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Archive for November, 2008

…..इससे कुछ भी कम राष्ट्रीय बेशर्मी है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 29, 2008

मुंबई में समुद्र के रास्ते कितने लोग घुसे थे इस बात का तो अभी तक पता नहीं चल पाया है,लेकिन हथियार से खेलने वाले सभी शैतानों को ध्वस्त कर दिया गया है। हो सकता है कुछ शैतान बच निकले हो और किसी बिल में घुसे हो। हर पहलु को ध्यान में रखकर सरकारी तंत्र काम कर रहा है। बहुत जल्द मुंबई पटरी पर आ जाएगी। यहां की आबादी की जरूरते मुंबई को एक बार फिर से सक्रिय कर देंगी। फिर से इसमें गति और ताल आ जाएगा। लेकिन क्या अब हम आराम से यह सोच कर बैठ सकते हैं कि गुजरात, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों का कोई शहर नहीं जलेगा या नहीं उड़ेगा?
आम आदमी रोजी-रोटी के चक्कर में किसी शहर के सीने पर किये गये बड़े से बड़े जख्म सबसे जल्दी भूलता है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले ब्रेकिंग खबरों की होड़ में मस्त हो जाते हैं, और तब तक मस्त रहते हैं जबतक दुबारा इस तरह की घटना किसी और शहर में नहीं घट जाती, नेता लोगों के सिर पर तो पूरा देश ही, क्या क्या याद रखेंगे ???? पढ़े-लिखे लोगों की अपनी सिरदर्दी है, कोई इस ऑफिस में काम कर रहा है, तो कई उस ऑफिस में। अपने बड़े अधिकारियों की फटकार से ही ये लोग भी सबकुछ भूल जाएंगे, और जो बचा-खुचा याद रहेगा वो इनकी बीवियों या तो चुम्मे लेकर या फिर लड़ कर भूला देंगी। हर राष्ट्रीय आपदा के बाद यही भारतीय चरित्र है।
यह कंप्लीट वार है, और इसे एक आतंकी हमला मानकर भूला देना बहुत बड़ी राष्ट्रीय बेशर्मी होगी। और हम से कोई भी इस बात का यकीन नहीं दिला सकता कि अगला निशाना कौन सा शहर होगा, लेकिन हमला होगा और जरूर होगा। ये कंट्री के हेरिटेज पर पर हमला है, जो वर्षों से जारी है और जारी रहेगा। वर्षों से हमारे हेरिटेज पर हमले होता आ रहे है,चाहे वो संसद हो या फिर मुंबई का ताज। यह एक ही कड़ी है। और इस कड़ी का तार लादेनवादियों से जुड़ा है। इस्लाम में फतवे जारी करने का रिवाज है। क्या इसलाम की कोई धारा इनके खिलाफ फतवे जारी करने को कहता है,यदि नहीं कहता है तो इसलाम में संशोधन की जरूरत है। इतना तो तय है कि यह हमला इस्लाम के नाम पर हुआ है। जो धारा जीवित लोगों को टारगेट बना रहा है, उसे मिट्टी में दफना देने की जरूरत है। भारत एक ग्लोबल वार में फंस चुका है, अपनी इच्छा के विरुद्ध। मुंबई घटना को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए।
हां गेस्टापू के बाद बच्चों को गब्बर की जरूरत नहीं पड़ेगी…..मां कहेंगी….बेटा शो जा…….भारत बुद्ध का देश है, गेस्टापू हमारी रक्षा कर रही है….बड़ा होकर तूभी गेस्टापू बनना…ताकि तेरे बच्चे चैन से सो सके, तेरी तरह।
यह वार है और चौतरफा वार है। बस पहचानने की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे चर्चिल ने हिटलर के ऑपरेशन 16 को पहचाना था, और उसके ऑपरेशन को ध्वस्त करने लिए काउंटर ऑपरेशन लॉयन बनाया था। उन लोगों का टारगेट क्या है ? कभी लंदन को उड़ाते हैं, कभी ट्वीन टावर उड़ाते हैं, कभी जर्मनी को उड़ाते हैं,कभी मुंबई को। ये कौन लोग हैं और क्या चाहते हैं ? इसे आईटेंटीफाई किया जाना चाहिए। और इसके खिलाफ व्यवस्थित तरीके से इंटरनेशनली इनवोल्व होना चाहिए। चीन और जापन में इस तरह के हमले क्यों नहीं हो रहे हैं ??
एनएसजी के मेजर उन्नीकृष्ण को सच्ची श्रद्धांजलि इनलोगों के विनाश से ही होगी। इससे कुछ भी कम राष्ट्रीय बेशर्मी है
….तलाशों और खत्म करो….मोसाद एक बार इस सिद्धांत को प्रैक्टकल रूप दे चुका है।
लोहा लोहे को काटती है, और इसका इस्तेमाल सभ्यता को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। इसमें एक तरफ वो लोग है जो इन्सान को मारते हैं, और दूसरे तरफ वो लोग है जो सभ्यता को बचाने के लिए एसे लोगों को मारते हैं। दुनिया एक नये सेटअप में आ रहा है,एक नेशन के तौर पर भारत को विहैव करना ही होगा,अंदर और बाहर दोनों।
लादेनवादियों को भारत के मस्जिदों से फतवा जारी करके इस्लाम से बेदखल करना ज्यादा अच्छा होगा। क्या मसजिदों से इमाम एसी फतवायें जारी करेंगे ?

