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Archive for January, 2009

अथातो जूता जिज्ञासा-7

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 31, 2009

अब बात चलते-चलते मुहावरों तक आ ही गई है तो बताते चलें कि हमारे देश में एक मुहावरा है – भिगो कर जूते मारना. वैसे मैं सही कह रहा हूँ, मैं भिगो कर जूते मारना पसन्द नहीं करता. इसकी वजह यह है कि मैं जूते सिर्फ़ दो तरह के पहनता हूँ- या तो चमडे के या फिर कपडे के. इन दोनों ही प्रकार के जूतों के साथ एक बडी भारी दिक्कत यह है कि इनसे मारने पर किसी को चोट तो कम लगती है और आवाज़ ज़्यादा होती है. ख़ास तौर से चमडे वाले जूते के साथ तो बहुत बडी दिक्कत यह है कि भीगने से वे ख़राब हो जाते हैं. अब अगर जूते भीग गए तो मैं चलूंगा कैसे? ऊपर से ज्ञानदत्त जी पानी में रात भर इन्हे भिगोने की बात करते हैं. मुझे लगता है कि पिछले दिनों इन्होने अपने जो एक फटहे जूते का फोटो पोस्ट किया था, वह इसी तरह फटा होगा.

जहाँ तक मेरा सवाल है, आप जानते ही हैं, आजकल हर चीज़ का दाम बहुत बढा हुआ है. सब्ज़ियां गृहिणियों के लिए जेवरों की तरह दुर्लभ हो गईं हैं और दाल के मामले में तो पहले से ही आम आदमी की दाल गलनी बन्द है. आम तौर पर आम आदमी को सिर्फ़ सूखी रोटी से काम चलाना पड रहा है. ऐसी स्थिति में मैं घर-परिवार के लिए रोटी का जुगाड करूँ या जूते ख़रीदूँ. भला एक नया ख़र्च मैं कैसे एफोर्ड कर सकूंगा?

मेरी इन तथ्यगत मजबूरियों के बावजूद भाई आलोक नन्दन ने आरोप लगाया है कि मैं भिगो कर जूते मारता हूँ. हालांकि मैं अपने परमप्रिय नौ नम्बर के जूते की कसम खाकर कह सकता हूँ कि मैने उन्हें कभी किसी भी तरह से जूते नहीं मारे हैं. पर अगर मुहावरे के रूप में इसकी बात की जाए तो मेरी मातृभाषा यानी कि भोजपुरी में थोडे अलग अन्दाज वाली एक ऐसी ही कहावत है. यह कहावत है – मरलस त बकिर पनहिया लाल रहल. आप जानते ही हैं कि कहावत मुहावरे की तरह अपना ठौर ढूंढने के लिए वाक्य की मोहताज नहीं होती. जूते की तरह मुहावरे का भी अपना स्वतंत्र अर्थ होता है. अगर तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो मुझे पूरा विश्वास है कि मुहावरे और कहावत के बीच क़रीब वही फ़र्क़ पाया जाएगा जो जूते और मोजे के बीच होता है.

कहावत में यह सामर्थ्य इसीलिए होती है क्योंकि हर कहावत के पीछे एक कहानी होती है. इस कहावत के पीछे कहानी यह है कि एक सज्जन ससुराल गए थे और वहाँ किसी कारणवश उन्हें व्यंजनों की जगह जूते परोस दिए गए. दुर्भाग्य से जूते ऐसी चीज़ हैं कि और तो हर मामले में उन्हें इज़्ज़त के लायक माना जाता है, पर इन्हें खाने के बाद कोई बताना नहीं चाहता. समझ लें कि रिश्वत या कमीशन की तरह. तो उन्होंने भी घर लौट कर किसी से इसका ज़िक्र करना मुनासिब नहीं समझा. लेकिन ख़बरची तो हर ज़माने में होते रहे हैं. सो यह एक्सक्लूसिव न्यूज़ भी किसी ने ब्रेक कर दी और देखते-देखते यह ख़बर पूरे गांव में फैल गई.

पहले तो लोंगों ने दबी ज़ुबान से पीठ पीछे ही चर्चाएं कीं.  जैसे अख़बारों में गॉसिप के कॉलम छपते हैं. पर जब दबी ज़ुबान चर्चाओं पर कहीं से कोई मानहानि का मुकदमा नहीं हुआ तो किसी सिरफिरे ने हिम्मत करके सीधे उन्हीं से पूछ लिया कि मान्यवर सुना है आपने ससुराल में जूते खाए हैं. अब सवाल यह है कि वे भला कैसे यह मान लेते कि ससुराल जैसी पावन जगह पर उन्होंने जूते जैसी चीज़ खाई. और दिक्कत यह कि वह आजकल के नेताओं की तरह महान भी नहीं हो सके थे जो सीधे ज़िन्दा मक्खी निगल जाते. लिहाजा बात तो उन्होंने मान ली, पर थोडे संशोधन के साथ. यह संशोधन बिलकुल वैसा ही था जैसा ईमानदार सम्पादक कभी-कभी सच्ची ख़बरों में कर देते हैं. उन्होने कहा कि हाँ भाई, मारा तो उसने, पर जिस पनही से मारा वह पनही असल में लाल रंग की थी.

पनही भोजपुरी में जूते को कहते हैं. फिर भी यह बताना ज़रूरी लगता है कि पनही और जूते के एक-दूसरे का पर्याय होने के बावजूद दोनों के बीच कुछ बुनियादी फ़र्क़ हैं. वैसे ही जैसे सैंडिल और हाई हिल सैंडिल में. आपसे क्या छिपाना, जूते खाना बेइज़्ज़ती की बात समझे जाने के बावजूद (हालांकि वास्तव में ऐसा है नहीं), ‘हम लोग’ एक उम्र में हाई हिल सैंडिल खाना बडे फ़ख़्र की बात समझा करते थे और हमराज टाइप के दोस्तों से उसकी चर्चा ‘मगर किसी से बताना मत’ वाले जुमले के साथ कुछ इस अन्दाज में किया करते थे कि वह ईर्ष्यावश सबको बता दे और कम से कम अपनी पूरी ज़मात तो यह बात जान ही जाए कि अब अपन भी इस लायक समझे जाने लगे हैं. क्या पता उन सज्जन के साथ भी कुछ ऐसी ही बात रही हो.

ख़ैर, अभी बात पनही और जूते की चल रही थी. जान लें कि पनही असल में जूते की थोडी बिलो टाइप वैरायटी है. हिन्दी में उसे प्लास्टिक का जूता कहते हैं. भोजपुरी इलाके में यह बहुत लोकप्रिय इसलिए है, क्योंकि अधिकांश क्षेत्रफल मटियार ज़मीन और लाल व काली सडक से महरूम होने के नाते वहाँ रास्तों में जगह-जगह पानी जमा रहता है. ऐसी स्थिति में अकसर लोगों को जूता पैरों के बजाय हाथ में लेकर चलना पडता है. मुहावरात्मक अर्थ में जूते और पानी के बीच कितना बैर है वह तो आप जानते ही हैं.

चमडे का जूता हमारे यहाँ अभिधात्मक अर्थ में एक ही महीने में सड जाता है. पुनश्च, उस पनही के लाल रंग का सम्बन्ध आप लाल झंडे से जोडने की ग़लती क़तई न करें. पनही को लाल कहने का उनका कुल मतलब बस इतना ही था कि वह पनही रंगदार यानी कि रंगीन थी. हमारी-आपकी तबीयत की तरह. बाक़ी तो आप ख़ुद ही समझदार हैं.

(…. अभी और भी हैं जहाँ आगे-आगे)

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अथातो जूता जिज्ञासा-6

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अथातो जूता जिज्ञासा-6

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 30, 2009

अजीत के अलग-अलग नाप वाले जूतों की बात पर मुझे याद आया मेरे एक धर्माग्रज विष्णु त्रिपाठी ने काफ़ी पहले जूतों पर एक कविता लिखी थी. पूरी कविता तो याद नहीं, लेकिन उसकी शुरुआती पंक्तियां कुछ इस तरह हैं : जूते भी आपस में बातें करते हैं. इसमें वह बताते हैं कि आंकडों के तौर पर एक ही नम्बर के दो जूते भी मामूली से छोटे-बडे होते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे दो जुड्वां भाइयों में बहुत सी समानताओं के होते हुए भी थोडा सा फ़र्क़ होता है. वह बताते हैं कि जूते आपस में बातें करते हुए एक दूसरे से शिकायतें भी करते हैं और ख़ास तौर से बाएं पैर के जूते को दाएं पैर के आभिजात्य से वैसा ही परहेज होता है जैसा धूमिल के शब्दों में दाएं और बाएं हाथ के बीच होता है.

