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ध्यान का इतिहास है जरूरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 21, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन
तिथि : 19 सितंबर 2007, बुधवार
मुकाम : दिल्ली में लोदी रोड स्थित श्री सत्य साईँ सेंटर का ऑडिटोरियम
लंबे समय बाद स्वामी वेद भारती का साथ था. दशमेश एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट ने यह आयोजन किया था और इसके कर्णधार थे राय साहब. राय साहब यानी वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय. जब मैं पहुँचा तब तक ‘ध्यान का वैश्विक प्रभाव’ विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी. राय साहब बता रहे थे स्वामी वेद भारती के बारे में. निश्चित रुप से मेरे जैसे लोगों के लिए इसमें कोई रूचिकर बात नहीं थी, जो पहले से ही स्वामी जी के बारे में काफी कुछ जानते थे. लेकिन उन तमाम लोगों के लिए यह दिलचस्प था जो पहले से ज्यादा कुछ नहीं जानते थे.
स्वामी जी से मेरा परिचय ‘योग इंटरनेशनल’ पत्रिका के मार्फ़त हुआ था. अमेरिका से छपने वाली इस पत्रिका में स्वामी जी की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी और उनका भारत का पूरा पता भी उसमें था. बाद में दिल्ली से छपने वाली लाइफ पोजिटिव में भी मैंने स्वामी जी पर एक पूरा लेख पढा और फिर मेरे माना में उनका एक इंटरव्यू करने की इच्छा हुई. ऋषिकेश स्थित उनके आश्रम से टेलीफोन पर सम्पर्क किया तो भोला शंकर से बात हुई. उन्होने एक महीने बाद स्वामी जी के भारत आने और तभी मुलाक़ात करा पाने की बात कही. खैर, मैंने उस वक़्त इसे हरी इच्छा मान कर भविष्य में कभी के लिए मुल्तवी कर दिया था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. एक महीना बीतते ही भोला ने फिर मुझसे स्वयम सम्पर्क किया और मुफीद समय पूछा. आखिरकार समय तय हुआ और मैं ऋषिकेश पहुँचा. पूरे दिन विभिन्न गतिविधियों में व्यस्तता और आश्रम की कार्यप्रणाली के अवलोकन के बाद रात 12 बजे स्वामी जी के साथ मेरी बैठक शुरू हुई.
हमारी चर्चा अध्यात्म कम दुनिया भर में योग और उसकी दुर्दशा पर अधिक केंद्रित रही. रात दो बजे तक हमारी चर्चा चलती रही और इस दौरान ध्यान की तमाम विधियों, नए दौर में इसकी प्रासंगिकता, इसे लेकर चल रहे सर्कसों के अलावा स्वामी जी के व्यक्तिगत जीवन से जुडे कई सवाल भी मैंने किए और उन्होने बिना हिचके मेरे सवालों के जवाब दिए. मुझे सुखद आश्चर्य हो रहा था कि स्वामी जी पूरे दिन की व्यस्तता के बावजूद इस वक़्त भी पूरी त्वरा के साथ बातचीत में लगे थे.
क्षमा करें, मैं फ्लैश बैक में चला गया. हालांकि हमें अभी की बात करनी थी. तो अभी 2005 के बाद 2007 में स्वामी जी में मैं वही त्वरा और वही शांति देख रहा था. राय साहब के बाद थोड़ी देर के लिए बीच में शेष नारायण सिंह आए और फिर स्वामी जी सीधे मुखातिब थे अपने श्रोताओं से. शुरुआत ध्यान से. यह ध्यान तो नहीं, हाँ ध्यान की छोटी सी झलक भर थी. पर जिसने भी मनोयोग से इसमें हिस्सा लिया होगा उसका संकल्पबद्ध होना मैं तय मानता हूँ. क्षमा करें, इसका आनंद लगभग वैसा ही है जैसे गूंगे के लिए गुड़ का स्वाद. मैं यह अनुभूति कैसे बांटू आपसे? हालांकि इस बीच भी कुछ लोगों के मोबाइल फोन बजे और तब कुछ लोगों के मन में तालिबानी ख़्याल भी आए. पर क्या करिएगा? हमारे देश में एक ही चीज की तो सबसे ज्यादा कमी है और वो है सिविक सेन्स. चूंकि यह चीज यहाँ कहीं नहीं पाई जाती, लिहाजा यहाँ भी इसकी उम्मीद व्यर्थ ही थी.
विषय पर आते हुए स्वामी जी ने शुरुआत ही संस्कृति और राष्ट्रवाद के फर्क से की. उन्होने कहा, ‘जब भी भारतीय संस्कृति की बात की जाती है उसे आम तौर पर राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है. लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. मैं काई संस्कृतियों में रहा हूँ और मुझे सबसे प्यार है. तमाम देशों में गया हूँ. मुझे वहाँ के लोगों से, उनके धर्मग्रंथों से प्यार है. मैं नहीं मानता कि धर्म बदलवा कर किसी व्यक्ति को परम सत्ता के दर्शन कराए जा सकते हैं या उसे आध्यात्मिक बनाया जा सकता है. भगवान ने स्वयं कहा है कि जो जिस मार्ग से मेरे पास आता है, मैं उसी मार्ग से उसे भक्ति और सत्य की ओर बढाता हूँ.
