Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

Archive for December, 2008

पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 30, 2008

पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें
अच्छी किताबें,सच्ची किताबें,
मेरा होता था सिर तेरी आगोश मे
तेरे बगल में होती थी किताबें।

हंसती थी तू उन किताबों के संग
रोती थी तू उन किताबों के संग,
कई रंग बदले किताबों ने तेरे
कई राज खोले किताबों ने तेरे।

जब किताबों से होकर गुजरती थी तुम
चमकती थी आंखे,और हटाती बालें,
शरारतों पर मुझको झिड़कने के बाद
फिर तेरी आंखों में उतरती थी किताबें।

होठों से तेरी झड़ती थी किताबें
मेरे अंदर उतरती थी किताबें,
डूबी-डूबी सी अलसायी हुई
हाथों में तू यूं पकड़ती थी किताबें ।

चट्टानों से अपनी पीठ लगाये हुये
सुरज ढलने तक तूम पढ़ती थी किताबें,
अंधरे के साया बिखरने के बाद
बड़े प्यार से तुम समेटती थी किताबें ।

उलटता हूं जब अपनी दराजों की किताबें
हर किताब में तेरा चेहरा दिखता है,
चल गई तुम, पढ़ कर मेरी जिंदगी को
मेरे हिस्से में रह गई तेरी किताबें।

शब्द गढ़ता हूं मैं तेरी यादों को लेकर
तेरी यादों से जुड़ी हैं कई किताबें,
मेरे प्यार का इन्हें तोहफा समझना
तेरी याद में लिख रहा हूं कई किताबें।

Advertisements

Posted in Uncategorized | 5 Comments »

थिंकर की बीवी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 29, 2008

क्या सभ्यता के विकास की कहानी हथियारों के विकास की कहानी है ? इनसान ने पहले पत्थरों को जानवरों के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया,फिर लोहे को और अब आणविक शक्तियों से लैस है,यह क्या है? हथियारों के विकास की ही तो कहानी है !!! पृथ्वी पर से अपने वजूद को मिटाने के लिए इनसान वर्षो् से लगा हुआ है। थिंकर की आंखे दीवार पर टीकी थी, लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। दीमाग में एक साथ कई बातें घूम रही थी।
गैस बंद कर देना, दूध चढ़ा हुआ है,बाथरूम से पत्नी की आवाज सुनाई दी। गैस चूल्हे की तरफ नजर पड़ते ही उसके होश उड़ गये। सारा दूध उबल कर चूल्हे के ऊपर गिर रहा था। सहज खतरे को देखते हुये उसने जल्दी से चूल्हा बुताया और गिरे हुये दूध को साफ एक कपड़े से साफ करने लगा। लेकिन किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया और बीवी उसके सिर पर आकर खड़ी हो गई।
तुम्हारी सोचने की यह बीमारी किसी दिन घर को ले डूबेगी। तुम्हारे सामने दूध उबल कर गिरता रहा और तूम्हे पता भी नहीं चला…हे भगवान मेरी किस्मत में तुम्ही लिखे थे। घर में दो छोटे-छोटे बच्चे हैं..अब खड़ा खड़ा मेरा मूंह क्या देख रहे हो। जाओ, जाकर दूध ले आओ।
बीवी की फटकार सुनने के बाद वह कपड़े पहनकर दूध लाने निकल पड़ा।
यदि इनसान को बचाना है तो हथियारों को नष्ट करना होगा, लेकिन कैसे? हथियारों को बनाने के उद्देश्य क्या है,इसकी जरूरत क्या है ? कौन लोग हथियार बनाने के धंधे में लगे हुए हैं? वह सोंचते हुये सड़क पर चला जा रहा था। दूध के बूथ पर पहुंचा और पैसा दुकानदार की ओर बढ़ा कर बोला,एक पैकेट दूध देना।
इनसान को हथियारों से मुक्त करना जरूरी है। लेकिन यह कुछ लोगों के लिए मुनाफे का धंधा है। वे लोग कभी इस धंधे को बंद करना नहीं चाहेंगे। वे लोग एसा सोचते भी नहीं होंगे। हथियार उत्पान दुनिया की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। घर में प्रवेश करने के बाद अपनी मेज पर रखी हुई तोलोस्तोव की पुस्तक युद्ध और शांति के पन्ने पलटने लगा। एक अंडरलाइन किये हुये वाक्य पर उसकी नजरे जाकर टिक गई, इनसान के नसों से खून निकाल कर पानी भर दो फिर युद्ध नहीं होंगे।
दूध कहां है, ड्रेसिंग टेबल छुटकारा मिलते ही बीवी ने पूछा।
दूध !! उसे समझ में नहीं आया कि बीवी उससे क्या पूछ रही है।
अरे उल्लू की तरह इधर उधर क्या देख रहे हो…तुम्हें दूध लाने भेजा था…
वो तो मैं ले आया..किचन में देखो..
कुछ देर तक किचन में दूध खोजने के बाद वह दनदनाती हुई फिर आई, किचन में दूध नहीं है.
.लेकिन मैंने दुकानदार को पैसे तो दिये थे
और दूध नहीं लाये..हे भगवान कैसे आदमी से पाला पड़ा है..दुकानदार को पैसे दे आया और दूध नहीं लाया…यह सब तुम्हारे सोंचते रहने की वजह से होता है…लेकिन…अब यहां खड़े-खड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हो…जाकर दूध लाओ…