आपको इस कविता की वैज्ञानिकता पर सन्देह हो सकता है, लेकिन भाई मुझे कोई सन्देह नहीं है. भला बताइए, जब जड होकर पेड तक बातें कर सकते हैं (और यह बात वैज्ञानिक रूप से सही साबित हो चुकी है) तो भला चेतन होकर जूते बातें क्यों नहीं कर सकते? वैसे करने को तो आप जूतों के चैतन्य पर भी सन्देह कर सकते हैं, लेकिन ज़रा सोचिए जूते अगर चेतन न होते तो चलते कैसे? कम से कम जूतों के चलने पर तो आपको कोई सन्देह नहीं होगा. हक़ीक़त तो यह है कि जूतों के बग़ैर आप ख़ुद नहीं चल सकते. अगर इसके बावज़ूद आपको जूतों के चलने पर सन्देह हो तो आप किसी महत्वपूर्ण मसले पर चलने वाली संसद की कार्यवाही देख सकते हैं.

इस तरह यह साबित हुआ कि जूते चेतन हैं और जब वे चेतन हैं तो उनके बातें करने पर कोई सन्देह किया ही नहीं जा सकता. बल्कि विष्णु जी तो केवल जूतों के आपस में बातें करने की बात करते हैं, पर मेरा तो मानना यह है जूते मनुष्यों से भी बातें करते हैं. भला बताइए, अगर ऐसा न होता तो कुछ लोग ऐसा कैसे कहते कि अब तो लगता है कि जूतों से ही बातें करनी पडेंगी. जी हाँ हुज़ूर! जूतों से बातें करना हमारे समाज में एक लोकप्रिय मुहावरे के रूप में प्रतिष्ठित है. यह तो आप जानते ही हैं कि मुहावरे कोई ऐसी-वैसी चीज़ नहीं, बल्कि इनमें हमारे लोक का साझा और संचित अनुभव छिपा होता है.

इस मुहावरे पर क़ायदे से ग़ौर करें तो ऐसा लगता है कि जूता कोई ऐरा-गैरा नहीं, बल्कि बडा साहब है. क्योंकि आम तौर पर लोग जूते से बात करने की तभी सोचते हैं जब आसानी से कोई काम नहीं होता है. अकसर यह पाया गया है कि आदरणीय श्री जूता सर से बात करते ही कई मुश्किल काम भी आसानी से हो जाते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे बडे-बडे साहबों से बातें करने पर असम्भव लगने वाले काम भी चुटकी बजाते हो जाते हैं. हालांकि मुझे ऐसा लगता है कि यह मुहावरा बहुत पुराना नहीं है. क्योंकि अगर यह कबीर के ज़माने में रहा होता तो उन्होंने साहब से सब होत है लिखने की ग़लती न की होती. छन्द की दृष्टि से जितनी मात्राएं साहब शब्द में हैं, जूता या जूती शब्द में भी उतनी ही मात्राएं हैं.

यह भी हो सकता है कि जूते की यह अलौकिक क्षमता इधर ही पता चली हो. अब तो यह देखा जाता है कि कुछ लोग सिर्फ़ जूतों से ही बातें करने के आदी हो गए हैं. यह भी पाया जाता है कि उनके सारे काम चुटकी बजाते हो जाते हैं. अडियल से अडियल अफसर भी उनकी फाइल रोकने की ग़लती कभी नहीं करता और यहाँ तक कि छोटी-मोटी कमियों की खानापूरी तो ख़ुद कर देता है. यह अलग बात है कि बरास्ता या मार्फ़त जूता किसी से बात करना सबके बस की बात नहीं है. अगर कोई मामूली हैसियत में पैदा हुआ हो और वह इस लायक बनना चाहे कि वह जूते से बातें कर सके तो यह लायकियत हासिल करने में ही उसे बहुत सारे जूते खाने पड जाते हैं. इसीलिए कुछ मामलों में जूते खाना भी काबिलीयत का एक पैमाना है.

राजनीतिक पार्टियां भी टिकट देते वक़्त इस बात का पूरा ख़याल रखती हैं कि कौन से कैंडीडेट के जूते कितने मजबूत और चलेबल हैं. जनता का वोट भी आम तौर पर उन्हीं महापुरुषों की झोली में जाता है जिनके जूतों में ज़्यादा मजबूती और चमक तथा ज़बर्दस्त रफ़्तार होती है. अब अगर कुछ जगहों से कमज़ोर जूतों वाले जनप्रतिनिधि चुन कर आने लगे हैं तो उसके पीछे भी सच पूछिए तो चुनाव आयोग के जूते का ही प्रताप होता है. यही क्यों, ग़ौर करें तो आप पाएंगे कि टीएन शेषन से पहले चुनाव आयोग को जानता ही कौन था! और टीएन शेषन के समय से अगर इस आयोग को जाना जाने लगा तो क्यों? भाई बात साफ़ है, शेषन के मजबूत, चमकदार और तेज़ रफ़्तार जूतों तथा उन्हें चलाने की उनकी प्रबल सुरुचि के कारण.

(शेष कल)

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अथातो जूता जिज्ञासा-5

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 29, 2009

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हमारे महान देश की महान जनता जूते या लाठी को केवल सहयोग देती आ रही हो, ऐसा भी नहीं है. हक़ीक़त यह है कि विभिन्न अवसरों पर जूते में अपनी अगाध आस्था भी जताती आई है और आज तक जताती आ रही है. यक़ीन न हो तो आप किसी भी चौराहे पर देख सकते हैं. हम लोग ऐसी सडकों और चौराहों पर ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी अपनी तौहीन समझते हैं, जहाँ जूते की तैनाती न की गई हो. इसके विपरीत जहाँ कहीं जूता दिखाई दे जाता है, वहीं हम अत्यंत ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देने को स्वयं ही आतुर हो उठते हैं. यह अलग बात है कि वह जूता कभी चालान के रूप में होता है, तो कभी डंडे के रूप में और कभी जुर्माने के रूप में. जूता न हो तो हम रेल में चलते हुए टिकट तक कटाना गवारा नहीं करते. और अपनी नीति नियामक संस्थाओं यानी संसद तथा विधान सभाओं में तो हम उन्हे भेजने लायक ही नहीं समझते जिन्हें जूता चलाना न आता हो. जूते में हमारी आस्था का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है!

अथातो जूता जिज्ञासा के दूसरे खंड पर टिप्पणी करते हुए भाई आलोक नन्दन जी ने बताया है कि हिन्दी सिनेमा के इतिहास में भी जूते की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होने इस सन्दर्भ में जॉनी छाप हीरो राजकुमार का नाम अत्यंत आदर से लिया है और बताया है कि उनका ओपनिंग सीन आम तौर पर उनके चमकते हुए जूतों से ही शुरू हुआ करता था. क्या पता अगर सर्वे करवाया जाए तो यह मालूम हो कि उनकी लोकप्रियता का कुल कारण ही जूते रहे हों. इसी क्रम में उन्होने खलनायक अजीत और उनकी एक फिल्म का भी जिक्र किया है. इस फिल्म में वह अपने दोनों पैरों में अलग-अलग नम्बरों के जूते पहनते हैं और बाद में इसी से बतौर क़ातिल पहचाने भी जाते हैं. ग़ौर किए जाने लायक बात यह है कि उन्हें पहचानने वाले भी कोई और नहीं, ख़ुद धरम पा जी हैं. वही धरम पा जी जिनके डर से कुत्तों ने गलियाँ छोड दीं. पता नहीं, कब किस कुत्ते पर उनका मन आ जाए और उसका ख़ून पीने के लिए उनका मन मचल उठे.

हमारे इलाके के स्टार गायक बलेस्सर यादव को उन्होने याद दिलाया है, उनके गाए एक गाने के लिए. इस गाने के बोल हैं भगवान से बढ कर जूता है. और इसकी वजह बताते हुए उन्होने स्पष्ट किया है कि मन्दिर में लोग जाते तो हैं भगवान के दर्शन के लिए, लेकिन ध्यान लगा रहता है जूते पर. क्योंकि मन्दिरों में जूता बाहर निकाल कर जाना पडता है और बाहर आप के जूते पर कब किसका दिल आ जाए, क्या पता! वैसे हमारे देश की पब्लिक तो है ही जूताप्रेमी. बलेस्सर भाई का एक और गाना है – अगर चप्पल की ऊँचाई अइसे बढती रही तो संडिल के नीचे से डंडा लगा दिया जाएगा. असल में उनका इशारा हाई हिल सैंडिलों की ओर है और आप तो जानते ही हैं कि पहले सैंडिलों की हिल हाई करने के लिए उनके तले में वुडवर्क ही होता था. ऊँचाई बढाने के डंडा लगाने की उन्होने बेवजह नहीं की है. बात असल में यह है कि वह भी डन्डे यानी कि दंड और जूते के बीच का सम्बन्ध स्पष्ट करना चाहते हैं.   

