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इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होता

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 16, 2008

– दिलीप मंडल

मैकाले पर फिर से बात करनी हैएक इनविटेशन से ट्रिगर मिला थाफिर मैकाले के बारे में जानने समझने की कोशिश कीकुछ लिखा भी उस पर एक लेख आया चंद्रभूषण जी काचंद्रभूषण या अपनों के लिए चंदू, उन लोगों में हैं जो बोलते/लिखते हैं, तो गंभीरता से सुनना/पढ़ना पड़ता हैउनके कहे में सार होता हैहल्की बातें वो नहीं करते

इसलिए मैकाले को पिछली कुछ रातों में जगजगकर एक बार फिर पढ़ाअनिल सिंह यानी रघुराज जी कहेंगे कि पोथी के पढ़वैया को फिर से कोई दोष होने वाला हैलेकिन अनिल जी, हम भी क्या करेंहमें पढ़ने का मौका हजारों साल के इंतजार के बाद मिला हैनए मुल्ला की तरह अब हम ज्यादा प्याज खा रहे हैंकिसी भूखे इंसान को भकोसभकोस कर खाते देखा है आपने? अभी तो हम बहुत पढ़ेंगे और बहुत लिखेंगेझेलिए, उपाय क्या है?

लेकिन बात शुरू हो उससे पहले एक टुकड़ा मैकाले के बारे में, जो हर्ष के ब्लॉग में है, संजय तिवारी जी के ब्लॉग में था और आजादी एक्सप्रेस में लगा हैआप भी पढ़िए

लार्ड मैकाले की योजना
मैं भारत के कोनेकोने में घूमा हूं और मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं दिखाई दिया जो चोर हो, भिखारी हो. इस देश में मैंने इतनी धनदौलत देखी है, इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी भी इस देश को जीत पायेंगे. जब तक उसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते जो है उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत.और इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूं कि हम उसकी पुरातन शिक्षा व्यवस्था और संस्कृति को बदल डालें. यदि भारतीय सोचने लगे कि जो भी विदेशी और अंग्रेजी में है वह अच्छा है और उनकी अपनी चीजों से बेहतर है तो वे अपने आत्मगौरव और अपनी संस्कृति को भुलाने लगेंगे और वैसे बन जाएंगे जैसा हम चाहते हैं.
(2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश संसद में मैकाले द्वारा प्रस्तुत प्रारूप)

अब मुझे ये जानना है कि मैकाले को आखिर किस स्रोत से कोट किया गया हैमैंने इसे तलाशने के लिए ब्रिटिश पार्लियामेंट की साइट और उसकी बताई साइट, ऑनलाइन किताबों की साइट, विकीपीडिया, नेशनल आर्काइव का संदर्भ, मिसौरी सदर्न स्टेट यूनिवर्सिटी, कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की साइट जैसे उपलब्ध स्रोत छान लिए हैंहो सकता है कहीं कुछ छूट रहा होभाषण तो दर्जनों जगह हैलेकिन वो अंश नहीं हैं जो ऊपर लिखे हैंउसका स्रोत आपको दिखे तो जरूर बताइएगाइससे मैकाले के बारे में कुछ बदल नहीं जाएगालेकिन न्याय की इमारत सच की बुनियाद पर खड़ी हो तो बेहतर

दरअसल इतिहास जब लिखा जाता है तो मुख्यधारा का स्वार्थ सबसे अहम पहलू बन जाता हैइसलिए इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होताइतिहास लेखन अनिवार्यत: इस बात से तय होता है कि उसे कौन और किस समय लिख रहा हैआतंकवादी भगत सिहं एक समय के बाद क्रांतिकारी बन जाते हैंपाकिस्तान की किताबों के नायक जिन्ना भारत के टेक्सट बुक में विलेन बन जाते हैं और भारत की किताबों के नायक जवाहरलाल पाकिस्तान में खलनायकऐसे सैकड़ोंहजारों उदाहरण इतिहास में बिखरे पड़े हैं

मैकाले के बारे में बात करने से पहले ऊपर के लिए कोटेशन के बारे में पक्का जान लेना चाहता हूं क्योंकि कई बारबात बारबार बोली जाती है तो सच्ची लगाने लगती हैकिसने कहा था येगोएबल्स ने? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग भोलेपन में कटपेस्ट कर रहे हैं और उसे ही इतिहास समझ रहे हैंवैसे, अगर ऊपर मैकाले को उद्धृत की गई बातों का प्रमाण मिल गया तो अपनी कही बातें वापस ले लूंगा

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3 Responses to “इतिहास का कोई अंतिम सच या निर्णायक पाठ नहीं होता”

  1. ….आत्मगौरव….अपनी संस्कृतिगोएबल्स? गोलवलकर?…एक ही बात है, काम चला लीजिए।

  2. भाई मैकाले की योजना के बारे में संजय आदि मित्रों ने जो बाट कही है वह सही हो या न हो. उनकी योजना चाहे कुछ भी रही हो, पर यह तो सच है ही कि वह भारत को सुधारने नहीं अंग्रेज शासकों का भला करने आए थे. अपने स्वार्थ साधने आए थे. इस क्रम में उन्होने वह काम किया जो चंदू भाई कहते हैं -इस संदर्भ में मैकाले को लेकर मेरी और भी बुरी राय इसलिए बनी हुई है कि अपने मूर्खतापूर्ण ज्ञान-सिद्धांत के जरिए उसने भारतीय समाज में मौजूद पारंपरिक ज्ञान की जड़ ही खोद दी.

  3. इस बारे में मैं और भी खोज कर रहा हूं. कुछ प्रमाण इकट्ठा हो गये हैं और कुछ पर काम जारी है.

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