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Archive for December, 2007

तस्लीमा, तुम स्वीडेन चली जाओ प्लीज़

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 28, 2007

तस्लीमा के नाम केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार की चिट्ठी

तस्लीमा,

तुम महान हो। बढ़िया लिखती हो। तुम्हारा लिखा हुआ हमारे देश में भी खूब बिकता है। लेकिन तस्लीमा तुम स्वीडेन चली जाओ। तस्लीमा तुमने हमारी धर्मनिरपेक्षता के स्वांग को उघाड़ दिया है। हम कितने महान थे। हम कितने महान हैं। हम लोकतंत्र हैं, हमारे यहां संविधान से राज चलता है, जिसमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात नागरिकों के मूल अधिकारों में दर्ज है।

लेकिन ये अधिकार तो हम अपने नागरिकों को भी नहीं देते हैं तस्लीमा। हम विनायक सेन को कैद कर लेते हैं। वरवर राव हमारे निशाने पर है। विरोध करने वालों को हम माफ नहीं करते। हमारी जेलों में लेखक रहें ये अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा है।

और तुम तो विदेशी हो तस्लीमा। नंदीग्राम में हमने एक शख्स को तो इसलिए गिरफ्तार कर लिया है कि उसकी झोली में महाश्वेता की रचनाएं मिली हैं। फिर भी ये लोकतंत्र है तस्लीमा। हमारी भी कुछ इज्जत है। हमारी इज्जत तुम्हारे यहां होने से सरेआम उछल रही है। तस्लीमा, जिद न करो। यूरोपीय लोकतंत्र के सुरक्षित वातावरण में चली जाओ। अब जाओ भी। दफा हो जाओ भारत से।

वरना तस्लीमा हम तुम्हारा बुरा हाल करेंगे। हम लोकतंत्र हैं फिर भी तुम्हे नजरबंद कर देंगे। सुरक्षा के नाम पर तुम्हें बाकी दुनिया से काट देंगे। किसी से भी मिलने नहीं देंगे तुम्हे। फोन पर बात भी तुम उसी से करोगी, जिसके लिए हम इजाजत देंगे। अकेलेपन से तुम्हें डर लगता है ना तस्लीमा। हम तुम्हे अकेलापन देंगे। ऐसा अकेलापन कि तुम पागल हो जाओगी। तुम पागल बनना तो नहीं चाहती हो तस्लीमा। भारतीय लोकतंत्र का दिल भी बड़ा कोमल है। और तुम तो समझदार हो। तुम समझती क्यों नहीं तस्लीमा। प्लीज, अब मान भी जाओ।

देखती नहीं तुम कि तुम्हारे भारत में होने से हम दोनों सरकारों को कितनी दिक्कत हो रही है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार हूं। मैं लेफ्ट हूं। मैं तो कहता हूं तुम जहां चाहो रहो। लेकिन पश्चिम बंगाल को तो माफ करो। यहां आओगी, तो हम तुम्हारी सुरक्षा नहीं करेंगे। हमने तीस साल के शासन में मुसलमानों के साथ बड़ा छल किया है। उनकी आबादी राज्य में 25 फीसद से ज्यादा है लेकिन सरकारी नौकरियों में वो सिर्फ 2.1 फीसदी हैं। उन्हें न हमने शिक्षा दी न बैंक लोन। तस्लीमा तुम सच्चर कमेटी की रिपोर्ट देख लो। वैसे अब तो हम उन्हें सुरक्षा भी नहीं दे रहे हैं। बर्गादार मुसलमानों की जमीन छीन रहे हैं हम। इसलिए नंदीग्राम होता है और वहां सबसे ज्यादा मुसलमान मारे जाते हैं।

तस्लीमा, पश्चिम बंगाल के मुसलमान नौकरियां मांगने लगे हैं। वो तो हम उन्हें दे नहीं सकते, लेकिन उनके कट्टरपंथी हिस्से को हम ये जरूर कह सकते हैं कि देखो हमने तस्लीमा को भगा दिया। तुम्हारा भागना हमारे लिए उपलब्धि है। ये हमारी ट्रॉफी है तस्लीमा। तुम बंगाल लौटकर उस ट्रॉफी को हमसे छीन लेना चाहती हो? खबरदार जो ऐसा किया। हम ऐसा नहीं होने देंगे।

हम बाहर नहीं बोलेंगे, पर केंद्र की सरकार को धमकाएंगे, समर्थन वापस लेने की धमकी भी देंगे। ऐसे में तुमको लगता है कि तुम बंगाल लौट पाओगी। भूल जाओ तस्लीमा। तुम स्वीडेन चली जाओ। हुसैन साहब भी तो विदेश भाग गए। तुम भी ऐसा ही करो। खुश रहो। हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं। तुम कितनी अच्छी हो। थैंक्स।
-दिलीप मंडल

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हमारी संस्कृति और जाति व्यवस्था को मत छेड़ो प्लीज़…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 22, 2007

…गुलामी भी हम बर्दाश्त कर लेंगे।

क्या देश के बीते लगभग एक हजार साल के इतिहास की हम ऐसी कोई सरलीकृत व्याख्या कर सकते हैं? ऐसे नतीजे निकालने के लिए पर्याप्त तथ्य नहीं हैं। लेकिन हाल के वर्षों में कई दलित चिंतक ऐसे नतीजे निकाल रहे हैं और दलित ही नहीं मुख्यधारा के विमर्श में भी उनकी बात सुनी जा रही है। इसलिए कृपया आंख मूंदकर ये न कहें कि ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।

भारत में इन हजार वर्षों में एक के बाद एक हमलावर आते गए। लेकिन ये पूरा कालखंड विदेशी हमलावरों का प्रतिरोध करने के लिए नहीं जाना जाता है। प्रतिरोध बिल्कुल नहीं हुआ ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन समग्रता में देखें तो ये आत्मसमर्पण के एक हजार साल थे। क्या हमारी पिछली पीढ़ियों को आजादी प्रिय नहीं थी? या फिर अगर कोई उन्हें अपने ग्रामसमाज में यथास्थिति में जीने देता था, उनकी पूजा पद्धति, उनकी समाज संरचना, वर्णव्यवस्था आदि को नहीं छेड़ता था, तो वो इस बात से समझौता करने को तैयार हो जाते थे कि कोई भी राजा हो जाए, हमें क्या?

