Aharbinger's Weblog

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Archive for October, 2007

अगर औरत की शक्ल में कार हो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 31, 2007

सत्येन्द्र प्रताप
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेवादा में सेमा नाम से कार की प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी मानी जाती है। हालांकि मनुष्य के हर रूप को बाजार ने भली भांति पहचाना है, लेकिन अगर कार के रुप में किसी महिला को देखा जाए तो तस्बीर कुछ इसी स्टेच्यू की तरह उभरेगी। शायद इसी सोच के साथ प्रदर्शनी के आयोजकों ने कार के पार्टस से महिला की स्टेच्यू बना डाली। आप भी औरत के विभिन्न अंगों की तुलना कार-पार्टस् से करके लुफ्त उठा सकते हैं???

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देख लो भइया, ये हाल है तुम्हारी दुनिया का

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 27, 2007

चीन के बीजिंग शहर में प्रदूषण का धुंध इस कदर छा गया है कि सड़क पर खड़े होकर बहुमंिजली इमारत का ऊपरी हिस्सा देखना मुश्किल हो गया है। चीन में अगले साल ओलंपिक खेल होने जा रहा है और उससे जुड़े अधिकारियों ने उद्योगों से होने वाले वायु प्रदूषण पर चेतावनी भी दी है।

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सबूत लपेटकर फांसी पर लटकाया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 26, 2007

सीरियाः अलेपो के उत्तरी शहर में १८ से २३ साल के पांच युवकों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया।ये टुवक हत्या के मामले में दोशी पाए गए थे। फांसी पर लटकाए गए युवकों के शरीर पर उनके अपराधों के बारे में विस्तृत रूप से लिखकर लपेट दिया गया था।

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बीड़ी जलइले िजगर से पिया….

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 23, 2007

शिक्षा के निजीकरण के िवरोध में सड़कों पर उतरे छात्र-छात्राओं का अनोखा विरोध

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आजा, आ……. लड़ेगा क्या

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 23, 2007


स्लोवािकय का छह सप्ताह का बिल्ली का बच्चा , खेलते हुए

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पत्रकार का प्रेमपत्र

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 22, 2007

सत्येन्द्र प्रताप
सामान्यतया प्रेमपत्रों में लड़के -लड़िकयां साथ में जीने और मरने की कसमें खाते हैं, वादे करते हैं और वीभत्स तो तब होता है जब पत्र इतना लंबा होता है िक प्रेमी या प्रेिमका उसकी गंभीरता नहीं समझते और लंबे पत्र पर अिधक समय न देने के कारण जोड़े में से एक भगवान को प्यारा हो जाता है.
अगर पत्रकार की प्रेिमका हो तो वह कैसे समझाए। सच पूछें तो वह अपने व्यावसाियक कौशल का प्रयोग करके कम शब्दों में सारी बातें कह देगा और अगर शब्द ज्यादा भी लिखने पड़े तो खास-खास बातें तो वह पढ़वाने में सफल तो हो ही जाएगा.

पहले की पत्रकािरता करने वाले लोग अपने प्रेमपत्र में पहले पैराग्राफ में इंट्रो जरुर िलखेंगे. साथ ही पत्र को सजाने के िलए कैची हेिडंग, उसके बाद क्रासर, अगर क्रासर भी लुभाने में सफल नहीं हुआ तो िकसी पार्क में गलबिहयां डाले प्रेमिका के साथ का फोटो हो तो वह ज्यादा प्रभावी सािबत होगा और प्रेमिका के इमोशन को झकझोर कर रख देगा.
नया अखबारनवीस होगा तो उसमें कुछ मूलभूत परिवर्तन कर देगा. पहला, वह कुछ अंगऱेजी के शब्द डालेगा िजससे प्रेमिका को अपनी बात समझा सके. समस्या अभी खत्म नहीं हुई क्योंिक वक्त की भी कमी है और पढ़ने के िलए ज्यादा समय भी नहीं है. फोटो तो बड़ा सा डालना होगा िजससे पत्र हाथ में आते ही भावनाएं जाग जाएं. अगर फोटो का अभाव है तो इंट्रो कसा हुआ हो, साथ ही टेक्स्ट कम होना बेहद जरुरी है.

अलग अलग अखबारों के पत्रकार अलग अलग तरीके से प्रेमपत्र िलखेंगे. िहन्दुस्तान में होगा तो बाबा कामदेव का प्रभाव, भास्कर में हुआ तो फांट से अलग िदखने की कोिशश, जागरण का हुआ तो ठूंसकर टेक्स्ट भरेगा, नवभारत टाइम्स का हुआ तो अंगऱेजी झाड़कर अपनी बेचारगी दशाॆएगा, अगर आज समाज का हुआ तो हेिडंग के नीचे जंप हेड जरूर मारेगा, चाहे डबल कालम का लव लेटर हो या चार कालम का.

