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Archive for January, 2008

मोहल्ले का चार सौ बीसा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 28, 2008

आज एक मजेदार बात. मोहल्ले ने आज अपने चार सौ बीस पोस्ट पूरे कर लिए. वही अविनाश भाई वाले मोहल्ले ने. मैंने अचानक अपना ब्लोग खोला तो वहाँ मोहल्ले के हिस्से में मुझे यह जानकारी मिली. मुझे एक घटना याद आई. उन दिनों में गोरखपुर में ही था और वहाँ दैनिक जागरण का सिटी रिपोर्टर था. एक सुनसान दिन था. ऐसा दिन कि खबरें न के बराबर थीं और पन्ने पूरे करने थे. विज्ञापन भी ज्यादा नहीं थे. मजबूरन में अपने रिपोर्टर बंधुओं से कह रहा था कि भाइयों कुछ करो. सब कुछ करने के बावजूद जब पेज पूरे नहीं हुए तो मैंने एक-एक बंधु से उनकी बीट के हाल लेने शुरू किए. टेलीफोन विभाग उन दिनों देखते थे गिरीश. उन्होने हँसते हुए बताया कि हमारे यहाँ तो आजकल सिर्फ चार सौ बीसी की चर्चा चल रही है. मैंने डिटेल जानना चाह तो उन्होने बताया कि टेलीफोन विभाग इन दिनों एक नंबर को लेकर परेशान है. नंबर है 33420 और यह जिसे दिया जाता है वही दस-बीस दिन में तंग आकर लौटा जाता है. तब इतनी आसानी से फोन नहीं मिलते थे. उस पर लौटा जाना. यह तो गजब की गुस्ताखी है. कारण पूछने पर पता चला कि वह नंबर मिलते ही जाने कहाँ-कहाँ से अनजान फोन आने लगते हैं और सिर्फ इतना कहा जाता है ‘सेल चार सौ बीस’. और फोन रख दिया जाता है. अब भला गाली खाने के लिए कौन फोन लगाए रखना चाहेगा?
खैर उस वक्त मैंने इस पर एक दिलचस्प खबर बनवाई. पर आज भी मुझे यह घटना याद आती है तो हँसी रुकती नहीं. अभी मैंने मोहल्ले पर यह आंकडा देखा तो फिर हँसी आ गई. आखिरकार मैंने मोहल्ले के सभासद अविनाश भाई को एक एस एम् एस भेजा, ‘मोहल्ले में पोस्टों की संख्या बड़ी मजेदार हो गई है अब. ज़रा एक बार नजर डालें.’ खैर फिर फोन पर हमारी बात भी हुई. हँसी भी हुई. लेकिन यहाँ हमारा अभीष्ट लंठई नहीं, अपितु वह काम है जो मोहल्ले ने इन दिनों में किया है.
यूं तो मुझे ब्लोगारगिरी करते ही बहुत दिन नहीं हुए. बमुश्किल आठ महीने. पर मोहल्ले से परिचय शुरुआती दौर में ही हो गया था. उन दिनों मोहल्ला की चर्चा खास तौर से भाषा के भदेसपन के लिए होती थी. यहाँ शिष्टता का चोंचला नहीं था. सीधी बातें थीं. वे कुछ लोगों को अखरती थीं. लेकिन में एक बात देख रहा था कि यहाँ कुछ भी फालतू आत्म प्रशस्ति या आत्मालाप जैसा सिर्फ लिखने के किया गया लेखन नहीं है. इस कारण में अक्सर इस मोहल्ले में आता-जाता रहा. यह देखता रहा कि बहुत सार्थक किस्म की बहसें यहाँ हो रही हैं. यहाँ दिलीप हैं, रवीश हैं, बोधिसत्व हैं, अनिल रघुराज, हर्षवर्धन, ओम थानवी, संजय तिवारी, मनीषा, अशोक, नसीरुद्दीन और इरफान हैं और ऐसे कई और लोग हैं जिनसे निरर्थक बातों की उम्मीद नहीं की जा सकती.
इस बीच मोहल्ले ने अपने समय का कोई महत्वपूर्ण मसला छोडा नहीं है. चाहे वह समाज हो, राजनीति हो, धर्म या जातिगत भेदभाव हो, क्रिकेट, साहित्य, संस्कृति या अर्थतंत्र हो …. मोहल्ले के निवासियों हर मुद्दे पर लिखा है और बेलाग लिखा है. सबसे अच्छी बात मुझे यह लगी कि सभासद ने किसी से कोई भेदभाव नहीं किया है. न तो किसी से कोई भेदभाव किया है न पक्षपात. अगर वह दलित विमर्श कर रहे थे तो कुलीनातावादियों को भी पूरा मौका दिया. अगर वह वाम हो रहे थे दक्षिण होने वालों से भी उन्हें कोई परहेज नहीं रहा. इस बीच कुछ टिप्पणियों को लेकर कुछ टीकाएं भी इधर-उधर हीन और मोहल्ले वालों को भला-बुरा भी कहा गया, पर थोडे ही दिनों में वह सब धूल-धूसरित भी हो गया. इतना तो सबको मानना पडा कि यहाँ जो कुछ हुआ गया वह न केवल ब्लोग बल्कि पूरी अभिव्यक्ति की दुनिया की ही उपलब्धि है. तो भाई इस चार सौ बीस पर मोहल्ले, मोहल्ले के निवासियों और मोहल्ले के सभासद को मेरी और से बधाई.