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इसका जवाब ढूंढने की कोई कोशिश अगर हुई है, तो वो मेरी जानकारी में नहीं है। देश की लगभग एक हजार साल की गुलामी की समीक्षा की बात शायद हमें शर्मिंदा करती है। हम इस बात का जवाब नहीं देना चाहते कि हजारों की फौज से लाखों की फौजें कैसे हार गई। हम इस बात का उत्तर नहीं देना चाहते कि कहीं इस हार की वजह ये तो नहीं कि पूरा समाज कई स्तरों में बंटा था और विदेशी हमलावरों के खिलाफ मिलकर लड़ने की कल्पना कर पाना भी उन स्थितियों में मुश्किल था? और फिर लड़ने का काम तो वर्ण व्यवस्था के हिसाब से सिर्फ एक वर्ण का काम है!

इतिहास में झांकने का मकसद अपनी पीठ पर कोड़े मारकर खुद को लहूलुहान कर लेना कतई नहीं हो सकता, लेकिन हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि गलतियों से न सीखने वाले दोबारा और अक्सर ज्यादा बड़ी गलतियां करने को अभिशप्त होते हैं।

भारत पर राज करने शासकों में से शुरूआती मुगल शासकों ने अपेक्षाकृत निर्बाध तरीके से (हुमायूं के शासनकाल के कुछ वर्षों को छोड़कर) देश पर राज किया। मुगल शासकों ने बाबर के समय से ही तय कर लिया था कि इस देश के लोग अपना जीवन जिस तरह चला रहे हैं, उसमें न्यूनतम हस्तक्षेप किया जाए। जजिया टैक्स लगाना उस काल के हिंदू जीवन में एकमात्र ऐसा मुस्लिम और शासकीय हस्तक्षेप था, जिससे आम लोगों को कुछ फर्क पड़ता था। ये पूरा काल अपेक्षाकृत शांति से बीता है। औरंगजेब ने जब हिंदू यथास्थिति को छेड़ा तो मुगल शासन के कमजोर होने का सिलसिला शुरू हो गया।

उसके बाद आए अंग्रेज शासकों ने भारतीय जाति व्यवस्था का सघन अध्ययन किया। उस समय के गजेटियर इन अध्ययनों से भरे पड़े हैं। जाति व्यवस्था की जितनी विस्तृत लिस्ट आपको अंग्रेजों के लेखन में मिलेगी, उसकी बराबरी समकालीन हिंदू और हिंदुस्तानी लेखन में भी शायद ही कहीं है। एक लिस्ट देखिए जो संयुक्त प्रांत की जातियों का ब्यौरा देती है। लेकिन अंग्रेजों ने भी आम तौर पर भारतीय परंपराओं खासकर वर्ण व्यवस्था को कम ही छेड़ा।

मैकाले उन चंद अंग्रेज अफसरों में थे, जिन्होंने जाति व्यवस्था और उससे जुड़े भेदभाव पर हमला बोला। समान अपराध के लिए सभी जातियों के लोग समान दंड के भागी बनें, इसके लिए नियम बनाना एक युगांतकारी बात थी। पहले लॉ कमीशन की अध्यक्षता करते हुए मैकाल जो इंडियन पीनल कोड बनाया, उसमें पहली बार ये बात तय हुई कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं और अलग अलग जातियों को एक ही अपराध के लिए अलग अलग दंड नहीं दिया जाएगा। शिक्षा को सभी जाति समूहों के लिए खोलकर और शिक्षा को संस्कृत और फारसी जैसी आभिजात्य भाषाओं के चंगुल में मुक्त करने की पहल कर मैकाले ने भारतीय जाति व्यवस्था पर दूसरा हमला किया।

गुरुकुलों से शिक्षा को बाहर लाने की जो प्रक्रिया मैकाले के समय में तेज हुई, उससे शिक्षा के डेमोक्रेटाइजेशन का सिलसिला शुरू हुआ। अगर आज देश में 50 लाख से ज्यादा (ये संख्या बार बार कोट की जाती है, लेकिन इसके स्रोत को लेकर मैं आश्वस्त नहीं हो, वैसे संख्य़ा को लेकर मुझे संदेह भी नहीं है) दलित मिडिल क्लास परिवार हैं, तो इसकी वजह यही है कि दलितों को भी शिक्षा का अवसर मिला और आंबेडकर की मुहिम और पूना पैक्ट की वजह से देश में आरक्षण की व्यवस्था हुई।

ये शायद सच है कि मैकाले इन्हीं वजहों से आजादी के बाद देश की सत्ता पर काबिज हुई मुख्यधारा की नजरों में एक अपराधी थे। भारतीय संस्कृति पर हमला करने के अपराधी। देश को गुलाम बनाने वालों से भी बड़े अपराधी। हम विदेशी हमलावरों को बर्दाश्त कर लेते हैं, लेकिन हमारी जीवन पद्धति खासकर वर्णव्यवस्था से छेड़छाड़ करने वाला हमारे नफरत की आग में जलेगा।

वीपी सिंह की मिसाल लीजिए। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ किया। उत्तर प्रदेश में डकैत उन्मूलन के नाम पर पिछड़ों पर जुल्म ढाए, राजीव गांधी की क्लीन इमेज को तार तार कर दिया, बोफोर्स में रिश्वतखोरी का पर्दाफाश किया, लेकिन मुख्यधारा उन्हें इस बात के लिए माफ नहीं करेगी कि उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की कोशिश की। हालांकि वीपी सिंह ने ये कदम राजनीतिक मजबूरी की वजह से उठाया था और वो पिछड़ों के हितैषी कभी नहीं रहे फिर भी वीपी सिंह सवर्ण मानस में एक विलेन हैं और पूरी गंगा के पानी से वीपी सिंह को धो दें तो भी उनका ये ‘पाप’ नहीं धुल सकता। ये चर्चा फिर कभी।

