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अथातो जूता जिज्ञासा-5

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 29, 2009

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हमारे महान देश की महान जनता जूते या लाठी को केवल सहयोग देती आ रही हो, ऐसा भी नहीं है. हक़ीक़त यह है कि विभिन्न अवसरों पर जूते में अपनी अगाध आस्था भी जताती आई है और आज तक जताती आ रही है. यक़ीन न हो तो आप किसी भी चौराहे पर देख सकते हैं. हम लोग ऐसी सडकों और चौराहों पर ट्रैफिक के नियमों का पालन करना भी अपनी तौहीन समझते हैं, जहाँ जूते की तैनाती न की गई हो. इसके विपरीत जहाँ कहीं जूता दिखाई दे जाता है, वहीं हम अत्यंत ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देने को स्वयं ही आतुर हो उठते हैं. यह अलग बात है कि वह जूता कभी चालान के रूप में होता है, तो कभी डंडे के रूप में और कभी जुर्माने के रूप में. जूता न हो तो हम रेल में चलते हुए टिकट तक कटाना गवारा नहीं करते. और अपनी नीति नियामक संस्थाओं यानी संसद तथा विधान सभाओं में तो हम उन्हे भेजने लायक ही नहीं समझते जिन्हें जूता चलाना न आता हो. जूते में हमारी आस्था का इससे बेहतर प्रमाण और क्या हो सकता है!

अथातो जूता जिज्ञासा के दूसरे खंड पर टिप्पणी करते हुए भाई आलोक नन्दन जी ने बताया है कि हिन्दी सिनेमा के इतिहास में भी जूते की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. उन्होने इस सन्दर्भ में जॉनी छाप हीरो राजकुमार का नाम अत्यंत आदर से लिया है और बताया है कि उनका ओपनिंग सीन आम तौर पर उनके चमकते हुए जूतों से ही शुरू हुआ करता था. क्या पता अगर सर्वे करवाया जाए तो यह मालूम हो कि उनकी लोकप्रियता का कुल कारण ही जूते रहे हों. इसी क्रम में उन्होने खलनायक अजीत और उनकी एक फिल्म का भी जिक्र किया है. इस फिल्म में वह अपने दोनों पैरों में अलग-अलग नम्बरों के जूते पहनते हैं और बाद में इसी से बतौर क़ातिल पहचाने भी जाते हैं. ग़ौर किए जाने लायक बात यह है कि उन्हें पहचानने वाले भी कोई और नहीं, ख़ुद धरम पा जी हैं. वही धरम पा जी जिनके डर से कुत्तों ने गलियाँ छोड दीं. पता नहीं, कब किस कुत्ते पर उनका मन आ जाए और उसका ख़ून पीने के लिए उनका मन मचल उठे.

हमारे इलाके के स्टार गायक बलेस्सर यादव को उन्होने याद दिलाया है, उनके गाए एक गाने के लिए. इस गाने के बोल हैं भगवान से बढ कर जूता है. और इसकी वजह बताते हुए उन्होने स्पष्ट किया है कि मन्दिर में लोग जाते तो हैं भगवान के दर्शन के लिए, लेकिन ध्यान लगा रहता है जूते पर. क्योंकि मन्दिरों में जूता बाहर निकाल कर जाना पडता है और बाहर आप के जूते पर कब किसका दिल आ जाए, क्या पता! वैसे हमारे देश की पब्लिक तो है ही जूताप्रेमी. बलेस्सर भाई का एक और गाना है – अगर चप्पल की ऊँचाई अइसे बढती रही तो संडिल के नीचे से डंडा लगा दिया जाएगा. असल में उनका इशारा हाई हिल सैंडिलों की ओर है और आप तो जानते ही हैं कि पहले सैंडिलों की हिल हाई करने के लिए उनके तले में वुडवर्क ही होता था. ऊँचाई बढाने के डंडा लगाने की उन्होने बेवजह नहीं की है. बात असल में यह है कि वह भी डन्डे यानी कि दंड और जूते के बीच का सम्बन्ध स्पष्ट करना चाहते हैं.   