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विस्फोट : बौद्धिक विमर्श में प्रामाणिकता और शुचिता की मिसाल

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 22, 2008

कृपया इसे किसी हारजीत के रूप में देखेंसवाल बौद्धिक विमर्श में प्रामाणिकता और शुचिता बनाए रखने का हैये किसी भी हारजीत से बड़ी चीज है। हमें ये कामना करनी चाहिए कि जो प्रामाणिक नहीं होगा, वो नष्ट हो जाएगाजैसा कि मैंने पहले भी लिखा था इससे मैकाले के बारे में कुछ बदल नहीं जाएगालेकिन न्याय की इमारत सच की बुनियाद पर खड़ी हो तो बेहतर– दिलीप मंडल

संजय तिवारी चाहते तो ऐसा नहीं भी कर सकते थेऔर वो ऐसा नहीं करते तो कोई उनका क्या बिगाड़ लेता? लेकिन संजय तिवारी ने वो किया जिसका मौजूदा दौर में घनघोर अभाव हैबात इतनीसी थी कि मैंने रिजेक्टमाल, इयत्ता और कबाड़खाना पर एक पोस्ट डाली थीपोस्ट तो अपने चंदू भाई के एक लेख की प्रतिक्रिया में थीलेकिन साथ में इस बात का जिक्र था कि कुछ जगहों पर (बतंगड़, विस्फोट और आजादी एक्सप्रेस का मैंने जिक्र किया था, वैसे ये बात है कई और जगहों पर भी) मैकाले को जिस तरह से उद्धृत किया जा रहा है उसके प्रमाण नही मिल रहे हैंमैंने सबसे से ये जानना चाहा था कि क्या किसी के पास उस स्रोत की जानकारी है, जहां से मैकाले को इस तरह कोट किया गया हैमैकाले का वह (सही/गलत) कोट इस तरह है:

लार्ड मैकाले की योजना
मैं भारत के कोनेकोने में घूमा हूं और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो चोर हो, भिखारी हो. इस देश में मैंने इतनी धनदौलत देखी है, इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी भी इस देश को जीत पायेंगे. जब तक उसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो है उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत.और इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूं कि हम उसकी पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बदल डालें. यदि भारतीय सोचने लगे कि जो भी विदेशी और अंग्रेजी में है वह अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं.
(2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में मैकाले द्वारा प्रस्तुत प्रारूप)

इस पर पिछले दिनों संजय तिवारी का ये मेल आयाइसे सार्वजनिक करना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि इसमें हम सबके सीखने के लिए कुछ हैसंजय जी ने क्या लिखा है, आप भी पढ़ें:

मैकाले के कथन पर आपका सवाल जायज है. फिलहाल यह टिप्पणी के माध्यम से मेरे पास पहुंचा है और मैं आपको भेज रहा हूं. और हां जब तक प्रमाणित नहीं हो जाता मैं वह वाक्य हटा रहा हूं. गंभीरता से ऐतिहासिक साक्ष्य देखने के लिए धन्यवाद.
फिर भी क्या मैकाले की ऐसी ही कुछ योजना नहीं थी?
I found an interesting piece in a site seems basically ISCON devotees site, but a gentleman has tried to find out what is the reality.This url is http://www.dandavats.com/?p=4104

संजय जी, बौद्धिक साहस और प्रामाणिकता के प्रति आपका आग्रह अनुकरणीय है। आप बंधुओं में अगर कोई भी मुझे मैकाले के उक्त कथन का स्रोत/प्रमाण भेजता है तो मैं उसे पोस्ट के रूप में छापूंगायहां एक बात औरमैकाले का लगभग सारा लेखन वेब पर मौजूद हैफरवरी, 1835 को ब्रिटिश संसद में भारतीय शिक्षा पर पेश किया गया मैकाले का प्रारूप भी नेट पर हैमैकाले के भाषणों, लेखन और पत्र व्यवहार के ढेर सारे पन्नों को पढ़ने के बाद मुझे ऐसा नहीं लगता कि मैकाले भारत का किसी भी रूप में प्रशंसक थाभारतीय लोगों के चारित्रिक आदर्श की वो प्रशंसा करेगा, ये मान पाना आसान नहीं हैयूरोपीय नस्ल की श्रेष्ठता में आकंठ डूबे मैकाले को भारतीय संस्कृति की प्रशंसा करने का श्रेय देना अनुचित है। इस बारे में फिर कभी।

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मुर्दा आचरण के खिलाफ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 19, 2008

