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Archive for February, 2009

गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2009

देव डी को एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म कहा जा रहा है। अंग्रेजी अखबारों में फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को पांच-पांच स्टार से नवाजा है, वैसे फिल्म समीक्षकों के किसी फिल्म को स्टार देने की प्रणाली पर रामगोपाल वर्मा अपने ब्लाग पर पहले ही सवाल उठा चुके हैं। देव डी के डायरेक्टर अनुराग कश्यप खुद कई बार कह चुके हैं किसी फिल्म की समीक्षा के बजाय फिल्मकार की समीक्षा की जानी चाहिये। अनुराग कश्यप की फिल्म को समझने के लिए यह जरूरी है कि अनुराग कश्यप की समीक्षा की जाये।
रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या से अनुराग कश्यप भारतीय फिल्म पटल पर एक फिल्म लेखक के रूप में मजबूती से उभरे थे, और यह फिल्म कथ्य और मेकिंग के स्तर पर सही मायने में एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म थी। रामगोपाल वर्मा ने पहली बार अपराध की दुनिया को मानवीय नजरिये से देखा था और मेकिंग में भी उन्होंने एसे शाट लिये थे, जो वास्तविक जीवन का अहसास कराते थे। अनुराग कश्यप इस टीम का हिस्सा थे, और उन्होंने लेखनी के स्तर पर इस फिल्म को शानदार मजबूती प्रदान की थी।
रामगोपाल वर्मा के स्कूल से निकलकर अनुराग कश्यप ने ब्लैक फ्राइडे बनाई थी, जो अपने कथ्य के कारण कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसकर देर से रिलीज हुई थी। यह फिल्म 1993 में हुये मुंबई बम विस्फोट पर लिखी गई एक पुस्तक पर आधारित थी, जिसे पर्दे पर दिखाने के लिए अनुराग कश्यप ने काफी मेहनत की थी। फिल्मों में सिर्फ मनोरंजन से इतर किसी और चीज की तलाश करने वाले लोगों को यह फिल्म अच्छी लगी थी, लेकिन बाक्स आफिस के ग्रामर पर यह बिखरी हुई थी। इस फिल्म के मेकिंग स्टाईल में कुछ नयापन था और कुछ कुछ डोक्यूमेंटरी फिल्म स्टाईल का टच लिये हुये था। कानूनी स्तर पर विवादों में फंसने के कारण इस फिल्म के रिलीज होने में जो देरी हुई थी उसका नकारात्मक प्रभाव इस फिल्म के व्यवसाय पर पड़ा था। लेकिन अनुराग कश्यप एक डायरेक्टर के तौर पर इस फिल्म से अपनी पहचान बनाने में सफल रहे थे।
ब्लैक फ्राइडे की व्यवसायिक असफलता के बाद अनुराग कश्यप की दूसरी फिल्म थी नो स्मोकिंग। यह फिल्म बाक्स आफिस पर औंधे मुंह गिरी थी, और इस फिल्म को देखकर थियेटर से निकलते हुये लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि इस फिल्म को बनाने का औचित्य क्या है। अनुराग कश्यप इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित थे, और उन्हें पूरा यकीन था कि कंटेंट और तकनीक के स्तर पर वह इस फिल्म में जोरदार प्रयोग कर रहे हैं। इस फिल्म में प्रतीकों के माध्यम से कभी वह नाजीवादियों के डेथ कैंप को दिखा रहे थे, तो कभी बर्फीली जमीन पर स्टालिन की सैनिक शक्ति को प्रदर्शित कर रहे थे। एक स्थानीय तांत्रिक की भूमिका में परेश रावेल के माध्यम से उन्होंने हिटलर और स्टालिन के क्रमश गेस्टापो और केजीबी की कार्यप्रणाली को भी मजबूती से उकरने की असफल कोशिश की थी। अनुराग कश्यप जमीनी स्तर पर आमलोगों को क्मयुनिकेट करने में असफल रहे थे, और मनोरंजन के लिहाज से भी यह फिल्म लोगों के गले के नीचे नहीं उतरी थी। बौद्धिकता के पीछे भागते हुये अनुराग कश्यप यह भूल गये थे किसी भी फिल्म का प्रथम उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करते हुये बाक्स आफिस पर इंटरटेनमेंट वैल्यू का निर्माण करना है। यह फिल्म एसा नहीं कर सकी, लिहाजा यह फिल्म थियेटरों पर चढ़ते ही उतर गई।
ब्लैक फ्राइडे और नो स्मोकिंग की त्रासदी से निकलने के लिये अनुराग कश्यप ने देव डी का निर्माण किया है, जिसके कथ्य में सेक्स कूटकूट कर भरा हुआ है। जिस तरह से विभिन्न अखबारों ने इस फिल्म को पांच-पांच सितारों से नवाजा है, उसे देखते हुये फिल्म समीक्षकों की भूमिका और उनकी सोंच पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं। समीक्षकों ने निर्देशन और पटकथा लेखन के तौर पर इस फिल्म को एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म करार दिया है, जबकि इस फिल्म को देखने वाले अधिकतर दर्शकों का यही मानना है कि यह फिल्म टुच्चई के स्तर तक गिरी हुई है।
जिस जमाने में शरतचंद ने देवदास लिखी थी, उस जमाने में भी भारतीय साहित्य में सेक्स को विभिन्न तरीके से चित्रित करने वाले लेखकों की कमी नहीं थी। पारो और देवदास की कहानी की खासियत यह थी कि पुस्तक में पारो शुरु से लेकर अंत तक देवदास को देबू भैया कहती है। दोनों की कहानी की खूबसूरती का आधार भी यही है। शेखर एक जीवनी में शेखर और शशि के संबंधों के बहुत ही करीब है देवदास और पारो के संबंध। देवदास और पारो की प्रेम कहानी एक अव्यक्त प्रेम कहानी है, जिसे पुस्तक को पढ़ने के दौरान बहुत ही मजबूती से महसूस किया जा सकता है। प्रेम के इस स्तर को पकड़ पाने में या तो अनुराग कश्यप अक्षम हैं,या फिर सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिये जानबूझकर एक शानदार कथा के अलौकिक किरदारों को सेक्स की चासनी में लपेट दिया है। कथ्य के नाम पर जिस तरह से अनुराग कश्यप ने देवदास की मौलिक कहानी में फेरबदल किया है और संवादों में गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया है उसे एक्सपेरिमेंट कहा जाना एक्सपेरिमेंट जैसे शब्द के साथ बलात्कार है।
कामुकता में डुबा हुआ देव लंदन से पारो से उसकी नंगी तस्वीर भेजने की मांग करता है, और बोल्ड पारो अपने कैमरे से खुद की नंगी तस्वीर निकाल कर गांव के कैफे हाउस से देव को ईमेल करने के लिए जाती है, पंजाब आने के बाद देव पारो को पाने के लिए जोरदार मश्कत करता है, और पारो से कुछ इंतजाम करने की गुजारिश करता है, पारो अपने एक पुरुष मित्र से उसके ट्यूबवेल की चाभी मांगती है, और उसके इंकार करने पर देव के लिए गन्ने के खेत में रजाई के साथ पहुंच जाती है, इसके पहले पारो का पुरुष मित्र देव को बता देता है कि पारो के साथ वह खूब मजा मार चुका है। गुस्सैल देव पारो पर गन्ने के खेत में ही उस वक्त भड़क जाता है, जब पारो उसके सीने के बाल से कामुक अंदाज में खेल रही होती है। देवदास के मौलिक कथ्य में जिस तरह से तोड़फोड़ किया गया है, इसके लिये एक्ट्राआर्डिनरी दिमाग की जरूरत नहीं है। मस्तराम का सस्ता साहित्य इस तरह के तथाकथित प्रयोगों से भरा हुआ है, और कथ्य के स्तर पर अनुराग कश्यप के इस टुच्चेपन को प्रयोग मानकर पांच-पांच स्टार देने वाले फिल्मी समीक्षकों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।
अनुराग कश्यप ने चंद्रमुखी के चरित्र को एक स्कूली लड़की के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका आपत्तिजनक तस्वीर निकाल कर उसका ब्यायफ्रेंड सबको मोबाईल फोन पर भेज देता है। चंद्रमुखी का शर्मसार पिता आत्महत्या कर लेता है और उसकी मां उससे मुंह मोड़ लेती है। परिस्थितिवश उसे वेश्या बनना पड़ता है। आधुनिक समाज में प्रचलित फोनिक सेक्स को चंद्रमुखी के माध्यम से खूब दिखाया गया है। पूरी फिल्म के केंद्रबिन्दू में सेक्स भरा हुआ है। यह फिल्म ब्लैक फ्राइडे जैसी मजबूत फिल्म बनाने वाले अनुराग कश्यप के गिरते हुये मानसिक स्तर का सूचक है। मनोरंजन के लिहाज से भी यह फिल्म एक खास मानसिक स्तर की मांग करती है। फिल्म के बैक ग्राउंज में गानों का खूब इस्तेमाल किया है, जो निसंदेह अच्छे बन पड़े हैं।
अनुराग कश्यप में एक बेहतर फिल्म मेकर बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन इस क्षमता का इस्तेमाल उन्हें सकारात्मक रूप से करने की कला सीखनी होगी। एक लाजबाव फिल्म मेकर के रूप में अभी अनुराग कश्यप मीलों पीछे हैं। कलाकारों के अभिनय और तकनीक पर तो उनकी पकड़ है, लेकिन कथ्य को लेकर वह लगातार भटकते हुये नजर आ रहे हैं। देव के रूप में अभय देयोल ने बेहतर अभिनय किया है, वहां पारो और चंद्रमुखी भी स्क्रीन पर दर्शकों को अपनी सेक्सी अदाओं से आकर्षित करती है।

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अथातो जूता जिज्ञासा-21

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2009

अब जहाँ आदमी की औकात ही जूते से नापी जाती हो, ज़ाहिर है सुख-दुख की नाप-जोख के लिए वहाँ जूते के अलावा और कौन सा पैमाना हो सकता है! तो साहब अंग्रेजों के देश में सुख-दुख की पैमाइश भी जूते से ही होती है. अब देखिए न, अंग्रेजी की एक कहावत है : द बेस्ट वे टो फॉरगेट योर ट्र्बुल्स इज़ टु वियर टाइट शूज़. मतलब यह अपने कष्ट भूलने का सबसे बढ़िया तरीक़ा यह है कि थोड़ा ज़्यादा कसे हुए जूते पहन लीजिए.