जाहिर है मैकाले को लेकर दो एक्सट्रीम चिंतन हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या इसके लिए मैकाले की पूजा होनी चाहिए या उनकी तस्वीर को गोली मार देनी चाहिए। इस अतिवाद को छोड़कर देखें तो मैकाले के समय का द्वंद्व नए और पुराने के बीच, प्राच्य और पाश्चात्य के बीच का था। मैकाले उस द्वंद्व में नए के साथ थे, पाश्चत्य के साथ थे। अंग्रेजी शिक्षा के लिए उनके दिए गए तर्क उनके समग्र चिंतन से अलग नहीं है। इसलिए ये मानने का कोई आधार नहीं है कि मैकाले ने साजिश करके भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव डाली। उनका मिनिट ऑन एजुकेशन (1835) पढ़ जाए। भारत के प्रति मैकाले में न प्रेम है न घृणा। एक शासक का मैनेजेरियल दिमाग है, जो अपनी मान्यताओं के हिसाब से शासन करने के अपने तरीके को जस्टिफाई कर रहा है।

मैकाले की इस बात के लिए प्रशंसा करना विवाद का विषय है कि उनकी वजह से देश में अंग्रेजी शिक्षा आई और भारत आज आईटी सेक्टर की महाशक्ति इसी वजह से बना हुआ है और इसी ज्ञान की वजह से देश में बीपीओ इंडस्ट्री फल फूल रही है। चीन में मैकाले जैसा कई नहीं गया। चीन के लोगों ने अंग्रेजी को अपनाने में काफी देरी की, फिर भी चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है। लेकिन चीन का आर्थिक और सामाजिक परवेश हमसे अलग है और ये तुलना असमान स्थितियों के बीच की जा रही है और भाषा का आर्थिक विकास में योगदान निर्णायक भी नहीं माना जा सकता। – दिलीप मंडल

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इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौडा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 21, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन

पिछ्ले दिनो मैने त्रिलोचन जी से सम्बन्धित एक संस्मरण लिखा था. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भाई अनूप शुक्ल यानी फुरसतिया महराज ने और भाई दिलीप मंडल ने आदेश दिया था कि इस विधा के बारे मे मै विस्तार से बताऊँ और अपने कुछ सानेट भी पढवाऊ. मेरे सानेट के मामले मे तो अभी आपको पहले से इयत्ता पर पोस्टेड सानेटो से ही काम चलाना पडेगा, सानेट का संक्षिप्त इतिहास मै आज ही पोस्ट कर रहा हूँ. हाँ, कविता को मै चूँकि छन्दो और रूपो के आधार पर बांटने के पक्ष मे नही हूँ, क्योंकि मै मानता हूँ कि काव्यरूपो के इस झगडे से कविता का कथ्य पीछे छूट जाता है; इसलिए मेरे सॉनेट कविता वाले खांचे मे ही दर्ज है.

वैसे यह लेख आज ही दैनिक जागरण के साहित्य परिशिष्ट पुनर्नवा मे प्रकाशित हुआ है और वही लेख दैनिक जागरण के ही मार्फत याहू इंडिया ने भी लिया है. भाई मान्धाता जी ने भी यह लेख अपने ब्लाग पर याहू के हवाले से लिया है. निश्चित रूप से भाई अनूप जी इसे पढ भी चुके होंगे, पर अन्य साथी भी इस विधा के इतिहास-भूगोल से सुपरिचित हो सके इस इरादे से मै यह लेख यहाँ दे रहा हूँ.

पहली ही मुलाकात में त्रिलोचन शास्त्री से जैसी आत्मीयता हुई, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता. कवि त्रिलोचन को तो मैं बहुत पहले से जानता था और उनकी रचनाधर्मिता का मैं कायल भी था, लेकिन व्यक्ति त्रिलोचन से मेरी मुलाकात 1991 में हुई. उनकी सहजता और विद्वत्ता ने मुझे जिस तरह प्रभावित किया, उसने उनके कवि के प्रति मेरे मन में सम्मान और बढ़ा दिया. ऐसे रचनाकार अब कहां दिखते है, जो लेखन और व्यवहार दोनों में एक जैसे ही हों! पर त्रिलोचन में यह बात थी और व्यक्तित्व की यह सहजता ही उनके रचनाकार को और बड़ा बनाती है. अंग्रेजी का मुहावरा ‘लार्जर दैन लाइफ’ बिलकुल सकारात्मक अर्थ में उन पर लागू होता है.
अंग्रेजी का और नकारात्मक अर्थो में इस्तेमाल किए जाने के बावजूद इस मुहावरे का सकारात्मक प्रयोग करते हुए संकोच मुझे दो कारणों से नहीं हो रहा है. पहला तो यह हिंदी के प्रति पूरी तरह समर्पित होते हुए भी त्रिलोचन को अंग्रेजी से कोई गुरेज नहीं था. अंग्रेजी का छंद सॉनेट हिंदी में त्रिलोचन का पर्याय बन गया, इससे बड़ा प्रमाण इसके लिए और क्या चाहिए? दूसरा यह कि शब्दों के साथ खेलना मैंने त्रिलोचन से ही सीखा. वह कैसे किसी शब्द को उसके रूढ़ अर्थ के तंग दायरे से निकाल कर एकदम नए अर्थ में सामने प्रस्तुत कर दें, इसका अंदाजा कोई लगा नहीं सकता था. भाषा और भाव पर उनका जैसा अधिकार था उसकी वजह उनकी सहजता और अपनी सोच के प्रति निष्ठा ही थी.
अपने छोटों के प्रति सहज स्नेह का जो निर्झर उनके व्यक्तित्व से निरंतर झरता था, वह किसी को भी भिगो देने के लिए काफी था. लेकिन मेरी और उनकी आत्मीयता का एक और कारण था. वह था सॉनेट. वैसे हिंदी में सॉनेट छंद का प्रयोग करने वाले त्रिलोचन कोई अकेले कवि नहीं है. उनके पहले जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महाप्राण निराला भी इस छंद का प्रयोग कर चुके थे. उनके बाद जयप्रकाश बागी ने इसका प्रयोग किया. हो सकता है कि इसका प्रयोग कुछ और कवियों ने भी किया हो, पर इटैलियन मूल के इस छंद को आज हिंदी में सिर्फ त्रिलोचन के नाते ही जाना जाता है. ऐसे ही जैसे इटली में बारहवीं शताब्दी में शुरू हुए इस छंद को चौदहवीं सदी के कवि पेट्रार्क के नाते जाना जाता है.
ऐसा शायद इसलिए है कि पेट्रार्क की तरह त्रिलोचन भी ताउम्र सफर में रहे। वैसे ही जैसे यह छंद इटैलियन से अंग्रेजी, अंग्रेजी से हिंदी और फिर रूसी, जर्मन, डच, कैनेडियन, ब्राजीलियन, फ्रेंच, पोलिश, पुर्तगी़ज, स्पैनिश, स्वीडिश .. और जाने कितनी ही भाषाओं के रथ की सवारी करता दुनिया भर के सफर में है. चौदह पंक्तियों के इस छंद से त्रिलोचन का बहुत गहरा लगाव था और यह अकारण नहीं था. कारण उन्होंने मुझे पहली ही मुलाकात में बताया था, ‘देखिए, यह छंद जल्दी सधता नहीं है, लेकिन जब सध जाता है तो बहता है और बहा ले जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आप जो कहना चाहते है, वही कहते है और पढ़ने या सुनने वाला ठीक-ठीक वही समझता भी है.’ मतलब यह कि दो अर्थो के चमत्कार पैदा करने के कायल अलंकारप्रेमी कवियों के लिए यह छंद मुफीद नहीं है. ठीक-ठीक वही अर्थ कोई कैसे ग्रहण करता है? इस सवाल पर शास्त्री जी का जवाब था, ‘हिंदी में बहुत लोगों को भ्रम है कि शब्दों के पंक्चुएशन से अर्थ केवल अंग्रेजी में बदलता है. हिंदी में क्रिया-संज्ञा को इधर-उधर कर देने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. वास्तव में ऐसा है नहीं. हिंदी में तो केवल बलाघात से, बोलने के टोन से ही वाक्यों के अर्थ बदल जाते है. फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि यहां शब्दों के पंक्चुएशन से अर्थ न बदले?’
त्रिलोचन की कोशिश यह थी कि वह जो कहे वही समझा जाए. यही वजह है जो-
इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा
सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला
यह उसने भी अजब तमाशा. मन की माला
गले डाल ली. इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा
अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
ऐसे आयें जैसे किला आगरा में जो
नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को.
गेय रहे एकान्वित हो. ..