हमारे इस जूताप्रेम का अन्दाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भगवान के चरण भी हम केवल इसी भय से छूते हैं कि उनका जूता हमारे सिर पर न पडे. यक़ीन न हो तो इस सन्दर्भ में आप भगवान शनि देव का उदाहरण देख सकते हैं. न केवल विज्ञान, बल्कि हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार भी शनि केवल एक ग्रह हैं. ज्योतिष और पुराणों के अनुसार इन्हें ग्रहमंडल में न्याय का अधिष्ठाता माना जाता है और इनका मुख्य कार्य है लोगों को उनके धर्मविरुद्ध आचरण या कहें ग़लत कार्यों के लिए दंडित करना. लेकिन वह ग्रह से पहले महराज, महराज से देव और फिर भगवान के रूप में मान्य हो गए.

अब अगर आप ग़ौर करें तो पाएंगे कि हमारे देश में धर्म की धारा ही 90 प्रतिशत तो अकेले शनिदेव के चलते बह रही है. बडे से बडा नास्तिक भी उनकी साढे साती के चपेट में आते ही श्री हनुमान चालीसा पढने लगता है. जय जय जय हनुमान गोसाईं. कृपा करहुं गुरु देव की नाईं. का जाप करते हुए वह मक्खीचूस भी तेल-उडद-तिल दान करने के लिए ग़रीब आदमी की तलाश में लग जाता है, जो रिक्शे वाले को वाजिब किराया मांगने पर चाटे रसीद करने में कोई परहेज नहीं करता है.

विद्वान ज्योतिषियों का मानना है कि शनिदेव की सर्वाधिक प्रिय वस्तु जूता ही है. शायद इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही एक ब्लॉगर भाई राकेश ने जूता देव चालीसा जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण रचना की है. अगर आप शनि देव के कोप से मुक्ति पाना चाहते हैं तो सर्वोत्तम उपाय यह है कि काले रंग का जूता दान करें. अव्वल तो ज्योतिषी लोग ऐसा मानते हैं कि भगवान राम को वनवास भी शनिदेव की महादशा के कारण हुआ था और छोटे भाई भरत ने उनसे पादुकाएं भी शनिदेव के प्रभाव के ही कारण उतरवाईं थीं. तात्पर्य यह कि भरत भाई तो केवल बहाना थे, वस्तुत: भगवान राम के जूते उतरवाने का काम तो शनिदेव ने किया था.

अब मैं सोचता हूँ कि काश महाराज दशरथ को यह बात पता रही होती और उन्होने भगवान राम से दस-बीस जोडी जूते दान करवा दिए होते तो यह सब क्यों हुआ होता. समझ में नहीं आता कि वसिष्ठ जैसे राजगुरु उनके संरक्षण में रहते हुए केवल दूसरे ऋषियों को ब्रह्मर्षि की उपाधियां बांटने या इसके लिए उन्हें अयोग्य घोषित करने का ही काम कर रहे थे य फिर ग्रहों की प्रवृत्तियों आदि पर भी उन्होंने कुछ काम करने की जहमत कभी उठाई. भरत भाई थोडा उनके द्वारा निकाले गए मुहूर्त पर ग़ुस्साए भी तो बस एक लाइन में कह दिया : सुनो भरत भावी प्रबल और बस मामला खल्लास. इस लिहाज से देखें तो उनसे बेहतर तो हमारे टीवी चैनलों के ज्योतिषी हैं जो अपनी चमत्कारी अंगूठियों से शनिदेव तो क्या उनके पिताश्री सूर्यदेव तक का इंतज़ाम कर दिया करते हैं.

(भाई अब बाक़ी कल)

 अथातो जूता जिज्ञासा-4

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अथातो जूता जिज्ञासा- 4

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 29, 2009

अब तक आपने पढा 

अथातो जूता जिज्ञासा – 1

अथातो जूता जिज्ञासा – 2

अथातो जूता जिज्ञासा – 3

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अब साहब युवराज तो ठहरे युवराज. रोटी वे जैसे चाहें खाएं. कोई उनका क्या बिगाड लेगा. पर एक बात तो तय है. वह यह कि पादुका शासन की वह परम्परा आज तक चली आ रही है. चाहे तो आप युवराज के ही मामले में देख लें. अभी उन्हें बाली उमर के नाते शासन के लायक नहीं समझा गया और राजमाता ख़ुद ठहरीं राजमाता. भला राजमाता बने रहना जितना सुरक्षित है, सीधे शासन करना वैसा सुरक्षित कहाँ हो सकता है. लिहाजा वही कथा एक बार फिर से दुहरा दी गई. थोडा हेरफेर के साथ, नए ढंग से. अब जब तक युवराज ख़ुद शासन के योग्य न हो जाएं, तब तक के लिए राजगद्दी सुरक्षित.

हालांकि इस बार यह कथा जैसे दुहराई गई है अगर उस पर नज़र डालें और ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ पूरे प्रकरण को देखें तो पता चलता है कि यह कथा हमारे पूरे भारतीय इतिहास में कई बार दुहराई जा चुकी है. अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि कालांतर में वही पादुका दंड के रूप में बदल गई. उसे नाम दिया गया राजदंड.

वैसे दंड का मतलब होता है लाठी और लाठी की प्रशस्ति में हिन्दी के एक महान कवि पहले ही कह गए हैं :

लाठी में गुन बहुत हैं

सदा राखिए साथ

इस बात को सबसे सही तरीक़े से समझा है पुलिस वालों ने. लाठी उनके जीवन का वैसे ही अनिवार्य अंग है जैसे राजनेताओं के लिए शर्मनिरपेक्षता. वे खाकी के बग़ैर तो दिख सकते हैं, पर लाठी के बग़ैर नहीं. बिलकुल इसी तरह एक ख़ास किस्म के संतों के लिए भी लाठी अनिवार्य समझी जाती है. यही नहीं, पुराने ज़माने में राजा के हाथ में राजदंड थमाने का काम भी संतों की कोटि के लोग करते थे. उन दिनों उन्हें राजगुरु कहा जाता था. राजा के सिर पर मुकुट हो न हो, पर राजदंड अवश्य होता था.

बाद में जब भारत में अंग्रेज आए तो उन्होंने एक कानून बनाया और उसी कानून के तहत राजदंड को दो हिस्सों बाँट दिया. बिलकुल वैसे ही जैसे भारत की जनता को कई हिस्सों में बाँट दिया. उसका एक हिस्सा तो उन्होंने थमाया न्यायपालिका को, जिसे ठोंक कर न्यायमूर्ति लोग ऑर्डर-ऑर्डर कहा करते थे और दूसरा पुलिस को. एक के जिम्मे उन्होंने कानून की व्याख्या का काम सौंपा और दूसरे के जिम्मे उसके अनुपालन का. अब दंड के हाथ में रहते न तो एक की व्याख्या को कोई ग़लत ठहरा सकता और न दूसरे के अनुपालन के तरीक़े को.

अब कहने को अंग्रेज भले चले गए, लेकिन किसी के भी द्वारा शुरू की गई उदात्त परम्पराओं के निरंतर निर्वाह की अपनी उदात्त परम्परा के तहत हमने उस परम्परा को भी छोडा नहीं. हमारे स्वतंत्र भारत के स्वच्छन्द शासकों ने लाठी के शाश्वत मूल्य को समझते हुए उसे ज्यों का त्यों अपना लिया. इसीलिए लाठी के शाश्वत मूल्यों के निर्वाह की वह उदात्त परम्परा आज भी तथावत और निरंतर प्रवहमान है तथा हमारे तंत्र के वे दोंनों अनिवार्य अंग आज भी बिलकुल वैसे ही उन मूल्यों का निर्वाह करते चले आ रहे हैं. देश की योग्य जनता तो एक लम्बे अरसे से इन परम्पराओं के निर्वाह की आदी है ही, लिहाजा वह बिलकुल उसी तरह इस परम्परा के निर्वाह में अपना पूरा सहयोग भी देती आ रही है.

