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Archive for February, 2008

बजट में ऐलान : विश्व के किडनी बाजार पर कब्जा करेगा हिंदुस्तान

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 9, 2008

मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए क्रांतिकारी घोषणा

-दिलीप मंडल

(दरअसल एक मीडिया हाउस में किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट और बजट की खबरें एक ही टेबल पर रखी गई थी और खबर बनाने वाले ने दोनों कों एक ही खबर का हिस्सा मान लियाउन्होंने जो खबर लिखी वो इस तरह है।)

देश के वित्त मंत्री डॉक्टर अमित चिदंबरम ने इस साल के बजट में एक क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा हैबजट 2008 के लिए उनका प्रस्ताव है कि किडनी ट्रांसप्लांट उद्योग के लिए हर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास एक एसईजेड बनाया जाएगाये एसईजेड दस साल तक टैक्स फ्री जोन होंगे और इन एसईजेड में में जबरन किडनी निकालना दंडनीय अपराध नहीं होगाउनके इस प्रस्ताव का सभी दलों के सांसद ने मेज थपथपा कर स्वागत किया

वित्त मंत्री ने कहा कि देश को मेडिकल टूरिज्म से होने वाली आमदनी की सख्त जरूरत हैये आमदनी साल दर साल बढ़ रही है, लेकिन इसकी संभावनाओं का सही तरीके से दोहन नहीं हुआ हैपूरे यूरोप, मिडिल ईस्ट और अमेरिका में भारतीय किडनी का बाजार हैलेकिन इतने बड़े बाजार को अभी तक सही तरीके से टैप नहीं किया गया हैइसलिए अब इस सेक्टर को बूस्ट करने की जरूरत हैजितनी किडनियां भारत में हैं, उसका दुनिया में कोई मुकाबला नहीं हैपहले हम किडनी बाजार पर कब्जा करेंगे और फिर लिवर के बाजार पर

वित्त मंत्री ने कहा कि एसईजेड में किडनी ट्रांसप्लांट होने से ये उद्योग फलेगाफूलेगाटैक्स छूट मिलने से ज्यादा से ज्यादा डॉक्टर इस क्षेत्र में आएंगेइससे रोजगार के मौके बढ़ेंगेडॉक्टर और मेडिकल प्रोफेशन के लोगों को छोड़ भी दें तो जिनकी किडनी निकाली जाएगी, उन्हें भी पैसे मिलेंगेइस तरह हजारों लोगों को आमदनी होगी और देश की जीडीपी भी बढ़ेगीसर्विस सेक्टर और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की तरह ट्रासप्लांट सेक्टर भी देश की तरक्की का कारण बन सकता है

देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं जिनकी किडनी निकाली जा सकती हैहम इस मामले में पूरे विश्व की जरूरतें पूरी कर सकते हैंमांग ज्यादा हो तो हम कुछ लोगों की दोनों किडनियां भी निकाल सकते हैंहम इस मामले में नंबर वन बन सकते हैंभारत फिर से विश्व में सबसे आगे होगा (तालियां)।

वाणिज्य मंत्री ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि किडनी ट्रांसप्लांट एसईजेड में होने के कई फायदे हैंएसईजेड पर कई तरह के कानून लागू नहीं होतेउन्होंने कहा कि कानून मंत्रालय को अंग प्रत्यारोपण अधिनियम में संशोधन करने का प्रस्ताव भेजा है, जिसके बाद किसी की किडनी जबरन निकालना अपराध नहीं होगाबल्कि जो लोग किडनी देने से मना करेंगे उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति होगीकिसी को देश के विकास में आड़े आने की इजाजत नहीं दी जाएगी

इसके अलावा एसईजेड में बाकी अंगों के ट्रांसप्लांट की भी व्यवस्था होगीऐसे एसईजेड एयरपोर्ट के पास होंगे और उनके लिए जमीन एयरपोर्ट अथॉरिटी मुहैया कराएगीइसलिए जमीन अधिग्रहण का भी कोई झगड़ा नहीं होगाविदेश से मरीज आएंगे, अपने जरूरत के अंग की शॉपिंग करेंगे, ट्रांसप्लांट कराएंगे और चले जाएंगेइस तरह हमारे देश में ढेर सारा डॉलर और यूरो आएगा

नेता प्रतिपक्ष ने मांग रखी कि ऐसे एसईजेड को मंजूरी देते समय विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों के साथ भेदभाव किया जाएवित्त मंत्री ने आश्वासन दिया कि सभी राज्य ऐसे एसईजेड के प्रस्ताव केंद्र के पास भेज सकते हैंबोर्ड ऑफ एप्रूवल उन पर समान भाव से विचार करेगा

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ये पोस्ट आपकी आंखों में अंगुली डालकर कुछ कह रही है!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 7, 2008

