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निशानी नहीं थी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 12, 2007

हरि शंकर राढ़ी
किसने कहा कि वो रानी नहीं थी.
दुष्यंत की बस निशानी नहीं थी.

तन में टूटन थी न मन में चुभन थी
सच में सुबह वो सुहानी नहीं थी.

लहरों सी उसमें लचक ही लचक थी
पानी भी था और पानी नहीं थी.

जल्दी से कलियों ने आँचल हटाया
हालांकि उनपर जवानी नहीं थी.

कैसे सुनाता वफ़ा की इबारत
दिल पर लिखी थी जुबानी नहीं थी.

फूलों के रस डुबाकर लिखी जो
राढ़ी वो सच्ची कहानी नहीं थी.

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4 Responses to “निशानी नहीं थी”

  1. जब आपको ई मालूम था की वो सच्ची कहानी नहीं थी, त लिखबे कहें किये जी?

  2. mahashakti said

    वाह भाई वाह

  3. आप तो बहुत दिन बाद आए, चलिए कुछ और लिख डालिए।

  4. prabhakar said

    ये मरीचिका है य कुछ भेद खुल रहा है?

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