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झलकियां मुंबई की

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 29, 2008

श्रद्धांजलि के लिए होड़
मुंबई की सड़कों पर हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे को श्रद्धांजलि देने की होड़ राजनीतिक पार्टियों में होड़ लगी हुई है। भाजपा और समाजवादी पार्टी कुछ ज्यादा तेजी दिखा रहे हैं। कल रात पूरे मुंबई में इन दोनों दलों की ओर से हेमंत करकरे, विजय सालस्कर और अशोक काम्टे के बड़े-बड़े पोस्टर सड़कों के किनारे लगाये गये। इन पोस्टरों पर मोटे-मोटे अक्षरों में उन्हें श्रद्धांजलि दिया गया है।
शराबखानों में सन्नाटा
मुंबई के शराब खानों में सन्नाटा है। अच्छे-अच्छे शराबियों की फटी पड़ी है। जीभ चटचटाने के बावजूद वे लोग शराबखानों की ओर मुंह नहीं कर रहे हैं। शराब बिक्री 70 फीसदी की कमी आई है। हार्ड कोर दारूबाज ही रिस्क लेकर दारू की दुकानों पर पहुंच रहे है। बारों में तो भूत रो रहा है। तीन दिनों से बारों में चहल-पहल पूरी तरह से ठप्प है। अंधेरी के आर्दश बार में कभी रात भर दारूबाजों की भीड़ लगी रहती थी, खूब बोतले खाली होती थी। अब यह पूरी तरह से ठप्प है।
फुटपाथ की बिक्री ठप्प
चर्चगेट के पास सड़क के किनारे दुकान लगाने वाले लोगों का धंधा पूरी तरह से बंद है। यहां पर करीब दो किलोमीटर तक छोटे-छोटे दुकानदार बैठा करते थे। यहां पर मौसम के मुताबिक हर तरह के कपड़े सस्ते दामों में बेचे जाते थे। मुंबई की आम आबादी यहीं से अपने लिए जरूरी समानों की खरीददारी करती थी। फिलहाल यह कारोबार पूरी तरह से बंद है। यहां पर प्रत्येक दिन लाखों का व्यापार होता था।
खाली खाली सा आजाद मैदान
चर्च गेट के सामने का आजाद मैदान,जो हमेशा लोगों से भरा रहता था,पूरी तरह से खाली है। इस मैदान में एक बार में 20-25 टीमें क्रिकेट खेला करती थी। अब इस मैदान में एक आदमी भी नहीं दिखाई दे रहा है। इस मैदान के अगल-बगल छोटे-मोटे खोमचे वाले भी रोज का धंधा किया करते थे। उनका धंधा भी पूरी तरह से चौपट हो गया है। चर्च गेट के पास सिघनम कॉलेज, केसी कॉलेज, एक महिला कालेज है। ये सब के सब बंद पड़े हैं। इन कालेजों की वजह से यहां पर लड़के और लड़कियों की भीड़ अक्सर होती थी। अब सब गधे के सिर से सिंघ की तरह गायब है।
मुंबई हाईकोर्ट में पसरा सन्नाटा
मुंबई के हाईकोर्ट में भी पूरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ है। वकीलों,पेशकारों और मुवक्किलों से भरा रहने वाला यह कोर्ट पूरी तरह से खाली है।
नरीमन प्वाइंट की सभी आफिसे बंद
नरीमन प्वाइंट की सड़कों पर रफ्तार से दौड़ने वाली गाडियों की संख्या पूरी तरह से कम गई है। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दे रहा है। समुद्री लहरे अभी भी समुद्र के किनारे बने ढलानों से टकरा रही है, लेकिन इनका संगीत सुनने वाला कोई नहीं है। यहां पर अक्सर युगल प्रेमियों का जोड़े मस्ती में एक दूसरे से लिपटे हुये दिखाई देते थे, लेकिन अब यहां पूरी तरह से विराना पसरा हुआ है। समुद्री हवा के लिए सुबह और शाम को यहां पर टहलने फिरने वाले बुजुर्ग भी घरों में दुबके हुये हैं। यह मुंबई का पारसीबाहुल इराका है, और व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण है। लगभग सभी प्रमुख कंपनियों के दफ्तर इसी इलाके में है, जो फिलहाल पूरी तरह से बंद हैं। एक अनुमान के मुताबिक इस इलाके में विभिन्न कंपनियों के करीब 25 हजार ऑफिस हैं। यदि कोलाब से नरीमन प्वाइंट तक लिया जाये तो इनकी संख्या 2 लाख से भी अधिक हो जाएगी। सब के सब बंद है। ओबराय होटल तो पूरी तरह से तहस नहस हो चुका है।
खाली दौड़ रही हैं बेस्ट की बसे
मुंबई की सड़कों पर खचाखच भरी रहने वाली बेस्ट की बसे खाली ढनढना रही हैं। कभी बस स्टापों पर भीड़ लगी रहती थी, अब इकादुका सवारी ही बस स्टापों पर नजर आ रहे हैं।

