं आता, इसलिए मैं उसका इसी तरह से फालतू इस्तेमाल करता रहता हूँ. लोग मेरी बेवकूफी को बेवकूफी के बजाय महानता समझें, इसके लिए अपनी उस दृष्टि के फालतू उपयोग के अलावा कुछ और फालतू काम करके मैं यह साबित करने की कोशिश भी करता रहता हूँ मैं उनके जैसा नहीं हूँ. उनसे अलग हूँ.
ये अलग बात है कि कई बार तो मुझे खुद अपनी इस बेवकूफी पर हँसी आती है। अरे भाई दुनिया जानती है कि बेवकूफ समझदारों से अलग होते हैं. इसमें बताने और साबित करने की क्या बात है? हाथ कंगन को आरसी क्या, पढे-लिखे को फारसी क्या? साबित तो हमेशा उलटी बातें होती हैं. और हों भी क्यों न! जो लोग देश-विदेश के बडे-बडे सौदों में दलाली के सबूत जेब में लेकर घूमते हैं मुकदमे की सुनवाई के लिए जब वही कचहरी पहुँचते हैं तो उनकी जेब ही कट जाती है. अब बताइए ऎसी स्थिति में दलाली ही क्यों, क़त्ल का भी जुर्म भला कैसे साबित होगा? वैसे भी जल्दी ही दो अक्टूबर आने वाला है और बापू ने कहा है कि घृणा पाप से करो, पापी से नहीं. अब बताइए, जब बापू की बात पूरी दुनिया मानती है तो हम कैसे न मानें?

इसीलिए हम कमीशन खाने या क़त्ल करने वालों को सजा नहीं देते. उन्हें मंत्री बनाते हैं. दे देते हैं उन्हें पूरा मौका कि खा लो और जितना चाहो कमीशन. आखिर कब तक नहीं भरेगा तुम्हारा पेट? कर लो और जितने चाहो क़त्ल या अपहरण, एक दिन तुम भी अंगुलिमाल की तरह बदल जाओगे. ये अलग बात है कि उनके आज तक बदलने की बात कौन कहे, वे अपने परम्परागत संस्कारों को ही और ज्यादा पुख्ता करते चले गए हैं. फिर भी हम हिम्मत नहीं हारे हैं और न ऊबे ही हैं. इसकी प्रेरणा भी हमें अपनी परम्परा से ही मिली है. बापू से भी पहले से हमारे पूर्वज ‘दीर्घसूत्री होने’ यानी लंबी रेस के घोड़े बनने पर जोर देते आए हैं.
इसीलिए देखिए, अपनी आजादी के सठिया जाने के बाद भी हम धैर्यपूर्वक देख रहे हैं और बार-बार उन्हें सत्ता में बने रहने का मौका देते जा रहे हैं.
लेकिन उस कविता पर टिप्पणी करते हुए मुझसे एक गलती हो गई. अखबार की नौकरी और वह भी लंबे समय तक पहले पन्ने की तारबाबूगिरी करने का नतीजा यह हुआ है कि मेरा पूरा व्यक्तित्व ही अख्बरिया गया है. थोडा जल्दबाजी का शिकार हो गया हूँ. तो टिप्पणी करने में भी जल्दबाजी कर दी. ज्यादा सोचा नहीं. बस तुरंत जो दिखा वही लिख दिया. महाभारत के संजय की तरह. नए दौर के अपने दूरंदेश साथियों की तरह उसका फालो अप पहले से सोच कर नहीं रखा. बता दिया कि भाई आपके ऐसे बस्सैने मन का अंत चाहे जहाँ हो, पर उसकी आदि भारत की संसद है.
बस इसी बात पर रात मुझे बापू यानी गान्ही बाबा ने घेर लिया. पहले तो अपने उपदेशों की लंबी सी झाड़ पिलाई. मैं तो डर ही गया कि कहीँ यह सत्याग्रह या आमरण अनशन ही न करने लगें. पर उन्होने ऐसा कुछ किया नहीं. जैसे पुलिस वाले किसी निरीह प्राणी को भरपूर पीट लेने के बाद उससे पूछते हैं कि बोल तुमने चोरी की थी न? अब बेचारा मरे, क्या न करे? या तो बेचारा पिटे या फिर बिन किए कबूल ले कि हाँ मैने चोरी की थी.
बहरहाल, बापू ने मुझसे सवाल किया कि बेटा तुमने संसद ही क्यों लिखा? मुझे तुरंत युधिष्ठिर याद आए, जिन्हे मैने द्वापर में यक्ष के पांच सवाल झेलते देखा था। मुझे लगा कि कहीँ मुझे भी बापू के पांच सवाल न झेलने पड़ें. बल्कि एक बार को तो मुझे लगा कि कहीँ यही द्वापर में यक्ष का रूप लेकर तो नहीं बैठ गए थे. लेकिन जल्दी ही इस शंका का समाधान हो गया. मैने अपने ध्यान की धारा थोड़ी गहरी की तो यक्ष की जगह मुझे राम जेठमलानी बैठे दिखे और बापू ने डांटा भी, ‘तुमने सोच कैसे लिया कि ऐसे फालतू के सवाल मैं कर सकता हूँ?’

