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कोई कहाँ है अपना

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 4, 2007

रतन
सभी अपने हैं मगर कोई कहॉ है अपना
यों तो कहने के लिए सारा जहाँ है अपना
लोग कहते हैं कि तुम दिल में मेरे रहते हो
सच यही है कि नहीं कोई मकां है अपना
लोग जो करते हैं ओ जानें करम है उनका
यह जनम अगला जनम उनपे फ़ना है अपना
वो न समझें वो न जानें कोई गुस्ताखी नहीं
ग़लत-सही हो जान उनपे फ़िदा है अपना
आपसा हमने उन्हें माना जो थे आपके लोग
जिनके बारे में बताया कि फलां है अपना
भूल जाये ये जहाँ खत्म हो जाये दुनिया
ख़त्म होगा नहीं वो नामो-निशां है अपना
यकीन तुम न करो पर है यही सच्चाई
कि रतन अलग सा अंदाजे बयाँ है अपना

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2 Responses to “कोई कहाँ है अपना”

  1. भूल जाये ये जहाँ खत्म हो जाये दुनियाख़त्म होगा नहीं वो नामो-निशां है अपना–वाह्ह!! बहुत खूब..मजा आया पढ़कर.

  2. लोग कहते हैं कि तुम दिल में मेरे रहते हो सच यही है कि नहीं कोई मकां है अपनासतर्क रहिएगा, कहीं ऐसा कहने वाले दिल का किराया न मांगने लगें.

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