आम आदमी भी प्रेम पत्र िलखने के इन नुस्खों को अपना सकते हैं, िजससे प्रेमी प्रेमिका की आपसी समझ बढ़ेगी और प्यार में लव लेटर के खतरे से पूरी तरह से बचा जा सकेगा.

तो कामदेव की आराधना के साथ शुरु करिये प्रेमपत्र लिखना. सफलता के िलए शुभकामनाएं.

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चलना है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 19, 2007

रतन
उम्र भर रात-दिन औ सुबहो-शाम चलना है
ये जिन्दगी है सफर याँ मुदाम चलना है

ये हैं तकदीर की बातें नसीब का लिखा
किसी को तेज किसी को खिराम चलना है

लाख रोके से रुकेगा नहीं इंसान यहाँ
जब भी आया है खुदा का पयाम चलना है
नहीं है एक कोई दुनिया से जाने वाला
आज मैं कल वो इस तरह तमाम चलना है
गलत किया है नहीं गर खता हुई हो कभी
माफ़ करना मुझे सब राम-राम चलना है
ज्यों यहाँ हम रहे खुशहाल वहाँ भी यों रहें
लबों पे लेके खुशनुमा कलाम चलना है

रतन हैं साथ सफर होगी हंसी अहले-जहाँ
कुबूल कीजिए मेरा सलाम चलना है

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पहला आर्यसत्य

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 16, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन

राजकुमार सिद्धार्थ पहली बार अपने मंत्री पिता के सरकारी बंगले से बाहर निकले थे. साथ में था केवल उनका कार ड्राइवर. चूंकि बंगले से बाहर निकले नहीं, लिहाजा दिल्ली शहर के तौर-तरीक़े उन्हें पता नहीं चल सके थे. कार के बंगले से बाहर निकलते ही, कुछ दूर चलते ही रस्ते में मिला एक साईकिल सवार. हवा से बातें करती उनके कार के ड्राईवर ने जोर का हार्न लगाया पर इसके पहले कि वह साईड-वाईड ले पाता बन्दे ने गंदे पानी का छर्रा मारा ….ओये और ‘बीडी जलाई ले जिगर से पिया ……..’ का वाल्यूम थोडा और बढ़ा दिया. इसके पहले कि राजकुमार कुछ कहते-सुनते ड्राईवर ने उन्हें बता दिया, ‘इस शहर में सड़क पर चलने का यही रिवाज है बेबी.’