आख़िरकार मैंने थोड़ी हिम्मत बाँधी और डरते-डरते जवाब दिया, ‘बापू क्या बताऊँ। असल में मुझे सारी गंदगी वहीं से निकलती दिखाई देती है. सो लिख दिया. अगर ग़लती हो गई हो तो कृपया माफ़ करें.’ ‘अरे माफ कैसे कर दूं?’ बापू गरजे. जैसे रामायण सीरियल में अरविंद त्रिवेदी गरजा करते थे. ‘तुम कभी तहसील के दफ्तर में गए हो?’ मैं कहता क्या! बस हाँ में मुंडी हिला दी. बापू तरेरे, ‘क्या देखा वहाँ मूर्ख? घुरहू की जमीन निरहू बेच देते हैं और वह भी बीस साल पहले मर चुके मोलहू के नाम. सौ रुपये दिए बग़ैर तुमको अपनी ही जमीन का इंतखाप नहीं मिल सकता और हजार रुपये खर्च कर दो तो सरकार की जमीन तुम्हारे नाम. बताओ इससे ज्यादा गंदगी कहाँ हो सकती है?’ मैं क्या करता! फिर से आत्मसमर्पण कर दिया. बापू बोले, ‘चल मैं बताता हूँ. कभी अस्पताल गया है?’
इस सवाल का जवाब सोचते ही मैं सिर से पैर तक काँप उठा। में फिर अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा था. सफ़ेद कोट पहने और गले में स्टेथस्कोप लटकाए कुछ गिद्ध एक मर चुके मनुष्य के जिंदा परिजनों को नोच रहे थे. मैं जुगुप्सा और भय से काँपता बापू के पैरों पर पड़ता इससे पहले ही बापू ने लगाई मुझे एक लाठी. बोले, ‘चल अभी मैं तुझे मैं तुझे नए जमाने के शिक्षा मंदिर दिखाता हूँ.’ मैंने आंख बंद की तो सामने एक चमाचम इंटरनेशनल स्कूल था और दूसरी तरफ एक टुटही इन्वर्सिटी. स्कूल में सुन्दर-सुन्दर कपडे पहने मोटे-मोटे जोंक प्लास्टिक के गुद्दों जैसे सुन्दर-सुन्दर बच्चों के हांफते-कांपते अभिभावकों के शरीर पर लिपटे पडे थे. जोंक अंगरेजी झाड़ रहे थे और अभिभावक बेचारे भीतर ही भीतर कराहते हुए उज्बकों की तरह यस् सिर यस् मैम किए जा रहे थे. उधर इन्वर्सिटी में एक वीसी नाम के प्राणी एक हाथ से नेताजी के चरण चंपने और दूसरे हाथ से विद्यार्थियों और सेवार्थियों से नोट बटोरने में लगे थे. वहीं कुछ आज्ञाकारी विद्यार्थी नेता एक निरीह टाइप प्रोफेसर, जो केवल अपना विषय पढ़ाना ही जानता था, उसे ठोंकने में लगे थे. इसके आगे मुझसे देखा नहीं जा रहा था. मैं गिड़गिड़ाया, ‘बस बापू.’

पर बापू कहाँ मानने वाले थे. वह गरजे, ‘चुप बे. अभी तूने कचहरी कहाँ देखी?’ वह दृश्य सोच कर ही मैं काँप उठा. मैंने सपने में भी अपनी आँखें किचकिचा कर बंद कर लीं. मैं सपने में ही गिड़गिड़ाया, ‘नहीं बापू. अब रहने दीजिए. मैं तो यह सोच कर काँप रहा हूँ कि इतनी सारी जगहों से निकलने वाले गंदगी के हजारों नाले-परलाने-नद-महानद सब जाते होंगे?’
अब बापू खुद रुआंसे हो गए थे. करुणा से भरे स्वर में उन्होने कहा, ‘कैसी विडम्बना है कि अब बच्चे अपना घर भी नहीं पहचानते. अरे मूर्ख देख जहाँ तू जी रहा है. मीडिया, साहित्य, सिनेमा ……. इतने तो महासागर हैं इन नालों-महानदों के गंतव्य. और कहाँ जाएंगे.’ नींद में ही जो सड़ांध मुझे आई कि मैं असमय जाग उठा. फिर मैंने उस सड़ांध को धन्यवाद दिया. क्योंकि, जैसा कि कहा जाता है, अंग्रेजों से भी न डरने वाले बापू शायद उस सड़ांध के ही भय से भाग चुके थे. मैं आश्वस्त था कि अब वे दुबारा मेरे पास फटकने वाले नहीं थे.
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1857 के शहीदों का सरकार ने अपमान होने दिया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 29, 2007