इष्ट देव सांकृत्यायन

आज वह दिन है जब आचार्य रजनीश ने इस दुनिया से विदा ली थी. आचार्य रजनीश से मेरी कभी मुलाक़ात तो नहीं हुई, रूबरू कभी उनको देखा भी नहीं. जब तक वह थे तब तक उनके प्रति में भी वैसे ही विरोध भाव से भरा हुआ था, जैसे वे बहुत लोग हैं जिन्होंने उनको ढंग से पढा-सूना या जाना नहीं. और यह कोई आश्चर्यजनक या अनहोनी बात नहीं हुई. मैंने उन्हें जाना अचानक और वह भी कबीर के मार्फ़त.
हुआ यों कि में अपनी बड़ी बहन के घर गया हुआ था और वहाँ जीजा जी के कलेक्शन में मुझे एक किताब मिली ‘हीरा पायो गाँठ गठियायो’. यह कबीर के कुछ पदों की एक व्याख्या थी. सचमुच यह हीरा ही था, जिसे मैंने गाँठ गठिया लिया. कबीर के पदों की जैसी व्याख्या रजनीश ने की थी, वैसी अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ तक कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे साहित्य के बडे आलोचकों और व्याख्याकारों से भी नहीं मिल पाई थी. हालांकि तब मैंने उसे अपनी काट-छाँट के साथ पढा था. चूंकि पूरी तरह नास्तिक था, आत्मा-परमात्मा में कोई विश्वास मेरा नहीं था, इसलिए जहाँ कहीं भी वैसी कोई बात आई तो मैंने मन ही मन ‘सार-सार को गहि रही, थोथा देई उड़ाय’ वाले भाव से उसे डिलीट कर दिया.
लेकिन चूंकि रजनीश की व्याख्या में मुझे रस मिल था और उससे कम से कम कबीर के प्रति एक नई दृष्टि भी मिलती दिखी थी, इसलिए इसके बाद भी रजनीश को मैंने छोडा नहीं. जहाँ कहीं भी कबीर पर उनकी जो भी किताब मिली वह में पढ़ता रहा. उसका रस लेता रहा और कबीर के साथ ही साथ रजनीश को भी जानता रहा. हालांकि इस क्रम में कहीं न कहीं जीवन को भी में नए ढंग से नए रूप में जानता रहा. पर तब अपने पूर्वाग्रहों के कारण इस बात को स्वीकार कर पाना शायद मेरे लिए मुमकिन नहीं था.
तो इस तरह में ये कह सकता हूँ की रजनीश को मैंने जाना कबीर के जरिये. पर बाद में मैंने इस दुनिया की कई और विभूतियों को मैंने जाना रजनीश के मार्फ़त. हुआ यों कि ऐसे ही चलते फिरते मुझे एक व्याख्या मिली रैदास पर. यह भी रजनीश ने ही की थी. अब ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ जैसी उक्ति के लिए जाने जाने वाले रैदास कोई पोंगापंथी बात तो कह नहीं सकते थे. इसलिए उन्हें पढ़ने में भी कोई हर्ज मुझे नहीं लगी और वह किताब भी खरीद ली. पढी तो लगा कि रैदास तो उससे बहुत आगे हैं जहाँ तक में सोचता था. अभी जिस दलित चेतना की बात की जा रही है उसके बडे खरे बीज रैदास के यहाँ मौजूद हैं. और आचार्य रजनीश के ही शब्दों में कहें तो ये बीज दुनिया को जला देने वाले शोले नहीं, मनुष्य के भीता का अन्धकार मिटाने वाले प्रकाशपुंज के रूप में मौजूद हैं.
अव्वल तो तब तक में यही नहीं जानता था कि रैदास ने कवितायेँ भी लिखी हैं. मैंने वह किताब पढ़ते हुए जाना कि रेडियो पर हजारों दफा जो भजन में सुन चुका हूँ, ‘तुम चन्दन हम पानी’ वह रैदास की रचना है. अभी फिर मैंने वह किताब पढ़नी चाही तो घर में नहीं मिली. नाम तक अब उसका याद नहीं रहा तो मैंने ओशो वर्ल्ड के स्वामी कीर्ति से कहा और उन्होने काफी मशक्कत से ढूंढ कर वह किताब मुझे भिजवाई. अब उसे में नए सिरे से पढ़ रहा हूँ. उसे फिर-फिर पढ़ते हुए फिर-फिर वही मजा आता है, जो पहली दफा पढ़ते हुए आया था.
रजनीश के प्रति मेरा विरोध भाव अब तक लगभग विदा हो चुका था. क्योंकि मैंने यह जान लिया था कि उनके कहने के बारे में जो कहानियाँ हैं वे कितनी सही हो सकती हैं. इसी बीच एक और किताब मिली. गोरखवाणी. गोरख के बारे में भी में नहीं जानता था कि उन्होने कवितायेँ भी लिखीं हैं और उनकी कविताओं के भाव जो बताते हैं, उनके अनुसार वह उससे बिलकुल अलग थे जो अब उनके चेले कर रहे हैं. खास तौर से ईश्वर के अस्तित्व के सम्बंच में गोरख की जो धारणा है,
‘बसती न शून्यम, शून्यम न बसती
अगम अगोचर ऐसा
गगन सिखर महँ बालक बोलैताका नांव धरहुंगे कैसा’
और इसकी जैसी व्याख्या आचार्य रजनीश ने दी है वह किसी के भी मन को झकझोर देने के लिए काफी है. असल में यही वह बिंदु है जहाँ से मेरी अनास्था के बन्धन कमजोर पड़ने शुरू हो गए थे. यह आचार्य रजनीश को पढ़ते हुए ही मुझे लगा कि वस्तुतः अनास्था भी एक तरह का बन्धन ही है. इनकार का बन्धन.
आचार्य रजनीश, जिन्हें अब लोग ओशो के नाम से जानते हैं, दरअसल हर तरह के बन्धन के विरुद्ध थे. यहाँ तक कि आचरण और नैतिकता के बन्धन के भी विरुद्ध. लेकिन इसका यह अर्थ एकदम नहीं है कि वह पूरे समाज को उच्छ्रिन्खाल और अनैतिक हो जाने की सीख दे रहे थे. दुर्भाग्य की बात यह है कि उनके बारे में उन दिनों दुष्प्रचार यही किया जा रहा था. आश्चर्य की बात है कि हमारे समाज में ऐसा कोई महापुरुष हुआ नहीं जिसके बारे में दुष्प्रचार न किया गया हो. कबीर और तुलसी तक नहीं बचे अपने समय के बौद्धिक माफियाओं के दुष्चक्र से. यह अलग बात है कि हम मर जाने के बाद सबको पूजने लगते हैं. जिंदा विभूतियों को भूखे मारते हैं और मुर्दों के प्रति अपनी अगाध आस्था जताते हैं. शायद हमारी आस्था भी मुर्दा है और यही वजह है जो हमारा देश मुर्दों का देश हो चुका है.
आचार्य रजनीश अकेले व्यक्ति हैं जो इस मुर्दा आस्था के खिलाफ खडे हैं. सीना तान कर. उनका प्रहार कोई नैतिक मूल्यों और अच्छे आचरण पर नहीं है. वह प्रहार करते हैं नैतिकता और आचरण के मुर्देपन पर. वह बार-बार यही तो कहते हैं कि ऐसा कोई भी आचरण या मूल्य जो आपका स्वभाव नहीं बना, वह मुर्दा है. ऐसा अच्छा आचरण सिर्फ तब तक रहेगा जब तक आपके भीतर भय है. भय गया कि अच्छाई गई. इस दुनिया ज्यादातर ईमानदार लोग सिर्फ दो कारणों से ईमानदार हैं. या तो इसलिए कि उन्हें बेईमानी का मौका नहीं मिला, या फिर इसलिए कि बेईमानी की हिम्मत नहीं पडी. भा मिला और मौका मिला कि ईमानदारी गई. रजनीश हजार बार कहते हैं कि मुझे नहीं चाहिए भय और दमन की नींव पर टिकी ऎसी ईमानदारी. मुझे तो सोलहो आने ईमानदारी और सौ फीसदी भलमनसी चाहिए . वह तोता रटंत की कोरी सीख या सरकारी दमन से आने वाली नहीं है. वह आएगी सिर्फ ध्यान से.
ध्यान के मुद्दे पर फिर कभी.