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टक्कर लादेनवादियों से है

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 29, 2008

कुत्ते की तरह पिटाई के बाद अजमल आमिर कमाल ने बहुत कुछ उगला है। यह फरीदकोट का रहने वाला है, जो पाकिस्तान के मुलतान में पड़ता है। इसने बताया है कि पाकिस्तान में 40 लोगों को दो राउंड में ट्रेनिंग दिया गया और मुंबई शहर पर हमला करने की तैयारी पिछले एक साल से चल रही थी। इसके लिए खासतौर पर पाकिस्तान और बांग्लादेश से लोगों को भरती किया गया था। मबई की गहराई से थाह ली गई थी, ये लोग यहां पर कई राउंड आये भी थे।
जिस समय ये सारी योजनाएं बनाई जा रही थी, लगता है उस समय रॉ के अधिकारी घास छील रहे थे। यदि समय रहते वे दूर दराज के मुल्कों में इस तरह की योजनाओं का पता नहीं चला सकते तो उनपर सरकारी पैसा बहाना फिजूल की बात है। रॉ को भंग कर देना बेहतर होगा। एक के बाद एक जिस तरह से भारत के बड़े-बड़े शहरों को निशाना बनाया जा रहा है,उसे देखकर कहा जा सकता है कि रॉ के काम करने के तरीके में कहीं कुछ गड़बड़ी है।
किसी जमाने में हाथों में बैंक के फाइल लेकर इधर से उधर घूमने वाले भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कल आपात बैठक में बैठे हुये थे, भारत की इंटेलिजेंसिया के अधिकारियों के साथ। काफी माथापच्ची करने के बाद किसी लाल बुझ्झकड़ टाइप के सलाहकार ने इन्हें (हालांकि प्रधानमंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह की स्थिति एक सलाहकार से भी बद्तर है। ) स्पेशल कमांडो फोस के गठन की बात कही, ताकि इस तरह के हमलों से तुरंत निपटा जा सके।
खाताबही देखने वाले प्रधानमंत्री की खोपड़ी में यह बात क्यों नहीं घुस रही है कि अब सवाल इस तरह के हमला के बाद की स्थितियों से निपटने का नहीं है, बल्कि इस तरह के हमलों को रोकने का है। कंट्री को डिफेंस की मुद्रा में लेना एक मनोवै्ज्ञानिक भूल है। जरूरत है एक एसे मैकेनिज्म बनाने की जो इस तरह की योजना बनाने वालों के बीच में अपनी पैठ बनाये, और उन्हें लपेट मारे। अपनी गोलपोस्ट को बचाने से अच्छा है गेंद को सामने के गोलपोस्ट में धकेलते रहे, यानि अटैक इज द बेस्ट पोलिसी। जरूरत है आतंकियों को डिफेन्सिव करने का और यह अटैक से संभव हो सकता है।
खाताबही देखने वाले प्रधानमंत्री के बस की बात नहीं है कि वह इतना दूर तक सोच सके। उनकी औकात मदारी वाले बंदर से जादा नहीं है,फर्क सिर्फ इतना है कि उनके गले में रस्सी नहीं है। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, दसों इंद्रियों से अपने आका की बात वह खूब समझते है। और नहीं भी समझते है तो अपनी मुंडी का इस्तेमाल वह वैसे ही करते हैं मानों सब समझ रहे हैं।
रूस की खुफिया एजेंसी इस मामले में अलकायदा की ओर इशारा कर रही है। यदि इस पर यकीन करे तो इसके तार सीधे लादेन और उसके गिरोह से जुड़ता है। और इसलामिक पद्धति पर उसका युद्ध का नमूना पूरी दुनिया देख चुका है। ट्वीन टॉवर की लपलपाती लुई लपटों को याद कर लीजिये, और फिर ताज से निकलते लपटों को। टक्कर लादेनवादियों से है। और इनकी चौतरफा पिटाई होनी चाहिए।
नरीमन हाउस में पांच यहूदियो को शैतानों ने मार डाला है, मोसाद वाले भारत आने के लिए छटापटा रहे हैं। मोसद वालों को इस तरह के मामलों से निपटने का अच्छा खासा अनुभव है। इस मुद्दे पर इनके साथ लम्बे समय का घठजोड़ किया जा सकता है, बिना कागज पत्तर के। एफबीआई की एक टीम भी भारत आ रही है। एफबीआई वाले अपने तरीके से इस मामले को समझेंगे, इनसे भारत को कुछ खास लाभ नहीं होने वाला है। औपचारिकता पूरी करके इनको भेज देना चाहिए। एशिया में -खासकर मिडिल ईस्ट में-एफबीआई का खुद का नेटवर्क कमजोर है। अफगानिस्तान और इराक पर हमला के बाद मिडल ईस्ट में इन्हें अपने लिए काम करने वाले एजेंटे नहीं मिल रहे हैं।
मुंबई पर लादेनवादियों शैतानों की एक टुकड़ी ने हमला किया है, यह मान लेना कि और हमले नहीं होंगे, अपने आप को धोखे में रखना है। इससे निपटने के लिए हर लेवल पर कमर कसनी होगी। खाताबही वाले प्रधानमंत्री से कुछ भी उम्मीद करना बेकार है। मैरी अंतोनियोत को डेमोक्रेटिक तरीके से चूल्हे चौकों में लगाने की जरूरत है।

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मांद में घुसकर सफाया करने की जरूरत