क्या हम ये सब भुला देंगे
-दिलीप मंडल

वो आए हैं 1857 की जंग लड़ने वाले अंग्रेज बहादुरों की जीत का जश्न मनाने। वो आए। मेरठ, दिल्ली, लखनऊ गए। गदर में अंग्रेजों ने जो जुल्म ढाए थे, उसका उन्हें कोई अफसोस न था। मेरठ में वो पत्थर पर बना प्रतीक चिह्न लगाना चाहते थे जिस पर लिखा था- 60वी किंग्स रॉयल राइफल कोर की पहली बटालियन ने 10 मई और 20 सितंबर 1857 के दौरान जो साहसिक और अभूतपूर्व साहस दिखाया, उसके नाम।

1857 के दौरान लखनऊ में कहर ढाने वाले कुख्यात सर हेनरी हेवलॉक का एक वंशज भी उस टोली में है, जो गदर के समय अंग्रेजों की बहादुरी को याद करने भारत आयी है। उसके मुताबिक- अंग्रेजी राज भारत के लिए अच्छा था, और भारत में लोकतंत्र इसलिए चल रहा है क्योंकि यहां अंग्रेजी राज रहा।
क्या आपको ये सुनकर कुछ याद आ रहा है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ब्रिटेन यात्रा के दौरान ठीक यही बात तो कही थी।
ऐसे में इस बात पर आश्चर्य नही होना चाहिए, कि 1857 के दौरान अंग्रेजों की बहादुरी का जश्न मनाने के लिए भारत आने वालों को सरकार वीसा देती है और उन्हें लोगो के गुस्से से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षा दी जाती है।
वैसे मेरठ से खबर है कि ये अंग्रेज जिस चर्च में अपना स्मृति चिह्न लगाना चाहते थे, वहां के पादरी ने इसकी इजाजत नही दी।

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बादल घिरे हुए

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 29, 2007

हरिशंकर राढ़ी
कितने दिनों के बाद हैं बादल घिरे हुए .
जिनको निहारते हैं चातक मरे हुए.

उनकी गली से लौट के आए तो कोई क्यों
जाते ही हैं वहाँ पे पापी तरे हुए.

पशुओं का झुंड कोई गुजरा था रात में
खुर के निशान शबनम पे दिखते पडे हुए.

मरने पे उनके आख़िर आंसू बहाए कौन
दिखते हैं चारो ओर ही चेहरे मरे हुए.

लगता है कोई आज भी रस्ता भटक गया
और आ रहा है झूठ की उंगली धरे हुए.

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इस मर्ज की दवा क्या है?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 29, 2007


सत्येन्द्र प्रताप
एक अखबार केस्थानीय संपादक के बारे में खबर आई कि वे रंगरेलियां बनाते हुए देखे गए. कहा जा रहा है कि एक स्थानीय अखबार के रिपोर्टर ने खबर भी फाइल कर दी थी. हालांकि इस तरह की खबरें अखबार और चैनल की दुनिया में आम है और आए दिन आती रही हैं. लेकिन दिल्ली और बड़े महानगरों से जाकर छोटे शहरों में पत्रकारिता के गुर सिखाने वाले स्थानीय संपादकों ने ये खेल शुरु कर दिया है. राष्ट्रीय चैनलों के कुछ नामी गिरामी हस्तियों के तो अपने जूनियर और ट्रेनी लड़कियों के एबार्शन कराए जाने तक की कनफुसकी होती रहती है.
खबर की दुिनया में जब अखबार में किसी लड़के और लड़की के बारे में रंगरेिलयां मनाते हुए धरे गए, खबर लगती है तो उन्हें बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है. लेिकन उन िविद्वानों का क्या िकया जाए जो नौकरी देने की स्थिति में रहते हैं और जब कोई लड़की उनसे नौकरी मांगने आती है तो उसके सौन्दर्य को योग्यता का मानदंड बनाया जाता है और अगर वह लड़की समझौता करने को तैयार हो जाती है तो उसे प्रोन्नति मिलने और बड़ी पत्रकार बनने में देर नहीं लगती.
एक नामी िगरामी तेज – तर्रार और युवा स्थानीय संपादक के बारे में सभी पत्रकार कहते हैं िक वह ले-आउट डिजाइन के निर्विवाद रुप से िवशेषग्य हैं. लेिकन साथ ही यह भी जोड़ा जाता है िक वह बहुत ही रंगीन िमजाज थे, पुरबिया अंदाज में कहा जाए तो, लंगोट के कच्चे थे.
महिलाओं के प्रति यौन िंहसा की खबर तमाम प्राइवेट और सरकारी सेक्टर से आती है. न्यायालय से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर बहस भी होती है. लेिकन नतीजा कुछ भी नहीं. अगर कुंिठत व्यक्ति उच्च पदासीन है तो मामले दब जाते हैं और अगर कोई छोटा आदमी है तो उसे पुिलस भी पकड़ती है और अपमािनत भी होना पड़ता है.
अगर पत्रकारिता की बात करें तो जैसे ही हम िदल्ली मुंबई जैसे महानगरों से बाहर िनकलते हैं तो खबरों के प्रति लोगों का नजरिया बहुत ही पवित्र होता है. लोग अखबार में भी खबरें ही पढ़ना चाहते हैं जो उनके जीवन और उनके िहतों से जुड़ी हों, सनसनी फैलाने वाली सामग्री कोई भी पसंद नहीं करता। पत्रकारों के प्रति लोगों का नजिरया भी अच्छा है और अखबार के माध्यम से वे अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं. अगर रंगरेिलयां जैसी खबरें वे अपने पूज्य संपादकों या पत्रकारों के बारे में सुनते या पढ़ते हैं तो उनका नजरिया भी बदल जाता है. हालांिक महानगरों में िहक्की गजट टाइप के ही अखबार छपते हैं जिसमें फिल्मी नायक नायिकाओं के प्रसंग छपते हैं.
उच्चपदों पर बैठे यौनकुंिठत वरिष्ठ पत्रकारों की कुंठा का कोई हल नजर नहीं आता. बार बार कहा जा रहा है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है , योग्य लोगों की जरुरत है, लेकिन वहीं बड़े पदों पर शराब और शबाब के शौकीन वृद्ध रंगीलों के िकस्से बढ़ते ही जा रहे हैं.