यह एक संयोग ही है कि ध्यान के दर्शन पर तो बहुत कार्य हुआ लेकिन उसके इतिहास पर कोई काम नहीं हुआ. हालांकि इस पर कार्य बहुत जरूरी है. मैं चाहता हूँ कि इस पर कार्य हो. अगर इस कार्य किया जाए तो शायद पता चले कि दुनिया भर में जहाँ कहीं भी ध्यान है हर जगह उसका व्याकरण एक ही है. सबमें श्वांस पर ही अवधान लाने के लिए कहा जाता है.’
उनहोंने चीन, कम्बोडिया, थाईलैंड, नोर्वे, इंडोनेशिया आदि कई देशों की संस्कृतियों, वहाँ के संतों-भाषाओं-ध्यान परम्पराओं का जिक्र करते हुए कहा, ‘एशिया की कम से कम 50 लिपियाँ ब्राह्मी से निकली हैं. चीन में जब बौद्ध धर्म पहुँचा और वहाँ मंत्रों के लिखने की बात आई तो पता चला कि चीनी लिपि में तो किसी दूसरी भाषा के वर्ण लिखे ही नहीं जा सकते. तब वहाँ ब्राह्मी से जुडी एक दूसरी लिपि का आविष्कार बौद्ध योगियों ने किया. यह लिपि है सिद्धम, जिसका प्रयोग आज भी वहाँ मंत्रों को लिखने के लिए किया जाता है.’
यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले मैंने स्वामी जी को जितना जाना था, आज उससे थोडा ज्यादा जाना. राहुल और रजनीश के बाद जिन लोगों ने मुझे प्रभावित किया उनमें स्वामी वेद भारती एक हैं. केवल भाषा और विचारधारा ज्ञान नहीं दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों के सम्मान के लिए भी. राहुल नास्तिक थे और रजनीश का अपना धर्म था. स्वामी वेद भारती ने अपना कोई धर्म नहीं चलाया. वह सनातन धर्म की मर्यादाओं से बंधे हैं. फिर भी दुनिया के सभी धर्मों, सभी संस्कृतियों और सभी दर्शन धाराओं के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान है. वरना तो इस तल पर ज्यादातर धर्माधिकारी जूता कंपनियों के एजेंटों से अलग नहीं हैं. राहुल-रजनीश और वेद में एक साम्य और है और वह है चरैवेति-चरैवेति. स्वामी जी कहते हैं कि कर्ण कवच-कुंडल पहन कर पैदा हुए थे और में पैरों में चक्कर पहन कर पैदा हुआ हूँ. बहरहाल इन बातों की चर्चा फिर कभी.
मुझे बेहद प्रभावित किया स्वामी जी की इस बात ने – ‘सेकुलरिज्म की बात आज की जा रही है. भारत में कम से कम चार शताब्दियों से दरगाहों पर हिंदू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायों के लोग जा रहे हैं और चादर चढ़ा रहे हैं. मन्नतें मान रहे हैं. सीरिया में मुस्लिम महिलाएं कोप्टिक चर्च में जाकर आशीर्वाद लेती हैं. तबसे जब सेकुलरिज्म शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था.
दुनिया का कोई भी धर्म हो, ध्यान का एक ही व्याकरण है। क्या बात है भाई? जरूर कोई इंटरनेशनल कोंफ्रेंन्स हुई होगी और उसमें ये एग्रीमेंट हुई होगी. (बीच में हंसने लगते हैं). यह बात जाने कितने हजार सालों से चली आ रही है.’ देश-विदेश में भारतीयता के हाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, ‘भारतीयों ने योग का मतलब चमत्कार समझ लिया है और योगी का मतलब ज्योतिषी. जबकि ऐसा है नहीं. योग सिद्धियों को नहीं कहते हैं. घुटने तक को नाक को ले आने या 5 मिनट तक सांस रोके रखने को भी योग नहीं कहते. योग धर्म बदलने के लिए भी आपको नहीं कहता. वह आपको आपके अपने धर्म में रहते हुए शांति की साधना का मार्ग देता है. योग का मतलब है कि कोई तनाव और क्रोध से भरा हुआ आपके पास आए, लेकिन जाए तो मुस्कराता हुआ, बिल्कुल शान्त भाव से लौटे.’ समारोह का समापन फिर से ध्यान और एमएस सिद्धू के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ. बाद में मेरी मुलाक़ात केएन गोविंदाचार्य, राय साहब, राजेश कटियार, अवधेश कुमार और संजय तिवारी से भी हुई. आख़िर में चाय पानी पिए और चले आए. और क्या?

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3 Responses to “ध्यान का इतिहास है जरूरी”

  1. सही सत्संग कर रहे हैं।

  2. स्वामी वेद भारती के बारे में यह लिंक भी काम का है. हिन्दी में संक्षिप्त जीवन परिचयhttp://visfot.blogspot.com/2007/08/blog-post_18.html

  3. अच्छा लगा इसे पढ़ना और स्वामी वेद भारती जी को जानना!!शुक्रिया!

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