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गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on February 28, 2009

देव डी को एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म कहा जा रहा है। अंग्रेजी अखबारों में फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को पांच-पांच स्टार से नवाजा है, वैसे फिल्म समीक्षकों के किसी फिल्म को स्टार देने की प्रणाली पर रामगोपाल वर्मा अपने ब्लाग पर पहले ही सवाल उठा चुके हैं। देव डी के डायरेक्टर अनुराग कश्यप खुद कई बार कह चुके हैं किसी फिल्म की समीक्षा के बजाय फिल्मकार की समीक्षा की जानी चाहिये। अनुराग कश्यप की फिल्म को समझने के लिए यह जरूरी है कि अनुराग कश्यप की समीक्षा की जाये।
रामगोपाल वर्मा की फिल्म सत्या से अनुराग कश्यप भारतीय फिल्म पटल पर एक फिल्म लेखक के रूप में मजबूती से उभरे थे, और यह फिल्म कथ्य और मेकिंग के स्तर पर सही मायने में एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म थी। रामगोपाल वर्मा ने पहली बार अपराध की दुनिया को मानवीय नजरिये से देखा था और मेकिंग में भी उन्होंने एसे शाट लिये थे, जो वास्तविक जीवन का अहसास कराते थे। अनुराग कश्यप इस टीम का हिस्सा थे, और उन्होंने लेखनी के स्तर पर इस फिल्म को शानदार मजबूती प्रदान की थी।
रामगोपाल वर्मा के स्कूल से निकलकर अनुराग कश्यप ने ब्लैक फ्राइडे बनाई थी, जो अपने कथ्य के कारण कोर्ट-कचहरी के चक्कर में फंसकर देर से रिलीज हुई थी। यह फिल्म 1993 में हुये मुंबई बम विस्फोट पर लिखी गई एक पुस्तक पर आधारित थी, जिसे पर्दे पर दिखाने के लिए अनुराग कश्यप ने काफी मेहनत की थी। फिल्मों में सिर्फ मनोरंजन से इतर किसी और चीज की तलाश करने वाले लोगों को यह फिल्म अच्छी लगी थी, लेकिन बाक्स आफिस के ग्रामर पर यह बिखरी हुई थी। इस फिल्म के मेकिंग स्टाईल में कुछ नयापन था और कुछ कुछ डोक्यूमेंटरी फिल्म स्टाईल का टच लिये हुये था। कानूनी स्तर पर विवादों में फंसने के कारण इस फिल्म के रिलीज होने में जो देरी हुई थी उसका नकारात्मक प्रभाव इस फिल्म के व्यवसाय पर पड़ा था। लेकिन अनुराग कश्यप एक डायरेक्टर के तौर पर इस फिल्म से अपनी पहचान बनाने में सफल रहे थे।
ब्लैक फ्राइडे की व्यवसायिक असफलता के बाद अनुराग कश्यप की दूसरी फिल्म थी नो स्मोकिंग। यह फिल्म बाक्स आफिस पर औंधे मुंह गिरी थी, और इस फिल्म को देखकर थियेटर से निकलते हुये लोग यह नहीं समझ पा रहे थे कि इस फिल्म को बनाने का औचित्य क्या है। अनुराग कश्यप इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित थे, और उन्हें पूरा यकीन था कि कंटेंट और तकनीक के स्तर पर वह इस फिल्म में जोरदार प्रयोग कर रहे हैं। इस फिल्म में प्रतीकों के माध्यम से कभी वह नाजीवादियों के डेथ कैंप को दिखा रहे थे, तो कभी बर्फीली जमीन पर स्टालिन की सैनिक शक्ति को प्रदर्शित कर रहे थे। एक स्थानीय तांत्रिक की भूमिका में परेश रावेल के माध्यम से उन्होंने हिटलर और स्टालिन के क्रमश गेस्टापो और केजीबी की कार्यप्रणाली को भी मजबूती से उकरने की असफल कोशिश की थी। अनुराग कश्यप जमीनी स्तर पर आमलोगों को क्मयुनिकेट करने में असफल रहे थे, और मनोरंजन के लिहाज से भी यह फिल्म लोगों के गले के नीचे नहीं उतरी थी। बौद्धिकता के पीछे भागते हुये अनुराग कश्यप यह भूल गये थे किसी भी फिल्म का प्रथम उद्देश्य लोगों का मनोरंजन करते हुये बाक्स आफिस पर इंटरटेनमेंट वैल्यू का निर्माण करना है। यह फिल्म एसा नहीं कर सकी, लिहाजा यह फिल्म थियेटरों पर चढ़ते ही उतर गई।
ब्लैक फ्राइडे और नो स्मोकिंग की त्रासदी से निकलने के लिये अनुराग कश्यप ने देव डी का निर्माण किया है, जिसके कथ्य में सेक्स कूटकूट कर भरा हुआ है। जिस तरह से विभिन्न अखबारों ने इस फिल्म को पांच-पांच सितारों से नवाजा है, उसे देखते हुये फिल्म समीक्षकों की भूमिका और उनकी सोंच पर भी सवालिया निशान लगने लगे हैं। समीक्षकों ने निर्देशन और पटकथा लेखन के तौर पर इस फिल्म को एक एक्सपेरिमेंटल फिल्म करार दिया है, जबकि इस फिल्म को देखने वाले अधिकतर दर्शकों का यही मानना है कि यह फिल्म टुच्चई के स्तर तक गिरी हुई है।