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वो नही चाहते कि कोई इसे पढ़े, इसलिए आपका धर्म है कि इसे गाएं, गुनगुनाएं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007

-दिलीप मंडल

याद
है आपको वो कविता। झांसी की रानी। देश के अमूमन हर राज्य की स्कूली किताबों में सुभद्रा कुमारी चौहान की ये कविता पढ़ाई जाती है। लेकिन राजस्थान बीजेपी को इसकी कुछ पंक्तियां अश्लील लगती है। इसलिए कविता तो छपती है लेकिन आपत्तिजनक लाइनें उसमें से हटा दी जाती हैं। पहले ये देखिए कि वो लाइनें कौन सी हैं, जिन्हें बीजेपी आपकी स्मृति से हटाना चाहती है।


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी

पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

http://www.prayogshala.com/poems/subhadra-khoob-ladi-murdani-woh-to

पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ें, अपने बच्चों को पढ़ाएँ, क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों जगह सिंधिया परिवार का जो रूतबा है, उसे देखते हुए आश्चचर्य नहीं होना चाहिए कि एक नया इतिहास लिखा जाए, जिसमें सिंधिया खानदान को अंग्रेजों से लड़ने वाला देशभक्त साबित कर दिया जाए।

वैसे अंग्रेजो के शासन में देशभक्त और अंग्रेजभक्त की पहचान करने का एक आसान सा फॉर्मूला है। दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आपको जिस राजपरिवार और रियासत का भवन या हाउस दिख जाए, उसे अंग्रेज बहादुर का वफादार समझ लीजिए। अब बनाइए लिस्ट- सिंधिया हाउस, कपूरथला हाउस, मंडी हाउस, बीकानेर हाउस, पौड़ी गढ़वाल हाउस (बीजेपी सांसद दिवंगत मानवेंद्र शाह के पुरखो की रियासत), धौलपुर हाउस, जोधपुर हाउस, त्रावणकोर हाउस, नाभा हाउस, पटियाला (अमरिंदर सिह के पुरखों की रियासत)हाउस, बड़ौदा हाउस, कोटा हाउस, जामनगर हाउस, दरभंगा हाउस … गिनते चले जाइए, गिनाते चले जाइए। क्या आपको किसी शहर में झांसी हाउस, आरा हाउस, बिठूर हाउस दिखा है?

दोस्तों वतन पर मरने वालों का निशां बाकी है, या वतन से गद्दारी करने वालो का? वतनपरस्तों का नाम बचा रहे इसलिए सस्वर गाइए-

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

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ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007