Posted in Uncategorized | 6 Comments »

युद्ध ! युद्ध !! युद्ध !!!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 27, 2008

बहुत बकबास सुनाई दे रहा है चारो तरफ, युद्ध युद्ध युद्ध ! क्या होता है युद्ध? तीन घंटे की फिल्म,ढेर घंटे का नाटक, ट्वेंटी-ट्वेंटी का क्रिकटे मैच, कविता पाठ ? क्या होता है यह युद्ध?
युद्ध में मौत तांडव करता है और खून बहती है, गरम-गरम। इनसानी लोथड़े इधर से ऊधर बिखरते हैं और धरती लाल होती है। युद्ध ब्लॉगबाजी नहीं है। एक बार में सबकुछ ले उड़ेगी। जमीन थर्रायेगा, आसमान कांपेगी और हवाएं काली हो जाएगी, क्योंकि दुनिया परमाणु बम पर बैठी हुई है। लोग सांस के लिए तरसेंगे।
चलो माना कि रगो में लहू दौड़ रही है। और जब लहू उफान मारेगी तो युद्ध का उन्माद खोपड़ी पर चढ़ेगा ही। कोई समझा सकता है कि युद्ध का उद्देश्य क्या है??? अब यह मत कहना कि पाकिस्तान को सबक सीखाना है। यह सुनते-सुनते कान पक चुका है। जिस वक्त पाकिस्तान का जन्म हो रहा था, उसके बाद से ही उसे सबक सीखाने की बात हो रही है। अब यह सबक सीखाने का तरीका क्या होगा ? सेना लेकर पाकिस्तान के अंदर घुस जाना और कत्लेआम करते हुये इस्लामाबाद की ओर बढ़ना ? यह सबकुछ करने में कितना समय लगेगा ?
सेना में जमीन स्तर पर रणनीति तैयार करने वालों से पूछों। वो भी दावे के साथ कुछ नहीं बता पाएंगे। यदि थोड़ी देर के लिए यह मान भी लिया जाये कि सेना 40 घंटे में इस्लामबाद तक पहुंच जाती है, हालांकि इसकी संभावना न के बराबर है, फिर आगे क्या करना है ??? युद्ध के उद्देश्य को लेकर दिमाग में कोई स्पष्ट सी बात है ??? युद्ध करेंगे !!! सरकार में बैठे लोगों को भी होश नहीं है कि वो क्या बक रहे हैं। वो जो कुछ भी बक रहे हैं, जनता के उन्माद के दबाव में बक रहे हैं।
नीत्शे कहता है, शांति चाहो, लेकिन अल्पकालीन,वह भी इसलिए कि एक नई युद्ध की तैयारी कर सको। दुनियां में जो कुछ श्रेष्ठ है सब युद्ध की बदौलत ही है। युद्ध साध्य है, साधन नहीं। बकबासियों यदि नीत्से की बात नहीं मानते हो, तो जरा समझाओ कि इस युद्ध का उद्देश्य क्या है ? बेशक युद्ध करो, लेकिन उसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताओ। क्या इस युद्ध के बाद दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान का नाम हमेशा के लिए गायब हो जाएगा?? यदि नहीं, तो नहीं चाहिए युद्ध। और यदि हां,तो थोड़ा सब्र करना होगा। सीधे सरकार बदलो, और एक नई सरकार बनाओ, जो पूरी तरह से युद्ध के लिए ही बनी हो। दो साल तक व्यवस्थित तरीके से जनता को युद्ध के लिए प्रशिक्षित करो, हर स्तर पर। और फिर युद्ध शुरु करो,तब तक लड़ो जब तक भारत का प्राचीन नक्शे को मू्र्तरूप न दे दो, अथक और अविराम लड़ने की क्षमता चाहिये। दुनिया के अन्य मुल्कों से डिप्लोमैटिक वार और इकोनॉमिक ब्लॉकेज के लिए पूरी तरह से कमर कसो।
यदि ये सब नहीं हो सकता, तो चूपचाप अपना काम करते रहो, जो कर रहे हो। घर के लिए सब्जी लाओ, बच्चों को अपनी बीवी के साथ घूमाने ले जाओ, नौकरी धंधा करो, और अपना जीवन चलाओ। छोड़ दो यह युद्ध उनके लिए, जो एसा करने का मादा रखते हैं, और इंतजार करो, क्योंकि युद् तो प्रकृति का स्वभाव है। प्रकृति खुद उनलोगों का चयन करेगी, जो उसके स्वभाव के अनुरूप अनवरत युद्द के लिए कमर कसे हुये है। गौर से देखो अपने अगल-बगल,यदि तूम अपने आप को युद्ध में खड़े देख रहे हो तो,समझो प्रकृति ने तुम्हारा चयन कर लिया है। यदि नहीं तो बकबासियों की तरह मत चिल्लाओं कि सबक सीखाना है।