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कविता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 19, 2008

झूठ : चार दृश्य
(१ )
जब मैं झूठ बोलता हूँ
तो
लोग कहते हैं –
यह आदमी बडा अच्छा है ।

(२ )
जब मैं झूठ बोलता हूँ
तो
मेरी भाषा में प्रवाह होता है ,
मन में विश्वास ,
स्वर में ओजस्विता
एवं मिठास का
विचित्र सा एहसास
होता है ।
(३)
झूठ के पाँव नहीं होते ,
इसके
पंख होते हैं ,
झूठ उड़ता है ।
(४ )
झूठ :
सच का सौतेला भाई
माँ की कृपा से
प्रगति कर गया है ।

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ghazel

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 19, 2008

सजा अपनी

बचा के आप भी रखिये अभी दुआ अपनी ।
दरख्त ढूंढ रहा है अभी हवा अपनी ।
वो क्या हुई जो बनाया था कभी
ढूंढ कर हार गया वह जमीं खुदा अपनी ।
एक फरिश्ता जिसे था सच का गुमा
काट कर दे गया जुबा अपनी ।
तमाम लोग हमारे ही राज करते हैं
यही उम्मीद है अपनी यही सजा अपनी ।
इन अंधेरों की बात मानी तो
खुद बुझा दोगे तुम शमां अपनी ।
अगले सावन को भी वो जेठ बना जाएगा
भूल कर भी न उसे तश्नागी दिखा अपनी ।
मेरी बस्ती की तरफ चाँद अब नहीं आता
सहम के उसने बदल दी है अब दिशा अपनी ।
हमारे अश्क हैं Rarhi और खरीदार हमीं
चलेगी कब तलक दुकान ये भला अपनी ।

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इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 16, 2008

– दिलीप मंडल

मैकाले पर फिर से बात करनी हैएक इनविटेशन से ट्रिगर मिला थाफिर मैकाले के बारे में जानने समझने की कोशिश कीकुछ लिखा भी उस पर एक लेख आया चंद्रभूषण जी काचंद्रभूषण या अपनों के लिए चंदू, उन लोगों में हैं जो बोलते/लिखते हैं, तो गंभीरता से सुनना/पढ़ना पड़ता हैउनके कहे में सार होता हैहल्की बातें वो नहीं करते

इसलिए मैकाले को पिछली कुछ रातों में जगजगकर एक बार फिर पढ़ाअनिल सिंह यानी रघुराज जी कहेंगे कि पोथी के पढ़वैया को फिर से कोई दोष होने वाला हैलेकिन अनिल जी, हम भी क्या करेंहमें पढ़ने का मौका हजारों साल के इंतजार के बाद मिला हैनए मुल्ला की तरह अब हम ज्यादा प्याज खा रहे हैंकिसी भूखे इंसान को भकोसभकोस कर खाते देखा है आपने? अभी तो हम बहुत पढ़ेंगे और बहुत लिखेंगेझेलिए, उपाय क्या है?

लेकिन बात शुरू हो उससे पहले एक टुकड़ा मैकाले के बारे में, जो हर्ष के ब्लॉग में है, संजय तिवारी जी के ब्लॉग में था और आजादी एक्सप्रेस में लगा हैआप भी पढ़िए

लार्ड मैकाले की योजना
मैं भारत के कोनेकोने में घूमा हूं और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो चोर हो, भिखारी हो. इस देश में मैंने इतनी धनदौलत देखी है, इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी भी इस देश को जीत पायेंगे. जब तक उसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो है उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत.और इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूं कि हम उसकी पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बदल डालें. यदि भारतीय सोचने लगे कि जो भी विदेशी और अंग्रेजी में है वह अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं.
(2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में मैकाले द्वारा प्रस्तुत प्रारूप)

अब मुझे ये जानना है कि मैकाले को आखिर किस स्रोत से कोट किया गया हैमैंने इसे तलाशने के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट की साइट और उसकी बताई साइट, ऑनलाइन किताबों की साइट, विकीपीडिया, नेशनल आर्काइव का संदर्भ, मिसौरी सदर्न स्टेट यूनिवर्सिटी, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की साइट जैसे उपलब्ध स्रोत छान लिए हैंहो सकता है कहीं कुछ छूट रहा होभाषण तो दर्जनों जगह हैलेकिन वो अंश नहीं हैं जो ऊपर लिखे हैंउसका स्रोत आपको दिखे तो जरूर बताइएगाइससे मैकाले के बारे में कुछ बदल नहीं जाएगालेकिन न्याय की इमारत सच की बुनियाद पर खड़ी हो तो बेहतर