(शेष कल)

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अथातो जूता जिज्ञासा – 3

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 27, 2009

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अब यह जो जार्ज पंचम का प्रशस्ति गान हम लम्बे समय से गाते चले आ रहे हैं, उसके पीछे भी वास्तव में जूता पूजन की हमारी लम्बी और गरिमापूर्ण परम्परा ही है. दरसल जूता पूजन की जो परम्परा हम गोसाईं के यहाँ देखते हैं, वह कोई शुरुआत नहीं है. सच तो यह है कि उन्होने उस परम्परा के महत्व को समझते हुए ही उसे उद्घाटित भर किया था. सच तो यह है कि जूता पूजन की परम्परा गोसाईं बाबा के भी बहुत पहले, ऋषियों के समय से ही चली आ रही है. हमारे आदि कवि वाल्मीकि ने ही जूते का पूजन करवा दिया था भगवान राम के अनुज भरत जी से. आप जानते ही होंगे भगवान राम के वनगमन के बाद जब भरत जी का राज्याभिषेक हुआ तो उन्होने राजकाज सम्भालने से साफ मना कर दिया. भगवान राम को वह मनाने गए तो उन्होने लौटने से मना कर दिया. आखिरकार अंत मैं उन्होने भगवान राम से कहा कि तो ठीक है. आप ऐसा करिए कि खुद न चलिए, पर अपनी चरणपादुका यानी खडाऊँ दे दीजिए. अब यह तो आप जानते ही हैं कि खडाऊँ और कुछ नहीं, उस जमाने का जूता ही है. सो उन्होने भगवान राम का खडाऊँ यानी कि जूता ले लिया.

बुरा न मानिए, लेकिन सच यही है कि भरत ने राजकाज सम्भालने में आनाकानी कोई भ्रातृप्रेम के कारण नहीं, बल्कि वस्तुत: इसीलिए की थी क्योंकि उनके पास ढंग का जूता नहीं था. वरना क्या कारण था कि वे जंगल में जाकर भगवान राम के जूते ले आते. यह बात वह अच्छी तरह से जानते थे कि जूते के बगैर और चाहे कोई भी काम हो जाए, पर राजकाज चलाने जैसा गम्भीर कार्य जूतों बगैर नहीं किया जा सकता. जूता जिज्ञासा के पहले खंड पर टिप्पणी करते हुए भाई नीरज जी ने बताया कि जूता ज़मीन से जुडी चीज़ है. आगे ज्ञानदत्त जी ने भी इसका समर्थन किया. अब मुझे लगता है कि भरत भाई ने यह बात पहले ही जान ली थी.

अगर नहीं जाना होता तो उन्हें भगवान राम के जूते की ज़रूरत क्यों महसूस होती. उन्हें पता था कि उनका तो पालन-पोषण लगातार राजमहल में ही हुआ था. वे कभी राजमहल से बाहर निकले ही नहीं. इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी ही तरह उनके जूतों को भी राजमहल से बाहर की दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं हो सकी है. जबकि भगवान राम और भाई लक्षमण बचपन में ही ऋषि विश्वामित्र के साथ जा कर महल से बाहर की दुनिया देख कर आ चुके है. इसलिए उनके जूतों को महल से बाहर की दुनिया भी पता चल चुकी है. उनके  जूतों की ब्रैंडिग महल से बाहर की दुनिया के लिए भी हो चुकी है. लिहाजा उन जूतों का इस्तेमाल शासन के लिए किया जा सकता है.

दूसरी बात यह भी उन्हें पता रही होगी कि ज़मीन से सीधे जुडने में जूते बडे आदमियों के लिए बाधक होते हैं. बिलकुल चमचों की तरह. जबकि भगवान राम का वन गमन वस्तुत: ज़मीन से जुडाव के लिए ही था. सो उन्होने भगवान का जूता भी मांग लिया. अब भगवान श्री राम जूतों के न होने से सीधे अपने पैरों से ही ज़मीन के अनुभव ले सकते थे. भला सोचिए, अगर भगवान के पैरों में जूते रह गए होते तो कैसे अहिल्या पत्थर से स्त्री बन पातीं और कैसे भगवान शबरी के जूठे बेर खा पाते. अब तो युवराज कलावती के घर में साफ खाना भी खाने जाते हैं तो जूते पहन कर जाते हैं और शायद इसीलिए लौटकर नहाते भी हैं विदेशी साबुन से. क्या पता रोटी वे डिटोल से धोकर खाते हैं, या ऐसे ही खा लेते हैं.

(आज इतना ही, बाक़ी कल)

 अथातो जूता जिज्ञासा-1

 अथातो जूता जिज्ञासा-2

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अथातो जूता जिज्ञासा – 2

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 26, 2009

 

अथातो जूता जिज्ञासा – 1 के लिए लिंक

झलक इसकी कबीर से ही मिलनी शुरू हो जाती है और वह भी बहुत परिपक्व रूप में. तभी तो कभी वह हिन्दुओं को कहते हैं:

दुनिया कैसी बावरी पाथर पूजन जाए.

घर की चाकी कोई न पूजे जाको पीसा खाए.

और कभी मुसलमानों को कहते हैं:

कांकर-पाथर जोडि के मसजिद लई चिनाय.

ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय.

यह सब जब वह कह रहे थे तब वास्तव में कहने के बहाने जूते ही चला रहे थे. यक़ीन न हो तो आज आप अपने तईं यह कह कर देख लीजिए. सिर पर असली के इतने जूते बरसेंगे कि फिर कुछ कहने या लिखने लायक भी नहीं बचेंगे. मैं भी अगर यह कहने की हिम्मत कर पा रहा हूँ तो कबीर के हवाले और बहाने से ही. आज अगर अपने तईं कह दूँ तो पता है कितनी तरह के और कितने जूते मुझे झेलने पडेंगे. अगर पाथर पूजने वाली बात कहूँ तो सिंघल, तोगडिया और शिवसैनिकों के डंडे झेलूँ और मसजिद वाली बात करूँ तो अल कायदा और तालिबान तो बाद में हमारे अगल-बगल की ही धर्मनिरपेक्ष ताक़तें पहले टूट पडें हमारे सिर. और भाई आप तो जानते ही हैं कबीर की ‘जो घर जारे आपना’ वाली शर्त मानना अपने बूते की बात तो है नहीं. क्योंकि जलाने के लिए मैं अपना घर कहाँ से लाऊँ? दिल्ली में घरों की क़ीमत चाहे कितनी भी सस्ती हो जाए, इतनी सस्ती तो कभी भी नहीं होगी कि एक अदना और खालिस कलमघिस्सू कभी भी अपना घर खरीद सके.

तो साहब कबीर का साथ देने का प्रोग्राम तो मुल्तवी समझिए. आगे बढें तो गोसाईं बाबा मिलते हैं. अरे वही, जिन्हे आप गोस्वामी तुलसीदास के नाम से जानते हैं. यक़ीन मानिए, जूतों के वह भी बडे कायल थे. वह तो जूतों के इतने कायल थे कि उन्होने अपने आराध्य भगवान राम के मुँह से ही जूतों की तारीफ करवाई. पढा ही होगा आपने ‘बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति’. आखिर इस ‘भय बिनु होइ न प्रीति’ का मतलब और क्या है? यही न, कि अरे भाई लछ्मन अब जरा जूता निकालो. ये जो समुन्दर जी हैं न, ये ऐसे नहीं मनेंगे. इन्हें समझाने के लिए समझावन सिंघ का उपयोग करना पडेगा. अगर गांव के पराइमरी इस्कूल में पढे होंगे तो  समझावन सिंघ का मतलब तो आप जानते ही होंगे. समझदार पडीजी और मुंशीजी लोग होनहार विद्यार्थियों से समझावन सिंघ के बगैर बात ही नहीं किया करते थे.

यक़ीन मानिए, समझावन सिंघ का असर इतना असरदार हुआ करता था कि दो दिन का पाठ लोग एके दिन में रट लिया करते थे. अब मैं पछ्ताता हूँ कि संस्कृत नाम का विषय पराइमरी में क्यों नहीं पढाया गया. अगर पढाया जाता रहा होता तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ मेरे जैसे कई होनहार विद्यार्थियों को बालक के रूप की द्वितीया विभक्ति भी याद हो गई होती. इसमें कमी किसी और बात की नहीं सिर्फ समझावन सिंघ की ही है.  तब के बच्चे गुरुजनों के नाम से काँपते थे. अब गुरुजनों की पैंट बच्चों के भय से खराब हो जाती है. वजह और कुछ नहीं, केवल समझावन सिंघ के प्रयोग पर स्कूलों में रोक का लगना है. अब स्कूलों के मैनेजमेंट बच्चों पर समझावन सिंघ का प्रयोग नहीं होने देते. अलबत्ता उनके पैरेंटों की जेबों पर मिस् कुतरनी का प्रयोग निरंतर करते रहते हैं. इससे बच्चों का भविष्य बने न बने पैरेंटों का वर्तमान ज़रूर बिगड जाता है.