‘मतलब?’ जिज्ञासु राजकुमार ने पूछा.
‘मतलब यह कि अगर आपके पास कार है तो आप चाहे जितने पैदल, साइकिल और बाइक सवारों को चाहें रौंद सकते हैं.’ ड्राइवर ने राजकुमार को बताया. कार थोड़ी और आगे बढ़ी. ड्राइवर थोडा डरा. उसने जल्दी से गाडी किनारे कर ली. मामला राजकुमार की समझ में नहीं आया.
‘क्या हुआ?’ उन्होने ड्राइवर से पूछा.
‘अरे कुछ नहीं राजकुमार, बस एक ब्लू लें आ रही है.’
‘क्या ब्लू लाइन? ये कौन सी चीज है भाई?’ वह अचकचाए.
‘ये चीज नहीं है बेबी. धरती पर यमराज के साक्षात प्रतिनिधि हैं. साक्षात मौत.’
‘मैं कुछ समझा नहीं?’
‘बात दरअसल ये है कि धरती पर जब भी लोगों को यह घमंड हो जाता है कि अब मनुष्य ने बीमारियों का इलाज ढूँढ कर मृत्यु को जीत लिया है तो यमराज कोई नई बीमारी भेज देते हैं. दिल्ली में उसी का नाम ब्लू लाइन है. पहले इसे रेड लाइन कहते थे. इसके भीतर अगर कभी जाने का सौभाग्य आपको मिले तो आपको पता चलेगा कि वहाँ एक पूरा रेड लाईट एरिया होता है.’
‘ये रेड लाईट एरिया क्या होता है?’
‘ये वो एरिया होता है जहाँ सिर्फ वही लोग जा सकते हैं जिन्हे अपने मान-सम्मान और जीवन-मृत्यु की कोई परवाह न हो.’
‘अच्छा! पर हम इसके भीतर तो जा नहीं रहे थे. तुम इसे देख कर डर क्यों गए?’
‘वो क्या है राजकुमार कि अगर ब्लू लाइन बसों को इस बात का पूरा हक है कि ये जब चाहें कार वालों को भी रौंद सकती हैं. चूंकि यहाँ सडकों पर ट्रेनें और प्लेनें अभी चलती नहीं हैं, इसलिए इनका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते.’
थोडा और आगे बढ़े तो एक चौराहा दिखा. चौराहे पर लाल-पीली-हरी बत्तियां दिखीं. चारों तरफ चिल्ल-पों की फालतू आवाजों के साथ बेतरतीब आते-जाते गाड़ियों से गाड़ियों के बीच एक तरह की धक्का-मुक्की करते लोग दिखे. राजकुमार को पीछे चले संदर्भ याद आ गए. उन्होने फिर पूछा, ‘क्या यही रेड लाईट एरिया है?’
‘नहीं ये एरिया नहीं, सिर्फ रेड लाईट है. एरिया थोडा अलग मामला है. वहाँ जाने से आप बच भी सकते हैं. पर यहाँ तो आपको आना ही पड़ेगा. सबको आना पड़ता है.’
‘ओह! और यह जो लाल-पीली बत्तियां लगीं हैं, ये किसलिए हैं?’
‘किताबों में लिखा तो यह गया है कि ये ट्रैफिक कण्ट्रोल के लिए हैं. पर असल में ऐसा कुछ है नहीं. वास्तव में ये सिर्फ सजाने के लिए लगाई गईं हैं.’
कार को थोडा और आगे बढते ही एक खाकी वर्दीधारी ने रोका. राजकुमार ने देखा कि गितिर-पितिर अन्ग्रेज़ी बोलती एक अल्पवसना युवती उससे पहले ही भिडी हुई थी. पर राजकुमार के ड्राईवर ने कार का शीशा उतारा. डंडाधारी को कुछ कहा और आगे बढ़ गया. राजकुमार को फिर जिज्ञासा हुई. उन्होने पूछा,’क्या मामला था? वह युवती क्यों भिडी हुई है?’
‘उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है.’
‘ये क्या होता है?’
‘ये एक प्रकार का कार्ड होता है, जिसके बग़ैर गाडी नहीं चलाई जा सकती है.’
‘ओह! तो तुम्हारे पास था वो कार्ड?’
‘नहीं. मेरे पास तो गाडी का आरसी भी नहीं है.’
‘फिर तुमसे उसने कुछ कहा क्यों नहीं?’
‘मैने उसे बता दिया कि ये मंत्री जी की गाडी है.’
‘ओह! तो क्या मंत्री जी की गाडियां चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती?’
‘हाँ. उनके लिए कोई नियम नहीं होता. ब्लू लाइन बसें इसीलिए तो सबको रौंदते हुए चलती हैं.’
‘अच्छा! तो क्या ये ब्लू लाइन बसें मंत्री जी की हैं?’
‘जी हाँ! आपके पिताजी की भी कई हैं. पर कागजों में इनका मालिक घुरहुआ है और मंत्री जी इन्हें चलवाते भी खुद नहीं हैं. सारी बसें ठेके पर चलती हैं.’
‘ऐसा क्यों?’
‘अब आपको क्या बताएं बेबी?’ ड्राइवर अचानक से दार्शनिक हो गया, ‘व्यवस्था ऐसे ही चलती है.’
हालांकि राजकुमार समझ नहीं पाए कि व्यवस्था क्या चीज है. पर उन्हें अब ड्राइवर से पूछना भी मुफीद नहीं लगा. आखिर वह क्या सोचता? यही न! कि राजकुमार इतना भी नहीं समझ सकते. लिहाजा वे अपने मौन में खो गए और सोचने लगे कि शायद यह कार है. या शायद ब्लू लाइन बस है. या शायद रेड लाईट है. या शायद वह एरिया है. या शायद ……………
और वह ध्यान मग्न हो गए. शायद उन्हें पहला आर्यसत्य मिल गया था.

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दीवार की काई की तरह

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 16, 2007

विनय ओझा ‘स्नेहिल’
अपनी उम्मीद है दीवार की काई की तरह।
फिर भी ज़िन्दा है खौफ़नाक सचाई की तरह॥

पेट घुटनों से सटा करके फटी सी चादर –
ओढ़ लेता हूँ सर्दियों में रजाई की तरह ॥

आँधियाँ गम की और अश्कों की उसपर बारिश –
साँस अब चलती है सावन की पुरवाई की तरह ॥

जाने यह कौन सी तहज़ीब का दौर आया है-
बात अब अच्छी भी लगती है बुराई की तरह ॥

सारी जनता तो उपेक्षित है बरातीयों सी –
और नेताओं की खातिर है जमाई की तरह ॥

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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 8, 2007

विनय ओझा स्नेहिल


मुस्कराहट पाल कर होंठों पे देखो दोस्तों-
मुस्करा देगा यकीनन गम भी तुमको देखकर.

थाम लेगा एकदिन दामान तुम्हारा आस्मां –
थोड़ा थोड़ा रोज़ तुम ऊँचा अगर उठते रहे.

यह और है कि हसीनों के मुँह नहीं लगते-
वरना रखते हैं जिगर हम भी अपने सीने में.

पाँव में ज़ोर है तो मिल के रहेगी मंज़िल –
रोक ले पाँव जो ऐसा कोई पत्थर ही नहीं.

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