दरअसल इतिहास जब लिखा जाता है तो मुख्यधारा का स्वार्थ सबसे अहम पहलू बन जाता हैइसलिए इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होताइतिहास लेखन अनिवार्यत: इस बात से तय होता है कि उसे कौन और किस समय लिख रहा हैआतंकवादी भगत सिहं एक समय के बाद क्रांतिकारी बन जाते हैंपाकिस्तान की किताबों के नायक जिन्ना भारत के टेक्सट बुक में विलेन बन जाते हैं और भारत की किताबों के नायक जवाहरलाल पाकिस्तान में खलनायकऐसे सैकड़ोंहजारों उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं

मैकाले के बारे में बात करने से पहले ऊपर के लिए कोटेशन के बारे में पक्का जान लेना चाहता हूं क्योंकि कई बारबात बारबार बोली जाती है तो सच्ची लगाने लगती हैकिसने कहा था येगोएबल्स ने? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग भोलेपन में कटपेस्ट कर रहे हैं और उसे ही इतिहास समझ रहे हैंवैसे, अगर ऊपर मैकाले को उद्धृत की गई बातों का प्रमाण मिल गया तो अपनी कही बातें वापस ले लूंगा

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खेल भावना की ऐतिहासिक मजबूरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 16, 2008

केशव
सिडनी में हुए कोलाहल के बाद आज से पर्थ टेस्ट शुरू हो गया और पहली इनिंग्स में भारत ने ठीक प्रदर्शन भी कर दिया. अब चूँकि सबका गुस्सा थोडे काबू में आ गया है तो चलिए ज़रा कुछ कठोर और कटु सत्यों पर बात की जाए. चाचा नेहरू का मैं प्रशंसक हूँ और उनकी तमाम बातों में मुझे काफी सार भी नज़र आता है, पर पहले एशियन खेलों के उद्घाटन पर उन्होने एक लाइन कही थी उससे मैं कतई इत्तेफाक नही रखता. उनका कहना था कि खेल को जीत या हार के तराजू में तौलने के बजाये खेल की भावना से खेला जाना चाहिए. मेरा मानना कुछ और है. जिन्हें मानव इतिहास और मानव के विकास कि ज्यादा जानकारी नही है वे ऐसी बातें करें तो समझ में आता है. ये बात काबिले गौर है कि संस्कृति के विकास के बाद मनुष्य ने अपने अन्दर छिपी आदिम आक्रामकता को संभ्रांत तरीके से प्रदर्शित करने के लिए खेल ईजाद किये. लेकिन नियम और कायदों की आड़ खड़ी करने के बावजूद ये बात जल्दी ही साफ हो गई कि जैसे ही खेल कि गहमा गहमी बढ़ती तो आदमी के अन्दर छिपा हुआ जानवर अपने पूरे जंगली स्वरूप में बाहर आ जाता. ये स्थिति रोमन काल से ही चली आ रही है और मानव के विकास के १० लाख साल के इतिहास में सभ्यता का इतिहास चूँकि कुल १० या १५ हजार साल पुराना है इसलिए आभिजत्य का असर उसके व्यक्तित्व पर उतना ही गहरा है जितना शरीर पर खाल की तह. ऐसे में खेल को खेल की भावना से खेलने वाला आदर्श पूजनीय तो है पर अनुकरणीय वो कम से कम १० या २० हजार साल बाद ही हो पाएगा.

आस्ट्रलियाई टीम इस ऐतिहासिक मजबूरी को समझती है और बिना किसी शर्म के अपने अन्दर मौजूद जानवर को बेलगाम करती है ताकि वो जीत सके. वो जीत के मनोविज्ञान को भी समझते हैं और ये जानते हैं कि इतिहास और रेकॉर्ड हमेशा विजेता ही लिखते हैं और उनके वंशज ही उसे पढ़ पाते हैं. हारा हुआ आदमी या जाति या तो खलनायक होती है या बेचारी जिसमें कुछ एक खूबियाँ थीं पर वो इतनी बेहतर नही थी कि खुद इतिहास लिख सके. हममें इस समझ की कमी है आस्ट्रेलिया ने सिडनी टेस्ट नही जीता है बल्कि एक सोच की ओर इशारा किया है कि खेल में जीतने के लिए हुनर के साथ-साथ आदिम आक्रामकता भी बेहद ज़रूरी है. सौरव गांगुली ने सिडनी टेस्ट के बाद एक इंटरव्यू में कहा था कि आस्ट्रेलिया कि टीम जीतने के लिए उतावली थी, इसिलिये शायद वो इतने मैंच जीतती है.
आज भी हमारी रगों में अपने आदिम पूर्वजों का ही खून दौड़ता है खेल एक प्रतिस्पर्धा है और जैसे ही कोई मुक़ाबला शुरू होता है तो हमारी आदिम प्रकृति उभर कर सामने आती है और हमारा तन मन उसे हार या जीत के मुक़ाबले कि तरह देखने लगता है. जो व्यक्ति आदर्श या संस्कृति की आड़ में इस नैसर्गिक प्रकृति को पूरी तरह उभरने से रोकता है वो जीत नही सकता. खेल एक युद्ध है जो लड़ने से पहले ही मन ही मन जीत लिया जाता है. विजेता हमेशा जीत का लक्ष्य मन में रख कर खेलता है और पराजित हमेशा हार के खौफ के साथ मैदान में उतरता है. आस्ट्रेलिया और भारत में काबलियत का उतना फर्क नही है जितना कि इस मानसिकता का. जिस दिन हम भी विजय का लक्ष्य रखेंगे और जीत से न तो झेपेंगे और न ही उसके मिलने पर ग्लानी या अपराध बोध से भर जाएँगे उस दिन हमारी हार का सिलसिला ख़त्म हो जाएगा.