और इसे आप नॉर्सिसिज्म नहीं कह सकते है। वह इस विधा में अपने अवदान को लेकर किसी खुशफहमी में नहीं है। साफ कहते है-
….उसने तो झूठे
ठाट-बाट बांधे है. चीज किराए की है.

फिर चीज है किसकी, यह जानने कहीं और नहीं जाना है.
अगली ही पंक्ति में वह अपने पूर्ववर्तियों को पूरे सम्मान के साथ याद करते है-
स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
वर्डस्वर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वरधारा है. उसने नई चीज क्या दी है!

ऐसा भी नहीं है कि वह आत्मश्लाघा से मुक्त है तो आत्मबोध से भी मुक्त हों। अपने रचनात्मक अवदान के प्रति भी वह पूरी तरह सजग है और यह बात वह पूरी विनम्रता से कहते भी हैं-
सॉनेट से मजाक भी उसने खूब किया है,
जहां तहां कुछ रंग व्यंग का छिड़क दिया है.

कविता की भाषा के साथ भी जो प्रयोग उन्होंने किया, वह बहुत सचेत ढंग से किया है. गद्य के व्याकरण में उन्होंने कविता लिखी, जिसमें लय उत्पन्न करना छंदमुक्त नई कविता लिखने वालों के लिए भी बहुत मुश्किल है. लेकिन त्रिलोचन छंद और व्याकरण के अनुशासन में भी लय का जो प्रवाह देते है, वह दुर्लभ है. शायद यह वही ‘अर्थ की लय’ है जिसके लिए अज्ञेय जी आह्वान किया करते थे.
यह अलग बात है कि आज हम उन्हे एक छंद सॉनेट के लिए याद कर रहे है, पर कविता उनके लिए छंद-अलंकार का चमत्कार पैदा करने वाली मशीन नहीं है. कविता उनके लिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम है. ठीक-ठीक वही बात जो वह सोचते है. वह अपने समय और समाज के प्रति पूरे सचेत है-
देख रहा हूं व्यक्ति, समाज, राष्ट्र की घातें
एक दूसरे पर कठोरता, थोथी बातें
संधि शांति की..

वह यह भी जानते है जो संघर्ष वह कर रहे है वह उनकी पीढ़ी में पूरा होने वाला नहीं है.इसमें कई पीढि़यां खपेंगी, फिर उनके सपनों का समाज बन पाएगा.कहते है-
धर्म विनिर्मित अंधकार से लड़ते लड़ते
आगामी मनुष्य; तुम तक मेरे स्वर बढ़ते.

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हमारी गालियों में मैकाले है, क्लाइव नहीं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 21, 2007

लेकिन सवाल ये है कि आज क्लाइव और मैकाले की बात ही क्यों करें? सही सवाल है। समय का पहिया इतना आगे बढ़ गया है। ऐसे में इतिहास के खजाने से या कूड़ेदान से कुछ निकालकर लाने का औचित्य क्या है? चलिए इसका जवाब भी मिलकर ढूंढेंगे, अभी जानते हैं इतिहास के इन दो पात्रों के बारे में। आप ये सब वैसे भी पढ़ ही चुके होंगे। स्कूल में नहीं तो कॉलेज में।


कौन था क्लाइव

क्लाइव न होता तो क्या भारत में कभी अंग्रेजी राज होता? इतिहास का चक्र पीछे लौटकर तो नहीं जाता इसलिए इस सवाल का कोई जवाब नहीं हो सकता। लेकिन इतिहास हमें ये जरूर बताता है कि क्लाइव के लगभग एक हजार यूरोपीय और दो हजार हिंदुस्तानी सिपाहयों ने पलासी की निर्णायक लड़ाई (22 जून, 1757) में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हरा कर भारत में अंग्रेजी राज की नींव रखी थी। वो लड़ाई भी क्या थी? सेनानायक मीरजाफर ने इस बात का बंदोबस्त कर दिया था कि नवाब की ज्यादातर फौज लड़ाई के मैदान से दूर ही रहे। एक दिन भी नहीं लगे थे उस युद्ध में। उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भारतीय संपदा की लूट का जो सिलसिला शुरू किया, उसकी बराबरी दक्षिण अमेरिका में स्पेन के युद्ध सरदारों की मचाई लूट से ही की जा सकती है।

