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पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on December 30, 2008

पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें
अच्छी किताबें,सच्ची किताबें,
मेरा होता था सिर तेरी आगोश मे
तेरे बगल में होती थी किताबें।

हंसती थी तू उन किताबों के संग
रोती थी तू उन किताबों के संग,
कई रंग बदले किताबों ने तेरे
कई राज खोले किताबों ने तेरे।

जब किताबों से होकर गुजरती थी तुम
चमकती थी आंखे,और हटाती बालें,
शरारतों पर मुझको झिड़कने के बाद
फिर तेरी आंखों में उतरती थी किताबें।

होठों से तेरी झड़ती थी किताबें
मेरे अंदर उतरती थी किताबें,
डूबी-डूबी सी अलसायी हुई
हाथों में तू यूं पकड़ती थी किताबें ।

चट्टानों से अपनी पीठ लगाये हुये
सुरज ढलने तक तूम पढ़ती थी किताबें,
अंधरे के साया बिखरने के बाद
बड़े प्यार से तुम समेटती थी किताबें ।

उलटता हूं जब अपनी दराजों की किताबें
हर किताब में तेरा चेहरा दिखता है,
चल गई तुम, पढ़ कर मेरी जिंदगी को
मेरे हिस्से में रह गई तेरी किताबें।

शब्द गढ़ता हूं मैं तेरी यादों को लेकर
तेरी यादों से जुड़ी हैं कई किताबें,
मेरे प्यार का इन्हें तोहफा समझना
तेरी याद में लिख रहा हूं कई किताबें।

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5 Responses to “पढ़ती थी तूम मेरे लिये किताबें”

  1. Amit said

    उलटता हूं जब अपनी दराजों की किताबेंहर किताब में तेरा चेहरा दिखता है,चल गई तुम, पढ़ कर मेरी जिंदगी कोमेरे हिस्से में रह गई तेरी किताबें।बहुत हे अच्छी रचना है….यादों के झरोखों से झाकती एक कविता …बहुत हे अच्छी लगी…

  2. शब्द गढ़ता हूं मैं तेरी यादों को लेकरतेरी यादों से जुड़ी हैं कई किताबें,मेरे प्यार का इन्हें तोहफा समझनातेरी याद में लिख रहा हूं कई किताबें। बहुत ही सुंदर कविता लिखी है आप ने…. बहुत कुछ याद दिला देती है.धन्यवाद

  3. नव वर्ष की आप और आपके समस्त परिवार को शुभकामनाएं….नीरज

  4. alok nandanji,I liked your new poem kitaben exploring a new thought. I have come back to the blog and will be active hereafter.wish you a very happy new year 2009hari shanker rarhi

  5. Dr.Bhawna said

    आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं…

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