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 28, 2008

भारत में आतंकवाद का फन कुचलने के लिए एक लंबी स्ट्रेटजी की जरूरत है,मुंबई पर हुआ संगठित हमला से यही सबक सीखने की जरूरत है। भारतीय नेशन स्टेट को आधुनिक तरीके से काम करना होगा, हर लिहाज से,और पूरी तरह से संगठित होकर। इसके लिए गेस्टापू जैसी कोई चीज चाहिए ही चाहिए। यह कई लेवल पर काम करेगा और बिंदास अंदाज में।
अभी-अभी मुंबई के एक रहने वाले एक यंग लड़के ने संगठिततौर पर ऊंचे लेवर पर काम करने का एक तरीका कुछ इस तरह से बताया।
उसी के शब्दों में…
वे लोग अफजल को मांग रहे हैं…उन्हें दे दो। लेकिन नकली अफजल…साइंस बहुत आगे निकल गया है…चेहरे और हुलिया चुटकियों में बदल जाएंगे…उनके बीच अपने आदमी घुसाने की जरूरत है, जो उनको लीड करे। इसके पहले कांधार में भी जब उन्होंने अपने लोग मांगे थे एसा ही करना चाहिए था…थोड़ा रिस्क है, लेकिन मुझे लगता है कि भारत के नौजवान इस रिस्क को इन्जॉव करेंगे। भारत के नक्शे पर जो कश्मीर दिख रहा है उसकी आधी से अधिक जमीन तो उधर घुसी पड़ी है…पूरे पर कब्जा करने की जरूरत है….वो साले कुछ नहीं कर पाएंगे…एक बार में सूपड़ा साफ हो जाएगा….दुनिया की एसे ही फटी पड़ी है…कोई टांग नहीं अडाएगा…सब साले अपने आप को बचाने में लगे हुये है…चीन को समझा देने की जरूरत है…भारत आपना नक्शा वापस लेने जा रहा है…अपने आप को दूर ही रखो..वे लोग वाउं टाउं माउं बोलेंगे…तो इधर से हमलोग भी वाउं टाउं माउं कर के ठोक देंगे….मामला खलास। यहां तो कुछ भी करने से पहले ऑडर लो…और ऑडर देने वाले पांच साल ऑडर लेने में ही लगा देते हैं…एसे कहीं सिस्टम चलता है….
यह लड़का उत्साह में था, बकवास ही सही, लेकिन अच्छा बकवास कर रहा था। गेस्टापू जैसी चीज की यह एक बानगी सो सकती है…इसके अतिरिक्त और भी बहुत कुछ हो सकता है…उनके मांद में घुसकर उनका सफाया किया जा सकता है….गोस्टापू न सही मोसाद जैसा कोई चीज तो बनाया ही जा सकता है…मोसदा भी न सही, अपने चाणक्य ने खुफियागिरी का जो सिस्टम दिया है उसे तो अपनाया ही जा सकता है…विष कन्या से सुपर कंसेप्ट क्या हो सकता है….? कितना पेशेवराना अंदाज था विष कन्या कंसेप्ट का। होने को बहुत कुछ हो सकता है, बस जरूरत है सही दिशा में सोचने की। इन संगठित हमलावरों से पेशेवर अंदाज में ही निपटा जा सकता है….
मुंबई पर भावुक स्टोरियां और विचार पढ़ने से उबकाई आ रही है। जरूरत है जमीन के दो फीट नीचे और आसमान के दो फीट ऊपर से सोचने की….स्ट्रेटजी के तहत, पेशेवर अंदाज में। नहीं तो मुंबई जैसे और भी मंजर देखने को मिल सकते हैं।

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राष्ट्रीय मीडिया को वार जोन की तमीज नहीं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 28, 2008

समुद्री सुरक्षा को भेदते हुये मुंबई टारगेट को बहुत ही पेशेवराना तरीके से अंजाम दिया गया है। इनकी मंशा चाहे जो भी रही हो, लेकिन हमला का यह अंदाज एक स्पष्ट रणनीति की ओर संकेत कराता है। इनके पास से एक सीडी में बंद मुंबई शहर का पूरा खाका मौजूद था और इनके पास से बरामद राशन पानी से स्पष्ट हो जाता है कि ये लोग फील्ड में अधिक से अधिक समय तक टीक कर हंगामा मचाने के इरादे से लैस थे। इनका एक्शन एरिया पांच किलोमीटर के अंतर था, हालांकि इनके एक्शन एरिया को समेटने के लिए एटीएस ने शानदार तरीके से काम किया। ये लोग एक साथ कई टारगेट को हिट कर रहे थे।
ताज और ओबराय में ए ग्रेट के सिटीजन ही जाते हैं और यहां पर विदेशी आगंतुको का भी भरमार रहता है। यदि ताज से निकलने वाले एक बंदे की बात माने तो ये लोग ये लोग अमेरिकी पासपो्रट धारियों को पकड़ने पर ज्यादा जोर दे रहे थे। वीटी रेल्वे स्टेशन पर इनलोगों ने आम आदमी को टारगेट पर लिया। कोलाबा में उतरने के बाद ये लोग कई टुकडि़यों में बंट गये थे। करकरे,आम्टे और कालस्कर इनके अभियान में इन्हें बोनस के रूप में मिले। अपने इस अभियान के प्रारंभिक दौर में इन्होंने भारत के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की बेवकूफियों का भी खूब फायदा उठाया। वारजोन के करीब कैमरा लेकर डटे हुये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों ने अपने कैमरे का मुंह खोलकर ताज और ओबराय के अंदर बैठे इन लौंडों को बाहर की स्थिति से अवगत कराते रहे। टीवी पर चैनल बदलते हुये ये लौंडे बाहर चलने वाली एटीएस की गतिविधियों को देख और समझ रहे थे जबकि एटीएस वाले उस वक्त अपने कमांडर की हत्या के बाद अपने आप को ऑगेनाइज करने की कोशिश कर रहे थे।
ये लौंडे सीमा पार से भी लगातार कम्युनिकेशन में थे और वहां बैठे लोग भी भारत की इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कृपा से वार जोन की गतिधियों पर नजर रखते हुये ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौडों को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने के लिए हांक रहे थे। इससे एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को वार जोन की रपट करने की तमीज नहीं है। चूंकि वार जोन एक शहरी इलाका था,इस लिहाज से चौगुनी सतकता की स्वाभाविक मांग थी। बाद में एटीएस वालों के कहने पर मीडियावालों को भेजे में बात घुसी, जबकि यह पहले ही घुस जानी चाहिए थी। तब तक काफी नुकसान हो गया था। ताज और ओबराय के अंदर बैठे लौंडे मोबाइल फोन से टीवी वालों को धड़ाधड़ फोन करके अपनी बाते रख रहे थे और टीवी वाले यंत्रवत अनजाने में उनकी बातों को बिना कट के लोगों तक कम्युनिकेट कर रहे थे और तरह से उनके मिशन को आगे बढ़ा रहे थे।
रात भर की लड़ाई के बाद हिंदी, अंग्रेजी और क्षेत्रीय भाषाओं की दैनिक अखबारों ने भी खबरों प्रेषण के दौरान अपने हेडलाइनों में आतंकियों की शब्दावली का ही इस्तेमाल किया। कई अखबारों ने मुंबई पर फिदायीन हमला जैसा हेडलाइन हगाया। भाई यह फिदायीन क्या होता है। कम से कम एक बार इस शब्द के मतलब तो देख लिये होते। कम्मीर से निकलने वाले तमाम अखबारों और वहां पर काम करने वाले तमाम पत्रकारों को आतंकियों ने धमका रखा लै कि उनके लिए मुजाहिदीन और फिदायीन जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाये। अपनी शब्दावली वे जबरदस्ती लोगों के जुबान पर चढ़ा रहे है, और हमारे देश की प्रिंट मीडिया भी उन्हीं की शब्दावली ढोकर उनके मिशन को आगे बढ़ाने में लगी है। राष्ट्रीय अखबारों से इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती है वे अपनी शब्दावली खुद गढ़े। यदि एसा करने की क्षमता नहीं है तो कम से कम उनकी शब्दावली का तो इस्तेमाल नही करे। बहरहाल जिस तरह से इनलोगों ने पेशेवराना अंदाज में मुंबई में पांच किलोमीटर के दायरे को वार जोन में तब्दील कर दिया, उसे लेकर चिंतित और निराश होने के बजाय की जरूरत नहीं है। चूंकि अभी लड़ाई चल रही है। हर किसी को जो जहां है उन्हें ध्वस्त करने के लिए अपनी पूरी उजा लगानी चाहिए। ताज और ओबराय को तो हमलोग बना लेंगे….लेकिन हमारे शहरों में खेली गई इस खून की होली का, जवाब ठंडे दिमाग से सि्रफ और सिफर् गेस्टापू ही हो सकता है। अपने नेशन को बचाने के लिए हमें भी उसी स्तर पर पेशेवर होना होगा…हो सके तो उनसे भी ज्यादा।