निश्चित रूप से यह कहावत ईज़ाद करने वाले लोग बड़े समझदार रहे होंगे. अपने नाप से छोटा जूता पहन कर चलने का नतीजा क्या होता है, यह हम हिन्दुस्तानियों से बेहतर और कौन जानता है. यह अलग बात है कि यह कहावत अंग्रेजों ने ईज़ाद की, लेकिन नाप से छोटे जूते पहन कर चलने की कवायद तो सबसे ज़्यादा हम भारतीयों ने ही की है. हमने चपरासी के लिए तो शैक्षणिक योग्यता निर्धारित की है, लेकिन प्रधानमंत्री बनने के लिए आज भी हमारी मुलुक में किसी शैक्षणिक योग्यता की ज़रूरत नहीं है. यह हाल तब है जबकि आजकल हमारे यहाँ आप कहीं से भी डिग्रियाँ ख़रीद सकते हैं.  मतलब यह कि जो ख़रीदी हुई डिग्रियाँ भी अपनी गर्दन में बांधने की औकात न रखता हो वह भी इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता है.

पहले कई दशकों तक लोगों को यह भ्रम रहा कि भाई हमारे देश में लोकतंत्र है. लोकतंत्र में लोक की इच्छा ही सर्वोपरि है. लिहाजा यहाँ प्रधानमंत्री जैसे पद को शैक्षणिक योग्यता जैसी टुच्ची चीज़ से बांधने का क्या मतलब है! इस मामले में तो जनता की इच्छा को ही सर्वोपरि आधार माना जाना चाहिए. लेकिन नहीं साहब, जल्दी ही यह भ्रम भी टूट गया. चलो अच्छा हुआ ये भी. जनमत भी चला गया तेल बेचने. मतलब यह कि स्कूटर चलाने लिए किसी तरह की अगर योग्यता हो ज़रूरी तो हुआ करे, देश चलाने के लिए हमारे देश में किसी योग्यता की ज़रूरत नहीं रह गई है अब.

अब सोचिए, जब बेचारी जनता को ख़ुद ही अपनी इच्छाओं की कोई कद्र न हो तो जिसे उसके सिर पर बैठाया जाएगा वह क्यों करने लगा उसकी इच्छाओं की कद्र? ज़ाहिर है, यह नाप से छोटे वाला ही मामला है. फख्र की बात यह है कि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है. हम पिछली कई शताब्दियों से यही झेलते आ रहे हैं. एक ज़माने में हमारे देश के सभी महान राजाओं की कुल निष्ठा अपने पड़ोसी राजाओं पर हमला करने और उनसे लड़ने तक सीमित थी. ये अलग बात है कि इनमें से किसी ने भी देश के बाहर जाने की कोई ज़रूरत नहीं समझी. और तो और विदेशी आक्रांताओं को अपने ही देश में जिताने में भरपूर मदद की. ज़ाहिर है, ऐसी उदारतावादी सोच भी छोटे नाप का ही मामला है.

इस छोटे नाप से ही हम अपने सारे कष्ट भूलते रहे हैं. पता नहीं, अंग्रेजों के हाथ यह कहावत कैसे लग गई. वैसे इसकी पैदाइश तो भारत में ही होनी चाहिए थी. क्या पता, यह कहावत अंग्रेजों ने भारत आने के बाद ही ईज़ाद की हो! बहरहाल, अब यह है तो उनकी ही सम्पत्ति और अब वे अपने दुखों को इसी तरह यानी जूते से ही नाप्ते हैं. अंग्रेज लोग यह भी कहते हैं कि एवरी शू फिट्स नॉट एवरी फुट. मतलब यह कि हर जूता हर पैर में सही नहीं होता. लेकिन हम इसे मानने के लिए तैयार नहीं हैं. हमारे यहाँ इसे झुठलाने की एक तो कटेगरी एक ख़ास किस्म के अफसरों की ही है. उन्हें जिले से लेकर चीनी मिल और यूनवर्सिटी की वाइस चांसलरी तक जहाँ कोए बैठा दे, वे वहीं फिट हो जाते हैं. इसीलिए वे इसी प्रकार के डन्डे से ही देश बेचारे को भी हांकते हैं. अब हम यह प्रयोग कई माम्लों में और वह भी कई तरीक़ों से कर रहे हैं.

अंग्रेज अपने देश में इन कहावतों पर अब कितना अमल या प्रयोग कर रहे हैं, ये वे जानें. बहरहाल हम इन पर लगातार प्रयोग कर रहे हैं. जैसा कि आप जानते ही हैं, प्रयोग सिर्फ़ उन्हीं चीज़ों पर किए जा सकते हैं जिन्हें आप या तो न जानते हों, या फिर इतना जान चुके हों कि अब जानए के लिए कुछ शेष न रहा हो. भला जिस महान देश में सत्य पर ही प्रयोग हो चुका हो, वहां ऐसी मामूली सी कहावत पर जानए के लिए कुछ शेष होगा, ऐसा मुझे लगता तो नहीं है. फिर भी प्रयोग इस पर अभी जारी है. इसकी वजह क्या है, यह जानने के लिए बने रहें हमारे साथ अगली पोस्त तक.

अथातो जूता जिज्ञासा-20

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अथातो जूता जिज्ञासा-20

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 25, 2009

फ्रांस के इतिहास और उसके चलते उसकी संस्कृति पर जूते का असर कितना जबर्दस्त है, यह बात अब साफ़ हो गई. एक बात और शायद आप जानते ही हों और वह यह कि दुनिया भर में पिछली दो-तीन शताब्दियों से फ्रांस को आधुनिकता का पर्याय माना जाता है. बिलकुल वैसे ही जैसे जैसे कि हमारे भारत महान को रीढ़रहितता का. इससे बड़ी बात यह कि फ्रांस की जो आम जनता है, वह अंग्रेजी जानने को बहुत ज़रूरी नहीं समझती है. इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात यह है कि अपने को अंग्रेजी न आने पर वहाँ के लोगों को कोई शर्म भी नहीं आती है. छि कितने गन्दे लोग हैं. है न!

लेकिन नहीं साहब! दुनिया अजूबों से भरी पडी है और उन्हीं कुछ हैरतअंगेज टाइप अजूबों में एक यह भी है कि बाक़ी दुनिया को भी उनके ऐसे होने पर कोई हैरत, कोई एतराज या कोई शर्म नहीं है. इससे ज़्यादा हैरत अंगेज बात जब मैं बीए  में पढ़ रहा था तब मेरे अंग्रेजी के प्रोफेसर साहब ने बताई थी. वह यह कि एक ज़माने में अंग्रेज लोग फ्रेंच सीखना अपने लिए गौरव की बात समझते थे. ठीक वैसे ही जैसे आजकल हम लोग अंग्रेजी सीखकर महसूस करते हैं. किसी हद तक ऐसा वे आज भी समझते हैं. अब ऐसे जूताप्रभावित देश का जिस इतना गहरा असर होगा, उसकी संस्कृति जूते के प्रभाव से बची रह जाए, ऐसा भला कैसे हो सकता है!

शायद यही कारण है कि उनकी संस्कृति भी जूते से प्रभावित है और वह भी भयंकर रूप से. सच तो यह है कि अंग्रेज लोग जूते से इस हद तक प्रभावित हैं कि उनके लिए किसी की औकात का पैमाना ही जूता है. बिलकुल वैसे जैसे कि आप के लिए दूध, दारू, पानी या तेल का पैमाना लीटर और अनाज, दाल, सब्ज़ी या कबाड़ का पैमाना किलो है. यक़ीन न हो तो आप उनके कुछ मुहावरे और कहावतें देख सकते हैं.

अंग्रेजी भाषा में जूते को लेकर वैसे तो तमाम मुहावरे हैं, पर ख़ास तौर से औकात नापने के मामले में एक मुहावरा है – टु पुट इन वन्स शूज़. इसका सीधा सा मतलब है किसी की ज़िम्मेदारी संभलना. ज़ाहिर है, ज़िम्मेदारी संभालने का मतलब है औकात में आना. विअसे तो हमारे यहाँ भी कहावत है कि जब बाप के जूते बेटे को आने लगें तो उससे मित्रवत व्यवहार करना चाहिए. ज़ाहिर है, यहाँ भी आशय यही है कि जब बाप की औकात बेटे के बराबर हो जाए….लेकिन यहाँ ज़रा मामला थोडा घुमा-फिरा कर है. सीधे तौर पर यह बात नहीं कही गई है. और मेरा अन्दाजा है कि यह कहावत हमारे यहाँ अंग्रेजों के साथ ही आई होगी. वहाँ तो सीधे कहा जाता है कि नाऊ अनूप हैज़ पुट हिज़ लेग्स इन डाइरेक्टर्स शूज़. मतलब यह कि अब अनूप ने डाइरेक्टर का जूता पहन लिया .. ना-ना ऐसा नहीं है. अगर ऐसा होता डाइरेक्टर अनूप को दौड़ा-दौड़ा के मारता और छीन लेता अपना जूता. पर आज वह ऐसा नहीं कर सकता. ऐसा वह इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि कहने का अभिप्राय यह है कि अनूप अब डाइरेक्टर हो गया.

इस प्रकार देखें तो अंग्रेजी में जूता ही एकमात्र अपिमाना या कहें कि मापक यंत्र या मात्रक है साहब आदमी की औकात का. क्योंकि अगर गणित के हिसाब से देखें तो

जूता=ज़िम्मेदारी=औकात.

इतना उम्दा समीकरण आपको चुनावी गणित में भी नहीं मिलेगा जी. थोड़ा और फैला कर अगर समझना चाहते हैं तो लीजिए देखिए एक कहावत :

नेव्हर जज समवन अनटिल यू हैव ट्र्वेल्ड अ माइल इन देयर शूज़.

आई बात समझ में. कहक साफ़ तौर पर कह रहा है कि तब तक किसी के बात-ब्योहार-चरित्र-आचरण का कोई फैसिला मत करो, जब तक कि तुम उसका जूता पहिन के कम से कम एक मील चल न लो. मतलब यह कि तब तक किसी को सही या ग़लत मत कहो जब तक कि तुम उसकी हैसियत या ज़िम्मेदारी को थोड़ी देर के लिए झेल न लो.

(अभी ना जाओ छोड़ कर कि भंडार अभी चुका नहीं. कुछ और कहावतें और मुहावरे अगली कड़ी में….)

अथातो जूता जिज्ञासा-19

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मज़ाक का लाइसेंस

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 24, 2009

डिस्क्लेमर : अथातो जूता जिज्ञासा की सींकड तोड़्ने के लिए आज एक बार फिर क्षमा करें. कल आपको सुबह 6 बजे जूता जिज्ञासा की 20वीं कड़ी मिल जाएगी. आज आप कृपया यह झेल लें. मेरी यह लुक्कड़ई मुख्यत: दो ब्लॉगर बन्धुओं को समर्पित है. किन्हें, यह जानने के लिए आगे बढ़ें और इसे पढ़ें……….