अब पलट कर सोचता हूँ कि ये समझावन सिंघ आखिर क्या थे. अपने मूल रूप में जूता ही तो थे. गोसाईं जी पक्के वैष्णव होते हुए भी इनके परम भक्त थे. होते भी क्यों नहीं? खुद उनकी अप्नी जीवनलीला पर समझावन सिंघ का कितना गहरा असर था, यह आप उनके पत्नी प्रेम प्रसंग से लेकर काशी के पंडितों द्वारा उन पर किए गए भांति-भांति के प्रयोगों तक देख सकते हैं. कुछ ऐसे ही प्रयोगों से आजिज आकर उन्होंने कवितावली नामक एक ग्रंथ की रचना की थी. गौर फरमाएं तो पाएंगे यह ग्रंथरूप में ‘उस’ के अलावा और कुछ नहीं है. आखिर जब वह कह रहे थे:

धूत कहो, अवधूत कहो, रजपूत कहो,  जोलहा कहो कौऊ

काहू की बेटी से बेटा न ब्याहब, काहू की जात बिगारब न सोऊ                                 

…….. आदि-आदि.

बताइए. भला यह भी कोई कविता हुई. असल में तो यह वही है, जो उन्होंने अपने समय के पूरे समाज के मुँह पर दे मारा था. कुछ लोगों के मुँह पर तो वह ऐसा लगा कि उन्होंने तुलसी बाबा को संत ही मानने से इनकार कर दिया. ठीक भी है. आखिर ऐसे आदमी को संत कैसे माना जा सकता है जिसका सीकरी से कोई काम हो. तुलसी ने तो कुछ जूते सीकरी की ओर भी उछाल दिए थे. यक़ीन न हो तो देखिए :

खेती न किसान को, बनिक को बनिज नहिं

भिखारी को न भीख बलि चाकर को न चाकरी

जीविकाविहीन लोग सीद्यमान सोच बस

कहैं एक एकन सों कहाँ जाइ का करीं

जी हाँ साहब. यह उनके समय के महान शासक अकबर महान के शासन की खूबियाँ हैं जो उन्होंने अपने ढंग से गिनाई हैं. वैसे आप तो जानते ही हैं, आज भी ऐसे इतिहासकारों की कोई कमी नहीं है, जो अकबर के शासनकाल की खूबियाँ गिनाते और पब्लिक से उनके प्रेम का बखान करते नहीं थकते. यक़ीन मानिए, आने वाले दिनों हमारे लोकप्रिय जननायकों के बारे में इतिहास में ऐसा ही लिखा जाएगा. जार्ज पंचम का प्रशस्तिगान तो हम पूरी श्रद्धा भाव के साथ अभी ही गाने लगे हैं.

(भाई, आज यहीं तक. बाक़ी कल, अगली किस्त में…..)
 