Posted in Uncategorized | 5 Comments »

न तुमने निभाई,न हमने निभाया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 27, 2008

कसमें खाई थी संग-संग हमने
न तुमने निभाई,न हमने निभाया ।
एक अनजानी डगर पे संग चले थे मीलों
न तुझे होश थी,न मैं कुछ जान पाया।
दुरियों के साथ मिटते गये फासले
मैं जलता गया,औ तुम पिघलती गई।
तुझे आरजू थी,मेरी नम्र बाहों की
मुझे आरजू थी तेरी गर्म लबों की।
दामन बचाना मुश्किल हुआ
तूम बहती रही, हम बहकते रहे।
टपकता रहा आंसू तेरी आंखों से
मेरी रातों की नींद जाती रही ।
चांद तले हम संग सफर में रहे
न मैं कुछ कहा, न तू कुछ कही ।
तेरी धड़कन मेरी सांसों में घुली
खामोश नजरों ने सबकुछ कहे ।
नये मोड़ पर नई हवायें बही
मैं भी ठिठका,और तू भी सिहरी ।
छुड़ाया था दामन हौले से तुमने
मैंने भी तुझको रोका नहीं था ।
हवाओं के संग-संग तू बह चली थी
घटाओं में मैं भी घिरता गया था।
बड़ी दूर तक निकलने के बाद
खाली जमीं थी,खुला आसमां था।
गुजरे पलों को समेटू तो कैसे
आगे पथरीला रास्ता जो पड़ा है ?
तुझे भी तो बढ़ना है तंग वादियों
जमाने की नजरे तुझपे टिकी है
मोहब्बत की मर्सिया लिखने से पहले
दफन करता हूं मै तेरी हर वफा को
तुमसे भी ना कोई उम्मीद है मुझको
लगाये न रखो सीने से मेरी खता को
कसमें खाई थी संग-संग हमने
न तुमने निभाई, न हमने निभाया।

