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इसे मैंने भी चुराई थी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 13, 2008

वो रसियन जूते थे, भूरे-भीरे। उनके फीतों में लोहे के बोल्ट लगे थे। दाये पैर के जूते के मुंह पर एक बड़ा सा छेद था, जॉन बनार्ड शा की काली कोट की तरह। याकोब उन जूतों से बेहद प्यार करता था। उन जूतों ने दुनियाभर की घाटियों में उसका खूब साथ दिया था। महानगरों की सड़कों पर चलने में उसे मजा नहीं आता था। याकोब से कई बार दोनों जूतों ने एक साथ शिकायत किया था कि महानगरों की हवायें उसे उच्छी नहीं लगती, उन्हें खुली हवायें चाहिए। लेकिन याकोव के सिर पर महानगरों में रहने की जिम्मेदारी थी, और इस जिम्मेदारी से वह चाहकर भी नहीं भाग सकता था। एक दारूखाने में उसे रात गुजरानी थी,छककर शराब पीते हुये, चार लोगों के साथ। बड़ी मुश्किल से इस बैठक में शामिल होने की उसने जुगत लगाई थी। चेचेन्ये में एक थियेटर को कैप्चर करने की योजना पर बनाई जा रही थी। याकोब जमकर उनके साथ पीता रहा। सुबह उसके जूते गायब हो चुके थे। उनचारों में से किसी एक ने चुरा लिया था। वे जूते उससे बातें करती थी, जंगलों में, घाटियों में, दर्राओं में, नदियो में।
कमांडर, क्या सोंच रहों हों, एक साथी ने पूछा।
अपनी जूतों के विषय में, वो तूम्हारे पैरों में है।
मेरे जूते,यह तो मैंने चुराई थी, एक कमांडर की थी।
मैंने चुराई थी.
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5 Responses to “इसे मैंने भी चुराई थी”

  1. बहुत बढिया!!

  2. वाह क्या बात है…..धन्यवाद

  3. सच बोलना भी ग़लत नही है .

  4. … जूते भी कमाल कर गये / कर रहे हैं।

  5. Dr.Bhawna said

    बहुत सुंदर…

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