 

काऊ बेल्ट में एक बात बहुत बढिया हुई है पिछ्ले दो-तीन दशकों में. आप मानें या न मानें लेकिन मैं ऐसा मानता हूँ. पहले लोग नेता चुनते थे, इस उम्मीद में कि ये हमारी नेतागिरी करेगा. उस पर पूरा भरोसा करते थे, कि जब हम भटकेंगे तब ये हमको रास्ता दिखाएगा. अगर कभी ऐसा हुआ कि हम हिम्मत हारने लगे तब ये हमें हिम्मत बंधाएगा. हमको बोलेगा कि देखो भाई इतनी जल्दी घबराना नहीं चाहिए. तुम सही हो अपने मुद्दे पर, लिहाजा तुम लड़ो और हम तुम्हारे साथ हैं. अगर कोई हमें दबाने की कोशिश करेगा तो यह हमारी ओर से लड़ेगा. हमे हर जगह उभारने की ईमानदार कोशिश करेगा. सुनते हैं कि पहले जब देश को गोरे अंग्रेजों से आज़ादी मिली तब शुरू-शुरू में कुछ दिन ऐसा हुआ भी. दो-चार नेता ग़लती से ऐसे आ गए थे न, इसीलिए.

फिर धीरे-धीरे नेता लोगों ने लोगों की उम्मीदों को ठेंगा दिखाना शुरू किया. पहले लम्बे-चौड़े वादे करके नेता बनते थे फिर बेचारी पब्लिक को पता चलता था कि असली में कर तो ये अपने वादों का ठीक उलटा रहे हैं. नेताजी मुश्किल मौक़ों पर हमें हिम्मत बंधाने के बजाय हर जगह हमारी हिम्मत तोड़ने, रास्ता दिखाने के बजाय और भटकाने, उभारने के बजाय ख़ुद दबाने और हमारी लड़ाई लड़ने के बजाय हमें ही ठिकाने लगाने की साजिश में जुटे हैं.  विकास तो बेचारा कहीं हो नहीं रहा, उलटे उसका प्रचार जाने किस आधार पर किया जा रहा है और उसके नाम पर कमीशन भरपूर खाया जा रहा है. ग़रीबी नेताजी ने कही तो थी हमारी मिटाने के लिए, पर मिटाई उन्होंने सिर्फ़ अपनी और चमचों की. अलबत्ता हम और ज़्यादा ग़रीब हो गए. इससे भी बड़ी और भयंकर बात यह है हमारी उत्तरोत्तर ज़्यादा ग़रीब और उनके ज़्यादा अमीर होते जाते जाने की परम्परा लगातार जारी ही है.

अब जनता के सामने यह भेद ख़ुला कि वास्तव में यह नेता नहीं, अभिनेता हैं. अभिनय ये बहुत टॉप क्लास करते हैं, ऐसा झकास कि बड़े-बड़े अभिनेता भी न कर सकें. जो कुछ भी ये कहते हैं वह कोई असली की बात नहीं, बल्कि एक ड्रामे का डायलॉग है, बस. ई मंच पर आते हैं. पहले से स्क्रिप्ट में जो कुछ भी लिखा होता है, वह बोल देते हैं. बात ख़त्म. अगले दिन यह इस स्क्रिप्ट की सारी बात भूल कर नई स्क्रिप्ट के मुताबिक काम शुरू कर देते हैं. फिर न आज वाली जनता से उनका कोई मतलब रह जाता है और न उससे किए हुए वादों से.

असल में आधुनिक भारत में नेतागिरी की परम्परा ही अभिनेतागिरी से शुरू हुई है. कुछ लोग इस बात को शुरू में ही समझ गए और कुछ नहीं समझ सके. जो नहीं समझ सके थे, उनमें कुछ तो थोडे दिनों बाद समझ गए और कुछ ठोकर खा-खा कर भी नहीं समझ सके. जो नहीं समझ सके उनकी छोड़िए. पर जो समझ गए वो सचमुच बड़े आदमी बन गए. वे किसी बात की चिंता नहीं करते हैं. चिंता करने का सिर्फ़ अभिनय करते हैं. अभिनय भी ऐसा कि वाह क्या ज़ोरदार. एकदम हक़ीक़त टाइप लगे. बल्कि हक़ीक़त फेल हो जाए और उनका अभिनय चल निकले. हम ऐसे एक जन को जानते हैं जो बहुत चिंता करते हैं. उनकी चिंता का आलम ये है कि घुरहू की भैंस मरे तो चिंता, लफ्टन साहब का कुक्कुर मर जाए तो चिंता. भले घुरहू की भैंस लफ्टन साहब के कुक्कुर साहब द्वारा काटे जाने के कारण ही मरी हो. ऐसे कई और उदाहरण हैं. हम कहाँ तक गिनाएं. आप तो ख़ुद ही समझदार हैं. समझ जाइए. उनकी चिंता की हालत यह थी कि शहर के बाहरी इलाके में ज़रा सी हवा चली नहीं कि वे आंधी आने की आशंका से चिंतित हो उठते थे और तुरंत अखबार के दफ्तर में पहुंच जाते थे विज्ञप्ति लेकर. अगर कोई सुझा देता था कि आप प्रशासन से मांग करिए कि वह आंधी-तूफान को आने से रोकने की व्यवस्था करे, तो उनको कभी कोई संकोच नहीं होता था. वह तुरंत मांग कर देते थे. लोकल अखबारों में छपी उनकी विज्ञप्तियों के ज़रिये बना इतिहास इस बात का गवाह है कि पानी को बरसने और सूखे को आने से रोकने तक की मांग वह कई बार कर चुके थे.

असल में भारतवर्ष में चिंता, मांग और उसे मनवाने के तौर-तरीक़े से वह भरपूर वाकिफ़ थे. अगर उनकी मांग नहीं मानी जाती थी दो-तीन बार करने के बाद भी, तब वह अनशन पर बैठ जाते थे. थोड़े दिन बैठे रहते थे तो पहले तो कोई तहसीलदार साहब आ जाते थे. उनको समझा-बुझा देते थे. पब्ल्कि को लगता था कि अब हमारी समस्या हल हो जाएगी और वह चल देते थे. उनका अनशन टूट जाता था. फिर पब्लिक को उनकी पहुंच पर थोड़ा शक़ होने लगा और उनको भी लगा कि बार-बार ये तहसीलदार ही आ रहा है. इससे हमारा रोब पब्लिक पर थोड़ा कम हो रहा है. तब वह सीधे डीएम को संबोधित करके मांग करने लगे. अनशन की अवधि थोड़ी बढ़ा दी. पत्रकार भाइयों को चाय पिलाने के अलावा बोतल भी पहुंचाने लगे. अब उनकी अनशन सभाओं में डीएम आने लगे.

बेचारी जनता पर इस बात का बड़ा गम्भीर असर हुआ. आख़िरकार जनता ने उनको अपने क्षेत्र की बागडोर सौंप दी. इसके बाद वे ऐसे नदारद हुए कि अगले पांच साल तक उनको देखने की कौन कहे, आवाज तक लोगों ने नहीं सुनी. बस अख़बारों में लोग उनकी विज्ञप्तियां और कान-फरेंस की ख़बरें ही पढ़ती रही.  इस बीच जनता ने पूरा मन बना लिया कि अब जब आएंगे नेताजी तो वो मज़ा चखाएंगे कि वह भी क्या याद करेंगे. पर बाद में जब आए तो ऐसा भौकाल बनाया नेताजी ने कि बेचारी पब्लिकवे सुन्न हो गई. कुर्ते के कॉलर से लेकर पजामे का नाड़ा तक पसीने से तर-बतर था नेताजी का. दिया उन्होने ब्योरा कि पब्लिक की भलाई के लिए उन्होने क्या-क्या किया. ये मंत्री, वो संत्री, ये नेता, वो ओता, ये अफसर, वो वफसर… रोज न जाने कितने लोगों से मिलते रहे. कई-कई दिन तो खाना तक नहीं खा पाते बेचारे.

फिर क्या था! पब्लिक ने फिर से उनको मान लिया अपना नेता. भेज दिया फिर लखनऊ से भी आगे, अबकी दिल्ली के लिए. बस. बहुत दिन बाद पब्लिक की समझ में आया कि ये कोई हक़ीक़त नहीं है. नेताजी जो कुछ भी करते हैं वह सब फ़साना है, लिहाजा अब नेताजी को ही फंसाना है. नेताजी पब्लिक की किसी परेशानी से चिंतित नहीं होते हैं, बल्कि चिंतित होने का अभिनय करते हैं. जो इसको समझ लेता है उसके साथ वह थोड़ा उससे आगे बढ़कर कुछ कर देते हैं. ये समझिए कि वही काम जो गांव की नाच में लबार यानी कि जोकर करता है. मतलब मज़ाक. बस, और कुछ नहीं.

एक दिन एक संत जी बता रहे थे कि ये ज़िन्दगी क्या है. ये दुनिया क्या है. दुनिया एक मंच है और हर आदमी अभिनेता. सभी अपना-अपना रोल खेल रहे हैं और चले जा रहे हैं. हमारे गांव के घुरहू ने तब निष्कर्ष निकाला कि असल में नेता जी ने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया है. घुरहू की अक़्ल असल में संत जी के उलट थी. घुरहू मानते थे कि ज़िन्दगी सच है, लिहाजा ज़िन्दगी की घटनाएं भी सच हैं और उस सच का अभिनय है सच के साथ एक्सपेरीमेंट. असल में नेताजी यही कर रहे हैं. एक्सपेरीमेंट. पब्लिक को अब सच के साथ यह एक्सपेरीमेंट बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. इससे वह छली जाती है.