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हिटलर,लेनिन और सिफलिसवाद

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 26, 2009

(गणतंत्र दिवस पर विशेष)
सिफलिस को लेकर इतिहास में खूब खेल खेला गया है, और जबरदस्त तरीके से खेला गया है। विश्व नायकों को भी इसमें लपेटने की कोशिश की गई है-हिटलर और लेनिन भी इससे अछूते नहीं थे। अपने विरोधियों को सिफलिस का मरीज बताना इंटरनेशनल डिप्लोमेसी का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। किसी महानायक को सिफलिस है या नहीं इसको लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, मनोविज्ञान की दुनिया में इसका इस्तेमाल किया जाये तो और बात है।
वैसे फ्रायड ने एडिपस कांप्लेक्स के नाम पर मनोविज्ञान की दुनिया में जो गंदगी उड़ेली है उसे देखते हुये कहा जा सकता है कि फ्राडय को न तो पुरातन कहानियों की समझ थी और न ही मन और विज्ञान की। एडिपस के सिर पर शुरु से ही दुर्भाग्य मडरा रहा था, इसी के वश में आकर उसने अपने पिता की हत्या कर दी थी और फिर मां के साथ उसकी शादी हुई, जिसे फ्रायड ने एडिपस कांप्लेक्स का नाम देकर पूरी दुनिया को गुमराह किया। फ्रायड की सेक्सुअल थ्योरी की सच्चाई चाहे जो भी रही हो,लेकिन उसने अपने थ्योरी के लिए एक पौराणिक कहानी का गलत तरीके से इस्तेमाल किया। अपने पिता की हत्या के पहले एडिपस अपनी मां से नहीं मिला था। उसे अपनी मां के बारे में गुमान तक नहीं था,फिर एडिपस कांप्लेक्स जैसे शब्द का इस्तेमाल क्यों ? क्या यह फ्राडय की अज्ञानता थी ? या वह जानबूझ कर अपनी बेतरतीब थ्योरी को एक मिथक से जोड़कर हो हल्ला जैसा माहौल क्रिएट कर रहा था? हिटलर और लेनिन को सिफलिश का शिकार बताने वाला मामला भी कुछ इसी तरह का है। यदि हम मान भी लेते हैं कि इन महानयकों को सिफलिस था, तो क्या विश्व इतिहास में इनका महत्व कम हो जाता है?
लेनिन की सिफलिस का लाल क्रांति पर कोई प्रभाव पड़ा- जीरो.
हिटहर की सिफलिस का नाजी मूवमेंट पर कोई प्रभाव पड़ा- जीरो.
फिर इतिहास में सिफलिस की आवश्यकता क्यों? इतिहास को सिफलिसवाद से जोड़ने कौन लोग है? और इस नजरिये का इतिहास में कितना महत्व दिया जाना चाहिये? शायद-जीरो।
सिफलिसवाद को स्थापित करने के लिए मेडिकल रिपोर्टों का भी भरपूर इस्तेमाल किया गया है। इन्हीं रिपोर्टों के आधार पर विश्व नायकों की मानसिकता को भी उकेरने की कोशिश की गई है। हिटलर वेश्याओं से घृणा करता था, इसकी व्यख्या कई रुपो में की जा सकती है, जिसका विश्व को प्रभावित करने वाली घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है, वैसे मनोवैज्ञानिक उलझन के लिए दिल बहलाने का ख्याल गालिब अच्छा है।
हिटलर के चरित्र को समझने के लिए प्रथम विश्व युद्ध (1914 से 1918 तक) के दौरान इंग्लैंड के प्रचार तंत्र पर हिटहर के नजरिये को समझना होगा। सीमा पर एक सैनिक के रूप में ब्रिटेन के प्रचार तंत्र की शक्ति को देखकर वह अचंभित रह गया था। किताबों को पढ़ने की कला वह बहुत पहले ही सीख चुका था और इसके प्रति वह एक सुलझी हुई सोच रखता था. दुनिया की नजर में उसकी सोच गलत हो सकती है,अपने तरीके से सोचना का पूरा अधिकार है सिफलिसवादी इतिहासकारों को।
उस वक्त वह एक सैनिक के रूप में ब्रिटेन की गोलियां झेल रहा था–दन, दना, दन…ठायं, ठायं, ऊपर से ब्रिटेन का कुशल प्रचार तंत्र हमला कर रहा था, जो अन्य जर्मन सैनिकों के साथ-साथ उसके मनोबल को भी तोड़ रहा था। युद्ध का प्रचार तंत्र वह झेले हुये था, वह भी सीमा पर। उसका यह अनुभव उसे विश्व इतिहास में एक स्थापित पद के लिए तैयार कर रहा था, इस बात से दुनिया का कोई भी वाद इन्कार नहीं कर सकता, जो इन्कार करता है वह सिफलिसवाद है और उन्हें भारत का सिफलिस दिखाई नहीं दे रहा है, या फिर देखना ही नहीं चाहते हैं।
लेनिन को लेकर भी सिफलिस के बहुत सारे किस्से हैं, दोनों दो धुव्र थे, दो धारायें थी, जो आपस में टकराती थी, लेकिन दोनों का मैकेनिज्म एक ही था और दोनों के खिलाफ सिफलिसवाद का हमला हुआ, उस तंत्र द्वारा जो दोनों के मध्य में था। सेकेंड वर्लड वार के दौरान दुनिया में दो तरह के मैकेनिज्म थे और तीन तरह के वाद । हिटलरवाद और लाल फिलॉसफी दो अलग-अलग धुव्र थे, जबकि बीच में एक सिफलिसवाद खड़ा था। ये तीनों वाद लोकतंत्र और विश्व कल्याण के नाम पर ही जंग लड़ रहे थे। लोकतंत्र और विश्व कल्याण को लेकर तीनो का अपना-अपना नजरिया था। तंत्र के मामले में हिटलरवाद और लाल फिलॉसफी एक ली जमीन पर खड़े थे, इन दोनों का खत्म करने का सबसे अच्छा रास्ता था कि इन्हें आपस में टकरा दो और एक सोची समझी रणनीति के तहत एसा ही किया गया। सही मायने में दोनों को एक-दूसरे के सामने कर दिया गया और प्रचारतंत्र द्वारा दोनों महारथियों को सिफलिस का शिकार साबित करने के लिए एक लंबा अभियान छेड़ा गया, जैसा कि उस प्रचार तंत्र का परम धर्म था।
एडॉल्फ प्रचार तंत्र को समझता था, साथ में वह एक अच्छा प्रशासक भी था. उसके आइडियोलॉजी चाहे जो भी रहे हो, लेकिन उसका तंत्र अपने समय में बहुत ही असरकारक था। नाजीवादी तंत्र की बनावट शानदार थी, इंटेलिजेंस से लेकर नागरिक तंत्र तक। जर्मनी के संशासधनों का उसने एक लक्ष्य के लिए इस्तेमाल किया, वह था जर्मनी का गौरव, जिसकी नीव बिस्मार्क ने डाली थी। हिटलर बिस्मार्क की अगली कड़ी था,और हालात के थपेड़े उसे इसी काम के लिए तैयार कर रहे थे, और वह खुद इन थपेड़ों पर सवार होकर जर्मनी का भाग्य विधाता बनने का सपना देख रहा था, साथ ही अपने सपनों पर यकीन भी कर रहा था,और धीरे -धीरे आम जर्मन भी उसके सपनों पर यकीन करने लगे थे।
वह अपने दिमाग में मचने वाले उथल पुथल को पूरे आवेग के साथ लोगों के सामने रखता था, वह साबित था, खूब बोलता था। हिटलर अपनी बातों को बेबाक तरीके से होगों के सामने रखता था और उस समय के माहौल में उस जो अच्छा लगता था उस ओर मजबूत कदम बढ़ाता था। मीन कैंफ पर जर्मनी में प्रतिबंध क्यों लगा है? क्योंकि जर्मन जनता उसे फिर से पढ़ कर पागल न हो जाये। वैसे जर्मनी के फिर से एकीकरण की पड़ताल करे ,समझ में आ जाएगा कि बर्लिन के बीच दीवार क्यो खड़ी की गई थी।
हिटलर लाल सेना को एक बंकर में मरा हुआ मिला था, उसके विरोधी उसे जिंदा पाने के लिए तरस गये थे। वह एक बहादुर सैनिक की तरह अंत तक अपने मोर्चे पर डटा रहा था, चाहे मोर्चा कितना भी क्यों न सिकुड़ती गई। हिटलर एक सैनिक की मौत की मरा था, (चंद्रशेखर आजाद जैसी मौत थी हिटलर की। ) इससे सिफलिसवादी इन्कार नहीं कर सकते। दुनिया भर में किसी भी सैनिक से पूछ कर देख ले, बंकर में हिटलर की मौत के लिए कोई भी सैनिक हजारों बार जनम लेना चाहेगा। बर्लिन चारों तरफ से घिरी हुई थी और वह एमा ब्राउन से शादी कर रहा था, अपनी जानी हुई मौत के ठीक पहले.एसा कोई कलाकर ही कर सकता था, रोमांटिसिज्म की यह परकाष्ठा थी! इतना कलात्मक मौत तो अच्छे-अच्छे सेना नायकों को भी नसीब नहीं हुई है। उस वक्त पूरी दुनिया रणभूमि बनी हुई थी और हिटलर केंद्र में था। क्या विश्व इतिहास में समय इतना देर किसी नायक पर टिका है ? उसके समय का कांटा उसी पर टिका हुआ था, एक साथ वह अनगिनित घटनाओं के केंद्र में था।
हिटलर के समय जर्मनी में लोहे की खपत बढ़ गई थी, और यदि लोहे की खपत किसी देश के विकास का पैमाना हो सकता है, तो जर्मनी निश्चित रूप से अपने विकास के चरमोत्कर्ष पर था। हिटलर के समय जर्मनी लोहा खाने वाले देशों में अग्रणी था। उसकी योजना जर्मनी के हर व्यक्ति तक कार पहुंचाने की थी। युद्ध के दौरान वह बर्लिन में एक शानदार स्टेडियम बनाने के लिए खुद नक्शे पर घंटों काम करता था, क्योंकि उसे यकीन था इस युद्ध में सिर्फ और सिर्फ जर्मनी की जीत होगी। और जीत का जश्न इसी स्टेडियम में मनाया जाएगा। उसे नहीं पता था कि वह प्रकृति के हाथों मार खाने वाला है, नेपोलियन बोनापार्ट की तरह। पूर्वी फ्रंट को पूरी तरह से तहस-नहस करने के बाद इस्टर्न फ्रंट की तरफ उसके मूव को लेकर चाहे जो बहसबाजी हो, पूर्वी फ्रंट पर हमले की योजना उसने बहुत पहले बना ली थी,स्टालिन से हाथ मिलाने के बहुत पहले।
काम करने वाली उसकी मशनरी शानदार थी, जो वह सोचता था वही जमीन पर दिखाई देता था, सैंकड़ों हाथ उसकी योजनाओं को संभालने के लिए लग जाते थे। मानवीय श्रंखला का उसने शानदार इस्तेमाल किया था, ठीक लेनिन की मशीनरी की तरह।
हिटलर ने जर्मनी में एक सफल क्रांति को अंजाम दिया था, वह भी डेमोक्रेटिक तरीके से। वाइमर रिपब्लिक को कंट्रोल करते हुये एक मजबूत तंत्र की स्थापना की थी। कभी-कभी जनता की इच्छा और कभी कभी जनता की दुर्बलता सैनिक तानाशाली का मार्ग प्रशस्त करती है। हिटलर की तानाशाही का आधार जनता की इच्छा थी। समय की मांग वहां की जनता को सैनिक तानाशाह की ओर आकर्षित कर रहा था और इतिहास में इस तरह के मोड़ विरले ही देखने को मिलते हैं। अपने आप को क्रांतिपुत्र कहने वाला नेपोलियन ने फ्रांस के ताज को जनता की इच्छा को देखते हुये ही अपने सिर पर रखा था। हिटलर के संदर्भ में कई बातें हैं, जिन्हें परत दर परत खोलने और टटोलने की जरूरत है।
सिफलिसवाद से इतर हटकर क्या हम हिटलर और लेनिन जैसे महानयकों को भारतीय नजरिये से परखने की स्थिति में हैं ? क्या हम सिफलिसवादी प्रचार तंत्र के प्रभाव से मुक्त हैं ? भारत को अपनी पूरी मौलिकता के साथ विश्व इतिहास के नायकों को उलट-पलटकर ठोक बजाकर परखना होगा, तभी हम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सही डग भर सकेंगे। भारत की अपनी जमीन है, अपने तौर तरीके है अपना मिजाज है। यदि हिटहर और लेनिन भारत की मनस्थिति के अनुकूल नहीं है तो निसंदेह उन्हें अरब सागर में फेंक दिया जाना चाहिये, लेकिन इसके लिए निरपेक्ष मूल्यांकन की जरूरत है। यह तभी संभव है जब भारत सिफलिसवाद से मुक्त हो जाएगा।
व्यक्तिगत जीवन में भले ही लेनिन सिफलिस का शिकार रहा हो, क्या हम इस बात से इनकार कर सकते हैं कि उसने रूस में लाल क्रांति का सफल नेतृत्व किया और दुनिया के आर्थिक इतिहास में पंचवर्षीय योजनाओं का सूत्रपात किया। इतिहास की तारीखों में लेनिन के नाम कई महान घटनाये दर्ज हैं, भले ही इन घटनाओं में हजारों लोगों की लाशे भी शामिल हो। समय जब करवट लेता है तो लोगों की बलि चढ़ती ही है। प्रश्न है भारत किस मोड़ पर खड़ा है। एक बार इसकी जमीन पकड़ ले, फिर मंजिल खुद ब खुद मिल जाएगी।

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अथातो जूता जिज्ञासा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 25, 2009