हमारे इस जूताप्रेम का अन्दाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि भगवान के चरण भी हम केवल इसी भय से छूते हैं कि उनका जूता हमारे सिर पर न पडे. यक़ीन न हो तो इस सन्दर्भ में आप भगवान शनि देव का उदाहरण देख सकते हैं. न केवल विज्ञान, बल्कि हमारे धर्मशास्त्रों के अनुसार भी शनि केवल एक ग्रह हैं. ज्योतिष और पुराणों के अनुसार इन्हें ग्रहमंडल में न्याय का अधिष्ठाता माना जाता है और इनका मुख्य कार्य है लोगों को उनके धर्मविरुद्ध आचरण या कहें ग़लत कार्यों के लिए दंडित करना. लेकिन वह ग्रह से पहले महराज, महराज से देव और फिर भगवान के रूप में मान्य हो गए.

अब अगर आप ग़ौर करें तो पाएंगे कि हमारे देश में धर्म की धारा ही 90 प्रतिशत तो अकेले शनिदेव के चलते बह रही है. बडे से बडा नास्तिक भी उनकी साढे साती के चपेट में आते ही श्री हनुमान चालीसा पढने लगता है. जय जय जय हनुमान गोसाईं. कृपा करहुं गुरु देव की नाईं. का जाप करते हुए वह मक्खीचूस भी तेल-उडद-तिल दान करने के लिए ग़रीब आदमी की तलाश में लग जाता है, जो रिक्शे वाले को वाजिब किराया मांगने पर चाटे रसीद करने में कोई परहेज नहीं करता है.

विद्वान ज्योतिषियों का मानना है कि शनिदेव की सर्वाधिक प्रिय वस्तु जूता ही है. शायद इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही एक ब्लॉगर भाई राकेश ने जूता देव चालीसा जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण रचना की है. अगर आप शनि देव के कोप से मुक्ति पाना चाहते हैं तो सर्वोत्तम उपाय यह है कि काले रंग का जूता दान करें. अव्वल तो ज्योतिषी लोग ऐसा मानते हैं कि भगवान राम को वनवास भी शनिदेव की महादशा के कारण हुआ था और छोटे भाई भरत ने उनसे पादुकाएं भी शनिदेव के प्रभाव के ही कारण उतरवाईं थीं. तात्पर्य यह कि भरत भाई तो केवल बहाना थे, वस्तुत: भगवान राम के जूते उतरवाने का काम तो शनिदेव ने किया था.

अब मैं सोचता हूँ कि काश महाराज दशरथ को यह बात पता रही होती और उन्होने भगवान राम से दस-बीस जोडी जूते दान करवा दिए होते तो यह सब क्यों हुआ होता. समझ में नहीं आता कि वसिष्ठ जैसे राजगुरु उनके संरक्षण में रहते हुए केवल दूसरे ऋषियों को ब्रह्मर्षि की उपाधियां बांटने या इसके लिए उन्हें अयोग्य घोषित करने का ही काम कर रहे थे य फिर ग्रहों की प्रवृत्तियों आदि पर भी उन्होंने कुछ काम करने की जहमत कभी उठाई. भरत भाई थोडा उनके द्वारा निकाले गए मुहूर्त पर ग़ुस्साए भी तो बस एक लाइन में कह दिया : सुनो भरत भावी प्रबल और बस मामला खल्लास. इस लिहाज से देखें तो उनसे बेहतर तो हमारे टीवी चैनलों के ज्योतिषी हैं जो अपनी चमत्कारी अंगूठियों से शनिदेव तो क्या उनके पिताश्री सूर्यदेव तक का इंतज़ाम कर दिया करते हैं.

(भाई अब बाक़ी कल)

 अथातो जूता जिज्ञासा-4

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12 Responses to “अथातो जूता जिज्ञासा-5”

  1. जूते की बहुत सही सही बातें बताई आपने …सच कहा ..और सच चाहे कड़वा हो भले ही पर सच तो सच है …अनिल कान्त मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति

  2. जूते के प्रकारों पर चर्चा होनी चाहिये। खड़ाऊं, चट्टी, चमरौधा जूता से होते हुये गुक्की जूतों तक की यात्रा की चर्चा बिना यह जूता जिज्ञासा अगर सिमट गई तो नीक नहीं लगेगा। फिर मेहरारुओं की हाइहील्स के एटीकेट्स, पानी में रात भर भिगोये जूते थे थुराई और ९९ के बाद गिनती भूल फिर शुरू करना … जाने क्या क्या है जूतालॉजिकल चर्चा में! 🙂

  3. क्या अनुभव है बॉस…शोधकर्ता आपको नमन!!

