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बात भारतीय फिल्मों पर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 14, 2008

पता नहीं किस व्यक्ति ने पहली बार देश में हिन्दी फिल्मों के लिए बॉलीवुड शब्द का इस्तेमाल किया और कैसे यह शब्द फिल्मी पत्रिकाओं और अखबारों से लेकर टीवी बालाओं के होठों पर आ गया। इस पर कभी बात में बात होगी, आज बात भारतीय फिल्मों पर। यूरोप और अमेरिका को बहुत दिनों तक पता ही नहीं था कि भारतीय फिल्मों में नाच गान का इस्तेमाल शानदार तरीके से किया गया था। उस दौर में दुनियां की अन्य फिल्में भारत की फिल्मों से इतर नहीं थी, लेकिन अन्य जगहों पर तकनीक के स्तर पर प्रयोग हो रहे थे, जबकि भारतीय फिल्मकार उन तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल करने की कला के अभ्यास में पारंगत थे। चाहे मूक फिल्मों का ही दौर क्यों न हो, उस समय भारत में बेहतरीन फिल्में बन रही थी।
साउंड फिल्मों के युग में तो भारतीय फिल्मकारों के हाथ में तो एक खजना लग गया था, नाच और गाने स तमाम भारतीय फिल्मी भरी पड़ी है। गीतों के बिना तो भारतीय फिल्म की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती थी।
दादा फालके से लेकर आज तक भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्मों में गीतों का भरपूर प्रयोग करते रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में फिल्म कई मूवमेंटों से होकर गुजरा है,जैसे इटली का रियलिज्म मूवमेंट और फ्रांस का वेव मूवमेंट। समुद्र पार के देशों में फिल्म थ्योरी पर खूब काम हुआ, और कई तरह के सिद्धांत भी गढ़े गये, जैसे एपरेटस थ्योरी, ऑटर थ्योरी, Feminist theory, (Feminist theory sub jagah milega, aur bahut hi majbooti se. )।
इन सब को लेकर उन दिनो कैहिस डू सिनेमा नामक एक फ्रांसीसी पत्रिका में खूब मारा मारी होती थी। इस पत्रिका का संपादक बाजिन था। उस समय के सारे छटे हुये फिल्म समीक्षक उस पत्रिका से जुड़े हुये थे। बाद में ये लोग खुद फिल्म बनाने पर उतर आये। फ्रांस वेव मूवमेंट इन्हीं समीक्षकों का दिया हुआ है। भारत में फिल्में से ज्यादा फिल्मों में लगे लोगों पर जोर दिया गया, जिसके कारण भारतीय फिल्म को फिल्म के सही ग्रामर पर नहीं कसा गया। इसका नतीजा यह है कि तकनीक के क्षेत्र में भारतीय फिल्म में कोई क्रांति आज तक नहीं हुई है। अभिनय और कलाकारों की लोकप्रियता में मामले में भारतीय फिल्मों ने जो उछाल मारा है वह दुनिया में किसी फिल्म उद्योग को नसीब नहीं है।
शोले का डायलॉग बच्चा-बच्चा जानता है। मुझे नहीं लगता कि किसी अन्य मूल्कों की फिल्मों का कोई डायलॉग उस मूल्क का बच्चा बच्चा जानता है। चाहे गुरुदत्त की सैडिस्टिक फिल्में हो चाहे देवानंद की रोमांटिक, भारतीय फिल्म भारतीय फिल्म के हर युग में गीतों और संगीतों करो भरपूर स्थान दिया गया।
जिस वक्त जीन रिनॉयार पोयटिक फिल्म बना कर दुनिया की फिल्म को एक नई दिशा दे रहे थे उस वक्त भारत में भी ताबड़ तोड़ फिल्में बन रही थी और कथ्य के लिहाज से पूरी तरह से भारतीय थी। भारत में फिल्मों के रुपहले चेहरों पर ज्यादा जोड़ दिया गया , तकनीक और कंटेट को हर एंगल से नहीं कसा गया। दुभाग्य की बात रही है कि भारतीय फिल्मों को अंग्रेजी maine समेटा गया है, इसी का नतीजा है कि भारतीय फिल्म अब बॉलीवुड बन गया है।
मजे की बात है कि तमाम भारतीय पत्र पत्रिकाओं ने अचेतन रूप से इस दासता को स्वीकार कर लिया है। इस कल्चरल दासता को फेंके बिना मुझे नहीं लगता कि बंगाल से लेकर मुंबई तक बनने वाली भारतीय फिल्मों का आकलन सही तरीके से किया जाकता है। क्या विमल दा और सत्यजीत रे के बिना भारतीय फिल्म की कल्पना की जा सकती है। उस दौर में मद्रास में भी ताबड़तोड़ फिल्में बनी थी।
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2 Responses to “बात भारतीय फिल्मों पर”

  1. आप का लेख बहुत ही उम्दा ओर सही है, ओर यह सच भी है, क्या आप को पता है यह बालीबुड किसी ने गाली के रुप मै कहा था ? ओर हम इसे शान से वालीबुड कहते नही थकते????धन्यवाद

  2. Raj Ji!! nahi pata tha ki Bollywood kisi ne gali ke rup me kaha tha ! Yadi kuch aur jankari is mamale me aapake pas ho to jarur dijiye taki yanha ke logon ki aankhe khule, halanki isaki ummid kam hi hai, kayonki ye log nakalchi bandar hai…Italy, France, Germany aur Russia ne kabhi bhi American film culture ko nahi apanaya…Indian filmkar bhi apani disha pakare huye the…Pata nahi ye bollywood wali genereation kab paida ho gai…Khair ab inase nibat lenge sir…aap lagatar apani pratikriya de rahe hai…aur vo bhi behatar andaj me…Thanks

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