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अशआर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on March 9, 2008

शेर किसका है मालूम नही. ऐसे ही गालिब-ओ-मीर पर बाते करते आज ये शेर विनय ने सुनाया. जानते वह भी नही कि किसका है. मुझे अच्छा लगा, लिहाजा  आपके लिए भी –

दिल मे रहो जिगर मे रहो नजर मे रहो

सब तुम्हारे ही लिए है चाहे जिस घर मे रहो

अब ये हाल है दर-दर भटकती फिरती है

मुसीबतो से कहा मैने मेरे घर मे रहो.

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11 Responses to “अशआर”

  1. वाह जी वाह..जिसका भी हो बहुत उम्दा है..आभार.

  2. उम्‍दा भी औरदमदार भीखोलता हैमन के द्वार भी.

  3. बहुत बढिया!!!

  4. मुसीबतो से कहा मैने मेरे घर मे रहो.********शेर हमने तो नहीं कहा। पर मुसीबतों से हाउस फुल जरूर है!

  5. बड़े भाई! एक बार कह के देखिए, सब भाग जाएंगी.

  6. acha hai…gurudev,

  7. shadi ke baad bhi kya yah kahne ki jaroorat baaki rah jaati hai ki museebaton mere ghar mein raho.Hari Shanker Rarhi

  8. भाई रार्ही जी आपकी बात तो सोलहो आने सच है. पर मुश्किल यह है की जिसने यह कहा उसके बारे में मुझे यह नहीं मालूम की वह शादीशुदा है या कुंवारा. पुनश्च, उसने यह शेर शादी के बाद लिखा या पहले ही लिख चुका था.

  9. क्या भइया कही ये आपका दर्द तो नही है . वैसे बहुत खूब

  10. अपने दर्द ह! तबे न बुझाइल.

  11. भाई सत्येंद्रजी , दर्द पे नाम थोड़े ही लिखा रहता है !समझे तो दर्द आपका ,नहीं तो किसी और का . हरी शंकर rarhi

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