जिस जमाने में शरतचंद ने देवदास लिखी थी, उस जमाने में भी भारतीय साहित्य में सेक्स को विभिन्न तरीके से चित्रित करने वाले लेखकों की कमी नहीं थी। पारो और देवदास की कहानी की खासियत यह थी कि पुस्तक में पारो शुरु से लेकर अंत तक देवदास को देबू भैया कहती है। दोनों की कहानी की खूबसूरती का आधार भी यही है। शेखर एक जीवनी में शेखर और शशि के संबंधों के बहुत ही करीब है देवदास और पारो के संबंध। देवदास और पारो की प्रेम कहानी एक अव्यक्त प्रेम कहानी है, जिसे पुस्तक को पढ़ने के दौरान बहुत ही मजबूती से महसूस किया जा सकता है। प्रेम के इस स्तर को पकड़ पाने में या तो अनुराग कश्यप अक्षम हैं,या फिर सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिये जानबूझकर एक शानदार कथा के अलौकिक किरदारों को सेक्स की चासनी में लपेट दिया है। कथ्य के नाम पर जिस तरह से अनुराग कश्यप ने देवदास की मौलिक कहानी में फेरबदल किया है और संवादों में गंदे शब्दों का इस्तेमाल किया है उसे एक्सपेरिमेंट कहा जाना एक्सपेरिमेंट जैसे शब्द के साथ बलात्कार है।
कामुकता में डुबा हुआ देव लंदन से पारो से उसकी नंगी तस्वीर भेजने की मांग करता है, और बोल्ड पारो अपने कैमरे से खुद की नंगी तस्वीर निकाल कर गांव के कैफे हाउस से देव को ईमेल करने के लिए जाती है, पंजाब आने के बाद देव पारो को पाने के लिए जोरदार मश्कत करता है, और पारो से कुछ इंतजाम करने की गुजारिश करता है, पारो अपने एक पुरुष मित्र से उसके ट्यूबवेल की चाभी मांगती है, और उसके इंकार करने पर देव के लिए गन्ने के खेत में रजाई के साथ पहुंच जाती है, इसके पहले पारो का पुरुष मित्र देव को बता देता है कि पारो के साथ वह खूब मजा मार चुका है। गुस्सैल देव पारो पर गन्ने के खेत में ही उस वक्त भड़क जाता है, जब पारो उसके सीने के बाल से कामुक अंदाज में खेल रही होती है। देवदास के मौलिक कथ्य में जिस तरह से तोड़फोड़ किया गया है, इसके लिये एक्ट्राआर्डिनरी दिमाग की जरूरत नहीं है। मस्तराम का सस्ता साहित्य इस तरह के तथाकथित प्रयोगों से भरा हुआ है, और कथ्य के स्तर पर अनुराग कश्यप के इस टुच्चेपन को प्रयोग मानकर पांच-पांच स्टार देने वाले फिल्मी समीक्षकों की बुद्धि पर तरस ही खाया जा सकता है।
अनुराग कश्यप ने चंद्रमुखी के चरित्र को एक स्कूली लड़की के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसका आपत्तिजनक तस्वीर निकाल कर उसका ब्यायफ्रेंड सबको मोबाईल फोन पर भेज देता है। चंद्रमुखी का शर्मसार पिता आत्महत्या कर लेता है और उसकी मां उससे मुंह मोड़ लेती है। परिस्थितिवश उसे वेश्या बनना पड़ता है। आधुनिक समाज में प्रचलित फोनिक सेक्स को चंद्रमुखी के माध्यम से खूब दिखाया गया है। पूरी फिल्म के केंद्रबिन्दू में सेक्स भरा हुआ है। यह फिल्म ब्लैक फ्राइडे जैसी मजबूत फिल्म बनाने वाले अनुराग कश्यप के गिरते हुये मानसिक स्तर का सूचक है। मनोरंजन के लिहाज से भी यह फिल्म एक खास मानसिक स्तर की मांग करती है। फिल्म के बैक ग्राउंज में गानों का खूब इस्तेमाल किया है, जो निसंदेह अच्छे बन पड़े हैं।
अनुराग कश्यप में एक बेहतर फिल्म मेकर बनने की पूरी क्षमता है, लेकिन इस क्षमता का इस्तेमाल उन्हें सकारात्मक रूप से करने की कला सीखनी होगी। एक लाजबाव फिल्म मेकर के रूप में अभी अनुराग कश्यप मीलों पीछे हैं। कलाकारों के अभिनय और तकनीक पर तो उनकी पकड़ है, लेकिन कथ्य को लेकर वह लगातार भटकते हुये नजर आ रहे हैं। देव के रूप में अभय देयोल ने बेहतर अभिनय किया है, वहां पारो और चंद्रमुखी भी स्क्रीन पर दर्शकों को अपनी सेक्सी अदाओं से आकर्षित करती है।