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मुंबई का वार जोन

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 27, 2008

1.
मुंबई उड़ गई
…अबे साले कहां है
… ….क्या हुआ ? ….
…तेरी मां की…जो पूछ रहा हूं, वो बता….
..साले होश में रह, नहीं तो घुसेड़ दूंगा…
…बेटा मुंबई उड़ गई है….
..हुआ क्या… ..
…तेरी मां की…बेटा मुंबई उड़ गई है,और मझे रिपो्रट चाहिये..और हां कुछ..चल बात में बाद होती है…दीपक के कुछ कहने के पहले ही, उधर से फोन की लाईन कट गई। –
——————–
2.
–साला, अखबार का सारा स्टॉक की खलास है। रात भर की अफरातफरी के बाद का कुछ आलम यह था। ठसाठस भरी रहने वाली बसे खाली खालीदौड़ रही थीं। ओशिवारा बस डिपों में बसों की कतार लगी हुई थी। रातभर की गतिविधियों के बाद मुंबई की सड़कों पर दीपक चलता जा रहा था। बदलते दृश्यों के बीच दीपक की आंखों के सामने रात की घटनाएं तेजी से तैर रही थी।
3.
….बहन की भूत, कहां पहुंचा,…
…पता नहीं……साले बार जोन में घुस,…..
.लेकिन ये है किधर… .
..बहन की भूत,वहां तू बैठा है…
दीपक के कुछ कहने के पहले ही, उधर से फोन की लाईन एक बार फिर कट गई।…………
4.
….अबे साले कहां है…..
…दारू पी रहा हूं…..
…कहां…..
.दारू खाना में….
…निकल वहां से,वार जोन खोज में घुस…..
.वार जोन, ई का होता है…लड़ाई किधर हो रही है…..
…मुंबई में…
..आधा दाड़ू बचा हुआ है……
…गटक और निकल..
फोन पर बकबकाने के बाद दीपक आगे बढ़ता जा रहा था….

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यदि संभव हो तो गेस्टापू बनाओ