सत्येन्द्र प्रताप
पहले टेस्ट मैच बहुत ही झेलाऊ था, फिर पचास ओवर का मैच शुरु हुआ, वह भी झेलाऊ साबित हुआ तो २०-२० आ गया. क्या खेल है भाई! भारत पाकिस्तान का मैच जोहान्सबर्ग में और सन्नाटा दिल्ली की सड़कों पर. मुझे तो इस बत की खुशी हुई कि आफिस से निकला तो खाली बस मिल गई, सड़क पर सन्नाटा पसरा था. मोहल्ले में पहुंचा तो पटाखों के कागज से सड़कें पट गईं थीं और लोग पटाखे पर पटाखे दागे जा रहे थे.
अरे भाई कोई मुझे भी तो बताए कि आखिर इस खेल में क्या मजा है? कहने को तो इस खेल में २२ खिलाडी होते हैं, लेकिन खेलते दो ही हैं. उसमें भी एक लड़का जो गेंद फेकता है वह कुछ मेहनत करता है, दूसरा पटरा नुमा एक उपकरण लेकर खड़ा रहता है. फील्ड में ग्यारह खिलाडी बल्लेबाजी कर रहे खिलाडी का मुंह ताकते रहते हैं कि कुछ तो रोजगार दो.
खेल का टाइम भी क्या खाक कम किया गया है? हाकी और फुटबाल एक से डेढ़ घंटे में निपट जाता है और उसपर भी जो खेलता है उसका एंड़ी का पसीना माथे पर आ जाता है. यहां तो भाई लोग मौज करते हैं. हां, धूप मेंखड़े होकर पसीना जरुर बहाते हैं. वैसे अगर जाड़े का वक्त हुआ तो धूप में खड़े होना भी मजेदार अनुभव हो जाता है. बस खड़े रहो और लोगों का मुंह निहारते रहो. हालांकि रिकी पॉन्टिंग जैसे खिलाडी जब खड़े-खड़े बोर हो जाते हैं तो वहीं अपनी जगह पर कूदने लगते हैं.
खिलाडी भी अजीब-अजीब होते हैं. पहले वाल्श और एंब्रोज थे, दोनों मिलाकर बारह ओवर फेंक देते थे और रोजगार देते थे विकेट कीपर को. बैटिंग करने वाला बंदा तो अपना मुंह-हाथ-पैर बचाने में ही लगा रहता था. राबिन भाई को कैसे भुलाया जा सकता था, अगर कभी गलती से पचास रन बना दिया मुंह से झाग फेंक देते थे. लगता था कि बेचारे ने मेहनत की है. पाकिस्तान के एक भाई साहब थे इंजमाम, क्या कहने! उन्हें तो दौड़ने में भी आलस आता था. ज्यादातर वे आधी पिच तक पहुंचते और उन्हें मुआ अंपायर उंगली कर देता था. वो भी समझ नहीं पाते कि आखिर क्या दुश्मनी है उनसे.
अब तो विज्ञापन कंपनियों की बांछें खिल गई हैं. क्योंकि तीन घंटे के क्रिकेट का बुखार भारत के युवकों पर चढ़ गया है. विश्वकप में भारत पाकिस्तान की दुर्दशा से तो उनका दिवाला निकल गया था. अब आर्थिक अखबारों में सर्वे पर सर्वे आ रहा है कि बड़ा मजा है इस क्रिकेट में. कंपनियों की भी बल्ले-बल्ले है.
हालांकि अगर क्रिकेट को २०-२० की जगह पर दो खिलाडियों का मैच कर दिया जाए तो मजा दुगुना हो जाए. अगर सामने लांग आन और लांगआफ पर गेंद जाए तो गेंदवाज उसे पकड़ कर लाए और अगर लेग आन लेग आफ और पीछे की ओर गेंद जाए तो बल्लेबाज उसे पकड़ कर लाए. ये मैच पांच ओवर में ही निपट जाएगा और खिलाडी खेलते हुए भी लगेंगे. दस-बीस हजार का टिकट लगाकर क्रिकेट के दीवानों को फील्ड के बाहरी हिस्से पर फील्डिंग के लिए भी लगाया जा सकता है. साथ ही नियमों में भी बदलाव की जरुरत है. पीछे गेंद जाने पर बालर को रन मिले और आगे की ओर गेंद जाने पर बैट्समैन को … वगैरा वगैरा. अगर इस तरह का क्रिकेट होने लगे तो सही बताएं गुरु मुझे भी देखने में मजा आ जाए.
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आम जनता की आस्था