और कौन था मैकाले

मैकाले को भारतीय इतिहास का हर छात्र एक ऐसे शख्स के रूप में जानता है जिसने देश को तो नहीं लेकिन भारतीय मानस को जरूर गुलाम बनाया। हमारी सामूहिक स्मृति में इसका असर इस रूप में है कि हम जिसे विदेशी मिजाज का, देश की परंपरा से प्रेम न करने वाला, विदेशी संस्कृति से ओतप्रोत मानते हैं उसे मैकाले पुत्र, मैकाले की औलाद, मैकाले का मानस पुत्र, मैकाले की संतान आदि कहकर गाली देते हैं।

लेकिन भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक क्लाइव को लेकर हमारे यहां घृणा का ऐसा भाव आश्चर्यजनक रूप से नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है। मैकाले जब भारत आया तो भारत में अंग्रेजी राज जड़ें जमा चुका था। मैकाले को इस बात के लिए भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है कि उसने क्लाइव की तरह तलवार और बंदूक के बल पर एक देश को गुलाम बनाया। या कि उसने छल से बंगाल के नवाब को हरा दिया। मैकाले अपने हाथ में तलवार नहीं कलम लेकर भारत आया था।

लेकिन मैकाले फिर भी बड़ा विलेन है।

मैकाले हमारी सामूहिक स्मृति में घृणा का पात्र है तो ये अकारण नहीं है। मैकाले के कुछ चर्चित उद्धरणों को देखें। उसका दंभ तो देखिए

“मुझे एक भी प्राच्यविद (ओरिएंटलिस्ट) ऐसा नहीं मिला जिसे इस बात से इनकार हो कि किसी अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की किताबों का एक रैक पूरे भारत और अरब के समग्र साहित्य के बराबर न हो।”

और उनके इस कथन को कौन भूल सकता है। प्रोफेसर बिपिन चंद्रा की एनसीईआरटी की इतिहास की किताब में देखिए।

” फिलहाल हमें भारत में एक ऐसा वर्ग बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो हमारे और हम जिन लाखों लोगों पर राज कर रहे हैं, उनके बीच इंटरप्रेटर यानी दुभाषिए का काम करे। लोगों का एक ऐसा वर्ग जो खून और रंग के लिहाज से भारतीय हो, लेकिन जो अभिरूचि में, विचार में, मान्यताओं में और विद्या-बुद्धि में अंग्रेज हो।”

इतिहासकार सुमित सरकार मैकाले को कोट करते हैं-

“अंग्रेजी में शिक्षित एक पढ़ा लिखा वर्ग, रंग में भूरा लेकिन सोचने समझने और अभिरुचियों में अंग्रेज।”

भारतीय इतिहास की किताबों में मैकाले इसी रूप में आते हैं। पांचजन्य के एक लेख में मैकाले इस शक्ल में आते हैं-

लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर गुलाम नहीं बनाया जाएगा, भारतवर्ष को हमेशा के लिए या पूरी तरह, गुलाम बनाना संभव नहीं होगा। लार्ड मैकाले की सोच थी कि हिंदुस्तानियों को अँग्रेज़ी भाषा के माध्यम से ही सही और व्यापक अर्थों में गुलाम बनाया जा सकता है। अंग्रेज़ी जानने वालों को नौकरी में प्रोत्साहन देने की लार्ड मैकाले की पहल के परिणामस्वरूप काँग्रेसियों के बीच में अंग्रेज़ी परस्त काँग्रेसी नेता पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एकजुट हो गए कि अंग्रेज़ी को शासन की भाषा से हटाना नहीं है अन्यथा वर्चस्व जाता रहेगा और देश को अंग्रेज़ी की ही शैली में शासित करने की योजनाएँ भी सफल नहीं हो पाएँगी।…भाषा के सवाल को लेकर लार्ड मैकाले भी स्वप्नदर्शी थे, लेकिन उद्देश्य था, अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से गुलाम बनाना।

तो ऐसे मैकाले से भारत नफरत न करे तो क्या करे? लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, दोस्त।

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क्लाइव या मैकाले – किसे पहले जूते मारेंगे आप?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 20, 2007

डिसक्लेमर: इस चर्चा में अगर कोई विचार मेरा है, तो उसका अलग से जिक्र किया जाएगा। – दिलीप मंडल

इन दो तस्वीरों को देखिएइनमें ऊपर वाले हैं लार्ड क्वाइव और नीचे हैं लॉर्ड मैकाले। लॉर्ड वो ब्रिटेन में होंगे हम उन्हें आगे क्लाइव और मैकाले कहेंगेएक सवाल पूछिए अपने आप सेकभी आपको अगरह कहा जाए कि इनमें से किसी एक तस्वीर को जूते मारो, या पत्थर मारो या गोली मारो या नफरत भरी नजरों से देखोतो आपकी पहली च्वाइस क्या होगी

अनुरोध इतना है कि इस सवाल को देखकर किसी नए संदर्भ की तलाश में नेट पर या किताबों के बीच चले जाइएगाअपनी स्मृति पर भरोसा करें, जो स्कूलों से लेकर कॉलेज और अखबारों से लेकर पत्रिकाओं में पढ़ा है उसे याद करेंऔर जवाब देंये सवाल आपको एक ऐसी यात्रा की ओर ले जाएगा, जिसकी चर्चा कम हुई हैजो इन विषयों के शोधार्थी, जानने वाले हैं, उनके लिए मुमकिन है कि ये चर्चा निरर्थक होलेकिन इस विषय पर मैं अभी जगा हूं, इसलिए मेरा सबेरा तो अभी ही हुआ हैइस पर चर्चा आगे जारी रहेगी

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…कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 18, 2007