 
इसके पहले कि अपना निष्कर्ष घुरहू सबको बता पाते और यह बात दूर-दूर तक फैलती, नेताजी को पता चल गई. उन्होने तुरंत इंतज़ाम बनाया. ख़ुद बैठ गए और अपने सामने आए बहुत बडे कद्दावर नेताजी के सामने एक अभिनेता जी को उतार दिए. अभिनेता जी ने क्या कमाल किया. कद्दवर नेताजी की तो उन्होने धोती ही ढीली कर दी. पब्लिक ने सोचा था कि अभिनेता जी जैसे फिल्मों में दिखाते हैं कलाबाजी, वैसे ही दिखाएंगे असल ज़मीन पर भी. एक फैट मारेंगे और एके 47 वाले धरती पकड लेंगे. अभिनेता जी जब पर्चा भर के निकले न कचहरी से, तो लड़की लोगों ने अपनी चुनरी बिछा दी उनके स्वागत में. लेकिन देर नहीं लगी. थोड़े ही दिन में उनको पता चल गया कि संसद के सेट पर उनसे भी बड़े-बड़े सुपर स्टार जमे हुए हैं. भाग खड़े हुए मैदान से. इधर पब्लिक ने ये भी देख लिया कि सिनेमा में बहुत ख़ुद्दार दिखने वाले अभिनेता जी जो हैं, ऊ हमारे गांव के नचनिए से ज़्यादा हिम्मतवर नहीं हैं. ज़रा सा झटका लगते ही तेल बेचने चल देते हैं. तो उस बेचारी का भरोसा थोड़ा और डगमगाया. उसने कुछ जगह अभिनेता लोगों को भाव देना बन्द कर दिया.
नेताजी ने यह बात फिर समझ ली. तो लीजिए अबकी बार ऊ सीधे गांव के नाच से ही लेकर आए हैं. बहुत टॉप क्लास का लबार. अरे वही लबार जिसकी एक-एक बात पर हंसते-हंसते आप लोग लोटपोट हो जाते हैं. घंटों खाना-पीना छोड़ के टीवी से चिपटे रहते हैं. अब उसको आपकी नुमाइंदगी के लिए भेजा जा रहा है. संसद के स्टूडियो में जाके अब ऊ आपके हितों पर लड़ने का अभिनय करेगा. हे भाई देखिए, जैसे सभी नेता जी लोग करते हैं चुनावी महाभारत में उन बेचारे को भी आपसे वादे तो करने ही पड़ेंगे. ये उसकी दस्तूर है न, इसीलिए. लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा कि आप कहीं उस वादे को दिल से न लगा लीजिएगा. भूल के भी अगर अइसा करेंगे न, तो पछताइएगा. क्योंकि मज़ाक करना उनका पेशा है. ऊ परदे से लेके चुनावी मंच तक आपके साथ मज़ाक करेंगे. संसद, देश के संविधान, जनता यानी कि आप के हितों और लोकतंत्र के साथ तो मज़ाक यहाँ होइए रहा है, बहुत दिनों से. पर अभी तक जो यह सब होता थ न, वह सब तनी संकोच के साथ होता था. समझ लीजिए कि अब वह संकोच नहीं बचेगा. जो भी होगा खुले आम होगा. संसद और संसदीय मर्यादाओं, जनता और जनता के हितों, लोक और लोकतंत्र, देश और देश के संविधान …… और जो कुछ भी आप सोच सकते हैं, उस सबके साथ, मज़ाक का सीधा लाइसेंस अब जारी हो गया है. आगे जैसा आपको रुचे. समझ गए न ज्ञान भैया और भाई सिद्धार्थ जी बुझाएल कि ना कुछू?

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अथातो जूता जिज्ञासा-19

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 22, 2009

हाँ तो हम बात कर रहे थे, विदेशों में जूते के प्रताप का. तो सच यह है कि विदेशों में भी जूते का प्रताप भारतवर्ष से कुछ कम नहीं रहा है. बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि कई जगह भारत से भी ज़्यादा प्रताप रहा है जूते का. इसी क्रम में भाई आलोक नन्दन ने पिछले दिनों जिक्र किया था फ्रांस की एक रानी मेरी अंतोनिएत का. यह जो रानी साहिबा थीं, ये पैदा तो हुई थीं ऑस्ट्रिया में सन 1755 में, लेकिन बाद में फ्रांस पहुंच गईं और वहीं की रानी हुईं. जैसा कि भाई आलोक जी ने बताया है ये अपने दरबारियों पर जूते चलाया करती थीं.

बेशक यह जानकर आपको दुख हो सकता है और मुझे भी पहली बार तो यह लगा कि यह कैसी क्रूर किस्म की रानी रही होंगी. लेकिन साहब उनकी क्रूरता की कहानियों का मामला दीगर मान लिया जाए तो उनकी जूते चलाने की आदत कुछ बुरी नहीं लगती रही होगी. ख़ास तौर से उनके दरबारियों को. केवल इसलिए नहीं कि वे दरबारी थे और दरबारियों को आम तौर पर जूते खाने की आदत होती ही है. अव्वल तो किसी के सही अर्थों में दरबारी होने की यह प्राथमिक टाइप की योग्यता है कि वह जूते खाने में न सिर्फ़ माहिर हो, बल्कि इसमें उसे आनन्द भी आता हो. जूते खाकर वह आह-ऊह न करे, बल्कि कहे कि वाह रानी साहिबा! क्या जूते चलाए आपने! मज़ा आ गया ये जूते खाकर तो. दरबारी होने की यह शर्त आज तक चली आ रही है, इस भयावह लोकतंत्र तक में. लिहाजा इस नाते तो उनके दुखी होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता और ख़ुशी की बात यह है कि वे जूते कोई  मामूली जूते नहीं होते थे, हमारे-आपके या ज्ञान भैया के बार-बार सोल चढे हुए जूतों जैसे.

रानी साहिबा मैरी अंतोनिएत के जूते हर तरह से ख़ास हुआ करते थे. एक तो इसीलिए कि वे रानी साहिबा के जूते होते थे और दूसरे इसलिए भी कि उनमें हीरे-जवाहरात जडे हुए होते थे. 17वीं शताब्दी की बात तो छोडिए, आज की इस हाइटेक इक्कीसवीं सदी में भी अगर हमको-आपको भी ऐसे जूते मिलें तो दरबारी न होने के बावजूद हम उन्हें पाना अपना सौभाग्य ही समझेंगे. भला बताइए, इस महंगाई के दौर में जब रोटी-दाल का जुगाड ही इतना मुश्किल हो, तब अगर कोई हीरे जवाहरात दे रहा हो, तो जूते की थोडी सी चोट के बदले उसे हासिल कर लेना भला किसे बुरा लगेगा! मुझे पक्का विश्वास है कि उन जूतों के लिए रानी साहिबा के दरबारियों के बीच तो ग़ज़ब की होड ही मच जाती रही होगी और सभी चाहते रहे होंगे कि काश! आज मेरी बारी हो. जिसे वे जूते मिल जाते रहे होंगे उसकी ख़ुशी का तो कोई पारावार ही नहीं होता रहा होगा और ठीक इसी तरह जो तमाम कोशिशों के बावजूद जूते नहीं पाते रहे होंगे उन बेचारों की ईर्ष्या का भी.

यक़ीन न हो तो आप आज के सन्दर्भ में इसे भारतीय लोकतत्र की कई महारानियों के व्यवहार में देख सकते हैं. दक्षिण की एक महारानी के पास तो चप्पलों और जेवरों का इतना बडा भंडार पता चला था कि पूरा इनकम टैक्स महकमा परेशान हो गया उनका हिसाब लगाते-लगाते, पर दरबारी खा-खा कर कभी परेशान नहीं हुए. एक और महारानी उत्तर की हैं, जिनके यहाँ दरबारियों के बैठने के लिए दरी बिछाई जाती है और वह ख़ुद वह सोफे पर बैठ कर जूते चलाती हैं. दरबारी बडी ख़ुशी-ख़ुशी उसे लोकते हैं और मांते हैं कि जूता मिलने का मतलब है विधानसभा और अगर लात भी मिल गया तो समझो लोकसभा का टिकट पक्का. भला यह दुनिया के किस हीरे से कम है. उत्तर की ही एक और महारानी हैं, जिनकी भारत ही नहीं विदेशों में भी तूती बोलती है, उनकी जूतियों के निकट से दर्शन ही दरबारियों की औकात बढा देते हैं. जिसे मिल जाएं, समझो कल्पवृक्ष ही मिल गया. पूरब की एक महारानी हैं. वह जब जूते चलाती हैं तो पब्लिक के हाथ मुश्किल से आया रोजगार का इकलौता साधन तक छिन जाता है, फिर भी पब्लिक उनके जूतों को अपने सिर-आंखों पर स्थान देती है.

महारानी अंतोनिएत के जूतों का क्या मूल्य होता रहा होगा यह तो आलोक जी ने नहीं बताया, पर इतना तो मैं अपने अनुमान से कह सकता हूँ कि उस ज़माने के हिसाब से भी वे जूते बहुत क़ीमती हुआ करते रहे होंगे. अगर उनका ढांचा बिगाड कर भी उनके हीरे-जवाहरात को ही बेचा जाता रहा हो तो भी इतना तो रिटर्न मिल ही जाता रहा होगा कि हमारे जैसे लोगों के लिए एक महीने के राशन की चिंता से मुक्ति मिल जाती रही होगी. अब सोचिए कि एक वो ज़माना था और एक आज का ज़माना.

जूते आज भी 20-20 हज़ार रुपये क़ीमत के तो भारतवर्ष में ही मिल जाते हैं. लेकिन इन क़ीमती जूतों की उन जूतों से भला क्या तुलना. ये तो वैसी ही बात होगी जैसे सोने के हल की तुलना खेत में चलाए जाने वाले हल या राज सिंहासन पर विराजने वाले खडाऊं की तुलना घुरहू के पव्वे से की जाए. इन जूतों में हीरे-जवाहरात तो कौन कहे, ढंग की पीतल भी नहीं लगी होती. दुकान से निकलने के बाद बाज़ार में अगर हम-आप इन्हें बेचने जाएं तो सौ रुपये भी शायद ही मिल पाएं. ये अलग बात है कि दुकान पर हमको-आपको ये 20 हज़ार में ही मिलेंगे. पर सवाल ये है कि ये आख़िर दुकान पर 20 हज़ार में बिकते क्यों और कैसे हैं. तो भाई इसमें तो कमाल सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्रैंडिंग का है. और ब्रैंडिंग वो फितरत है जो आजकल तेल-साबुन से लेकर मीडिया तक की होने लगी है. कुछ अख़बारों में तो स्थिति यहाँ तक पहुंच गई है कि सम्पादकीय विभाग को धकिया कर इसने बैक बेंचर बना दिया है और ख़ुद ड्राइविंग सीट पर काबिज हो गई है. मतलब यह कि उनकी सम्पादकीय नीतियां ही तय करने लगी है. लिहाजा अब अगर आपको टेलीविज़न पर सिर्फ़ चटपटी ख़बरें और अख़बारों में भी बहुत सारी चटपटी ख़बरें मिलने लगी हैं तो उन पर अफ़सोस करने की कोई ज़रूरत नहीं है.

बहरहाल, मैरी अंतोनिएत के प्रसंग से सिर्फ़ इतना ही ज़ाहिर नहीं हुआ कि विदेशों में भी जूता जी का प्रताप ऐतिहासिक सन्दर्भों में महत्वपूर्ण है, बल्कि सच तो यह है कि वहां यह आम आदमी के लिए आज के भारत की तुलना में ज़्यादा उपयोगी भी रहे हैं. कम से कम, आज के लोकतांत्रिक राजाओं के दरबारी तो ख़ुद को आम आदमी ही मानते हैं. मेरा ख़याल है कि उन दिनों भी राजा-रानियों के दरबारी ख़ुद को राजा-रानी साहिबा के सामने आम आदमी ही कहा करते रहे होंगे. मुझे तो ऐसा लगता है कि आजकल भी जो ख़ास लोग ख़ुद को आम जगहों पर आम आदमी के रूप में प्रेज़ेंट करते हैं उसकी यह एक बडी वजह है. ये अलग बात  है कि जिस आम आदमी के नाम पर ही सब कुछ होता है उसे सब कुछ होने का न तो तब कोई फ़ायदा मिल पाया और न आज ही मिल पा रहा है.