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 27, 2008

सडे़-गले हुये एक बर्बर समाज के बीच एक खूबसूरत नौजवान बड़ा होता है, अपने चाचा के धंधे में हाथ बटाते हुये तिजारत की भाषा सीखता है। बाद में एक अमीर विधवा का कारोबार बड़ी मेहनत और लगन से संभालता है। वह अमीर विधवा उसके ऊपर फिदा होती है। उसके साथ शादी करने के बाद उसे दिन प्रति दिन के जीवन की जरुरतों से मुक्ति मिल जाती है।
अब वह अपने अगल बगल के परिवेश को पुरी नंगई में देखता है और आंखे बंद कर सोचता है…बस सोंचता ही जाता है, सोंचता ही जाता है….घंटो, दिनो.. महीनों–वर्षों। लोगों के विकृत जीवन उसकी बंद आंखों में घूमते हैं..बार-बार, लगातार। वह हैलूसिनेशन की स्थिति में आ जाता है…उसे अपने अगल-बगल अनजान सी आवाज सुनाई देती है। पहली बार इस आवाज को सुनकर वह डरता है…अपनी पत्नी को बताता है…उसकी पत्नी उसकी बातों में यकीन करती है और उसे समझाती है इस आवाज को वह लगातार सुने…और समझने की कोशिश करे। बस इसी आवाजा के सहारे वह पैंगम्बर का रूप अख्तियार करता है।
उसके दिमाग में समाज को एक धागे में बांधने का प्रारुप तैयार होता है…उसको अमली जामा पहनाने के लिए उसे तलवार का सहारा लेना पड़ता है…क्योंकि उसे यकीन है कि उसके अगल-बगल बर्बता में डूबे हुये लोग उसकी बात नहीं सूनेंगे। अपनी सोंच को धरती पर उतारने के लिए वह हथियार बंद लोगों की एक फौज तैयार करता है…उनके दिमाग में एकता और समानता की बात कूट-कूट कर भरता है और साथ ही यह भी बताता है कि यह एकता सिर्फ और सिर्फ तलवार से हासिल की जा सकती है। उसके फौज देखते ही देखते धरती के बहुत बड़े भू-भाग को अपने अधिकार में ले लेते हैं और समय के साथ हैलूसिनेशन की अवस्था में कहे गये उसके शब्द एक जिंदा धर्मग्रन्थ का रूप अख्तियार करता है।
पृथ्वी छोड़ने के पहले वह घोषणा करता है कि वह अंतिम बंदा है, जिसके साथ ईश्वर ने अपने रसुल के माध्यम से संवाद स्थापित किया है। अब इन्सान को राह दिखाने वाला कोई नहीं आएगा…और इसी के साथ एक बहुत बड़ी आबादी के अक्ल पर हमेशा के लिए पट्टी बांध देता है। अन्य सभ्यताओं के साथ उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था कई धाराओं में बहती है….आज मुंबई शहर में जो कुछ हुआ है, वह इन्हीं धाराओं में से एक है।
मुंबई के रंगमंच पर अभी-अभी जो दृश्य देखने को मिल रहे हैं, एक अनवरत जारी नाटक के हैं,जिसका क्लामेक्स अपने आप को अंतिम पैंगम्बर घोषित करने वाला नौजवान हैलूसिनेशन की स्थिति में बहुत पहले लिख चुका है। इस नाटक के दायरे में कोई एक देश या सीमा नहीं, बल्कि दुनिया पूरी आबादी आती है…इस नाटक को तबतक चलना है, जबतक पूरी दुनिया उसके हैलूसिनेशन के सामने सिर नहीं झुका देती…इस धारा की सीधी सी फिलॉसफी है या तो सिर झुकाओ या फिर सिर कटाओ।
सभ्यताएं एक दूसरे से टकराते हुये ही आगे बढ़ती हैं…पृथ्वी पर इनसान की कहानी सभ्यताओं के टकराव की कहानी है। नेशन-स्टेट्स की आधुनिक अवधारणा सभ्यताओं के बीच के इस टकराव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दुनिया किसी एक वाद या एक धर्म से चलेगी इससे बड़ी मूर्खता की बात और कुछ नहीं हो सकती। सवाल है इस तरह के वाद पर चलकर आमलोगों को टारगेट बनाने वालों को रोकने का। दुनियाभर के विभिन्न नेशन स्टेट्स अपने-अपने तरीके से इस तरह की खोपड़ी वालों को रोकने के लिए मैकेनिज्म बनाने और उसे सफाई के साथ चलाने में जुटे हुये हैं।
भारतीय नेशन स्टेटे की अपनी खास विशेषताएं और जटिलताएं हैं, इन्हें ध्यान में रखकर ही एक मजबूत मैकेनिज्म को बनाया जा सकता है। लेकिन इस नेशन स्टेट में रहने वाले सभी लोगों को यह स्वीकार करना ही होगा कि अंतिम पैंगम्बर की हैलुसिनेएशन का कट्टरवादी असर इस सभ्यता के वाहकों के एक हिस्से पर मजबूती से है।
सलमान रुश्दी जब सैटेनिक वर्सेज लिखता है तो भारतीय नेशन स्टेट उसकी किताब पर प्रतिबंध लगता है, क्यों ? जबकि यह किताब अमेरिका और ब्रिटेन में धड़ल्ले बिकती है। अंतिम पैंगंबर के हैलूसिनेशन पर तर्क के तलवार तो चलाने ही होंगे।
जो धर्म, चाहे वह कोई भी क्यो न हो, यदि अपने विस्तार के लिए इनसानी खून मांगता है, उसे कब्र में घूसेड़ दिया जाना चाहिए, और घूसेड़ दिया जाएगा। ईश्वर के नाम पर इनसान का खून बहाना,ईश्वर को गाली देना है। यदि कोई ईश्वर और उसके व्यवस्था को बनाने और बनाये रखने के नाम पर खून बहाने की बात करता है, तो एसे लोगों को उसी के हथियार से निपटने की जरूरत है। मुंबई न तो शुरुआत है, न ही मध्य और न ही अंत। अनवरत जारी एक मानवविरोओधी धारा का एक व्यवहारिक पक्ष है। इस धारा को रोकने के लिए वैचारिक स्तर पर खुद पैगंबर के मानवतावादी अनुयायियों को आगे आना होगा, और व्यवाहारिक स्तर पर भारतीय नेशन स्टेट को एक मजबूत मैकेनिज्म बनानी होगी….यदि संभव हो तो गेस्टापू की तरह।