इष्ट देव सांकृत्यायन

तारीख 9 दिसम्बर 2007
दिन रविवार होने और अरसे बाद रविवार को रविवारी फुर्सत मिलने के कारण में पूरी तफरीह के मूड में था. करीब शाम को आए विनय और देर तक लुक्कड़ई होती रही. बाद में हम उनके ही घर चले गए और वहीं टीवी आन किया. रात साढ़े नौ बजे. मैंने टीवी खोला तो था डीडी भारती का कार्यक्रम ‘सृजन’ देखने के लिए, पर पहले सामने कोई न्यूज चैनल आ गया. इसके पहले की चैनल सरकाता, नीचे चल रहे एक प्रोमो पर ध्यान गया- “हिन्दी के वरिष्ठ कवि त्रिलोचन का निधन”। सहसा विश्वास नहीं हुआ. इसके बावजूद कि त्रिलोचन इधर काफी समय से बीमार पड़े थे मन ने कहा कि यह शायद किसी और त्रिलोचन की बात है. हालांकि वह किसी और त्रिलोचन की बात नहीं थी. यह तय हो गया ख़बरों के हर चैनल पर यही खबरपट्टी चलते देख कर.
यह अलग बात है कि शास्त्री जी के बारे में इससे ज्यादा खबर किसी चैनल पर नहीं थी, पर उस दिन में लगातार इसी सर्च के फेर में फिर ‘सृजन’ नहीं देख सका। इस प्रलय के बाद फिर सृजन भला क्या देखते! हिन्दी में आचार्य कोटि के वह अन्तिम कवि थे। एक ऐसे कवि जिसमें आचय्त्व कूट-कूट कर भरा था, पर उसका बोध उन्हें छू तक नहीं सका था. बडे रचनाकारों से क्षमा चाहता हूँ, पर अपने समय में में उन्हें हिन्दी का सबसे बडा रचनाकार मानता हूँ. सिर्फ इसलिए नहीं कि उनकी रचनाएं बहुत उम्दा हैं, बल्कि इसलिए कि अपने निजी स्वभाव में भी वह बहुत बडे ‘मनुष्य’ थे. गालिब ने जो कहा है, ‘हर आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना’, संयोग से यह त्रिलोचन को मयस्सर था. त्रिलोचन वह वटवृक्ष नहीं थे जिसके नीचे दूब भी नहीं बढ़ पाती. वह ऐसे पीपल थे जिसके नीचे दूब और भडभाड़ से लेकर हाथी तक को छाया मिलती है और सबका सहज विकास भी होता है. त्रिलोचन की सहजता उतनी ही सच्ची थी जितना कि उनका होना. वह साहित्य के दंतहीन शावकों से भी बडे प्यार और सम्मान से मिलते थे और उनके इस मिलने में गिरोह्बंदी की शिकारवृत्ति नहीं होती थी.
पहली बार उनसे मेरी मुलाकात सन 1991 में हुई थी। तब में पहली ही बार दिल्ली आया था। उसी बीच श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार समारोह का आयोजन था. पुरस्कार उस साल उदय प्रकाश को दिया जाना था ‘तिरिछ’ कहानी संग्रह के लिए. उसी समारोह में शिरकत के लिए त्रिलोचन जी को ले आना था. डा. अरविंद त्रिपाठी पुरस्कार समिति के सचिव थे. उनके साथ ही में भी गया था. डा. अरविंद ने ही त्रिलोचन जी से मेरा परिचय कराया. यह जान कर कि में भी सानेट लिखता हूँ उन्होने कहा कि तब तो आप पहले अपने सानेट सुनाइए. खैर गीत-सानेट सुनते-सुनाते चाय-पानी पीकर हम लोग उनके घर से चले. करीब डेढ़ घंटे के उस सफर में वह दूसरे बडे रचनाकारों की तरह गंभीरता की चादर ओढे अलगथलग होकर चुप नहीं बैठ गए -. पूरे रास्ते बातचीत होती रही. वह सबकी सुनते और अपनी कहते रहे. सबसे अच्छी बात यह रही कि पूरे रास्ते साहित्य जगत की राजनीति की कोई बात नहीं हुई. बातें शब्दों पर हीन, हिन्दी और विश्व साहित्य पर हुईं, कविता की प्रवृत्ति और प्रयोगों पर हुईं … और जाने किन-किन मुद्दों पर हुईं.
इसी बातचीत में मुहे पहली बार मालूम हुआ कि ‘विकृति’ शब्द का अर्थ ‘खराबी’ या ‘गंदगी’ जैसा कुछ नहीं होता। यह अर्थ उसमें शब्द के लाक्षणिक प्रयोग के नाते जुड़ गया है और रूढ़ हो जाने के कारण बहुधा मान्य हो गया है. इस शब्द का मूल अर्थ तो ‘विशिष्ट कृति’ है. लाक्षणिक प्रयोगों के ही चलते ऐसे ही जाने और कितने शब्दों के अर्थ रूढ़ होकर नष्ट हो गए हैं. ऐसे ही और बीसियों शब्दों के अर्थ उन्होने हमें बताए. इसी बातचीत में उपसर्ग-प्रत्यय से तोड़ कर शब्दों के मूल रूप और अर्थ ढूँढने की कला मैंने सीख ली, जो अब तक मेरे काम आ रही है.
अब तक में शास्त्री जी को केवल एक कवि के रूप में जानता था। लेकिन इसी बातचीत में मैंने जाना की वही त्रिलोचन जो कहते हैं –
चाय की प्यालियाँ कभी मत दो
हर्ष की तालियाँ कभी मत दो
चाह की राह से आए अगर
दर्द को गालियाँ कभी मत दो

बडे भाषाविद भी हैं. उन्होने कई कोशों का सम्पादन भी किया है. शब्दों की छिर्फाद करने की उनकी कला मुझे ही नहीं बडे-बडों को भी वाकई हैरत में डाल देती थी.
बहरहाल हम आयोजन स्थल पहुंचे और उस गहमागहमी में वह अविस्मरनीय सफर इतिहास का हिस्सा बन गया। शास्त्री जी मंचस्थ हो गए और में श्रोताओं की भीड़ में गुम. लेकिन आयोजन के बाद उन्होने मुझे खुद बुलाया और फिर टैक्सी आने तक करीब दस मिनट हमारी बातें हुईं. उन्होने फिर मिलने के लिए भी कहा और चलते-चलते यह भी कहा, ‘आपकी कविताओं में जो ताप है वह आज के रचनाकारों में दुर्लभ है. इसे बनाए रखिए. एक बात और… रस, छंद, अलंकार कविता के लिए जरूरी हैं, लेकिन अगर इन्हें जिद बनाइएगा तो ये विकास में बाधक बनेंगे.’
यह मेरे लिए एक और सूत्र था। भाषा और भाव के प्रति इस खुलेपन का साफ असर त्रिलोचन की कविताओं पर ही नहीं, उनके व्यक्तित्व पर भी भरपूर था. एक तरफ तो वह कहते हैं – तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं
चार दिन के लिए ही आया था
कंठ खुलते ही गान गाया था
लोग नाम कीट्स का लेते हैं
कैसे बन कर सुगंध छाया था