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 28, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन
दिलली हाईकोर्ट ने जस्टिस सभरवाल के मसले को लेकर जिन चार पत्रकारों को सजा सुनाई थी, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा दी है. हाईकोर्ट ने उन्हें यह सजा इसलिए दी थी क्योंकि उसे ऐसा लगा था कि मिड डे में छापे लेख से कोर्ट की छवि धूमिल हो रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा के खिलाफ पत्रकारों की याचिका किस आधार पर स्वीकारी और किस कारण से हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा पर रोक लगाई, यह बात तो अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है लेकिन पत्रकार बिरादरी और आम जन का मानना है कि इससे भारत की न्यायिक प्रणाली में आम जनता का विश्वास बहाल होता है. आस्था और विश्वास की बहाली का उपाय सच का गला दबाना नहीं उसकी पड़ताल करना है. यह जानना है कि अगर मीडिया ने किसी पर कोई आरोप लगाया है तो ऐसा उसने क्यों किया है? आखिर इस आरोप के क्या आधार हैं उसके पास? उन आधारों पर गौर किया जाना चाहिए. उसके तर्कों को समय और अनुभव की कसौटी पर कसा जाना चाहिए. इसके बाद अगर लगे कि यह तर्क माने जाने लायक हैं, तभी माना जाना चाहिए. तमाम पत्रकारों की ओर से विरोध के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि मीडिया के आचार संहिता लाई जानी चाहिए. लेकिन यह आचार संहिता सच का गला घोंटने वाली नहीं होनी चाहिए. यह आचार संहिता सत्ता के हितों की रक्षा के लिए नहीं, आम जनता के हितों की रक्षा करने वाली होनी चाहिए. क्योंकि लोकतंत्र में व्यवस्था का कोई भी अंग जनता के लिए है. चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका या मीडिया; भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सभी जनता के लिए हैं न कि जनता इनके लिए है. इसीलिए हमारे संविधान ने व्यवस्था के जिस किसी भी अंग या पद को जो विशेषाधिकार दिए हैं वह आम जनता के हितों की रक्षा के लिए हैं. आम जनता इनमें से किसी के हितों की रक्षा के लिए नहीं है. मीडिया को भी इस तरह के जो घोषित-अघोषित विशेषाधिकार हैं, जिनके अंतर्गत वह महीनों अपराधियों के इंटरव्यू दिखाता है, किसी सेलेब्रिटी की शादी की खबर महीनों चलाता है और भूत-प्रेत के किस्से सुना-सुना कर उबाता रहता है या सनसनी फैलता रहता है, ये अधिकार छीने जाने चाहिए.
लेकिन भाई अगर व्यवस्था के शीर्ष पर आसीन लोग भ्रष्ट हो रहे हों, और अपने स्वार्थों में इस क़दर अंधे हो गए हों कि धृतराष्ट्र को भी मात दे रहे हों तो उनके विशेषाधिकार के नाजायज पंख भी काटे जाने चाहिए. व्यवस्था अगर यह काम नहीं करेगी तो फिर यह काम जनता को करना पड़ेगा. और भारत की जनता ऐसा कुछ करने में हिचकती नहीं है. इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं.
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्याय में आम जनता की आस्था बहाल करने वाला है. इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय धन्यवाद और बधाई दोनों का पात्र है. धन्यवाद इसलिए कि उसने अपना दायित्व निभाया. न्याय की व्यवस्था को न्याय की तरह देखा. और बधाई इसलिए कि वह न्यायिक प्रणाली में जनता की आस्था बनाए रखने में सफल रहा.

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वे हमारे साथ सदैव रहना चाहते है!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 27, 2007

-दिलीप मंडल

उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस इलाके में लड़कियों के साथ छेड़खानी की। उन्होंने लड़कियो के साथ जबर्दस्ती की कोशिश की। लेकिन वो हमारी आपकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस में भर्ती होंगे। सरकार उनके साथ है। इसलिए आप चाहें या न चाहें, वो हमारी सुरक्षा करेंगे। वो हमारे लिए हमारे साथ सदैव रहना चाहते हैं।

डीयू की लड़कियां कितनी गैरवाजिब मांग उठा रही हैं। वो चाहती है कि छेड़खानी करने वाले लफंगे जिस बैच में शामिल हों, उस बैच को नौकरी पर न रखा जाए। वो चाहती है कि दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल उनकी मांग मान लें। जिस एनएसयूआई को डीयू ने खूबसूरत पोस्टर और संगठन का जलवा देखकर हाल ही मे जिताया है और जिसके नेताओं ने सोनिया गाधी के साथ तस्वीरे खिचाई थी, वो खामोशी साधे हुए है। डीयू स्टूडेंट यूनियन की प्रेसिडेट लड़की, दिल्ली की मुख्यमंत्री महिला, देश चलाने वाली एक महिला – और सभी कांग्रेसी, जिसका हाथ आम आदमी के साथ है, लेकिन डीयू की लड़कियों की एक मामूली सी और बिल्कुल सही मांग के समर्थन में कोई नही आ रहा है।

आप किस ओर खड़ें है?