Posted in Uncategorized | 5 Comments »

कामांध समूह की लौंडी है सेक्यूलरिज्म

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 16, 2008

इंग्लैंड के एक राजा परकामुकता सवार होती है,
एक महिला को पाने की जिद।
इसायित को संगठन के तौर पर इस्तेमाल कर रहा
एक गिरोह उसकी राह में खड़ा होता है.
हर तरह की तिकड़मबाजी और घूसखोरी
चलती है,लेकिन अंदर खाते।
नीति, कूटनिती को ताक पर रखकरवह राजा आगे बढ़ता है
इसायित की चाबूक से त्रस्त जनताराजा के पक्ष में कमर कसती है।
धर्म को राजनीति से बेदखल करते हुये राजा
अपनी जिद पूरा करता है..
अपनी मन पसंद महिला को अपनी
बाहों में भरता है, वैधानिक तरीके से।
और इसके साथ ही धर्म पर
राज्य की विधि स्थापित होती है
और यहीं से सेक्यूलरिज्म का बीज छिटकता है.
सेक्यूलरिज्म एक कामांध राजा के दिमाग की उपज है..
.और अब इसका इस्तेमाल
सत्ता के लिए कामांध समूह कर रहा है..अनवरत।
विज्ञान कहता है,कोई भी चीज निरपेक्ष नहीं होती
सेक्यूलरिज्म कामांध समूह की लौंडी है, बजाते रहो.

Posted in Uncategorized | 1 Comment »

इसे मैंने भी चुराई थी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 13, 2008

वो रसियन जूते थे, भूरे-भीरे। उनके फीतों में लोहे के बोल्ट लगे थे। दाये पैर के जूते के मुंह पर एक बड़ा सा छेद था, जॉन बनार्ड शा की काली कोट की तरह। याकोब उन जूतों से बेहद प्यार करता था। उन जूतों ने दुनियाभर की घाटियों में उसका खूब साथ दिया था। महानगरों की सड़कों पर चलने में उसे मजा नहीं आता था। याकोब से कई बार दोनों जूतों ने एक साथ शिकायत किया था कि महानगरों की हवायें उसे उच्छी नहीं लगती, उन्हें खुली हवायें चाहिए। लेकिन याकोव के सिर पर महानगरों में रहने की जिम्मेदारी थी, और इस जिम्मेदारी से वह चाहकर भी नहीं भाग सकता था। एक दारूखाने में उसे रात गुजरानी थी,छककर शराब पीते हुये, चार लोगों के साथ। बड़ी मुश्किल से इस बैठक में शामिल होने की उसने जुगत लगाई थी। चेचेन्ये में एक थियेटर को कैप्चर करने की योजना पर बनाई जा रही थी। याकोब जमकर उनके साथ पीता रहा। सुबह उसके जूते गायब हो चुके थे। उनचारों में से किसी एक ने चुरा लिया था। वे जूते उससे बातें करती थी, जंगलों में, घाटियों में, दर्राओं में, नदियो में।
कमांडर, क्या सोंच रहों हों, एक साथी ने पूछा।
अपनी जूतों के विषय में, वो तूम्हारे पैरों में है।
मेरे जूते,यह तो मैंने चुराई थी, एक कमांडर की थी।
मैंने चुराई थी.