(चरैवेति-चरैवेति…)

अथातो जूता जिज्ञासा-17

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हरा दीजिए न, प्लीज़!

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 21, 2009

(डिस्क्लेमर : आज जूता कथा को सिर्फ़ एक बार के लिए कुछ अपरिहार्य कारणों से ब्रेक कर रहा हूँ. आशा है, आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे. आशा है, आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे. कल से फिर अथातो जूता गिज्ञासा जारी हो जाएगी और आप उसकी 19वीं कडी पढ सकेंगे. तब तक आप इसका आनन्द लें. धन्यवाद.)

“अले पापा दादा को गुच्छा आ गया.”

“क्या गुच्छा आ गया? कौन से दादा को कौन सा गुच्छा आ गया?”

“अले वो दादा जो टीवी में आते हैं, हल्ला मचाने के बीच, उनको औल वो वाला गुच्छा जो आता है.”

“ये कौन  कौन सा गुच्छा है भाई जो आता है. आम का, कि मकोय का, कि अंगूर का या और किसी चीज़ का?”

“ना-ना, ये छब कुछ नईं. वो वाला गुच्छा जो आता है तो लोग श्राब दे देते हैं. वो दादा तब लोपछभा में कहते हैं कि जाओ. तुम छब हाल जाओ.”

लीजिए साहब! छोटी पंडित की बात स्पष्ट हो गई. ये उसी दादा की बात कर रहे हैं जिनको लोप, अंहं लोकसभा में गुस्सा आया है. वैसे लोकसभा को चाहे अपनी तोतली भाषा में सही पर उन्होने नाम सही दिया. आख़िर लोक के नाम पर बनी जिस सभा से लोक की चिंता का पूरी तरह लोप ही हो चुका हो, उसे लोपसभा ही तो कहा जाना चाहिए. और उसी दादा को आया है जिन्हें वह कई बार आ चुका है. इसके पहले उनको ग़ुस्सा आने का नोटिस लोग इसलिए नहीं लेते रहे हैं क्योंकि वह उन्हें जब-जब आया उसका कोई ख़ास नतीजा सामने नहीं आया. मतलब यह कि दादा को ग़ुस्सा तो आया, पर उस बेचारे ग़ुस्से का कोई नतीजा नहीं आया. बेचारा उनका ग़ुस्सा भी बस आया और चला गया. किसी सरकारी घोटाले के जांच के लिए आई टीम के दौरे की तरह. जैसे सरकारी घोटालों की सरकारी जांचों कोई निष्कर्ष नहीं निकलता, बिलकुल वैसे ही दादा का ग़ुस्सा भी अनुर्वर साबित हुआ.

यहाँ तक कि दादा को एक बार न्यायपालिका पर ग़ुस्सा पर भी ग़ुस्सा आ गया था. बोल दिया था दादा ने तब कि न्यायपालिका को उसकी सीमाओं में ही रहना चाहिए. मैं बडे सोच में पड गया था तब तो कि भाई आख़िर न्यायपालिका की सीमाएं क्या हैं. मेरे न्यायवादी मित्र सलाहो ने तब मेरे संशय का समाधान किया था कि जहाँ से विधायिका में किसी भी तरह एक बार बैठ गए लोगों के हितों की सीमाएं शुरू हो जाएं, बस वहीं अन्य सभी पालिकाओं की सीमाएं बाई डिफाल्ट ख़त्म समझ लिया करो. तब से मैंने इसे एक सूत्रवाक्य मान लिया. ग़नीमत है कि दादा को अभी तक संविधान पर ग़ुस्सा नहीं आया. वरना क्या पता अचानक बेचारे सविधान को भी वह खुले आम उसकी सीमाएं समझाने लगें. अब तो और डर लगने लगा है, क्या पता श्राब ही दे दें. हे भगवान! तब क्या होगा? मैं तो सोच कर ही डर जाता हूँ. बहरहाल मुझे पूरी उम्मीद है कि ऐसा नहीं होगा. क्योंकि उनके होनहार साथी जिन पर आज उन्होंने ग़ुस्सा किया है, वे अक्सर अपने मन मुताबिक ठोंकपीट उसमें करते रहते हैं और वह चुपचाप सब कुछ बर्दाश्त करता रहता है. मैं समझ नहीं पाता कि इसे उसका बडप्पन मानूं या बेचारगी कि आज तक एक बार भी उसने भूल से भी कभी इस ठोंकपीट पर किसी तरह का एतराज नहीं जताया.

इसका यह मतलब बिलकुल न समझें कि दादा को हमेशा ग़ुस्सा ही आता रहता है. अब देखिए, मन्दी देवी तो अब आई हैं, एक साल पहले. पर पूरे देश की जनता महंगाई से त्राहि-त्राहि कर रही है पिछ्ले 5 साल से. पर एक बार भी दादा को इस बात पर ग़ुस्सा नहीं आया. उनकी पार्टी को इस बात पर एक-दो बार ग़ुस्सा ज़रूर आया इस बात पर और पार्टी ने इस बात थोडा हो-हल्ला भी मचाया. पर दादा को एक बार भी इस बात पर ग़ुस्सा नहीं आया. और तो और, पार्टी ने इस बात पर समर्थन तो क्या वमर्थन वापस लेने की बात भी नहीं की. और जब चार साल बीत गए और लगा कि अब तो जनता के बीच जाने का वक़्त निकट आ गया है तो बिन मुद्दे का मुद्दा गढ डाला. एटमी सन्धि के बहाने पूरे का पूरा समर्थन ही वापस ले लिया. पहले से ही जनता के बीच होने की रियाज के लिए.

दादा ने लेकिन तब पार्टी छोड दी लेकिन हस्तिनापुर का वह सिंहासन नहीं छोडा जिसकी रक्षा का वचन वह शायद राजमाता को दे चुके थे. आप को जो मानना हो मान सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि दादा ने तब ठीक ही किया. आख़िर जब दोनो तरफ़ कौरव ही हों तो किसका साथ दिया जा सकता है? जब तय हो कि किसी भी स्थिति में हस्तिनापुर तो नहीं ही बचना है, तो किसका साथ दिया जा सकता है. बेहतर होगा कि फिर हस्तिनापुर के सिंहासन की ही रक्षा की जाए. लिहाजा दादा ने भी किसी भी समझदार आदमी की तरह यही किया.

लेकिन दादा इस बार चुप नहीं रह पाए. कैसे रह सकते थे? उन्होने अपनी दूरदृष्टि से देख लिया है कि इस तरह हल्ला मचाने वाले जनप्रतिनिधि सिर्फ़ अपना, अपने स्वार्थों और अपने अहं का ही प्रतिनिधित्व कर सकते हैं. जन से उनका कोई मतलब रह ही नहीं गया है. मैं समझ सकता हूँ, दादा को इस बार ग़ुस्सा बहुत ज़ोर का आया है. इतनी ज़ोर का कि बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया. लेकिन बेचारे वे आख़िर कर भी क्या सकते थे. भाई उम्र भी तो हो गई है. और जब कुछ नहीं किया जाता तो एक ही बात होती है.

मुझे अपने गांव की हरदेई बुआ याद आ गईं. बुढापे में उठ भी नहीं पाती थीं, पर ग़ुस्सा तो उन्हें आता था. तो सुबह से शुरू हो जाती थीं, अपने इकलौते नालायक बेटे पर. कुछ और तो कर नहीं सकती थीं, लिहाजा उसे शाप ही देती थीं. हमारे गांव में उन्हें दुर्वासा ऋषि का अवतार माना जाता था.  और हाँ, दुर्वासा ऋषि भी आख़िर क्या कर सकते थे. न तो वे राजा थे, न सेनापति, न मंत्री और कोई राजपुरोहित ही. कोई और रुतबा तो उनके हाथ में था नहीं जो किसी का कुछ बिगाड लेते. पर उन्हें गुस्सा तो आता था. लिहाजा वे घूम-घूम कर शाप ही दिया करते थे. मुझे लगता है कि कुछ ऐसा ही मामला दादा के साथ भी हो लिया है. अब दादा हैं कि ग़ुस्सा करके शाप दे रहे हैं और अपने इम्तिहान वाले कौशल भाई हैं कि इस ग़ुस्से पर भी बहस कराना चाहते हैं. अरे भाई ग़ुस्सा है तो बस ग़ुस्सा है, अब उस पर बहस कैसी. क्या पूरे देश को आपने वकील समझ रक्खा है, जो बात-बेबात बहस ही करने पर तुली रहे.

जा जनता बहस नहीं करेगी. यह बात दादा भी जानते हैं. दादा जानते हैं कि जब वामपंथियों के एक धडे ने हिटलरशाही को अनुशासन पर्व बताया था, तब भी जनता ने जनार्दन को मज़ा चखाया था. लिहाजा उन्हें पूरी उम्मीद है कि इस बार भी वह अपने हितों से खेलने वाले महान लोकनायकों को मज़ा चखा देगी. तभी तो उम्मीद से शाप दिया है, “जाओ तुम सब हार जाओगे. ये जो पब्लिक है, ये सब जानती है.” अब देखिए, दादा तो जो कर सकते थे, वह तो उन्होने कर दिया. गेंद उन्होने आपके पाले में डाल दी है.  अब यह आप पर है कि आप उसके साथ क्या सलूक करें.

लेकिन भाई, दादा के शाप के साथ-साथ आपसे यह बिनती है. दादा जो भी हों और जैसे भी हों तथा अब तक उन्होने जो भी और जिसलिए भी किया हो, प्लीज़ वह सब आप लोग भूल जाइए. बस एक बात याद रखिए. वह यह कि आपके महान लोकनायकों दिया गया उनका यह शाप शायद आपके लिए वरदान साबित हो सकता है.  तो इस देश के लोकतंत्र पर दादा की आस्था की रक्षा के लिए मेरी एक बात मान जाइए न! अपने ऐसे महान लोकनायकों को, जिन्हें लोक की कोई परवाह ही न हो, इस बार हरा दीजिए न, प्लीज़!

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अथातो जूता जिज्ञासा-18

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 20, 2009

अब बात जूता शास्त्र या जूतापैथी की नहीं, अपितु समग्र जूताशास्त्रीय परम्परा के अनुशीलन की है तो इसकी शुरुआत हमें आधुनिक भारतीय नियमानुसार पश्चिम से ही करनी होगी. मैं जानता हूँ कि अगर मैं सीधे भारत से ही इस परम्परा का अनुशीलन करने लगा तो चाहे वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न होअ, विद्वान (सॉरी मेरा मतलब इंटेलेक्चुल्स से था) लोग उसे स्वीकार नहीं करेंगे. अब देखिए न! हम शेक्सपपीयर को इंग्लैण्ड का कालिदास नहीं, कालिदास को भारत का शेक्सपीयर कहते हैं. मम्मट और विश्वनाथ जैसे आचार्यों के रहते हम कबीर, गोरख, तुलसी और रैदास के काव्य को प्लेटो की कसौटी पर कसते हैं. तो भला इस परम्परा को अगर मैंने केवल भारतीय कहा तो आप कैसे मान लेंगे. अभी देखिए, भाई अरविन्द जी इधर बताने लगे हैं कि भोले बाबा की पूजा बहुत पहले से दूसरे देशों में भी होती रही है. मुझे पक्का यक़ीन है इस बार वे ब्लॉगर भी महाशिवरात्रि पर अभिषेक करने जाएंगे, जो पिछली बार तक नहीं जाते रहे हैं. आख़िर अब मामला ग्लोबल है न भाई!