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12 जनवरी 2008 की आधी रात के बाद विवेकानंद को पढ़ते हुए…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 12, 2008

अद्वैत मत की ध्वजा पश्चिम में लहराने वाले स्वामी विवेकानंद का आज जन्मदिन है। इसलिए विवेकानंद को नए सिरे से पढ़ना शुरू किया- खंड एक, फिर दो, फिर कुछ चिट्ठियां और खंड तीन। खंड तीन में स्वामीजी का मद्रास के विक्टोरिया हॉल में भाषण। विश्व धर्म महासम्मेलन के बाद मद्रास में उनका स्वागत हुआ। भीड़ इतनी थी कि स्वागत समारोह में उनका भाषण नहीं हो पाया। यही भाषण बाद में विक्टोरिया हॉल में दिया गया। पूरा भाषण आप इस साइट पर देख सकते हैं। यहां उस भाषण के एक अंश का अनुवाद प्रस्तुत है। मूल इंग्लिश उसके नीचे पढ़िए। ये अंश इसलिए, क्योंकि ये विवेकानंद की उस बहुचर्चित-ज्ञात छवि से प्रस्थान है, जिसके बारे में सभी जानते हैं। पढ़िए विवेकानंद को :

“समाज सुधारकों की पत्रिका में मैंने देखा कि मूझे शूद्र बताया गया है और चुनौती दी गई है कि शूद्र संन्यासी कैसे हो सकता है। इस पर मेरा जवाब है : मैं अपना मूल वहां देखता हूं जिसके चरणों में हर ब्राह्मण ये कहते हुए वंदना करता है और पुष्प अर्पित करता है – यमाय धर्मराजाय चित्रगुप्ताय वै नम:। और जिनके पूर्वपुरुष क्षत्रीय में भी सबसे पवित्र गिने जाते हैं। अगर आप अपने धर्मग्रंथों और पुराणों पर विश्वास रखते हैं तो उन तथाकथित सुधारकों को ये मालूम होना चाहिए कि अतीत में दूसरे योगदान के अलावा मेरी जाति ने कई सदियों तक लगभग आधे भारत पर शासन किया है। अगर मेरी जाति की बात छोड़ दी जाए तो वर्तमान भारतीय सभ्यता में क्या शेष रह जाएगा। सिर्फ बंगाल में ही मेरी जाति ने सबसे महान दर्शनशास्त्री, सबसे महान कवि, सबसे महान इतिहासकार, सबसे महान पुरातत्ववेत्ता, सबसे महान धर्मप्रचारक दिए हैं। हमारी जाति से भारत के सबसे महान आधुनिक वैज्ञानिक पैदा हुए हैं। इन विरोधियों को इतिहास का ज्ञान होना चाहिए और जानना चाहिए कि ब्राह्मण, क्षत्रीय और वैश्य इन तीनों जातियों को संन्यासी बनने का समान अधिकार है। उन्हें वेद पाठ करने का भी समान अधिकार है। वैसे ये तो एक बात है। यदि वो मुझे शूद्र कहते हैं तो भी मुझे कोई कष्ट नहीं है।”

(one word more: I read in the organ of the social reformers that I am called a Shudra and am challenged as to what right a Shudra has to become a Sannyasin. To which I reply: I trace my descent to one at whose feet every Brahmin lays flowers when he utters the words — — and whose descendants are the purest of Kshatriyas. If you believe in your mythology or your Paurânika scriptures, let these so-called reformers know that my caste, apart from other services in the past, ruled half of India for centuries. If my caste is left out of consideration, what will there be left of the present-day civilisation of India? In Bengal alone, my blood has furnished them with their greatest philosopher, the greatest poet, the greatest historian, the greatest archaeologist, the greatest religious preacher; my blood has furnished India with the greatest of her modern scientists. These detractors ought to have known a little of our own history, and to have studied our three castes, and learnt that the Brahmin, the Kshatriya, and the Vaishya have equal right to be Sannyasins: the Traivarnikas have equal right to the Vedas. This is only by the way. I just refer to this, but I am not at all hurt if they call me a Shudra.)

दरअसल इस भाषण में विवेकानंद की ये पीड़ा आप देख सकते हैं जो उन्हें कुछ समाज सुधारकों ने दी है। इससे आप आंबेडकर की पीड़ा को बेहतर समझ सकते हैं। फुले और शाहूजी महाराज को बेहतर जान सकते हैं। दलित लेखन में जो कड़वाहट किसी को असांस्कृतिक और असभ्य लगती है, उसके समझने का सूत्र विवेकानंद देते हैं। इसके अलावा विवेकानंद रचना समग्र में कदाचित सिर्फ एक और जगह स्वामीजी अपने जाति मूल की बात करते हैँ। समुद्र यात्रा पर निकलने से पहले वो इस बात का जिक्र करते हैं कि “अंग्रेजों ने सभी जाति के लोगों को एक साथ नेटिव करार दिया है।” यहां वो इस बात का जिक्र करते हैं कि “कायस्थ कुल में जन्म होने के कारण उन्हें कई तबकों के हमले झेलने पड़े। और कि सभी जातियां खुद को कायस्थों से श्रेष्ठ मानती हैं।”
मूल उद्धरण नीचे देखें :

Well, in our country we hear much about some people belonging to the gentry and some to the lower classes. But in the eyes of the Government all are “natives” without exception. Maharajas, Rajas, Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, Shudras — all belong to one and the same class — that of “natives”. The law, and the test which applies to coolies, is applicable to all “natives” without distinction. Thanks to you, O English Government, through your grace, for a moment at least I feel myself one with the whole body of “natives”. It is all the more welcome, because this body of mine having come of a Kâyastha family, I have become the target of attack of many sections. Nowadays we hear it from the lips of people of all castes in India that they are all full-blooded Aryans — only there is some difference of opinion amongst them about the exact percentage of Aryan blood in their veins, some claiming to have the full measure of it, while others may have one ounce more or less than another — that is all. But in this they are all unanimous that their castes are all superior to the Kayastha! And it is also reported that they and the English race belong to the same stock — that they are cousins-german to each other, and that they are not “natives”. And they have come to this country out of humanitarian principles, like the English. And such evil customs as child-marriage, polygamy, image-worship, the sutti, the zenana-system, and so forth have no place in their religion — but these have been introduced by the ancestors of the Kayasthas, and people of that ilk. Their religion also is of the same pattern as that of the English! And their forefathers looked just like the English, only living under the tropical sun of India has turned them black!

