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कहाँ जाएंगे

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 5, 2007

रतन

रहे जो अपनों में बेगाने कहां जाएंगे
जहाँ हों बातों से अनजाने कहां जाएंगे
प्यार का नाम ज़माने से मिटा दोगे अगर
तुम ही बतलाओ कि दीवाने कहां जाएंगे
होंगे साकी भी नहीं मय नहीं पयमाने नहीं
न हों मयखाने तो मस्ताने कहां जाएंगे
लिखे जो ख्वाब कि ताबीर सुहाने दिन में
न हों महफिल तो वे अफ़साने कहां जाएंगे
यों तो है जिंदगी जीने का सबब मर जाना
न हों शम्मा तो ये परवाने कहां जाएंगे
है समझ वाले सभी पर हैं नासमझ ये रतन
बात हो ऐसी तो समझाने कहां जायेंगे
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2 Responses to “कहाँ जाएंगे”

  1. एक बात तो है। सरकार चाहे जो आए मैखाने कहीं नहीं जाएंगे। वो तो बढ़ते ही रहेंगे। दीवाने भी वहां जा सकते हैं, गैर दीवाने भी

  2. यकीनन. उन्हें हटना भी नहीं चाहिए.

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