दिलीप मंडल

कितने आदमी थे? दरअसल एक भी नहीं! सवाल तो आसान था और जवाब भी उतना ही आसान हो सकता था। सवाल था – आपकी जानकारी में क्या कोई ऐसा दलित पत्रकार है जो किसी मीडिया संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर हो। महत्वपूर्ण पद पर का मतलब क्या? फैसला लेने वाले ऊपर के बीस पदों को महत्वपूर्ण मान लीजिए। ये सवाल एक साथ मोहल्ला, कबाड़खाना, इयत्ता और रिजेक्टमाल पर डाला गया था।

जवाब में आए तीन नाम- बनवारी जी, गंगा प्रसाद और ए एल प्रजापति। बनवारी जी अरसा पहले रिटायर हो गए हैं, गंगा प्रसाद जी जनसत्ता में पटना कॉरेसपॉंडेंट हैं और ए एल प्रजापति जी ओबीसी हैं। मुझे अलग अलग संस्थानों में इन तीनों के साथ काम करने का मौका मिला है। दरअसल इस सवाल का जवाब सीधा और आसान-सा है। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के उत्तरार्ध में लोकतांत्रिक देश भारत की मीडिया में एक भी दलित किसी महत्वपूर्ण पद पर नहीं है। दलित मतलब क्या? दलित यानी इस देश का हर छठा आदमी। तो इसमें क्या बात हो गई? बात तो है। इसका असर दरअसल उस कंटेंट पर पड़ता है जो मीडिया बनाता है। सवाल विश्वसनीय होने का है। सवाल उस प्रामाणिकता का है, जिसका मीडिया में दूसरे कई और कारणों से भी क्षरण हो रहा है।

चलिए हम आपको डेढ़ साल पीछे ले चलते हैं। हमने 28 मई, 2006 का दिन चुना और दिल्ली से छपने वाले उन आठ अखबारों केस स्टडी के तौर पर लिया, जो सबसे ज्यादा बिकते हैं। हिंदी और इंग्लिश के इन अखबारों में पहले पेज की हेडलाइन पर नजर डालिए :
– आत्मदाह के प्रयास से जाग उठा अतीत
– आरक्षण की आग-आत्मदाह पर उतरे आंदोलनकारी
– आरक्षण-दो ने किया आत्मदाह का प्रयास
– आरक्षण के विरोध में आत्मदाह की कोशिश
– कटक में मेडिकल छात्र ने किया आत्मदाह का प्रयास
– एंटी रिजर्वेशन स्टर गेट्स फायरी
– मंडल वन-रिरन
– इमोलिशन बिड्स एट कटक, डेल्ही

28 मई, 2006 का अखबार इसलिए क्योंकि 27 मई वो तारीख है जब आरक्षण विरोधी आंदोलन की सबसे बड़ी सभा दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई थी। ये हेडलाइंस और उनकी भाषा जो कह रही है वो तो आप देख पा रहे हैं, लेकिन ये हेडलाइंस कई बातें नहीं बता रही हैं। टेलीविजन की पुरानी खबरों का रिकॉर्ड रखना थोड़ा मुश्किल होता है। लेकिन टेलीविजन कोई अलग कहानी नहीं कह रहे थे। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के रेकॉर्ड से निकालकर उस दिन के टेप देखे जा सकते हैं।

27 तारीख को खुद को जला लेने के दो मामले हुए और दोनों को मीडिया ने आरक्षण विरोधी आंदोलन का हिस्सा बताया। पहला केस तो रामलीला मैदान का ही है। उस दिन जो ऋषि गुप्ता जला था वो बिहार का रहने वाला और हलवाई (अतिपिछड़ी जाति) का है। मैट्रिक फेल ऋषि छात्र नहीं है बल्कि वो पूर्वी दिल्ली में छोटी सी दुकान चलाता था।

ये बात मैं इसलिए जानता हूं क्योंकि जले हुए ऋषि से मिलने 28 मई की रात मैं खुद सफदरजंग अस्पताल पहुंचा था और वहां उसके पिता मुझे वार्ड में रोते हुए मिले। मुझसे जितना बन पड़ा, उनकी उतनी मदद मैंने की थी। वो चाहते थे कि उनके बेटे पर आत्महत्या की कोशिश का मुकदमा कायम न किया जाए। उन्होंने बिहार के एक बड़े नेता से मुलाकात कराने के लिए कहा था और वो काम हो गया था। यूथ फॉर इक्वेलिटी के टॉप नेता और एम्स के रेडियोथेरेपी डिपार्टमेंट के डॉक्टर हर्ष मेरे अच्छे और पुराने परिचित हैं। उन्होंने मीडिया को बाइट दी और लिखित बयान भी जारी किया कि जलने वाले युवक का आरक्षण विरोधी आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

इसके अलावा कटक में जिस छात्र के आत्मदाह की खबर छपी उसके बारे में अखबारों में ही अंदर के पन्नों पर छपा था कि वो डिप्रेशन का शिकार था और उसे अस्पताल में भर्ती इसी वजह से कराना पड़ा था। वहां आत्मदाह की कोई कोशिश ही नहीं हुई थी और ये रिजर्वेशन से जुड़ी घटना नहीं है। इसके बावजूद मीडिया ने इन घटनाओं को खास तरह से देखा और दिखाया।

