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मेरा बच्चा मनमोहन की भाषा नहीं समझेगा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 13, 2008

अर्थ विज्ञानियों की भाषा में आथिक मंदी की बात आम लोगों के समझ में नहीं आ रही है। वे दिन प्रति दिन की समस्याओं से रूबरू होते हुए इस मंदी की मार झेल रहे हैं। पिछले आठ महीने में दूध की कीमत में प्रिंट के लेवल पर प्रति लीटर दो रुपये का इजाफा हुआ है, लेकिन खुदरे दुकानदार इस पर प्रिंट लेवल से तीन रूपया जादा कमा रहे हैं। पहले पैकेट वाले दूध की कीमत प्रति आधा लीटर 9 रुपये था, जिसे बढ़ाकर 10 रुपये किया गया। लेकिन मुंबई के बाजार में यह 12 रूपये में बेचा जा रहा है। इसी तरह चावल, दाल, तेल, चीनी, नमक और खाने पीने के वस्तुओं की कीमतों में इजाफा हुआ है। दुकानदार मनमाना रेट लगा रहे हैं और लोग इन आवश्यक वस्तुओं को उनके मनमाना दामों पर खरीदने के लिए मजबूर है। साग सब्जी का भाव भी आसमान छू रहा है। मुंबई की सडकों पर गाजर 80 रुपये प्रति किलो बिक रहे हैं।
खाने पीने के वस्तुओं की कीमतों में जहां उझाल आया है , वहीं प्रोपटी की कीमतों में गिरावट आ रहा है। तमाम बिल्डर फ्लैट बनाकर बैठे हुये हैं, लेकिन उन्हें कोई खरीदने वाला नहीं है। अभी कुछ दिन पहले तमाम बिल्डरों ने ग्राहकों के लिए अपनी अवासीय परियोजनाओं को लेकर एक प्रद्रशनी का आयोजन किया था, जिससे लोग दूर ही रहे। बिल्डरों की बहुत बड़ी रकम निमाण कायो मे फंसा पड़ा है, और जिस तरह से लोगों के पहुंच से साग-सब्जी और नून तेल दूर होता जा रहा है उसे देख यही लग रहा है कि इन बिल्डरों के पैसे लंबे समय तक फंसे रहेंगे।
फिल्म उद्योग का भी बाजा बजा हुआ है। फिल्म से जुड़े लोग सड़कों और चाय टपरियों पर बतिया रहे हैं कि रिलायंस ने अपनी दो महत्वकांक्षी फिल्मी प्रोजेक्टों को फिलहाल बंद कर दिया है। शाहरूख खान भी एक फिल्म की तैयारी में लगे हुये थे, लेकिन अपने वित्तीय सलाहकारों की बात मानकर वह उन्होंने भी इसे बंद कर दिया है। तमाम प्रोडक्शन हाउस वाले छोटी बजट वाली फिल्मों के विषय में गंभीरता से सोचने लगे हैं। आज से कुछेक महीना पहले फोन पर घर बैठे लोन देने वाले चिरकुट बैंकों का खूब फोन आता था, अब इनकी घंटी बजनी बिल्कुल बंद हो गई है। सब गधे के सिर से सिंग की तरह गायब हो गये हैं। क्या भारत फ्रांस में बास्तील किले पर आम जनता के हमले से पहले वाली स्थिति में है ? खाने के लिए साग-सब्जी और दाल चावल नहीं मिलेगा तो लोग क्या करेंगे? नरसिन्हा राव के समय मनमोहन सिंह ने उदारीकरण चालू किया था, अब प्रधानमंत्री बैने बैठे हैं।
मेरी अन्तोन्योत से कुछ उम्मीद करना ही बेकार है….मेरे बच्चे दूध के लिए रो रहे हैं….देखता हूं कि पॉकेट में कुछ पैसे है कि नहीं….मनमोहन सिंह का कैबिनेट तो अथ विज्ञान की भाषा maine बात करेगा, जिसे मेरा बच्चा नहीं समझेगा.
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2 Responses to “मेरा बच्चा मनमोहन की भाषा नहीं समझेगा”

  1. मैरी एन्तोइनेट और उसके दरबारियों को सत्ता किसने सौपी थी? जिसने किया सज़ा भी वही भोगे.

  2. भारत की बहु किस ने कहा था ? अब नखरे भी तो सहने पडेगे, कल तक त्याग की देवी भी तो यही लोग कह रहे थे,लेकिन दुख हे तो उन मुर्खॊ के साथ साथ सभी पिस रहै है.धन्यवाद आप का दर्द हम सब क दर्द है.

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