Posted in Uncategorized | 5 Comments »

चोरी के मामले में इस्लाम वाला कानून सही

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 11, 2008

ले लोटा, इ बतवा तो बिल्कूल सही है कि यहां लोग बिजली के तरवे काट लेता है,और उसको गला-गुलाकर के बेचकर दारू पी जाता है या सोनपापड़ी खा जाता है। इहां के अदमियन के कोई कैरेक्टरे नहीं है। लगता नहीं कि बिना डंडा के ये सुधरेंगा सब.
मेरे गंऊआ में एक पहलवान जी थे, किसी को भी दबाड़ देते थे। उन्हीं की कृपा से आज तक मेरे गंऊआ बिजली नहीं आयी, जबकि सरकार ने सबकुच पास कर दिया था, यहां तक की तार और पोल भी गिर गये थे। पहलवान जी की अपनी समस्या थी। अपनी बीवी की जब और जैसे इच्छा होती थी भरमन कुटाई करते थे। उनकी कुटाई से त्रस्त आकर वह कई बार कुइंया में छलांग मार चुकी थी, लेकिन हर बार पहलवान जी रस्सी डोल डालकर उसे निकाल लेते थे, और फिर कूटते थे, दे दना, दे दना, दे दना दन।
जब गांव में बिजली आने की बात हुई तो किसी ने पहलवान जी के कान में यह बात डाल दी कि गांव में जितनी भी औरतों की कुटाई हो रही है वो बिजली का बहुत बेसब्री से इंतजार कर रही हैं, क्योंकि बिजली के तार में लटककर मरना आसान है। फिर क्या था पहलवान जी ने बिजली के खिलाफ शंख फूंक दिया। कसकी मजाल जो पहलवान जी से पंगा ले….गांव वालों ने समझाया, इंजीनियरों ने समझाया…सब बेकार। ऊ पहनवान जी की बुद्दि के कारण आज तक मेरा गंउया बिजली के लिए तरस रहा है।
लगता है कि यहां के आदमी के कैरक्टरे में कुछ गड़बड़ी है, सही चीज को उलटे तरीके से ही सोचेगा। भारत में अइसा कोई गांव नहीं है जहां पर लोग अकुसा फंसाकर बिजली नहीं चुराता है, गांव तो छोड़ दीजिये…शहरों में भी एक से एक तुरमखान हैं।
दिल्ली के लक्ष्मी नगर में मेरा मकान मालिक की बेटी रात होते ही मीटर से कनेक्शन हटाकर अकुसा सटा देती थी, और सुबह-सुबह बदल देती थी…ना, यहां के लोगों में करेक्टरे नहीं है…हर जगह के लोगों में एक नेशनल कैरक्चवा होता है….शायद यहां के लोगों का नेशनल करेक्टरवा यही है….इसका कराण क्या है. चिंता के बात है, यही करेक्टरवा नेतवन सब में दिखाई देता है. रास्ता तो निकालना है….अपने लेवह पर पूरी कोशिश करनी है…कोई कोर कसर नहीं छोड़ना है…कभी-कभी लगता है कि चोरी के मामले में देश में इस्लाम वाला कानून लागू कर देने से एक ही बार में सब ठीक हो जाएगा।

Posted in Uncategorized | 6 Comments »