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अथातो जूता जिज्ञास्याम:. जी हाँ साहब, तो अब यहाँ से शुरू होती है जूते की जिज्ञासा. आप ठीक समझ रहे है मैं जूता शास्त्र लिखने की ही तैयारी मे हूँ. भारत मे शास्त्रो के लेखन की एक लम्बी परम्परा रही है और सभी शास्त्रो की शुरुआत इसी तरह होती है – अथातो से. अथातो से इस्की शुरुआत इसलिए होती है क्योंकि इससे यह जाहिर होत है कि इससे पहले भी इस विषय पर काफी कुछ कहा जा चुका है और आपसे यह उम्मीद की जाती है कि आप उसके बारे मे काफी कुछ जांनते भी हैं. आप जाने या न जाने, पर मै आपसे इतनी तो उम्मीद कर ही सकता हूँ कि आप कम से कम जूते और शास्त्रो के बारे मे तो जानते ही है.
तो पहले बात शास्त्रो से ही शुरू करते है. भारत मे छ: शास्त्र तो प्राचीन काल से चले आ रहे है, एक सातवाँ शास्त्र इसमे महापंडित राहुल सान्कृत्यायन ने जोडा – घुमक्कड शास्त्र. अन्यथा न ले, मैं उसी परम्परा को आगे बढा रहा हूँ. आप जानते ही है, घूमने के लिए जो चीज़ सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, वह है पैर. पैर मज़बूत और सही सलामत होँ तभी घूमने का पूरा मज़ा लिया जा सकता है. पुनश्च, पैरों को सही-सलामत व मज़बूत बनाए रखने के लिए अनिवार्य है जूता. सही बात तो यह है कि आज की दुनिया मे आपके पास पैर हों या न हों पर जूता होना ज़रूरी है. कोई भी आपके पैर नहीं देखता. देखना चाहे तो भी नहीं देख सकता. क्योंकि पैर तो आपका जूतों के अन्दर सुरक्षित रहता है. उसे कोई कैसे देख सकता है? देखते लोग जूता ही हैं. अव्वल तो सच यह है कि पैर छूने के नाम पर भी अधिकतर लोग छूते भी जूता ही हैं. और आपके पैर में ढंग के ब्रैंडेड जूते न हों तो कोई आपके पैर छुएगा भी नहीं.
तो जूते की कुछ तो महत्ता आपको इतने से ही चल गई होगी. अब हम जूता जिज्ञासा या कहें कि जूता चिंतन की इस प्रक्रिया को आगे बढाते हैं. वैसे जैसा कि मैं पहले ही स्पष्ट कर चुका हूँ, यह जूता चिंतन करने वाला भी मैं कोई पहला महापुरुष नही हूँ. मुझसे पहले इस देश में ऐसे कई महापुरुष हो चुके हैं, जिन्होने गम्भीर और महत्वपूर्ण विषय पर गहन चिंतन-मनन किया है. उनके द्वारा स्थापित की गई इस समृद्ध लेकिन अव्यवस्थित परम्परा को ही मैं आगे बढा रहा हूँ. वैसे मेरा प्रयास और कुछ नहीं, केवल पहले से चली आ रही इस समृद्ध परम्परा को व्यवस्थित देने भर का ही है. सच पूछिए तो इस परम्परा की शुरुआत तो संतों के समय से ही हो गई थी. लेकिन चूँकि ज़्यादातर संत ‘मसि कागद छूयौ नहीं’ वाली परम्परा से सम्बद्ध थे, इसलिए वे इसे शास्त्र का रूप नही दे सके.
वैसे उनके द्वारा इसे व्यवस्थित शास्त्र का रूप न दिए जाने का एक दूसरा कारण भी हो सकता है. असल में ऐसा माना जाता है कि वे पढे-लिखे भले न रहे हों पर त्रिकालदर्शी ज़रूर थे. 20वीं सदी में क्या होने वाला है, ये वे 15वीं सदी में ही जानते थे. शायद वे जानते थे कि 20वीं सदी के भारत में जगह-जगह यूनिवर्सिटियां होंगी. उन यूनिवर्सिटियों में हिन्दी-अंग्रेजी जैसे कई विभाग होंगे. उन विभागों में बडे-बडे डिग्रीधारी जंतु होंगे. ये डिग्रियां उनके सिरों सींगों की तरह काम करेंगी, जिनका इस्तेमाल करते हुए वे जिसे चाहें विद्वान और जिसे चाहें दो कौडी का बेवकूफ साबित कर देंगे. किसी की कापी पर किसी का रोल नम्बर और किसी की थीसिस पर किसी का नाम चिपका देंगे. यह जानते ही वे शुरू मे ही डर गए होंगे कि अगर उन्होने इस शास्त्र को कोई व्यवस्थित रूप दे दिया तो इस पर से उनका नाम तो उकाच दिया जाएगा और उनकी जगह किसी डाक़्टर-प्रोफेसर का नाम चिपका दिया जाएगा. यही वजह है जो उन्होने इसे एक व्यवस्थित शास्त्र का रूप देने के बजाय सिर्फ एक झलक भर देकर छोड दी.
…………………………   
(बहरहाल, ऐसा लगता है कि जूता चिंतन का यह पोस्ट काफी लम्बा हो रहा है. और अगर यह हनुमान जी पूंछ की तरह बढता गया तो मुझे पक्का यक़ीन है आप इसे पढेंगे नहीं. इससे वैसे ही ऊब जाएंगे जैसे कोर्स की किताबों से छात्र ऊबे रहते हैं.  लिहाजा आज यहीं तक. आगे कल पढिएगा. अगली किस्त में.) …………   

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मल्हार गाती इतिहासकारों की टोली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 24, 2009