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दूर आसमान रहे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 26, 2007

रतन
उडो तो ऐसे कि पीछे हर इक उडान रहे
इतना आगे बढ़ो कि दूर आसमान रहे
हद हो इतना कि कोई बात भी न हो पाए
फासला ऐसा तेरे मेरे दरमियान रहे
न ही माजी न ही आगे की बात हो कोई
न कुछ न संग तेरी यादों का सामान रहे
हुए हो दूर मगर मेरी सदा रखना याद
कभी न हम मिलें दिल में यही गुमान रहे
भूल से मिल गए कहीँ भी एक पल के लिए
निगाह बात करे लब ये बेजुबान रहे
पाक तुम भी रहो और पाक हमें भी रखना
चाक न दिल हो न तन ही लहूलुहान रहे
हंसी दुनियाँ है मेरी तुम न इसे नर्क बना
पान हो मुँह में तो हाथों में पीकदान रहे
अगर करोगे ग़लत बद्दुआ करेंगे सभी
कि परेशान मैं ज्यों तू भी परेशान रहे
ए रतन कर दुआ कि सारा जहां रोशन हो
और मेरे सिर पे भी खुदा का साईबान रहे

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कृपया इनसे मुग्ध न हों

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 25, 2007

-दिलीप मण्डल
क्या आप उन लोगों में हैं जो लालू यादव के भदेसपन के दीवाने हैं? क्या मुलायम सिंह आपकी नजर में समाजवादी नेता हैं? क्या उत्तर भारत की ओबीसी पॉलिटिक्स से आपको अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद है? क्या आप उन लोगों में हैं, जिन्हें लगता है कि इन जातियों का उभार सांप्रदायिकता को रोक सकता है? अगर आप ऐसे भ्रमों के बीच जी रहे हैं तो आपके लिए ये जाग जाने का समय है।

1960 के दशक से चली आ रही उत्तर भारत की सबसे मजबूत और प्रभावशाली राजनीतिक धारा के अस्त होने का समय आ गया है। ये धारा समाजवाद, लोहियावाद और कांग्रेस विरोध से शुरू होकर अब आरजेडी, समाजवादी पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, समता पार्टी आदि समूहों में खंड खंड हो चुकी है। गैर-कांग्रेसवाद का अंत वैसे ही हो चुका है। टुकड़े टुकड़े में बंट जाना इस राजनीति के अंत का कारण नहीं है। पिछड़ा राजनीति शुरुआत से ही खंड-खंड ही रही है। बुरी बात ये है कि पिछड़ावाद अब अपनी सकारात्मक ऊर्जा यानी समाज और राजनीति को अच्छे के लिए बदलने की क्षमता लगभग खो चुका है। पिछड़ा राजनीति के पतन में दोष किसका है, इसका हिसाब इतिहास लेखक जरूर करेंगे। लेकिन इस मामले में सारा दोष क्या व्यक्तियों का है ? उत्तर भारत के पिछड़े नेता इस मामले में अपने पाप से मुक्त नहीं हो सकते हैं, लेकिन राजनीति की इस महत्वपूर्ण धारा के अन्त के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थितियां भी जिम्मेदार हैं।

दरअसल जिसे हम पिछड़ा या गैर-द्विज राजनीति मानते या कहते हैं, वो तमाम पिछड़ी जातियों को समेटने वाली धारा कभी नहीं रही है। खासकर इस राजनीति का नेतृत्व हमेशा ही पिछड़ों में से अगड़ी जातियों ने किया है। कर्पूरी ठाकुर जैसे चंद प्रतीकात्मक अपवादों को छोड़ दें तो इस राजनीति के शिखर पर आपको हमेशा कोई यादव, कोई कुर्मी या कोयरी, कोई जाट, कोई लोध ही नजर आएगा। दरअसल पिछड़ा राजनीति एक ऐसी धारा है जिसका जन्म इसलिए हुआ क्योंकि आजादी के बात पिछड़ी जातियों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही थी।


जबकि इन जातियों के राजनीतिक सशक्तिकरण का काम लगभग पूरा हो चुका है, तो इन जातियों में मौजूदा शक्ति संतुलन को बदलने की न ऊर्जा है, न इच्छा और न ही जरूरत। इस मामले में पिछड़ा राजनीति अब यथास्थिति की समर्थक ताकत है। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि दलित उत्पीड़न से लेकर मुसलमानों के खिलाफ दंगों में पिछड़ी जातियां बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती दिखती हैं। ऐसा गुजरात में हुआ है, उत्तर प्रदेश में हुआ है और बिहार से लेकर हरियाणा और मध्यप्रदेश तक में आपको ऐसे केस दिख जाएंगे।

1990 का पूरा दशक उत्तर भारत में पिछड़े नेताओं के वर्चस्व के कारण याद रखा जाएगा। मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, देवीलाल (दिवंगत), ओम प्रकाश चौटाला, कल्याण सिंह, उमा भारती, अजित सिंह जैसे नेता पूरे दशक और आगे-पीछे के कुछ वर्षों में राजनीति के शिखर पर चमकते रहे हैं। इस दौरान खासकर प्रशासन में और सरकारी ठेके और सप्लाई से लेकर ट्रांसपोर्ट और कारोबार तक में पिछड़ों में से अगड़ी जातियों को उनका हिस्सा या उससे ज्यादा मिल गया है। ट्रांसफर पोस्टिंग में इन जातियों के अफसरों को अच्छी और मालदार जगहों पर रखा गया। विकास के लिए ब्लॉक से लेकर पंचायत तक पहुंचने वाले विकास के पैसे की लूट में अब इन जातियों के प्रभावशाली लोग पूरा हिस्सा ले रहे हैं।