एक धारधार हथियार के तौर पर उभर रहा है ब्लॉग

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 10, 2008

डॉ.भावना की कविता पर प्रतिक्रया देते हुये संतोष कुमार सिंह ने एक सवाल उठाया है कि भारत की कोख से गांधी, नेहरू, पटेल और शात्री जैसा नेता क्यों पैदा नहीं हो रहे है। अन्य कई ब्लॉगों पर की गई टिप्पणियों में भी बड़ी गंभीरता के साथ भारत की वर्तमान व्यवस्था पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं। एक छटपटाहट और अकुलाहट ब्लॉग जगत में स्पष्टरूप से दिखाई दे रहा है। विभिन्न पेशे और तबके के लोग बड़ी गंभीरता से चीजों को ले रहे हैं और अभिव्यक्त कर रहे हैं।
डा. अनुराग, ज्ञानदत्त पांडे, ताऊ रामपुरिया, कॉमन मैन आदि कई लोग हैं, जो न सिर्फ अपने ब्लॉग पर धुरन्धर अंदाज में की-बोर्ड चला रहे हैं, बल्कि अन्य ब्लॉगों पर पूरी गंभीरता के साथ दूसरों की ज्वलंत बातों को पूरी शालीनता से बढ़ा भी रहे हैं। प्रतिक्रियाओं में चुटकियां भी खूब ली जा रही हैं, और ये चुटकियां पूरी गहराई तक मार कर रही हैं।
सुप्रतिम बनर्जी ने एक सचेतक के अंदाज में अभी हाल ही में एक आलेख लिखा है दूसरो का निंदा करने का मंच बनता ब्लॉग। यानि ब्लॉगबाजी को लेकर हर स्तर पर काम हो रहा है, और लोग अपने खास अंदाज में बड़ी बेबाकी से सामने आ रहें हैं। अभिव्यक्ति का दायरा बड़ा हो गया है। पिछले कई दिनों से मैं ब्लॉगबाजी कर रहा हूं और दूसरों के ब्लॉग को देख सुन भी रहा हूं। अभिव्यक्ति का एक नया अंदाज सामने आ रहा है। एक नई स्टाईल और नई उर्जा प्रवाहित होने लगी है, जो शुभ है-ब्लॉगबाजों के लिए भी और देश और समाज के लिए भी।
नीलिमा अपने आलेख मुझे कुछ कहना है में जाने अनजाने तानाशाही सिस्टम की ओर प्रोवोक कर रही हैं। मौजूद हालात में देश का एक तबका एसा चाह भी रहा है। नीलिमा के ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रियाओं में डेमोक्रेसी को लेकर लोगों ने बहुत सारी बातें कहीं हैं। कमोबेश सभी डेमोक्रेसी को पसंद कर रहे हैं,तले दिल से। वाकई में डेमोक्रेसी तहे दिल से पसंद करने वाली चीज भी है, हालांकि इसके नाम पर बहुत प्रयोग और खून खराब हुआ है। इतिहास इस बात का गवाह है। जिस रूप में इस वक्त डेमोक्रेसी हमारे देश में मौजूद है, उस रूप को तोड़ने की जरूरत मैं नहीं समझता। हां, इतना जरूर है कि डेमोक्रेसी को चलाने वाले प्रतिनिधियों में कहीं कोई गड़बड़ी जरूर हो सकती है। हो सकता है इसके लिए हमारा सामाजिक बुनावट जिम्मेदार हो, हो सकता है हम खुद जिम्मेदार हो। कहीं कुछ चूक हो रही है। हो सकता है विभिन्न दलों की कार्यप्रणाली पुरानी पड़ गई हो,निसंदेह कहीं कोई गलती हो रही है। एक आम धारणा पिछले कई वर्षों से भारत में दौड़ रही है,अच्छे लोग राजनीति से दूर है,और अच्छे लोग आज की राजनीति में टिक नहीं सकते, आज की राजनीति अच्छे लोगों के लिए नहीं है। तो क्या यह मानकर बैठ जाना चाहिए भारत की राजनीति बूरे लोगों के हाथ में है और ये बुरे लोग ही भारत की दिशा तय करते रहेंगे?
भारत के अन्य संचार माध्यमों में व्यवसायिकता हावी हो गई है,खबरों को लाभ और हानि के दृष्टिकोण से तौला जाता है,गंभीर बहसों की गुंजाईश न के बराबर है। एसे में ब्लॉग एक धारधार हथियार के तौर पर उभरकर सामने आ रहा है। गहरी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करने के साथ-साथ इसका इस्तेमाल जीवन और समाज, राष्ट्र, धर्म, अर्थ और संस्कृति से जुड़े गंभीर पहलुओं की पड़ताल करने के लिए भी किया जा रहा है। उम्मीद है कि समय के साथ जनमत निर्माण की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी यह बखूबी निभाने लगेगा।

Posted in Uncategorized | 4 Comments »