स्वामी जी जाति प्रथा के विरोधी नहीं है। वो जिस कालखंड में हिंदू समाज के विकास की कल्पना कर रहे थे, और जिन लोगों के बीच ये कल्पना की जा रही थी, उन स्थितियों में जाति प्रथा का विरोध संभव भी नहीं था। लेकिन उनके भाषण का एक और अंश देखिए –

“हे ब्राह्मणों, अगर ब्राह्मणों में अछूतों की तुलना में सीखने की प्रवृत्ति ज्यादा है तो ब्राह्मणों की शिक्षा पर और खर्च न किया जाए। बल्कि ऐसा सारा खर्च अछूतों की शिक्षा पर किया जाए। कमजोर को ही मदद की जरूरत है। अगर ब्राह्मण जन्मना समझदार है तो वो किसी सहायता के बिना शिक्षा प्राप्त कर लेगा। अगर बाकी लोग जन्म से समझदार नहीं हैं तो उनके लिए शिक्षा और शिक्षकों का बंदोबस्त किया जाए। मुझे तो लगता है कि यही न्याय है और यही सही है।” इसी भाषण में स्वामीजी ने कठोपनिषद को उद्धृत करते हुए कहा था – उतिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधत।

Ay, Brâhmins, if the Brahmin has more aptitude for learning on the ground of heredity than the Pariah, spend no more money on the Brahmin’s education, but spend all on the Pariah. Give to the weak, for there all the gift is needed. If the Brahmin is born clever, he can educate himself without help. If the others are not born clever, let them have all the teaching and the teachers they want. This is justice and reason as I understand it. Our poor people, these downtrodden masses of India, therefore, require to hear and to know what they really are. Ay, let every man and woman and child, without respect of caste or birth, weakness or strength, hear and learn that behind the strong and the weak, behind the high and the low, behind every one, there is that Infinite Soul, assuring the infinite possibility and the infinite capacity of all to become great and good. Let us proclaim to every soul: — Arise, awake, and stop not till the goal is reached.

विवेकानंद लगातार ये रेखांकित करते हैं वो समाज सुधारक नहीं है। वो अपने देश के अतीत को लेकर शर्मिंदा तो कतई नहीं हैं। बल्कि वो लगातार आह्वान करते हैं कि देश और समाज को अतीत के साथ निरंतरता रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। विवेकानंद को भारत में कम पढ़ा गया है। या फिर चुन-चुन कर उनकी कुछ बातें रखी जाती हैं। विवेकानंद को और ज्यादा जानने की जरूरत है। – दिलीप मंडल

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भारतीय समाज की गुत्थियां और 21वीं सदी में विवेकानंद का आह्वान

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 12, 2008

दिलीप मंडल

“पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान इतने उच्च स्वर से मानवता के गौरव का उपदेश करता हो, और पृथ्वी पर ऐसा कोई धर्म नहीं है, जो हिंदू धर्म के समान गरीबों और नीच जातिवालों का गला ऐसी क्रूरता से घोंटता हो।”

“अब हमारा धर्म किसमें रह गया है? केवल छुआछूत में – मुझे छुओ नहीं , छुओ नहीं। हम उन्हें छूते भी नहीं और उन्हें ‘दुर’ ‘दुर’ कहकर भगा देते हैं। क्या हम मनुष्य हैं?”

“भारत के सत्यानाश का मुख्य कारण यही है कि देश की संपूर्ण विद्या-बुद्धि राज-शासन और दंभ के बल से मुट्ठी भर लोगों के एकाधिकार में रखी गयी है।”

“यदि स्वभाव में समता न भी हो, तो भी सब को समान सुविधा मिलनी चाहिए। फिर यदि किसी को अधिक तथा किसी को अधिक सुविधा देनी हो, तो बलवान की अपेक्षा दुर्बल को अधिक सुविधा प्रदान करना आवश्यक है। अर्थात चांडाल के लिए शिक्षा की जितनी आवश्यकता है, उतनी ब्राह्मण के लिए नहीं।”

“पुरोहित – प्रपंच ही भारत की अधोगति का मूल कारण है। मनुष्य अपने भाई को पतित बनाकर क्या स्वयं पतित होने से बच सकता है? .. क्या कोई व्यक्ति स्वयं का किसी प्रकार अनिष्ट किये बिना दूसरों को हानि पहुँचा सकता है? ब्राह्मण और क्षत्रियों के ये ही अत्याचार चक्रवृद्धि ब्याज के सहित अब स्वयं के सिर पर पतित हुए हैं, एवं यह हजारों वर्ष की पराधीनता और अवनति निश्चय ही उन्हीं के कर्मों के अनिवार्य फल का भोग है।”

