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चतुष्पदी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 11, 2008

हो गए बस में अगर एक पागल चाह के
फूल बन जाएंगे खुद सारे कांटे राह के
इक ज़रा सी जिंदगी की फिक्र इतनी किसलिए
चल रहा ब्रह्माण्ड जब बिन किसी परवाह के

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5 Responses to “चतुष्पदी”

  1. बहुत बढिया!!

  2. ये तो इत्ती घणी धांसू है, कि आपकी सी ना लग रही।

  3. जी हां; बिल्कुल सही। वह गाना भी है न – हर फिक्र को धुयें में उड़ाता चला गया। बस वैसा ही कुछ होना चाहिये जीवन में।

  4. कुछ धांसू वांसू नाहीं बा भइया। हम्मे त इहे लगत बा। अब भउजाई से मिले के परी कि इनके कुछ समझावा। बड़ा एहर ओहर के बात लिखत हवें। अरे आपन नाहीं त दुसरे क त खयाल रखही के परी न। आदमी खाली अपने खातिर थोड़े न जियेला। ओकरे जिंदगी पर तमाम लोगन के हक होला। अगर अइसन नाहीं होत त जनता काहें बीमा करावे खातिर टूटति।बाकी बाद में लिखब।

  5. siddhartha said

    churng jiekdam tohre jvn ke anuroop kavita baasiddhartha chapra bihar

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