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दूर आसमान रहे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 26, 2007

रतन
उडो तो ऐसे कि पीछे हर इक उडान रहे
इतना आगे बढ़ो कि दूर आसमान रहे
हद हो इतना कि कोई बात भी न हो पाए
फासला ऐसा तेरे मेरे दरमियान रहे
न ही माजी न ही आगे की बात हो कोई
न कुछ न संग तेरी यादों का सामान रहे
हुए हो दूर मगर मेरी सदा रखना याद
कभी न हम मिलें दिल में यही गुमान रहे
भूल से मिल गए कहीँ भी एक पल के लिए
निगाह बात करे लब ये बेजुबान रहे
पाक तुम भी रहो और पाक हमें भी रखना
चाक न दिल हो न तन ही लहूलुहान रहे
हंसी दुनियाँ है मेरी तुम न इसे नर्क बना
पान हो मुँह में तो हाथों में पीकदान रहे
अगर करोगे ग़लत बद्दुआ करेंगे सभी
कि परेशान मैं ज्यों तू भी परेशान रहे
ए रतन कर दुआ कि सारा जहां रोशन हो
और मेरे सिर पे भी खुदा का साईबान रहे
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2 Responses to “दूर आसमान रहे”

  1. वाह रतन भाई, बहुत खूब!!ए रतन कर दुआ कि सारा जहां रोशन होऔर मेरे सिर पे भी खुदा का साईबान रहे-क्या बात कही है!! दाद कबूलें.

  2. really—-great. I think this is great vision and reflect in word through heart. Ramesh Mishra

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