क्या ये सिर्फ संयोग है? क्या आपने सोचा है कि मीडिया में आरक्षण के पक्ष में कोई संयोग कभी क्यों नहीं होता। धर्म या जाति के सवाल पर जब इस पार या उस पार जैसे सवाल आते हैं तो मीडिया के पैर हमेशा फिसलते क्यों नजर आते हैं? क्या है इसकी वजह? सोचकर बताइए और हां, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है दोस्त। आप सिर्फ ये बताइए कि और सुनने का धैर्य और साहस आपमें है या नहीं। अगर नहीं है तो आपके सुंदर मंगलमय जीवन में उथलपुथल मचाने का मेरा कोई इरादा नहीं है। बगल के कमरे में लाश सड़ रही हो तो भी आपको नींद आ सकती है।

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एक दलित पत्रकार की तलाश है…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 5, 2008

…जो किसी मीडिया संस्थान में महत्वपूर्ण पद पर हो। आप पूछेंगे ये एक्सरसाइज क्यों? बारह साल पहले वरिष्ठ पत्रकार बी एन उनियाल ने यही जानने की कोशिश की थी। 16 नवंबर 1996 को पायोनियर में उनका चर्चित लेख इन सर्च ऑफ अ दलित जर्नलिस्ट छपा था। उस समय उन्होंने प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के एक्रिडेटेड जर्नलस्ट की पूरी लिस्ट खंगाल ली थी। प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची भी देख ली। लेकिन वो अपने मित्र विदेशी पत्रकार को मुख्यधारा के किसी दलित पत्रकार से मिलवा नहीं पाए। उनियाल साहब के काम को पाथब्रेकिंग माना जाता है और इसकी पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी।

1996 के बाद से अब लंबा समय बीत चुका है। क्या हालात बदले हैं? यकीन है आपको? जूनियर लेवल पर कुछ दलितों की एंट्री का तो मै कारण भी रहा हूं और साक्षी भी। लेकिन क्या भारतीय पत्रकारिता में समाज की विविधता दिखने लगी है? अभी भी ऐसा क्यों हैं कि जब मैं पत्रकारिता के किसी सवर्ण छात्र को नौकरी के लिए रिकमेंड करके कहीं भेजता हूं तो उसे कामयाबी मिलने के चांस ज्यादा होते हैं। दलित और पिछड़े छात्रों को बेहतर प्रतिभा के बावजूद नौकरी ढूंढने में अक्सर निराशा क्यों हाथ लगती है? क्या जातिवाद की बीमारी मीडिया के बोनमैरो में घुसी हुई है। क्या हम इसके लिए शर्मिंदा है? क्या हम इस पाप का प्रायश्चित्त करने के लिए तैयार हैं?

( आज ये लिखते हुए मुझे एस पी सिंह याद आ रहे हैं, पत्रकारिता में सामाजिक विविधता लाने के लिए वो हमेशा सचेत रहे। मेरा और मेरी तरह के कुछ दर्जन लोगों का पत्रकारिता में आना उनकी ही वजह से हो पाया। मुझे याद है कि मंडल कमीशन विरोधी आंदोलन के समय उन्होंने आरक्षण के पक्ष में स्टैंड लिया था और टाइम्स हाउस में इस बात के पोस्टर लगे थे कि एसपी सिंह चमार हैं। विरोधों से टकराने की वजह से ही एसपी सिंह एसपी बन पाए। टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के हर बैच में किसी न किसी मुसलमान और अवर्ण छात्र का होना कोई सामान्य बात नहीं है। एसपी सिंह और राजेंद्र माथुर को इसके लिए कितना विरोध झेलना पड़ा होगा, इसकी कल्पना मैं नहीं कर सकता। लेकिन जो धारा के साथ बहे उन्हें कौन याद रखता है? देखिए मरे हुए एसपी का नाम जिंदा लोगों से ज्यादा चर्चा में रहता है)

नस्लवाद की आदिभूमि अमेरिका के फॉक्स और सीएनएन में आपको ब्लैक, हिस्पैनिक और जैना विरजी, अंजली राव और मोनिता राजपाल जैसे भारतीय दिख जाएंगे। ये चेहरे वहां इसलिए नहीं है कि वो अनिवार्य रूप से सबसे टैलेंटेड हैं। दरअसल नस्लभेदी अतीत को लेकर अब वहां पश्चाताप है। इसलिए अब सचेत ढंग से ये कोशिश हो रही है कि अमेरिकी समाज के अलग अलग तरह के चेहरे सभी क्षेत्रों में दिखें। वहां के बड़े कॉरपोरेट गर्व के साथ कहते हैं कि उसके स्टाफ में ब्लैक की संख्या उनकी आबादी से ज्यादा है। अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए एक मिली जुली नस्ल का शख्स आगे बढ़ रहा है और उसे श्वेतों का भी समर्थन है। भारत कब बदलेगा? और क्या आपका भी इसमें कोई योगदान होगा?

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