मात्र 26 वर्ष की उम्र में काल कवलित हो गए अंग्रेजी के विद्रोही कवि जान कीट्स की रचनाधर्मिता के वह कायल थे। यह बात मैंने उनसे बाद की मुलाकातों में जानी। दिल्ली के उस एक माह के प्रवास के दौरान शास्त्री जी से मेरी कई मुलाकातें हुईं। उन मुलाकातों में मैंने केवल उनके व्यक्तित्व के बड़प्पन को ही महसूस नहीं किया; हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत कई भाषाओं के हजारों शब्दों के नए-नए अर्थ भी जाने और यह भी जाना कि सुबरन को यह कवी किस बेताबी और शिद्दत के साथ ढूँढता फिरता रहा है.
बाद में में वापस गोरखपुर आ गया. फिर उनसे सम्पर्क बनाए नहीं रख सका. लम्बे अरसे बाद एक और मौका आया. वह विश्वविद्यालय के एक आयोजन में गोरखपुर आए हुए थे. मालूम हुआ तो में इंटरव्यू करने पहुंचा. मुझे उम्मीद नहीं थी कि अब उनको मेरा नाम याद होगा, पर मिलने के बाद यह मेरा भ्रम साबित हुआ. विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस पहुंच कर मैंने सन्देश भेजा और उनसे मिलने की अनुमति चाही तो उन्होने तुरंत बुलाया. मिलते ही बोले, ‘अरे तुम्हारे शरीर पर अब तक मांस नहीं चढ़ा!’ उनके साथ ही बैठे केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और उदय भान मिश्र हंस पड़े और में अवाक था. साहित्य संसार पर इंटरव्यू तो हुआ, लेकिन इस बीच मैंने एक बात यह भी गौर की कि उनका मन कुछ बुझा-बुझा सा है.
…..चलना तो देखो इसका –
उठा हुआ सिर, चौडी छाती, लम्बी बाँहें,
सधे कदम, तेजी, वे टेढी-मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं ….

न ये वही त्रिलोचन नहीं थे. कारण पूछने पर शास्त्री जी तो नहीं बोले, पर केदार जी ने संकेत दिया, ‘असल में गाँव में इनके हिस्से की जो थोड़ी-बहुत जमीन थी, उसकी बंदर्बांत हो चुकी है.’ में समझ सकता था कि अपने हक़ से निराला की तरह ‘बाहर कर दिया गया’ यह रचनाधर्मी सांसारिक विफलता से नहीं, बल्कि इसके मूल में व्याप्त छल और व्यवस्था के भ्रष्टाचार से ज्यादा आहत है. शायद ऎसी ही वजहों से उन्होने कहा होगा –
अमर जब हम नहीं हैं तो हमारा प्यार क्या होगा?
लेकिन इसकी अगली ही पंक्ति
सुमन का सुगंच से बढ़कर भला उपहार क्या होगा
यह स्पष्ट कर देती है कि नश्वरता के इस बोध के बावजूद प्यार के प्रति उनके भीतर एक अलग ही तरह की आश्वस्ति है. आखिर हिन्दी के शीर्षस्थ रचनाकारों में प्रतिष्ठित होने के बाद भी अपनी मातृभाषा अवधी में ‘अमोला’ जैसा प्रबंधकाव्य उन्होने ऐसे ही थोडे दिया होगा. शायद यही वजह है जो नश्वरता का उनका बोध बाद में और गहरा होता गया-
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सच्चाई है

नश्वरता के इस बोध के बावजूद उन्हें यह बोध भी है कि अभी अपनी पारी वह पूरी खेल नहीं पाए हैं. अभी ऐसे बहुत सारे काम बचे हैं जो उन्हें ही करने हैं. तभी तो वह कहते हैं –
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह संभल के आई है

और इसीलिए मुझे अब भी यह विश्वास नहीं हो रहा है कि शास्त्री जी नहीं रहे. आखिर सिर्फ उनसे ही हो सकने वाले बहुत सारे काम जो अभी बाक़ी पड़े हैं, उन्हें कौन पूरा करेगा?

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याद तुम्हारी आई है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 15, 2007

नजरें जाती दूर तलक हैं
पर दिखती तनहाई है
क्या तुम रोते हो रातों में

सीली सी पुरवाई है
रातों में आते थे अक्सर
ख्वाब सुहाने तू हंस दे
बेरौनक मुस्कान हुई है
रोती सी शहनाई है
हम तेरी यादों के सहारे
जीते थे खुश होते थे
अब उजडा लगता है चमन क्यों
फीकी सी रौनाई है
गम के सफर में साथ दिया है

साया मेरा कदम-कदम
जानें क्या अब बात हुई है
धुंधली सी परछाई है
हमें खबर थी के तुम खुश हो
अपनी किस्मत लेकर संग
मुद्दत बाद अचानक कैसे
याद तुम्हारी आई है

रतन

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हिंदी के दस हजार ब्लॉग, कई लाख पाठक

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 13, 2007

नए साल में ब्लॉगकारिता का एजेंडा

स्वागत कीजिए 2008 का। हिंदी ब्लॉग नाम के अभी अभी जन्मे शिशु के लिए कैसा होगा आने वाला साल। हम अपनी आकांक्षाएं यहां रख रहें हैं। आकांक्षाएं और उम्मीदें आपकी भी होंगी। तो लिख डालिए उन्हें। अगले साल इन्हीं दिनों में हिट और मिस का लेखाजोखा कर लेंगे। – दिलीप मंडल

हिंदी ब्लॉग्स की संख्या कम से कम 10,000 हो

अभी ये लक्ष्य मुश्किल दिख सकता है। लेकिन टेक्नॉलॉजी जब आसान होती है तो उसे अपनाने वाले दिन दोगुना रात चौगुना बढ़ते हैं। मोबाइल फोन को देखिए। एफएम को देखिए। हिंदी ब्लॉगिंग फोंट की तकनीकी दिक्कतों से आजाद हो चुकी है। लेकिन इसकी खबर अभी दुनिया को नहीं हुई है। उसके बाद ब्लॉगिंग के क्षेत्र में एक बाढ़ आने वाली है।