अंदाजा लगाइए कि भारतीय समाज के बारे में ये बातें किसने कही होंगी। बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने, ज्योतिबाफुले ने, शाहूजी महाराज ने या फिर पेरियार ने, कबीर ने, दादू ने, रविदास ने या कांसीराम ने या करुणानिधि ने। जी नहीं ये सब कहा है उन विवेकानंद ने, जिन्हें कोई भारतीय नवजागरण का प्रतीक मानता है तो कोई संघ वाला जिसकी मूर्ति और फोटो पर फूल चढ़ाता है।

पहला उद्धरण विवेकानन्द साहित्य, भाग १ , पृ. ४०३ से है। दूसरा लिया गया है विवेकानन्द साहित्य, भाग २ , पृ. ३१६ से। तीसरा कोटेशन विवेकानन्द साहित्य, भाग ६ , पृ. ३१०-३११ से है। चौथा विवेकानंद की रचना नया भारत गढ़ो, पृ . ३८ से और पांचवां विवेकानंद पत्रावली भाग ९ , पृ. ३५६ से है।

(सारे उद्धरण अफलातून जी से साभार)

दरअसल, जाति के बारे में विवेकानंद के विचार उन तमाम लोगों को मालूम हैं, जिन्होंने विवेकानंद को पढ़ा है। लेकिन सवाल ये है कि आज विवेकानंद का आह्नान करने की आखिर क्या जरूरत आ पड़ी? दरअसल भारतीय क्रिकेट में थोड़ा और भारत देखने की आउटलुक के एस आनंद की कामना और इस बारे में आशीष नंदी, राजदीप सरदेसाई और रामचंद्र गुहा के विचार और कुछ अपनी बात एक पोस्ट में डाली थी। उस पर कुछ बेनाम लोगों ने कुछ बातें कहीं। उन टिप्पणियों को आप पोस्ट में देखें। इसी दौरान अफलातून भाई, विवेकानंद को उद्धृत कर भारतीय समाज पर चर्चा चला रहे हैं। मुझे दोनों बातें जुड़ती दिखीं।

बहरहाल, मुझे लगता है कि जो खतरनाक किस्म के सर्प होंते हैं वो कोंचने से फन नहीं काढ़ते। पोंगापंथियों की यही तो पहचान है। ऐसे लोग दिखावे के लिए घनघोर प्रगतिशील होने का छद्म रचते हैं, विवेकानंद से लेकर मार्क्स तक की बात करते हैं। पर खास और जरूरी मौकों पर सामने आती है सिर्फ जहर बुझी जुबान और जहरीले कर्म। मुसलमानों के दो तिहाई बायोडाटा एमएनसी कंपनियों में ऐसे ही रद्दी की टोकरी में नहीं फेंक दिए जाते। और दलितों के साथ भी तो ये लोग ऐसा ही करते हैं। देखिए भारतीय समाज का दा विंची कोड

मेरिट उनके लिए एक आड़ है, जिसके पीछे से वो शिकार करते हैं- कभी मुसलमानों का, कभी पिछड़ों का, कभी दलितों का, तो कभी औरतों का, कभी विकलांगों का, कभी पिछड़े प्रदेश वालों का, कभी नॉर्थ ईस्ट वालों का शिकार, तो कभी पहाड़ वालों का, तो कभी ग्रामीण और कस्बाई पृष्ठभूमि वालों का और अक्सर भारतीय भाषा में पढ़कर आने वालों का। उनके कितने ही रंग हैं। खास तौर पर न्यायपालिका, नौकरशाही, मीडिया, साहित्य, विश्वविद्यालय और यूपीएससी उनके गढ़ हैं। और शिकार हमेशा पिछड़े और दलित नहीं, सवर्ण भी बनते हैं। सवर्ण औरतें, गांव के सवर्ण, पिछड़े प्रदेशों के सवर्ण, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले सवर्ण, गरीब सवर्ण। कमजोरों के आखेट में जाति तो सिर्फ एक हथियार है। वो बाजार में बाजार के हथियारों से मारते हैं, आदिवासियों को विस्थापन के हथियार से मारते हैं, शहर से गांव को मारते हैं।

वैसे, बेनाम और खुद के कर्मों पर शर्मशार मुंह छिपाने वाले टिप्पणीकारों से मेरा निवेदन है कि वो उस खतरनाक जमात के सही प्रतिनिधि नहीं हैं। कम से कम नफरत के नाम पर चल रही सदियों पुरानी परंपरा के ग्रेजुएट तो वो कतई नहीं हैं। दरअसल जो समझदार हैं वो चुप हैं और विष इकट्ठा कर रहे हैं। ढेर सारा विष। लेकिन इतना जहर कहां से लाओगे। कल ही एचआरडी मिनिस्ट्री ने आंकड़ा दिया है कि भारत के स्कूलों और कॉलेजों में दो करोड़ से ज्यादा दलित बच्चे पढ़ रहे हैं। लड़कियों ने लड़कों को स्कूली शिक्षा में पीछे छोड़ दिया है। गांव से बड़ी आबादी शहरों में आ रही है। ये भीड़ आज सेवक है, लेकिन कल को ये भी मालिकाना हक मांगने वाले हैं। ये भीड़ टिड्डीदल की तरह आने वाली है, छाने वाली है। बदलता समय पोंगापंथियों के विषदंत तोड़ देगा। खासकर जातिवादियों के लिए, चाहे वो ब्राहा्ण हों या पिछड़े, मुश्किल समय आ चुका है। ऐसे समय में जो भी अपना जबड़ा सख्त रखेगा, उन्हें दर्द ज्यादा होगा।

लेकिन आने वाले दिनों में जब जाति कमजोर होगी तो भी क्या कमजोरों के आखेट की परंपरा बंद होगी? ये सवाल कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर है।
(ये पूरी बहस आप मोहल्ला में देख सकते हैं)

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चतुष्पदी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 11, 2008

हो गए बस में अगर एक पागल चाह के
फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के
इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए
चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के

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