ये सच दिखाते हैं,हर कीमत पर

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 8, 2008

सूनो, सूनो, सूनो
कान खोल कर सूनो
दिल थाम कर सुनो
टीवी चैनलों के खिलाफ
देश में एक गहरी साजिश
चल रही है.
आतंकियों ने इनके कनपटे पर
बंदूक ताना था,लेकिन मारा नहीं
क्योंकि ये प्रेस-प्रेस चिल्लाये थे .
इनके अगल-बगल से गोलियां गुजरती रही
लेकिन सीने से एक भी गोली नहीं टकरायी
क्योंकि गोलियों को पता था ये प्रेस है.
सड़कों पर फटा ग्रेनेड के छींटे इनके
कैंमरे से होते हुये,न्यूजरूम में पहुंच गये
दो सकेंड के लिए थम गई इनकी सांसे
साठ घंटे तक ये लोग डटे रहे
टीआरपी के लिए नहीं,पत्रकारिता के लिए
खूब की पत्रकारिता, आतंकवाद के
कवरेज पर इन्हें गर्व है
अपनी जान जोखिम में
डालकर इन्होंने सच परोसा
इन्हें किसी की सर्टिफिकेट
की जरूरत नहीं है
क्योंकि ये सच दिखाते
हैं,हर कीमत पर।
सरकार में बैठे हुये लोगों ने इनकी सराहना की है
…जिम्मेदारी के साथ काम किया इन लोगों ने.
अपनी पीठ थपथपाने के बाजाये
भाई लोग, शीशे के कमरे से बाहर निकलो
आम आदमी की आंखों में झांको
और पता लगाओ कौन से सवाल तैर रहे हैं
उनकी आंखों में
मैं बताता हूं 12 घंटे तक एक ऑफिस में
काम करने वाले एक व्यक्ति का सवाल
सूनो यह मासूम सवाल….
यदि मेरी अंतोनोयोत को आंतकी उठा ले जाये
तो राष्ट्र कहां तक समझौता करेगा ?
अब तो मुंबई की आग भी ठंडी पड़ चुकी है
बैठाओ पैनल न्यूजरूम में
नेताओं को बुलाओ,विशेषज्ञों को बुलाओ,
और बिना कुर्तक किये पूछो उनसे
आम आदमी का यह मासूम सवाल।
क्योंकि टीवी चैनलों के खिलाफ
साजिश में,यदि तुम्हे लगता है कि यह
साजिश है,इस देश का आम आदमी शामिल है.
यदि बात समझ में नहीं आये
तो एक बार रूसो का जेनरल विल उलटकर देख लेना
शायद दिमाग में यह बात घुसे कि
कि टीवी चैनलों के खिलाफ
इस साजिश में यकीनन इस देश
का आम आदमी शामिल है ….यकीनन.

Posted in Uncategorized | 2 Comments »

घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 6, 2008

सलाखों के पीछे बंद सुकरात से
पहरे पर खड़े एक सैनिक ने कहा था,
तुम इस जेल से भाग जाओ,क्योंकि मुझे पता
हैं कि ये लोग जघन्य अपराध कर रहे हैं।
मुस्कराते हुये सुकरात ने जवाब दिया था,
लोकतंत्र के इन पहरेदारों को पता होना चाहिए
कि मेरी मौत से यह डेमोक्रेसी और मजबूत होगी।
सुकरात की मौत पूरी तरह से डेमोक्रेटिक थी
मतदान हुये थे—मौत के पक्ष और विपक्ष में।
अंतिम फैसला के बाद सुकरात ने विष के रूप
में अपने लिए मौत का प्याला खुद चुना था
———एक सच्चे डेमोक्रेट की तरह।
बंदुक के साये में घूमने वाले नेताओं की
रखैल नहीं है डेमोक्रेसी…
इसके नाम पर अब और दलाली
और धंधेबाजी नहीं, बस बहुत हुआ।
डेमोक्रेसी मेरी बीवी है, जो लड़ती है, झगड़ती है
और मुझे प्यार करती है।
और मैं भी इससे प्यार करता हूं,
डेमोक्रेसी को मैं हाथ में विष का प्याला लिये
सुकरात के मुस्कराते हुये होठों पर देखता हूं
और उनलोगों के चेहरे को भी पहचानता हूं
जो डेमोक्रेसी को उसी के नाम पर जहर दे रहे हैं
इन चेहरों को नोंचने से घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का।

Posted in Uncategorized | 3 Comments »