हिंदी ब्लॉग के पाठकों की संख्या लाखों में हो

जब तक ब्लॉग के लेखक ही ब्लॉग के पाठक बने रहेंगे, तब तक ये माध्यम विकसित नहीं हो पाएगा। इसलिए जरूरत इस बात की है कि ब्लॉग उपयोगी हों, सनसनीखेज हों, रोचक हों, थॉट प्रोवोकिंग हों। इसका सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन इंग्लिश और दूसरी कई भाषाओं के स्तर तक पहुंचने के लए हमें काफी लंबा सफर तय करना है। समय कम है, इसलिए तेज चलना होगा।

विषय और मुद्दा आधारित ब्लॉगकारिता पैर जमाए

ब्लॉग तक पहुंचने के लिए एग्रीगेटर का रास्ता शुरुआती कदम के तौर पर जरूरी है। लेकिन विकास के दूसरे चरण में हर ब्लॉग को अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता बनानी होगी। यानी ऐसे पाठक बनाने होंगे, जो खास तरह के माल के लिए खास ब्लॉग तक पहुंचे। शास्त्री जे सी फिलिप इस बारे में लगातार काम की बातें बता रहे हैं। उन्हें गौर से पढ़ने की जरूरत है।

ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो

सहमति आम तौर पर एक अश्लील शब्द है। इसका ब्लॉग में जितना निषेध हो सके उतना बेहतर। चापलूसी हिंदी साहित्य के खून में समाई हुई है। ब्लॉग को इससे बचना ही होगा। वरना 500 प्रिंट ऑर्डर जैसे दुश्चक्र में हम फंस जाएंगे। तुम मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हो, बदले में मैं तुम्हारे ब्लॉग पर टिप्पणी करता हूं – इस टाइप का भांडपना और चारणपंथी बंद होनी चाहिए। साल में कुछ सौ टिप्पणियों से किसी ब्लॉग का कोई भला नहीं होना है, ये बात कुछ मूढ़मगज लोगों को समझ में नहीं आती। आप मतलब का लिखिए या मतलब का माल परोसिए। बाकी ईश्वर, यानी पाठकों पर छोड़ दीजिए। ब्लॉग टिप्पणियों में साधुवाद युग का अंत हो।

ब्लॉग के लोकतंत्र में माफिया राज की आशंका का अंत हो

लोकतांत्रिक होना ब्लॉग का स्वभाव है और उसकी ताकत भी। कुछ ब्लॉगर्स के गिरोह इसे अपनी मर्जी से चलाने की कोशिश करेंगे तो ये अपनी ऊर्जा खो देगा। वैसे तो ये मुमकिन भी नहीं है। कल को एक स्कूल का बच्चा भी अपने ब्लॉग पर सबसे अच्छा माल बेचकर पुराने बरगदों को उखाड़ सकता है। ब्लॉग में गैंग न बनें और गैंगवार न हो, ये स्वस्थ ब्लॉगकारिता के लिए जरूरी है।

ब्लॉगर्स मीट का सिलसिला बंद हो

ये निहायत लिसलिसी सी बात है। शहरी जीवन में अकेलेपन और अपने निरर्थक होने के एहसास को तोड़ने के दूसरे तरीके निकाले जाएं। ब्लॉग एक वर्चुअल मीडियम है। इसमें रियल के घालमेल से कैसे घपले हो रहे हैं, वो हम देख रहे हैं। समान रुचि वाले ब्लॉगर्स नेट से बाहर रियल दुनिया में एक दूसरे के संपर्क में रहें तो किसी को एतराज क्यों होना चाहिए। लेकिन ब्लॉगर्स होना अपने आप में सहमति या समानता का कोई बिंदु नहीं है। ब्लॉगर हैं, इसलिए मिलन करेंगे, ये चलने वाला भी नहीं है। आम तौर पर माइक्रोमाइनॉरिटी असुरक्षा बोध से ऐसे मिलन करती है। ब्लॉगर्स को इसकी जरूरत क्यों होनी चाहिए?

नेट सर्फिंग सस्ती हो और 10,000 रु में मिले लैपटॉप और एलसीडी मॉनिटर की कीमत हो 3000 रु

ये आने वाले साल में हो सकता है। साथ ही मोबाइल के जरिए सर्फिंग का रेट भी गिर सकता है। ऐसा होना देश में इंटरनेट के विकास के लिए जरूरी है। डेस्कटॉप और लैपटॉप के रेट कम होने चाहिए। रुपए की मजबूती का नुकसान हम रोजगार में कमी के रूप में उठा रहे हैं लेकिन रुपए की मजबूती से इंपोर्टेड माल जितना सस्ता होना चाहिए, उतना हुआ नहीं है। अगले साल तक हालात बदलने चाहिए।

नया साल मंगलमय हो, देश को जल्लादों का उल्लासमंच बनाने में जुटे सभी लोगों का नाश हो। हैपी ब्लॉगिंग।

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अपनी राम कहानी है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 13, 2007

रतन
सपनों के बारे में कहना
कुछ कहना बेमानी है
दुनिया के लोगों जैसी ही
अपनी राम कहानी है
सोना चांदी महल इमारत
सब कुछ पल के साथी हैं
सच यह है कुछ और नहीं है
जीवन दाना पानी है
गम और खुशियाँ रात दिवस ये
शाम सुबह और सूरज चाँद
ये वैसे ही आते जाते
जैसे आनी जानी है
अगर मगर लेकिन और किन्तु
ये सब हमको उलझाते
इन पर वश तब तक चलता है
जब तक साथ जवानी है
अपनी राह नहीं है सीधी
चिंता गैरों को लेकर
उनके बारे में कुछ कहना
आदत वही पुरानी है

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बचपन से ही दारू… क्या बात है भाई

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 13, 2007

ये तो पी के टुन्न हो गया। सिगरेट पीने की भी औकात नहीं। बीयर पीता था।

अभी से चुम्मा चाटी शुरु, कहां से सीखा गुरु।

जवानी के जलवे, चलो दाढ़ी बना लेते हैं।

अरे वाह क्या जलवा है कुमार शानू का। बिल्ली से लेकर शेर। सभी म्यूजिक से झूम रहे हैं।

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