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लपटों में सबकुछ जलेगा–तेरा झूठ भी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 26, 2008

तुमने हमे स्कूलों में पढ़ाया
कि देश को तुमने आजाद कराया,
हमने मान लिया,क्योंकि हम बच्चे थे।

हमारी खोपड़ी में दनादन कूड़ा उड़ेलेते रहे
और उसकी बदबू से उकता कर
जब भी हमने सवाल किया,
तुमने कहा, परीक्षाये पास करनी है तो पढ़ते जाओ,
और हम पढ़ते रहे, क्योंकि परीक्षाये पास करनी थी।

विज्ञान और गणित के सवाल तो ठीक थे,
लेकिन इतिहास के सवाल पर तुम हमेशा मुंह मोड़ते रहे,
और बाध्य करते रहे कि तुम्हारी सोच में ढलू
अच्छे और बुरे की पहचान तुम्हारी तराजू से करूं

कभी तुमने नहीं बताया, लेकिन अब समझ गया हूं
कि इतिहास पढ़ने और पढ़ाने की चीज नहीं है,
यह तो बनाने की चीज है।

मौजूदा सवालों से रू-ब-रू होकर
आज मैं तुमसे पूछता हूं—-
देश के टूटते ज्योगरफी की झूठी गौरव गाथा तुने क्यो लिखी ?
क्यों नहीं बताया कि हमारी सीमाओंका
लगातार रेप होता रहा, कभी अंदर से तो कभी बाहर से ?
तुमने सच्चाई को समझा नहीं ?
या तुम्हारे अंदर सच्चाई को बताने का साहस नहीं था?
या फिर सोच समझकर अपनी नायिकी को हमारे उभर थोपते रहे ?

तुमने वतमान के साथ-साथ खुद को धोखा दिया,
अब तेरी झूठी किताबें और नहीं…!!!
तेरी झूठ की कब्र तो खोदनी है,
रेगते हुये जन्तुओं की तरह
इतिहास से तुझे बेदखल तो होना ही पड़ेगा.

सवाल तेरा और मेरा नहीं है,
सवाल है कोटि-कोटि जन के दिमाग
में चिन्गारी छिटकाने की
क्योंकि चिंगारी ही तो लपटे बनती हैं,
और मुझे यकीन है,
इन लपटों में सबकुछ जलेगा—तेरा झूठ भी।

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मुंबई में नापतौल की घपलेबाजी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 26, 2008

मुंबई के किराना दुकानों में नापतौल के लिये इस्तेमाल किये जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक तराजुओं में मामूली सी घपलेबाजी है, लेकिन इससे दुकानदारों को अच्छा खासा लाभ हो रहा है। दुकानदार सामानों के नापतौल में 15 से 20 ग्राम का बट्टा मार रहे हैं। चावाल,दाल और गेहू जैसे खाद्य सामग्री पर इनके द्वारा मारे गये बट्टे को तो कोई खास असर नहीं पड़ रहा है, लेकिन जीरा,लाल मिरच, इलायची, दालचीनी, गोलकी, काजू, किसमिस आदि पर ये लोग 15-20 ग्राम का बट्टा मारकर अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं,चूंकि इन सामानों का वजन कम होता है और कीमत ज्यादा।
नापतौल की व्यवस्था पर नजर रखने वाले अधिकारी भी इस बात से अच्छी तरह अवगत हैं कि दुकानदारों ने अपने इलेक्ट्रॉनिक नापतौल की मशीनों गति बढ़ा रखी है। लेकिन दुकानदार इनकी भी जेबे गरम करते रहते हैं, इसलिए ये लोग अपनी इस उपरी कमाई को बंद करना नहीं चाहते हैं। इसके अलावा दुकानदारों से इन्हें कम कीमत पर अपने घरों के लिए महीनवारी सामान भी मिल जाते है।
मीट और मूरगों के दुकानों में इस्तेमाल किये जाने वाले बाटों और तराजुओं में भी 50 से 100 ग्राम के बीच डंडीबाजी चल रही है। ये लोग पैसे चोखे लेकर सामान कम दे रहे हैं। इस मामले में शिकायत करने पर आगे बढ़ो की बात कहकर ग्राहकों का अपमान करने से भी बाज नहीं आते हैं। यहां पर मछली के कई बाजार तो बिन नापजोख के ही चल रहे हैं। आप मछली पसंद कीजिये और उसकी कीमत के मोलभाव में जुट जाइये। एक मछली की कीमत वो 200 सौ से 300 सौ रुपये बताएंगे। यदि मोलभाव में आप माहिर हैं तो यह मछली आपको 50 से 100 रुपये के बीच आपको मिल जाएगी। यह पूरी तरह से आपके मोलभाव के गुण पर निभर करता है।
बड़े-बड़े मॉलों में नापतौल को लेकर तो कोई खास गड़बड़ी नहीं है, लेकिन आद्य-पदाथो को छोड़कर कीचन से संबंधित अन्य सामानों के दाम बहुत ही अधिक है। हालांकि ये सामान आपको ब्रांड का सुकून जरूर देते हैं। वैसे मुंबई की लोयर और मिडिल क्लास आबादी इन मॉलों से दूर ही रहती है। ये लोग मुंबई के गली-कूचों से ही किराना के सामान खरीदने में यकीन रखते हैं। मॉलों में घुसने में ये लोग हिचकते हैं। मुंबई के मिठाई की दुकानों में भी नाम तौल की इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का मीटर फास्ट है।

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गोली मारो पोस्टर….झकझोरो मुझे…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 24, 2008