असल में हम भारतवर्षियों की एक बहुत ही पुरानी आदत ये है कि अपनी जो भी चीज़ें हमें बुरी लगती हैं (चाहे वास्तव में वे कितनी भी अच्छी क्यों न हों) उनके बारे में हम यह मान लेते हैं कि इनका सारा प्रताप केवल भारत में ही है. भला विदेशों में कोई ऐसी बातें मानता है या ऐसे काम करता है, ना-बिलकुल भी नहीं. ख़ास तौर से वे लोग जो अपने जिला मुख्यालय से आगे नहीं गए होते हैं, वे तो यह बात डंके की चोट पर पूरे दावे के साथ कहते हैं कि विदेशों में ऐसा बिलकुल नहीं है. बिलकुल वैसे ही जैसे कुछ विद्वान पंडित लोग पूरे दावे के साथ कह देते हैं कि चार वेद और छः शास्त्र में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि पहले प्रेम विवाह होता था. अब यह अलग बात है कि अगर यह दावा करने वाले विद्वान पंडितों से उसी वक़्त पूछ लिया जाए तो शायद वे चार वेद और छः शास्त्रों के नाम भी न गिना सकें. वेद-शास्त्र का उनका कुल ज्ञान केवल सत्यनारायण व्रत कथा तक सीमित होता है. पर दावा करने में क्या जाता है! सो वे दावा कर देते हैं.

इसके ठीक विपरीत हमारे देश में एक वर्ग उनका भी है जो सच्चे अर्थों में इंडियन लोग हैं. भारत, हिन्दुस्तान और आर्यावर्त के अस्तित्व का उन्हें कोई भान तक नहीं है. वे इंडिया में रहते हैं, इंडिया में जीते हैं, इंडिया में खाते हैं, इंडिया में पीते हैं, इंडिया ही ओढते हैं और इंडिया ही बिछाते हैं. उन्हें हर वह चीज़ बेहद पसन्द होती है, जिसका नाम अंग्रेजी में होता है. और तो और, अगर किसी भारतीय चीज़ का नाम भी अंग्रेजी में कर दिया जाए तो वह उन्हें महत्वपूर्ण एवं उपयोगी लगने लगती है तथा पसन्द आने लगती है. जैसे आप योग को ही देखिए. अभी तक अमेरिका या इंग्लैंड में कोई महापुरुष उनका पेटेंट करा पाया या नहीं, यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि भारत में कुछ महापुरुष योगा के बडे फैन हैं. वे रेगुलर योगा करते हैं और अगर ग़लती से भी कहीं आपने उनसे योग की चर्चा कर दी तो समझिए कि झंझट. वह बिदक जाएंगे.

बात भी ठीक है. ग्लोबल लैंग्वेज तो जो है वो अंग्रेजी है, फिर किसी चीज़ के हिन्दी नाम का क्या मतलब? देखिए अंग्रेजों ने क़रीब दो सौ साल तक हमारे देश पर राज किया. ऐसा वे क्यों कर सके? इसीलिए न कि वे अंग्रेजी जानते थे. अगर अंग्रेजी न जानते होते तो क्या वे ऐसा कर पाते? कभी नहीं. और तो और, अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद तो यह बात और ज़्यादा ज़ोरदार तरीक़े से साबित हो गई. अब देखिए न, आज भी हमारे ऊपर वही लोग राज कर रहे हैं जो अंग्रेजी जानते हैं. बल्कि सरकार में धीरे-धीरे अंग्रेजी जानने वालों का ही वर्चस्व बढता गया है. एक बहुत बडे गिरोह के लोगों ने बाक़ायदा यूरोप से ही अपने लिए सरदार आयात किया है. उन्हें अपने भारतीय सरदारों पर ज़रा भी यक़ीन नहीं हुआ.

हालांकि आज़ादी के तुरंत बाद जो सरकार हमारी बनी थी, शुरुआती दौर में, उस वक़्त सरकार में कुछ दिहाती लोग भी आ गए थे. उनको अंग्रेजी नहीं आती थी. सिर्फ़ हिन्दी आती थी, या तमिल, तेलुगु, बांग्ला, मराठी … आदि कोई दूसरी भारतीय भाषा आती थी.  पर आपको अब कहीं कुछ ऐसा गडबड दिखाई देता है? बिलकुल नहीं. क्यों? क्योंकि इस दिशा में बहुत सोच समझ कर बडे ही क़ायदे से काम किया गया. शुरू से ही हमारी सरकार के जो कर्ता-धर्ता थे उन्होने इस बात का पूरा ख़याल रखा कि जितनी जल्दी हो सके ई धोती बांधने वालों को सरकार के भीतर से दफ़ा करना है. तो चुन-चुन कर ऐसे लोगों को किनारे लगाने की पूरी मुहिम चलाई गई. राजनेताओं की जगह साहब बैठाए गए. तब जाकर इतनी कडी मेहनत के बाद अब हमारे देश में सचमुच शूपात्र लोग सरकार में आ सके हैं.

पिछले साठ सालों में हमारे लोकतंत्र ने इतनी तरक्की की है कि अब देखिए चारों ओर तो देख के ई लगता है कि सचमुच  राजा लोग राज कर रहे हैं.   धोती तो दूर अब पजामा पहनने वाले भी संसद-विधान सभा जैसी जगहों पर कम ही दिखाई देते हैं. हाँ बाहर यानी देश के भीतर कहीं जनसभा-वभा के लिए निकलने पर ज़रूर कभी इलास्टिक के नाडे वाला पजामा बांध लेते हैं. तब जाकर हम यह गौरव हासिल कर सके हैं कि दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र (जैसा कि दावा किया जाता है) के शीर्ष पर भी किसी व्यक्ति को बैठाने के लिए हमें जनमत की ज़रूरत नहीं, सूट-बूट-टाई और एक व्यक्ति के प्रति आस्था चाहिए होती है.  ऐसा कैसे सम्भव हो सका है, जानते हैं? ऐसा सिर्फ़ इसलिए सम्भव हो सका है क्योंकि अब हमारे देश में सिर्फ़ उन्हीं पार्टियों का वर्चस्व रह गया है, जो जन के बजाय जूते से चलती हैं.

अब आपको होने के लिए यह भ्रम भी हो सकता है कि यह जूता तंत्र हमारा अपना है और सिर्फ़ हमारा ही है. अन्य किसी भी देश का इस पर कोई हक़ बिलकुल भी नहीं है.  जैसे कई लोगों को यह भ्रम है कि विदेशों मे जितना कुछ भी ज्ञान है, वह सब यहीं से गया है. लेकिन नहीं साहब ऐसा नहीं है. जब आपके यहाँ ऋषि-मुनि बैठ कर वेद-पुराण और मनुस्मृति रचने में लगे थे तो बाक़ी जगहों पर भी लोग कोई घास नहीं छील रहे थे. वह भी कुछ रच रहे थे. जब आपके यहाँ जूते पर काम चल रहा था तभी दूसरे देशों में भी जूते पर काम चल रहा था और इसके ही फलस्वरूप जूते पर उनके यहाँ भी काफ़ी कुछ हुआ मिलता है.  तो इससे यह पता चलता है कि जूते को लेकर दूसरे देशों में भी काफ़ी समृद्ध परम्परा है.

(कैसे यह जानने के लिए बने रहिए इयत्ता के साथ. बहरहाल अभी हम लेते हैं एक छोटा सा वमर्शियल ब्रेक (ज़्यादा नहीं, सिर्फ़ चौबीस घंटे का) ब्रेक के बाद हम फिर मिलेंगे और आपको बताएंगे कि क्या हैं विदेशों में जूताजी से जुडी महान परम्पराएं. )

अथातो जूता जिज्ञासा-16

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अथातो जूता जिज्ञासा-17

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 16, 2009

यूँ तो चिकित्सा पक्ष को 16वें अध्याय में ही सम्पूर्ण मान लेने का मेरा इरादा था, लेकिन कुछ चिट्ठाकार साथियों की टिप्पणियों के ज़रिए जो आदेश आए उसके मुताबिक मुझे इसे विस्तार देना ज़रूरी लगा. इधर व्यस्तता का आलम कुछ ऐसा रहा कि लिखना सम्भव नहीं रहा, इसलिए समय से मैं पोस्ट नहीं कर सका. व्यस्तता आज भी कुछ ऐसी ही रही और रात को क़रीब साढे 11 बजे लौट कर लिखने का इरादा तो बिलकुल भी नहीं था. पर अब तो धन्यवाद ही कहना पडेगा उन सर्वथा अपरिचित पडोसी महोदय-महोदया को, जिनके यहाँ शायद शादी है और फिल्मी-ग़ैर फिल्मी गाने इतनी ऊंची आवाज़ में बजाए जा रहे हैं कि बेचारे कान के सही-सलामत होने पर अफ़सोस हो रहा है. मुझे याद आ रहा है, काफ़ी पहले मैंने एक फिल्म देखी थी- ‘अग्निसाक्षी’. उसमें नाना पाटेकर हीरो थे और उनके कोई बगलगीर अपना जन्मदिन मना रहे थे. देर रात तक वे भी ऐसा कानफाडू शोर मचाए हुए थे. काफ़ी देर तक बर्दाश्त करने के बाद जब नाना साहब से नहीं रहा गया तो उन्होने अपनी बन्दूक उठाई और पहुंच गए उनके तम्बू-कनात में. चलाने लगे दनादन गोलियां. उनका डायलॉग ठीक-ठीक तो याद नहीं, पर उसका लब्बोलुआब यह था कि साले तुमने पैदा होकर दुनिया पर कौन सा एहसान किया है जो पूरी दुनिया तुम्हारे पैदा होने की ख़ुशी में अपनी नींद ख़राब करे और चैन गंवा दे. बहरहाल, इसके साथ ही उनकी ख़ुशी का पटाक्षेप हो गया.

मन तो मेरा भी यही कर रहा है कि कुछ ऐसा ही करूँ, लेकिन मजबूरी यह है कि मेरे पास बन्दूक नहीं है. और अगर हो भी तो गोलियां इतनी महंगी हो गई हैं कि अब सिर्फ़ फिल्मों में ही चलाई जा सकती हैं. पर साहब जूते तो चलाए ही जा सकते हैं! अगर पूरा मोहल्ला साथ दे. पर यहाँ कौन साथ देगा. पहली तो वजह यह कि सभी यही करते हैं  और दूसरी यह कि यहाँ ग़ुनाह ग़ुनाह नहीं है, ग़ुनाह है ग़ुनाह के ख़िलाफ़ खडे होना. एक दिन जूता चलाइए और पूरी ज़िन्दगी कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते फिरिए.