  4. भाई अनिल कान्त जी शुक्रिया. यकीन करें मैं सच कहूँगा. सच के सिवा और कुछ न कहूँगा.ज्ञान भैया आपने तो कुछ और नए आयाम दे दिए. धन्यवाद.और भाई समीर लाल जीवस्तुतः यह कोई शोध नहीं, बल्कि आप जैसे बड़े भाइयों से मिले अनुभव का ही प्रतिफलन है.

  5. shelley said

    जूते के साथ आपकी अपर श्रधा देख कर दिल बाग-बाग़ हो गया .इसे पढ़ कर पादुका वियोग पख्यानाम नमक रचना की याद आगे जो की मैंने बारहवीं में पढ़ी थी .

  6. makrand said

    bahut shandaar joota mara bhai

  7. ईष्टदेव जी की जय हो…. बढ़िया और सटीक आलेख.. मैंने भी कुछ छंद जूतों पर लिखे थे अशोक चक्रधर के संचालन में सब टीवी पर प्रसारित वाह-वाह में पढ़े और सराहे वो छंद अपने ब्लाग पर कल दूंगा और आपको समर्पित करूंगा…

  8. अरे भाई जल्दी पोस्ट करिए योगेन्द्र जी.इस शोधग्रंथ में आपका नाम भी मैं जोडना चाहूंगा.