हिटलर को लेकर दुनिया भर में बहुत कुछ कहा गया है,कहा जा रहा है और कहा जाता रहेगा। दुनियाभर के कलमची विश्व इतिहास में उसे महाखलनायक के रूप में स्थापित करने के लिए वर्षों से कलम घसीट रहे हैं,हिटलर शब्द को एक गाली के तौर पर स्थापित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। क्या विश्व इतिहास में हम हिटलर का मूल्यांकन कभी निरपेक्ष भाव से करने का साहस करेंगे,साहस इसलिए कि जहां आप हिटलर के गुणों को सामने लाने की कोशिश करेंगे,लोग आपके अंदर भी रावण को देखने लगेंगे।
हिटलर को मानवता का दाग बताया जाता है, क्योंकि उसने बहुत बड़े पैमाने पर यहुदियों की हत्या करवाई। सामूहिक हत्यायें तो इतिहास का अंग रहीं हैं, सिकंदर जब यूनान से अपनी सेना लेकर बढ़ा तो क्या किया था, युद्ध के बाद युद्ध, और युद्द के बाद युद्ध, और युद्ध के बाद युद्ध ! इन युद्धों को जस्टीफाई करने के लिए उसने अपने साथ इतिहासकारों की एक टोली छोड़ रखा था,जो कलात्मक तरीके से इन युद्धों को उचित ठहराते हुये सिकंदर के लिए मल्हार गाते हुये उसे एक विश्व विजेता के रूप में दर्ज कर रहे थे।
स्पार्टकस के नेतृत्व में जो सेना रोमन साम्राज्य के खिलाफ खड़ी हुई थी, उसका भी कलात्मक तरीके से रोमनो ने संहार किया था, चूंकि स्पार्टकस लोकगीतों में ढल गया, इसलिये इतिहासकारों के कलम से उसे कुछ खास नुकसान नहीं हुआ.
मोहम्मद के नेतृत् में इस्लाम के पताका के नीचे जो सेना दौड़ी थी वह नरसंहार नहीं तो और क्या कर रही थी, वो भी लोगों को सभ्यता का पाठ पढ़ाने के नाम पर। दिन प्रतिदिन की जिंदगी से जोड़कर बहुत ही मजबूती से इस्लाम की फिलॉसफी को स्थापित किया गया, जिसके कारण पूरा अभियान इतिहासकारों के दायरे से निकल कर जनमानस तक एक अचंभे के रूप में स्थापित हुआ।
नेपोलियन बोनापार्ट की सेना पूरे यूरोप को कुचलती रही और मसलती रही, और उसके इतिहासकार उसे एक महानायक के रूप में स्थापित करने में लगे रहे। चंगेज खान और अहमदशाह अब्दाली को भले ही एक बहुत बड़े भू-भाग के लोग खलनायक मानते हो, लेकिन अपने समय में अपने लोगो और अपनी सेना का ये दोनों हीरो था।
नरसंहार को लेकर हिटलर को खलनायक बनाने के लिए दुनिया भर में फैले यहुदियों की लॉबी ने मजबूती से काम किया है,जिनकी मजबूत पकड़ अमेरिका पर है और अमेरिका दूसरे विश्वयुद्ध का विजेता रहा है। इसके लिये प्रचार माध्यमों (न्यूज पेपर,टीवी, फिल्म, साहित्य,इतिहास लेखन आदि) का घनघोर इस्तेमाल किया गया है। पूरी दुनिया को उपनिवेशों में बाटने वाले ये देश हिटलर के खिलाफ युद्ध को लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर पर लड़ रहे थे। युद्ध में पराजय के बाद हिटलर को एक सनकी तानाशाह के रूप में प्रस्तुत किया जाना स्वाभाविक था। कोई भी विजित दल एसा ही करता। विजेताओं के लिए इतिहास की औकात रखैल से ज्यादा नहीं है। यही कारण है कि हिटलर मानवता के लिए एक नाजायज संतान की तरह दिखता है या दिखाया जाता है।
वाइमर गणतंत्र को दुनिया का सबसे मजबूत गणतंत्र माना जाता था। हिटलर के शासन में आने के पहले वहां के चुनावी परिदृश्य के आंकड़ों पर एक नजर मारने से स्पष्ट हो जाता है कि नाजी पार्टी वहां होने वाली लगातार चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में बार-बार ऊभर रही थी। वाइमर गणंत्रण ही इस पार्टी को संभालने के काबिल नहीं था, वहां के लोग इस गणतंत्र के खोखलेपन से त्रस्त थे। जर्मनी में वाइमर गणत्रंत्र के दौरान बनी पेंटिंग और क्राफ्टिंग पर एक सरसरी नजर मारने से ही यह सप्ष्ट जो जाता है कि इस गणतंत्र को चलाने वाले लोग किस कदर अय्याशी और भ्रष्टाचार में डूबे हुये थे।
वर्साय की संधि के तहत जर्मनी को युद्ध अपराधी देश घोषित किया गया था और हर्जाने के रूप में उससे एक मोटी रकम की मांग की गई थी। अन्य देशों की तरह जर्मनी की इकोनॉमी भी बुरी तरह से बर्बाद हो गई थी। हर्जाना चुकाने के लिए मित्र राष्ट्रों ने उसे कर्ज दिये थे, यदि जर्मनी में हिटलर नहीं आता तो उस कर्ज के किश्त जर्मनी को आज तक चुकाने पड़ते। आर्थिक मामलों के पंडित लोग स्टैटिक उलट कर देख सकते हैं।
सत्ता में आने के लिए हिटलर ने वही तरीके अपनाये,जो उस समय के अनुकूल थे। मानवता और मानवाधिकारों की व्याख्या हमेशा से विजेताओं द्वारा सुविधा से करने का रिवाज रहा है। उस युग में हिटलर का नाजीवादी मूवमेंट निसंदेह भारत के हित में था। वह ब्रिटेन की कमर तोड़ रहा था, जो शताब्दियों से भारत का खून पी रहा था। नाजीवादियों ने ब्रिटेन की समुद्री शक्ति को चकनाचूर किया,जो बाद में भारत की स्वतंत्रता का मजबूत आधार बना। यूरोप की राजनिती मे हिटलर ने वही भूमिका निभाई, जिसे लेकर जर्मनी धधक रहा था। जर्मनी की सत्ता पर हिटलर रातो रात काबिज नहीं हुआ था, जर्मनी को लेकर एक आग निरंतर उसके अंदर धधक रही थी,धीरे-धीरे करके लोग उसके लपटों के प्रभाव में आते गये। अपने समय में बिखरे हुये अंगारों पर चलकर हिटलर ने देश की बागडोर संभाली थी,और इस तरह का काम कोई महानायक ही कर सकता है। तमाम वाद और तंत्र साधन नहीं साध्य हैं,असल बात है तपते हुये समय में कुशलता से देश को खेना।

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अब फिल्मकारों के लिए कितनी कहानी बुन पाते हैं वो जाने

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 21, 2009

बुश युग की शुरुआत और ओबामा : क्या अमेरिका की जनता ने ओबामा को इसलिये वहां के सर्वोच्च पद पर बैठाया है कि वह काले हैं। यदि हां तो निसंदेह दुनिया आज भी रंगभेद के आधार पर बटी हुई है, और यदि नहीं तो ओबामा की ताजपोशी की गलत व्खाया क्यों की जा रही है, क्या ओबामा के पहले अमेरिकी चुनाव में कोई ब्लैक राष्ट्रपति पद के लिए खड़ा हुआ था।? क्या ओबामा ने चुनाव के पहले वहां की जनता से यह अपील की थी कि वह काले हैं इसलिए लोग उसे वोट दे? यदि नहीं, तो उसे काला राष्ट्रपति के रूप में क्यों प्रस्तुत किया जा रहा है ? इस व्याख्या के पीछे दुनिया एक गुप्त सुख का अहसास तो नहीं कर रही है ?
एतिहासिक घटनाओं का संबंध मनोविज्ञान से होता है। भले ही ओबामा राष्ट्रपति के पद पर स्थापित हो गये हों, लेकिन आज भी लोगों के अचेतन में काले और गोरों को लेकर एक लकीर खीची हुई है, और इसी से अभिभूत होकर दुनिया भर में ओबामा के लिए प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या इसके पहले अमेरिका के किसी राष्ट्रपति के लिए श्वेत शब्द का इस्तेमाल हुआ है? यदि नहीं तो ओबामा के लिए प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति शब्द का इस्तेमाल क्यों ? क्या अमेरिका के राष्ट्रपति के आगे स्वेत और अश्वेत शब्द का इस्तेमाल किया जाता है ? फिर जश्न किस बात की मनाई जा रही है ? यह एक रुटिन चुनाई से निकल के आये हैं, आर्थिक मंदी के दौर पर सवार होकर, आउटसोर्सिंग के ग्लोबल दौर में!!! अमेरिका की सेना इराक में जंग कर रही है, आतंकवाद के खिलाफ ! क्या आतंकवाद के खिलाफ जारी जंग को ओबाना वापस लेंगे और यदि हां, तो किस रूप में ? क्या इराक के तमाम अमेरिकी सैनिक वापस ले लिये जाएंगे ? और उनका स्वागत अमेरिका में कैसे किया जाएगा ? इतिहास की शुरुआत करते हुये ओबाना इन जलते हुये प्रश्नों पर खड़े है।
बुश ने एक शानदार इतिहास रचा है। क्या ओबामा युग के शुरुआत के पहले, बुश युग का मूल्यांकन करना ठीक नहीं होगा, वैसे बुश युग आतंकवाद के खिलाफ बेखौफ जंग का युग रहा है,आतंकवाद पर हर तरफ से हमले किये, बुद्घ की प्रतिमा को बामियान में उड़ाने वालों तालिबानियों को बंकरों में से बाहर कर दिया। सैनिक तानाशाह सद्दाम को डेमोक्रेटिक तरीके से मांद में पकड़ कर पीटा, हालांकि सद्दाम का लादेनवादी इस्लाम से दूर-दूर तक कहीं संबंध नहीं था, और मार डाला। अपने हिस्से में बुश कई बेहतरीन दृश्य ले गये, जिनपर फिल्मकारों को इतने द़श्य मिल जाएंगे कि सदियों तक फिल्म बनाते रहेंगे।
बामियान में बुद्ध की प्रतिमा पर हमला के बाद पूरी दुनियां चकित हुई थी। बुश-युग का मूल्यांकन भारत के संदर्भ में बामियान से होना चाहिये। मनोज कुमार की एक फिल्म का गीत है, काले गोरों का भेद नहीं हर दिल से हमारा नाता है… अश्वेत जैसे शब्द का वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए इस्तेमाल क्या अमेरिका में एक अश्वेत राष्ट्रपति के युग के नाम से जाना जाना चाहिये,यदि नहीं तो ओबाना के आगे अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति जैसे शब्द का अभी से इस्तेमाल क्यों ? ओबाना का स्टफ टफ है, अमेरिका को आर्थिक मंदी के दौर में वह कैसे मूव करता है इस पर देखना है।
लादेन और ओमर कहां है? भारत और अमेरिका के ऊपर होने वाले तालिबानी हमलों के दो अलग-अलग तारीखों को जोड़ दे, घटनाओं का अंबार लगा है, कंधार में एक जाबांज भारतीय पायलट से लेकर मुंबई में आमटे युग तक,बहुत सारे दृश्य हैं,फिल्मकारों के लिए लिए,अब कितनी कहानी बुन पाते हैं वो जाने।

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