जूता जी का उपयोग किया जा सकता है, बशर्ते साथ देने के लिए पूरा समूह हो और समूह यहाँ किसी अच्छे काम के लिए नहीं बन पाता है. संघे शक्ति तो है कलियुगे, लेकिन संघ यहाँ दुर्भाग्य से चोर-उचक्कों के ही बन पाते हैं. असामाजिक, अमानवीय और अराजक तत्वों के ही बन पाते हैं. बेचारा शरीफ़ आदमी अपने बीवी-बच्चों की परवाह करे, नौकरी-व्यापार या खेती करे, ब्लॉग लिखे या कि संघ बनाए! वैसे ऐसी आज़ादी, जिसमें खेत बढने के लिए आज़ाद हो या न हो, पर गधा चरने के लिए ज़रूर आज़ाद है, है सिर्फ़ हमारे ही देश में. दूसरे देशों में ऐसी आज़ादी सर्वथा अनुपलब्ध है. क्योंकि भीख में आज़ादी (जैसा कि इतिहास की किताबों में हमें पढाया गया है) सिर्फ़ और सिर्फ़ भारत वर्ष को ही मिली है. ऐसे देश में कोई संघ बनाने का क्या मतलब जहाँ आज़ादी तो आज़ादी, आज़ादी की लडाई ही हाइजैक हो गई. 

(लीजिए, शायद उन्हें भनक लग गई कि मैं जूता शास्त्र लिखने बैठ गया हूँ. शोर तो बन्द हो गया, पर अब मैं थमने वाला नहीं हूँ. ये है न जूतापैथी का असर!)

पीछे एक पोस्ट में भाई राज भाटिया और एनॉनिमस जी ने ध्यान दिलाया था मन्दिर से जूते चोरी होने का. यह त्रासदी मैंने भी भुगती है और मुझे लगता है कि सिर्फ़ हमारा-आपका ही नहीं, भारत के हर आम आदमी का जूता ही हाइजैक हो गया है. उसे अब अपने लिए नए सिरे से जूते गढने होंगे. पर मुश्किल यह है कि वह अपने लिए जूते गढने के बजाय उन्ही तत्वों के लिए जूते गढने में व्यस्त है जिन पर उसे जूते चलाने चाहिए. अगर एक बार वह ऐसे तत्वों के लिए जूते गढने छोड कर ख़ुद अपने लिए जूते बनाने शुरू कर दे तो देश के बहुत सारे रोगों का इलाज हो जाएगा. सिर्फ़ कायिक रोग ही नहीं, मानसिक और आत्मिक रोगों का निदान भी इस पैथी में है.

अब आप पिछले दिनों उठे प्रेम रोग के ज्वार का ही मसला लें. दिल्ली में ही कुछ ऐसी जगहें हैं, जहाँ लोग सिर्फ़ तभी जाना पसन्द करते हैं जब  वे अकेले हों या साथ मे कोई ऐसा या ऐसी ही हो …. अगर बच्चों के साथ जाना हो तो उनके लिए मुसीबत हो जाए. मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूँ जो दिल्ली की प्रेम वाटिकाओं में जाना ख़ूब पसन्द करते थे. संयोग से विवाहोपरांत उन्हें किसी पार्क में जाने का उनका मन हुआ. बहुत तलाशते-तलाशते एक पार्क में ऐसी जगह मिली जिसे उन्होने थोडी देर बैठने लायक उपयुक्त समझा. लेकिन उनके वहाँ बैठने के थोडी ही देर बाद वहाँ वेलेंटाइन छाप एक प्रेमी जोडा आ धमका और उसने जो आलाप शुरू किया, वह उनके लिए थोडी ही देर में घबराहट का कारण बन गया. हद हो गई जब बच्चा पूछ बैठा, ‘पापा ये लोग कौन हैं?’ बेचारे पापा क्या बताते! उन प्रगतिशील पापा ने बताया, ‘बेटा ये लोग भाई बहन हैं.’

‘अच्छा! ये लोग क्या कर रहे हैं?” इस सवाल का पापा के पास कोई जवाब नहीं था. मम्मी ने जवाब दिया, ‘वे लोग प्यार कर रहे हैं’.

‘ओह! हम भी बडे होकर अपनी बहन से ऐसे ही प्यार करेंगे.’ बेटे की यह इच्छा जाहिर होते ही वे वहाँ से चल पडे और पूरे रास्ते वेलेंटाइनवादी प्रेमियों को गरियाते ही रहे. महीनों गरियाते रहे. सबसे ज़्यादा अफ़सोस इस बात पर था उन्हें कि दिल्ली में कोई ऐसी जगह नहीं रही जहाँ थोडी देर परिवार समेत जाकर बैठा जा सके. बाद में उनके जो लेक्चर सुनने को मिले, अगर मैं टीवी का पत्रकार या बुद्धिजीवी होता तो निश्चित रूप से उन्हें तालिबानी या अलक़ायदावादी घोषित कर देता. पर अफ़सोस मैं ऐसा नहीं कर सकता. बहरहाल कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो हमारी-आपकी तरह कुढते नहीं रहते हैं. वे जूता लेकर निकल आते हैं और इलाज शुरू कर देते हैं.

यह इलाज इंजेक्शन और सर्जरी से भी ज़्यादा कारगर साबित होता है.  मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूँ जो पहले धन्धेबाजों के टुकडों पर जूते चलाते हैं और फिर गुलाबी चड्ढियों के साथ फोटो भी खिचवाते हैं. पहले विरोध करके अपना और कम्पनी का प्रचार और फिर अपने विरोध का प्रदर्शन करके दुहरा प्रचार. यानी दोनों हाथ में लड्डू. समझदार लोग, जो समर्थकों और विरोधियों दोनों का ठीक-ठीक मंतव्य समझते हैं, चड्ढी के  बदले लंगोटांदोलन चला देते हैं.  यह भी एक तरह का जूता ही है, भिगोया हुआ जूता. असल में जूतापैथी के साथ भी एक बडी दिक्कत यह है कि यहाँ भी अलग-अलग रोगों के लिए अलग-अलग क़्वालिटी के जूते की और भी अलग-अलग मात्रा में ज़रूरत होती है. जैसे होमियोपैथी में होता है- मदरटिंचर से लेकर टेन थाउज़ैंड एक्स तक की हर दवाई आती है और शायद एक लाख पॉवर तक की दवाएं भी आती हैं. सब एक से एक कारगर. पर दिक्कत वही है, रोग को समझ कर इलाज होता है और वह भी एक्सपर्ट डॉक्टर द्वारा. एक बार अगर कायदे से हम इनका इस्तेमाल सीख जाएं तो भाई योगेन्द्र मौद्गिल वाली चिंता से मुक्त हो जाएंगे. यह बात सिर्फ़ होमियोपैथी में ही नहीं, उस एलोपैथी में भी है, जो इलाज से पहले चेक पर ही मरीज के हज़ारों रुपये ख़र्च करा देती है और आयुर्वेद में भी. जूतापैथी से विभिन्न रोगों के इलाज के तरीक़े अगर आप जानना चाहते हैं, तो थोडा धैर्य रखें और जैसे किसी एलोपैथ डॉक़्टर के यहाँ जाने के बाद आप सिर्फ़ रोग जानने के लिए हज़ारों रुपये ख़र्च कर देते हैं, ठीक वैसे जूतापैथी से विभिन्न रोगों का इलाज कैसे किया जाए, यह ठीक-ठीक जानने के लिए आपको पहले जूतापैथी की पूरी परम्परा से वाकिफ़ होना पडेगा और यह जानने के लिए कृपया बने रहें हमारे साथ अगले वमर्शियल ब्रेक तक.

(चरैवेति-चरिवेति)

अथातो जूता जिज्ञासा-16

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अथातो जूता जिज्ञासा-16

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 14, 2009

जूता जी की भूमिका भारतीय चिकित्सा शास्त्र में केवल यहीं तक सीमित हो, ऐसा भी नहीं है. कई अन्य महकमों की तरह चिकित्सा जगत या कहें कि महकमे में भी जूते को एक सम्मानजनक हैसियत प्राप्त है. इसका एहसास मुझे बहुत जल्दी हो गया. तभी जब मैं गोरखपुर में था. हुआ यूँ कि एक बेचारे आम आदमी का एक्सीडेंट हो गया. घर-परिवार और गाँव-बाज़ार के लोगों की नज़र में वह सिर्फ़ आम ही नहीं, बल्कि कुछ-कुछ आवारा किस्म का आदमी था. अब ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में उसकी कोई हैसियत तो थी नहीं. फिर भी उसे लेकर लोग तुरंत अस्पताल आए. अब चूंकि वह आवारा ही था, पैसा-कौडी तो उसके या परिवार वालों के पास कुछ था नहीं,  लिहाज़ा उसे किसी प्राइवेट अस्पताल में नहीं जाया जा सकता था. उधर सरकारी अस्पतालों से गम्भीर मरीजों के ठीक होकर वापस घर लौटने की परम्परा आप जानते ही हैं कि आज तक शुरू नहीं हो सकी है. इसके बावजूद उसे सरकारी अस्पताल मे ही भरती करवाया गया.

सरकारी अस्पताल में आने के बाद पहले तो उसे भर्ती करने से ही मना कर दिया गया, पर इसी बीच उसका कोई उसके ही जैसा यानी आवारा किस्म का मित्र आ गया और उसके दबाव पर उसे भरती कर लिया गया. हालांकि उसके दबाव को उस वक़्त माना डींग ही जा रहा था, लेकिन चूंकि सरकारी अस्पतालों के कर्मचारी अनुभवी होते हैं और वे जानते हैं कि कई बार डींग लगने वाली बातें भी सही साबित हो जाते हैं, लिहाजा उसका मुँह बन्द करने के लिए उसे भरती कर लिया गया. पर इस दबाव के बावजूद अस्पताल में उसे भरती वैसे ही किया गया जैसे कि कांजी हाउस में जानवरों को करते हैं. मतलब यह कि उसे बेड के नाम पर किसी वार्ड के कोने में थोडी सी जगह दे दी गई. जैसे-तैसे उसी कोने में एक गन्दी सी चादर डालकर उस पर उसे लिटा दिया गया. इसके परिवार के जो लोग उस वक़्त वहाँ मौजूद थे, सभी एक किनारे बैठ कर बिलकुल वैसे ही उसके जीवन की घडियाँ गिनने लगे, जैसे आम जनता एक बार एक पार्टी की सरकार बनवाने की ग़लती करने के बाद अगले चुनाव के दिन गिनने लगते हैं.