  9. स्कूल में एनसीसी के जूतों के लिए बहुत मारा मारी होती थी,उन जूतों को हासिल करने के लिए बच्चों के बीच खूब होड़ होती थी…स्कूल तो स्कूल घर में भी बच्चे उन जूतों को बड़े शान से पहनते थे, उनको पहनकर सरकारी शक्ति का अहसास होता था। जूतों का सीधा संबध सैनिक तंत्र से भी है। बिना जूतों की सेना की कल्पना आप कर ही नहीं सकते हैं। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में जूतों ने महत्पपूर्ण भूमिका निभाये थे। वाशिंगटन के नेतृत्व में लड़ने वाली अमेरिकी सेना के पास सिविलियन जूते थे, जो जल्दी ही फट गये, जबकि ब्रिटिश सेना के पास सैनिक जूते थे। जूतों के अभाव में वाशिंगटन की सेना पहाड़ों, पत्थरों और जंगलों में खाली पैर घूमती थी। और मजूबत जूतों के बल पर आगे बढ़ते हुई ब्रिटिश सैनिक उन्हें उनके पैर के खून के निशान के सहारे पकड़ लेती थी। भारत में भी ब्रिटिश सैनिकों के जूते भारतीय योद्धाओं से मजूबत थे। भारतीय योद्धाओं के जूते लड़ने के अनुकूल नहीं था, जबकि ब्रिटिश सैनिकों के जूते ठोस थे। कहा जा सकता है कि दुनियाभर में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना मजबूत जूतों के बल पर हुई। नाजीविदियों ने शायद इस रहस्य को समझा था, इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों की मजबूती के लिए जूतों की मजबूती पर ज्यादा ध्यान दिया था। रूसी सैनिकों के जूते भी खासा मजबूत थे,इन्हें खासतौर पर बर्फ पर चहने के अनुकूल के बनाया गया था। वैसे कभी-कभी जूते युद्ध क्षेत्र में खुद अपनी सेना के लिए बोझ भी बन गये हैं, जैसे वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी सैनिकों के जूतों। वियतनाम के जंगलों में दलदल में फंसने के बाद अमेरिकी सैनिकों के जूतों का बोझ दोगुना हो जाता था, जिसके कारण अमेरिकी सैनिकों को वियतनाम में अपने जूते छोड़ कर भागने पड़े थे। मुझे लगता है कि यदि दुनिया में किसी भी सेना की मजबूती का अंदाजा लगाना हो तो पहले उसके जूतों की मजबूती का पता लगाना चालिये। पुराने समय में आदि विद्रोही स्पार्टकस की सेना की हार पीछे रोमनों के मजूबत जूते प्रमुख कारण थे। स्पार्टकस की किसान और विद्रोही सेना के पास जूतों का पूरी तरह से अभाव था। रोमनों के साथ खूनी लड़ाई के बाद स्पार्टकस की सेना की पूरी कोशिश होती थी कि मारे गये सभी रोमन सैनिकों के जूते उतार लिये जाये। जूता शास्त्र में पुरी दुनिया का मिलिटरी साइंस आ सकता है,क्योंकि जमीनी सैनिकों का मूवमेंट बहुत हद तक जूतों की मजबूती और कुशलता पर निर्भर करता है। मिलिटरी साइंस के साथ-साथ जूतों का इस्तेमाल खुफिया जगत में भी खूब हुआ है। गुप्त संदेशों को इधर से उधर छुपाकर ले जाने में जूतों की भूमिका अति महत्वपूर्ण रही है। भारतीय फिल्मों में भी जूतों को खुफिया जगत से जोड़कर बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म चरस में धमेन्द्र एक सीआईडी अधिकारी बने हुये हैं और अजीत के अड्डे पर जाकर वहां की सूचना अपने बड़े अधिकारियों को अपने जुते में लगे ट्रांसमीटर के जरिये देते हैं। जूतों का क्रमश इतिहास सीधे सभ्यता के इतिहास से जुड़ा हुआ है। शायद आगे की खोज के बाद इनसान की दूसरी महत्पपू्रर्ण खोज जूते ही थी। आग की खोज और चक्के के अविष्कार के बीच में जूता खड़ा है। इनसान ने अपने शरीर के संवेदनशील अंगो को ढकने के लिए भले तमाम तरह के साधनों का इस्तेमाल किया,लेकिन जूतों का निर्माण निसंदेह पैर की सुरक्षा के लिय प्रथम प्रथम बार किया होगा,समय के साथ जूते विलासिता और वैभव के रूप में नया रूप अख्तियार करते चले गये। लेकिन जूतों के निर्माण में शिकारी और सैनिक मनोवृति काम कर रहा था। जूतों के उदगम के पीछे मानव सुरक्षा की भावना काम कर रही थी। जूतों के उदगम के पीछे मानव सुरक्षा की भावना काम कर रही थी। शुरु से ही जूतों के निर्माण के लिए जानवरों के खालों का इस्तेमाल किया जा रहा था,और जानवरों के खालों का सीधा संबंध शिकार से है। इसलिए जूतों का अवतरण बैल गाड़ी के पहिये के इस्तेमाल से बहुत पहले हुआ था और सभ्यता के विकास का आधार जूता ही बना। आज पूरी दुनिया में जूतों की कीमत से आदमी की कीमत आंका जाता है, आज भी सभ्यता का आधार जूता ही है। कौन देश कितना जूता इस्तेमाल करता है। किस देश में जूतों की खपत कितनी है। दूनिया के किस देश के लोग सबसे ऊंची कीमत वाली जूतों का ज्याद इस्तेमाल करते हैं,आदि के आधार पर बड़ी सहजता से कहा जा सकता है है कि दुनिया का कौन सा देश सबसे अमीर और कौन सा देश सबसे गरीब है। यानि जूतों की खपत के आधार पर किसी भी देश की इकोनॉमिक को आसानी से समझा जा सकता है। प्रत्येक वर्ष जूतों का निर्माण सैनिक हथियारों के निर्माण से ज्यादा होता होगा,क्योंकि जूतो की खपत सैनिक हलकों के साथ-साथ नागरिक हलकों में भी है। जूते की इकोनोमिक को यदि आधार बनाये तो, दुनिया की इकोनॉमिक की एक अलग तरीके से व्यख्या की जा सकती है। इकोनॉमिक आफ जूते के तहत इसे चैप्टरबद्ध कर सकते हैं। आपकी जूता शास्त्र मेरी खोपड़ी पर जूते चला रहा है, लगता है खूब जूते खाने के बाद आप इस शास्त्र को लिखने बैठे है। जहां तक मुझे याद है आप कहा करते हैं कि जब तक कोई चीज आपको जूते नहीं मारे,तब तक आप कलम उठा नहीं सकते।

  10. मैं तो इस पादुका परिचर्चा से अबतक दूर होने के कारण पछता रहा हूँ। इधर कुछ दूसरे कामों में ज्यादा समय देना पड़ा ताकि जूता न पड़ जाय।बहुत अच्छी चर्चा। गुरुदेव ज्ञानदत्त जी की बात पर अमल शुरू हो। जय हो…।

  11. कोई बात नहीं, अबसे शामिल हो जाइए सिद्धार्थ जी और अपने अर्थ को सिद्ध कराने के lie प्रेम से बोलिए – जूता जी की जय.

  12. खाया बुश ने प्रथम फिर पड़ा चीन पर जाय,इजरायल को भी दिया जूते ने समझाय । जूते ने समझाय कहा हमको वो खाए , मुंह की भाषा जिसे न बिल्कुल समझ में आए । है तो अपरम्पार इष्ट जूते की माया ,जरदारी ने जाने क्यों अब तक न खाया । – ओमप्रकाश तिवारी

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