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घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 6, 2008

सलाखों के पीछे बंद सुकरात से
पहरे पर खड़े एक सैनिक ने कहा था,
तुम इस जेल से भाग जाओ,क्योंकि मुझे पता
हैं कि ये लोग जघन्य अपराध कर रहे हैं।
मुस्कराते हुये सुकरात ने जवाब दिया था,
लोकतंत्र के इन पहरेदारों को पता होना चाहिए
कि मेरी मौत से यह डेमोक्रेसी और मजबूत होगी।
सुकरात की मौत पूरी तरह से डेमोक्रेटिक थी
मतदान हुये थे—मौत के पक्ष और विपक्ष में।
अंतिम फैसला के बाद सुकरात ने विष के रूप
में अपने लिए मौत का प्याला खुद चुना था
———एक सच्चे डेमोक्रेट की तरह।
बंदुक के साये में घूमने वाले नेताओं की
रखैल नहीं है डेमोक्रेसी…
इसके नाम पर अब और दलाली
और धंधेबाजी नहीं, बस बहुत हुआ।
डेमोक्रेसी मेरी बीवी है, जो लड़ती है, झगड़ती है
और मुझे प्यार करती है।
और मैं भी इससे प्यार करता हूं,
डेमोक्रेसी को मैं हाथ में विष का प्याला लिये
सुकरात के मुस्कराते हुये होठों पर देखता हूं
और उनलोगों के चेहरे को भी पहचानता हूं
जो डेमोक्रेसी को उसी के नाम पर जहर दे रहे हैं
इन चेहरों को नोंचने से घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का।

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3 Responses to “घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का”

  1. जो डेमोक्रेसी को उसी के नाम पर जहर दे रहे हैंइन चेहरों को नोंचने से घंटा न कुछ उखड़ेगा डेमोक्रेसी का। बहुत सुंदर,धन्यवाद

  2. cmpershad said

    हर सच्चा डेमोक्रेट सूली चढा है। सुकरात तो एक था, भारत में करोडों हैं!

  3. बंदुक के साये में घूमने वाले नेताओं कीरखैल नहीं है डेमोक्रेसी…बहुत खूब

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