इस बीच उसके उस आवारा टाइप मित्र के जुगाड या दबाव पर ही कोई डॉक़्टर तो नहीं, पर एक कंपाउंडर साहब आकर कुछ मरहम पट्टी भी कर गए. कुछ दवाएं भी उन्होने लिख दीं और वह भी वह आवारा टाइप मित्र ही बाज़ार से किसी तरह जुगाड कर लाया. परिवार वाले उसके बडे कृतज्ञ हुए जा रहे थे, क्योंकि बेचारे इसके अलावा और कुछ भी करने लायक नहीं थे. और तो और, अस्पताल का कोई चतुर्थ श्रेणी अधिकारी भी उनसे टेढे मुँह भी बात तक करने के लिए तैयार नहीं था.  इसी बीच वही मित्र किसी तरह अपनी गैंग के सरदार यानी विधायक जी को इत्तिला कर आया. हालांकि विधायक जी की विधायकी गए क़रीब तीन साल बीत चुके थे, पर अपने चमचों की नज़र में वह अभी भी विधायक ही थे. ख़ुद को पढे-लिखे मानने वाले कुछ बेवकूफ़ किस्म के लोग जब-तब उनकी ऐतिहासिक विधायकी को मानने से इनकार कर देते थे और तब उनको विधायक जी के विधिशास्त्री चमचे ऐसा भूगोल पढाते थे कि वे बेचारे अपने घर का पता तक भूल जाते थे. इसके बाद अगर वे कभी होश में आते थे तो विधायक जी को सीधे मंत्री जी ही कहने लगते थे.

बहरहाल, अपने ख़ास चमचे के एक्सीडेंट और फिर अस्पताल में उसकी भर्ती कराए जाने और वहाँ उसकी तीमारदारी क़ायदे से न होने पाने की सूचना मिलते ही विधायक जी ने किसी बडे डॉक्टर, जिसे उन दिनों शायद सीएमएस कहते थे, को फोन भिडा दिया. सुनते हैं कि अपने ख़ास चमचे की ठीक से तीमारदारी न हो पाने की एवज में विधायक जी ने बडे डॉक्टर साहब के परिवार से अपने अत्यंत अंतरंग संबंधों का तो हवाला दिया ही, यह पूर्व सूचना भी दे दी कि अगर अगले 10 मिनटों में उसके इलाज की प्रॉपर टाइप व्यवस्था न बन गई तो आगे वे मुँह के बजाय जूते से ही बात करेंगे. सौभाग्य से उनकी यह भविष्यवाणी सच भी साबित हुई. बमुश्किल आधे घंटे के भीतर विधायक जी अस्पताल परिसर में पधार चुके थे और वहाँ पहुँचते ही उन्होने किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति पर जूतों की बारिश भी शुरू कर दी थी.

इसके बाद तो जैसे पूरे अस्पताल में कर्तव्यनिष्ठता का तूफ़ान ही आ गया. डॉक्टर, नर्स, कपाउंडर, फार्मासिस्ट, वार्डब्वॉय… आदि सभी अपने कर्तव्यपालन में ऐसे जुटे, जैसे सरकारी अस्पताल के कर्मचारी नहीं, फ़ौज के सिपाही हों. हालांकि ऐसी घटनाएं भारतीय इतिहास में कम ही घटती हैं, पर आश्चर्यजनक सत्य उस बार घटित हुआ और वह बेचारा आवारा टाइप घायल आदमी सरकारी अस्पताल से ही तीन दिन बाद पूरी तरह स्वस्थ होकर वापस अपने घर गया. बाद में ऐसी ही कुछ घटनाओं का गवाह बनने का सुअवसर मुझे सिवान, मेरठ और जालंधर में भी प्राप्त हुआ.  इससे आपको हो या न हो, पर भाई मुझे तो इस बात का पक्का यक़ीन हो गया कि जूते की भूमिका सम्पूर्ण भारतीय चिकित्सा जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण है.

मुझे आश्चर्य होता है कि इसके बावजूद भारत सरकार या चिकित्सा विज्ञान की मान्य संस्थाओं की ओर से इस विषय पर व्यवस्थित शोधकार्य क्यों नहीं करवाया जा रहा है. आयुर्वेद, एलोपैथ, होमियोपैथी और जो कोई अन्य पैथी भी चिकित्सा जगत में हो सकती है, उस सबमें जूता की इतनी महत्वपूर्ण और सर्वमान्य टाइप की हैसियत के बावजूद अभी तक ऐसा एक भी शोधग्रंथ उपलब्ध नहीं है जिससे कि चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थी इस बात को साफ़ तौर पर जान सकें कि उनके किस प्रकार के प्रयोग से क्या-क्या चिकित्सीय लाभ लिए जा सकते हैं. मेरा तो  मानना कि इस विषय पर जल्द से जल्द व्यवस्थित रूप से शोधकार्य की शुरुआत कर दी जाने चाहिए. वरना कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में हर शोधकार्य को अपनी निजी सम्पत्ति मानने वाला अमेरिका नीम की तरह जूता जी के चिकित्सीय उपयोगों का पेटेंट करा ले और हम देखते ही रह जाएं. वैसे यह भी ग़ौर करने की बात है कि तासीर में नीम जी और जूता जी दोनों एक जैसे हैं और दोनों ही मामलों में अमेरिकी जनता और राजनेताओं की हमसे जबर्दस्त होड भी है.

(चरैवेति-चरैवेति….)

अथातो जूता जिज्ञासा-15

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अथातो जूता जिज्ञासा-15

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 12, 2009

जूते के प्रताप की सीमा यहीं सम्पन्न नहीं हो जाती है. नज़र उतारने या बुरी नज़र से अपने भक्तों को बचाने की जूता जी सामर्थ्य तो उनकी शक्तिसम्पन्नता की एक बानगी भर है. वस्तुतः उनकी कूवत इस सबसे भी कहीं बहुत ज़्यादा है. पता नहीं आधुनिक विज्ञान वालों ने अभी मान्यता दी या नहीं, लेकिन सच यह है कि कई दारुण किस्म के रोगों के इलाज में भी जूता जी का प्रयोग धडल्ले से किया जाता है.

आप ठीक समझ रहे हैं. मेरा इशारा मिरगी नामक रोग की ओर ही है. नए ज़माने के पढे-लिखे टाइप समझे जाने वाले लोग फिट्स कहते हैं. पता नहीं इसे फिट्स कहना वे कितना फिट समझते हैं, लेकिन एक बात ज़रूर है और वह यह कि फिट के इस बहुवचन का प्राथमिक उपचार वे भी जूते से ही करते हैं. यक़ीन मानिए, जूते का ऐसा भी उपयोग हो सकता है, यह अपने पिछडे गाँव में रहते हुए मुझे मालूम नहीं हो पाया. जूता जी की इस सामर्थ्य का पता मुझे तब चला जब मैं शहर में आया.

हुआ यों कि एक दिन एक सरकारी दफ्तर में एक सज्जन को फिट्स पड गया. पहले तो लोगों ने यह समझा कि वह शायद फिट हो गए हैं. ऐसा लोगों ने इसलिए समझा क्योंकि वे सज्जन ऐसे लोगों में शामिल थे जिनके लिए खाने से ज़्यादा पीना ज़रूरी था. तो लोगों को पहले यही लगा. लेकिन थोडी ही देर में जब उनके मुँह से झाग निकलने लगी तो लोगों को यह लगा कि अब शायद मामला पीने से बहुत आगे बढ चुका है. और यह अन्दाजा होते ही पूरे दफ्तर में अफरा-तफरी मच गई. उस वक़्त  उस दफ्तर में उनके सहकर्मियों से ज़्यादा परेशान मैंने चाय-पान के उस छोटे दुकानदार को देखा जिसके यहाँ उनका खाता चलता था.

ख़ैर उसके ही सुझाव पर पहले तो एक सरकारी डॉक्टर साहब को बुलाया गया. मैने सुना था कि वह डॉक्टर साहब डॉक्टरी विद्या रूस से पढकर आए थे. आने के बाद बहुत देर तक तो डॉक्टर साहब अपना आला, ठंढामीटर और पता नहीं क्या-क्या लगा कर क्या-क्या तो देखते रहे, पर कुछ अन्दाजा लगा नहीं पाए कि आखिर इनको जो हुआ है उसे क्या नाम दिया जाए और इन्हें उसके इस प्रकोप से बचाने यानी कि होश में ले आने के लिए क्या किया जाए. इस बीच वह लगातार छटपटाते रहे और मुँह से झाग फेंकते रहे.

आखिरकार उसी दुकानदार के सुझाव पर उन्हें जूता सुंघाया गया.  हालांकि उन्हें जूता सुंघाए जाने का पहले उनके कुछ सहकर्मियों ने विरोध भी किया, पर जब डॉक्टर साहब ने कह दिया कि भाई एक बार करके देखो तो सही. क्या पता कुछ फायदा कर ही जाए, तब भाई लोगों ने उन्हें जूता सुंघाया. जूता सूंघने से वह होश में तो नहीं आए, पर इतना ज़रूर हुआ कि उन्होंने छटपटाना और झाग फेंकना बंद कर दिया. इसके बाद उन्हे अस्पताल ले जाया गया और वहाँ जो कुछ भी हुआ हो उसका साक्षी बनने के लिए मैं वहाँ मौजूद नहीं था.

हालांकि उस वक़्त वहाँ जूता सुंघाने से उनकी हालत में जो सुधार आया था, उस पर मुझे कतई कोई यक़ीन इसलिए नहीं हुआ क्योंकि तब मैं भी ख़ुद को पढा-लिखा मानता था. पहले तो मुझे लगा कि शायद यह जूते का प्रताप नहीं, बल्कि इनकी जीवनलीला की वैलिडिटी का मामला है, पर थोडे दिनों बाद जब उन्हें मैंने दुबारा घूमते पाया तो समझ गया कि उनकी ज़िंदगी फिरसे रिचार्ज होकर आ गई है और यह सब काफ़ी हद तक जूता जी का ही पुण्य प्रताप है.

फिर जब उसी दफ्तर की कैंटीन में बैठे-बैठे एक दिन उनके ही बहाने जूता जी के प्रताप की चर्चा शुरू हुई तो मालूम हुआ कि यह तो सिर्फ़ एक बानगी थी. जूता जी इसके अलावा भी कई अन्य रोगों में उपयोगी साबित होते हैं. एक सज्जन ने बताया कि हांफा-डांफा नामक रोग में भी जूता जी को रोगी के सिर पर से फेर कर उतारा जाता है और इससे आश्चर्यजनक रूप से लोग स्वस्थ होते देखे गए हैं. बताते चलें कि यह जानकारी देने वाले भी वही सज्जन थे जो अपने फिटग्रस्त सहकर्मी को जूता सुंघाए जाने के प्रबल विरोधियों का नेतृत्व कर रहे थे.

(चलते चलिए…..)

अथातो जूता जिज्ञासा-14

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