इन जातियों के प्रभावशाली होने में एक बड़ी कमी रह गई है। वो ये कि शिक्षा के मामले में इन जातियों और उनके नेताओं ने आम तौर पर कोई काम नहीं किया है। इस मामले में उत्तर भारत की पिछड़ा राजनीति, दक्षिण भारत या महाराष्ट्र की पिछड़ा राजनीति से दरिद्र साबित हुई है।

विंध्याचल से दक्षिण के लगभग हर पिछड़ा नेता ने स्कूल कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी खोलने में दिलचस्पी ली थी और ये सिलसिला अब भी जारी है। लेकिन उत्तर भारत के ज्यादातर पिछड़ा नेता अपने आचरण में शिक्षा विरोधी साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों के अच्छे शिक्षा संस्थान पिछड़ा उभार के इसी दौर में बर्बाद हो गए। इन नेताओं से नए शिक्षा संस्थान बनाने और चलाने की तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते। शिक्षा को लेकर उत्तर भारत के पिछड़े नेताओं में एक अजीब सी वितृष्णा आपको साफ नजर आएगी।

इसका असर आपको पिछले साल चले आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान दिखा होगा। अपनी सीटें कम होने की चिंता को लेकर जब सवर्ण छात्र सड़कों पर थे और एम्स जैसे संस्थान तक बंद करा दिए गए, तब पिछड़ी जाति के छात्रों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जब सरकार ने आंदोलन के दबाव में ओबीसी रिजर्वेशन को संस्थानों में सीटें बढ़ाने से जोड़ दिया और फिर आरक्षण को तीन साल की किस्तों में लागू करने की घोषणा की, तब भी पिछड़ी जाति के नेताओं से लेकर छात्रों तक में कोई प्रतिक्रिया होती नहीं दिखी। और फिर जब अदालत में सरकार ओबीसी आरक्षण का बचाव नहीं कर पाई और आरक्षण का लागू होना टल गया, तब भी पिछड़ों के खेमे में खोमोशी ही दिखी।

इसकी वजह शायद ये है कि पिछड़ी जातियों में कामयाबी के ज्यादातर मॉडल शिक्षा में कामयाबी हासिल करने वाले नहीं हैं। पिछड़ी जातियों में समृद्धि के जो मॉडल आपको दिखेंगे उनमें ज्यादातर ने जमीन बेचकर, ठेकेदार करके, सप्लायर्स बनकर, नेतागिरी करके, या फिर कारोबार करके कामयाबी हासिल की है। दो तीन दशक तक तो ये मॉडल सफल साबित हुआ। लेकिन अब समय तेजी से बदला है। नॉलेज इकॉनॉमी में शिक्षा का महत्व चमत्कारिक रूप से बढ़ा है। आईटी से लेकर मैनेजमेंट और हॉस्पिटालिटी से लेकर डिजाइनिंग, एनिमेशन और ऐसे ही तमाम स्ट्रीम की अच्छी पढ़ाई करने वाले आज सबसे तेजी से अमीर बन रहे हैं। इस रेस में पिछड़े युवा तेजी से पिछड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के गुड़गांव के हरियाणा में आपको पढ़े लिखे लोगों की समृद्धि और जमीन बेचकर करोड़ों कमाने वालों की लाइफस्टाइल का फर्क साफ नजर आएगा। ऐसे भी वाकए हैं जब जमीन बेचकर लाखों रुपए कमाने वाला कोई शख्स किसी एक्जिक्यूटिव की कार चला रहा है। अगली पीढ़ी तक ये फासला और बढ़ेगा।

ऐसे में उम्मीद की किरण कहां है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए आपको इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि समाज में बदलाव की जरूरत किसे है। उत्तर भारतीय समाज को देखें तो उम्मीद की रोशनी आपको दलित, अति पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के बीच नजर आएगी। भारतीय लोकतंत्र में ये समुदाय अब भी वंचित हैं। यथास्थिति उनके हितों के खिलाफ है। संख्या के हिसाब से भी ये बहुत बड़े समूह हैं और चुनाव नतीजों के प्रभावित करने की इनकी क्षमता भी है। वैसे जाति और मजहबी पहचान की राजनीति की बात करते हुए हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आने वाले समय में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होने के साथ शायद आदिम पहचान के दम पर चल रहे भारतीय लोकतंत्र का भी चेहरा भी बदलेगा। वैसे भी लोकतंत्र जैसी आधुनिक शासन व्यवस्था का जाति और कबीलाई पहचान के साथ तालमेल स्वाभाविक नहीं है।

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