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आतंकवाद का जूठन खाकर मोटी होती मीडिया

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 4, 2008

यदि गौर से देखा जाये तो आतंकवाद और मीडिया दोनों विश्वव्यापी है और विश्व व्यवस्था में दोनों के आर्थिक तार एक दूसरे से जुड़े हुये है। मीडिया को खाने और उगलने के लिए दंगे, फसाद और युद्ध चाहिये और इसी जूठा भोजन के सहारे मीडिया पल बढ़ कर मोटी होती है।
आतंकवाद एक तरफ जहां शहरों और लोगों को निशाना बनाकर अपने संगठनों के लिए अधिकतम संशाधनों की जुगाड़ करता है वहीं मीडिया आतंकवाद के जूठे को परोसकर उसे महिमामंडित करते हुये अपने लिए अधिक से अधिक से कमाई करती है। वैश्विक स्तर पर दोनों एक दूसरे को पाल पोस रहे हैं, हालांकि इस जुड़ाव का अहसास मीडिया को नहीं हैं और हो भी नहीं सकता, क्योंकि मीडिया के पास ठहरकर सोचने का वक्त कहां हैं।
वैसे मीडिया में आर्थिक मामलों (मैनेजमेंट)से जुड़े लोगों को इस बात का पूरा अहसास है कि मुंबई में हुये हमलों के बाद मीडिया में बूम आ रहा है और इसी तरह के दो चार हमलें और हो गये तो कम से कम मीडिया का धंधा तो आर्थिक मंदी के दौर से निकल हीजाएगा। मीडिया एक संगठित उद्योग की तरह पूरी दुनिया में काम कर रही है।
मुंबई हमले के बाद मीडिया के शेयरों में उछाल की खबरें आ रही हैं। चूंकि मीडिया के धंधे में बहुत बड़े पैमाने पर एफडीआई लगा हुआ है, इसलिए यह पूरी तरह से लाभ और हानि के गणित से संचालित हो रही है। राष्ट्रीयता जैसी चीज मीडिया के लिए कोई मायने नहीं रखती है। मीडिया पूरी तरह से इस धंधे में निवेश करने वाले लोगों और इस धंधे को संचालित करने वाले बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के प्रति जिम्मेदार हैं,आम लोगों के हितों से उनका कोई लेना देना नहीं हैं। मीडिया के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स में वही लोग बैठे हुये जिन्होंने इस धंधे में मोटा माल लगा रखा है। उन्हें तो बस मुनाफा चाहिए,हर कीमत पर।
मीडिया को चलाने वाले विशुद्ध रूप से मुनाफेबाज लोग हैं। आतंकवाद के पीछे भी मुनाफेबाजी की एक थ्योरी काम कर रही है। आमलोगों के असंतोष और गरीबी को बहुत ही व्यवस्थित तरीके से धार्मिक सांचे में ढालकर वैश्विक स्तर पर जेहाद के कारवां को आगे बढ़ाया जा रहा है। जेहाद के कारवां को आगे बढ़ाने लोग अफगानिस्तान के तालिबानी स्कूल की उपज है। मुल्ला उमर और लादेन नेपथ्य में बैठकर एसे तमाम लोगों को हर तरह की सहायता उपलब्ध करा रहे हैं,जो क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को अपनी फौज में भर्ती करने में सक्रिय हैं। और इस काम के लिए उनसे मिलने वाले पैसों से अपनी खुद की जेबे भी भर रहे हैं,जैसे मीडिया में बैठे मेडियोकर लोग कर रहे हैं।

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4 Responses to “आतंकवाद का जूठन खाकर मोटी होती मीडिया”

  1. आपकी बात बिल्कुल सही है.

  2. सच कह रहे है मीडिया जूठन खा खाकर अपनी टी. आर.पी. बढ़ा रही है .

  3. Kashif said

    अरे आपने तो दिल की बात कह दी !

  4. अजी यहा सब ऎसे ही है, यह नेता भी तो कुछ कम नही, आज आप ने अपने लेख मै बहुत सच लिखा है, काश इसे यह निक्कमा मीडिया भी पढे रो चुलू भर पानी मे डुब मरे.धन्यवाद

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