लोगों के चेहरे और घटनायें आपस मे गुंथकर तेजी से बदलते हैं, बिना किसी लयताल के।….यह तो मेरी छोटी सी बेटी है…यह मर रही है, लेकिन क्यों ..नहीं नहीं…मैं इसे मरने नहीं दूंगा..अरे यह तो मरी हुई है…इसका तो शरीर ही नहीं है…यह तो छाया है ।
वह क्या है, धूल भरी आंधी…यह तो वही महिला है, जिसके पति को एक पागल भीड़ ने मार दिया था…क्या हुआ था…ओह, अपने काम से लौट रहा था…कितनी निदयता से मारा था लोगों ने.
…रथ दौड़ा था-कसम राम की खाते है, हम मंदिर वहीं बनाएंगे…रथ के बाद खून की लहर…यह क्या बाबरी ढांचा एक बार फिर ढहढहा कर गिर रहा है…साथ में आरक्षण की हवा…भूरा बाल साफ करो…100 में शोषित नब्बे है, नब्बे भाग हमारा है…जो हमसे टकराएगा चूर-चूर हो जाएगा…
…मैं सपना देख रहा हूं…हां, हां, मैं सपना देख रहा हूं…मुझे उठना चाहिए…कमबख्त नींद भी तो नलीं टूट रही है…लेकिन है यह सपना ही…तू कौन है?
तू मुझे नहीं पहचानता…मैं इंदल हूं…तेरा बचपन का दोस्त…और मेरे साथ अजुन है…
लेकिन तूम दोनों तो मर गये थे ?
…हां…मर गया था…मुझे अपनी बेटी की शादी करनी थी…सारा खेत बेच डाला…फिर भी पैसों का जुगाड़ हुआ नहीं हुआ…मरता नहीं तो क्या करता, सल्फास की गोलियां खा ली थी..पेट में बहुत मरोड़ उठ रहे थे, जीने के लिए तरस रहा था, लेकिन सांस टूट गई
…और अजुन तुम…?
अपनी आंखों के सामने अपनी बेटी और बीवी को भूख से मरते कैसे देखता…खेत-खलिहान और जानवर, सभी कुछ तो गिरवी रख दिये…दिल्ली गया, पंजाब गया …हाड़तोड़ कर कमाने की कोशिश की…इसी चक्कर में शरीर भी जाता रहा…एक दिन शरीर पर किरासन का तेल उलझकर आग लगा ली….
…अब मेरे पास क्यों आये हो….?
यह बताने की गिद्दों की टोली आसमान में मडरा रही है….गिद्ध अपने बेटे और बेटियों की शादी रचाने की तैयारी में है….उन्हें पूरा यकीन है कि महाभोज का अवसर आ गया है….सियारों और कुत्तों के बीच यही चरचा है…धरती पर गिरने वाले इन्सानी खूनों का गंध उनके नथूनों से टकरा रहे हैं….
….हाय हाय,हाय हाय …गईया बछड़वा हाय-हाय…
धूं-धूकर जलाता हुआ ऑफिस…हवाओं में सनसनाती हुई गोलियां…धांय, धांय…लोगों की खोपडि़यां उनके कंधे से निकलकर सड़कों पर गिर रहीं हैं…एक जनकवि चौराहे पर खड़ा होकर लोगों के बीच जोर-जोर अपनी कविता पढ़ रहा है…गोली मारो पोस्टर।
हाथों में डंडे लहराते हुये सड़कों पर ठप-ठप कर दौड़ती हुई भारी-भरकम बूटें…
…इंकलाब जिंदाबाद, जिंदाबाद जिंदाबाद…
चौकड़ी…ठेलम ठेल…रैली पर रैला…
…सत्ता में आने के बाद आपका पहला कदम क्या होगा…?
शरमाई सी, सकुचाई सी कठपुतली..लगाम किसी और के हाथ में…
…संपूण क्रांति गईल तेल लेवे…पहीले हमर मेहरारू के सत्ता में आवे दे…
…पक्की बात है सरकार…न खाता न बही, रउआ जे कहब वही सही…रउआ लम्हर नेता बानी…
भाड़ों के नाच गान में डूबा हुआ पूरा तंत्र…खैनी ठोकने वाहे अधिकारियों की फौज…और उनमें हुजूर का खैनी ठोकने के लिए लगा होड़…महिला अधिकारी की आवाज…भौजी चिंता ना करी, हम बानी ना।
जोड़तोड़, खेल पे खेल..कूदाफानी…हई पाटी से खीचों, हउ पाटी से खीचों…जयश्री राम, जयश्रीराम।
रोको इन्हें, फासीवादी है…गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन रोको इन्हें…
…गठबंधन करो, तालमेल करो, लेकिन सत्ता में आयो……
हूजर, तीनों मुद्दा आड़े आ रहे हैं…लोग तैयार नहीं हो रहे…..
…हटाओ मुद्दे को कन्वेनर बनायो..कन्वे करेगा…सत्ता जरूरी है वाद नहीं…वाद सत्ता में आने का माध्यम है…
…लो बन गई सरकार…अब मंत्री बनाओ संतुलन बैठाओ…
…हूले ले…हूले ले….हूले ले…निकल गया पांच साल…
…लोग जवाब मांग रहे हैं…
…फील गुड कराओ…
अमेरिका में इटली का माफिया डॉन कॉरलियोन…..गॉडफादर…लाइफ इज अलवेज ब्यूटीफूल।…
नहीं, नहीं…मैं सपने देख रहा हूं…कोई मुझे जगाओ…झकझोरो मुझे…।

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