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14 Responses to “गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो”

  1. यह समीक्षा पढ़ कर ही भारतीय सिनेमा के सत्यानाश की वजह आसानी से समझी जा सकती है.

  2. जी सहमत पहले भी लिख चुका हूँ क्वाचिदनयतोअपि पर !

  3. आज के भारतीया सिनेमा का यह आधुनिक प्यार है, किस ओर जा रहे है हम, कोन रोकेगा इन्हे ऎसी बक्वास फ़िल्मे बनाने से???गन्ने के खेत में रजाई लेकर जाती पारो बहां उसे संप ने क्यो नही काट लिया, वही मर खप जाती

  4. हम भी ये सिनेमा देखे | पुरे सिनेमा में ये ढुन्ढते रहे की ५ स्टार वाली बात अब आएगी शायद. पूरा सिनेमा ख़तम हो गया और हमको लगा की माइनस में रेटिंग के योग्य इस सिनेमा को ५ स्टार कैसे मिल गया | सचमुच फिल्म samkshako की समीक्षा संदेहास्पद है.

  5. वो दिन दूर नहीं जब रामायण का नया वर्जन RAM-R और कृष्णलीला के लिए KRISH-K बनाए जाएं.अच्छी चीज की रचना करना जितना मुशील होता है उसे बिगाड़ना उतना ही आसान.

  6. Anonymous said

    बंदरमुखी इयत्ताकार…नारायन…नारायन

  7. ppaliwal said

    Aisi filmo ki samisha kar aur gande shabdo ka prayog kar aapne bhi anurag jaisa hi kaam kiya hai.Lekin lekh ki vishaye vastu se sahmat hoon

  8. Anonymous said

    अरे अनोनिमस नारायण बन्दर आ गोरिल्ला में तोरा अंतर ना बुझाला ?

  9. Anonymous said

    सच =अलोक जी= मनुष्य चाहे कितना ही विकसित हो चुका हो इसके परिधान पाषाण युग की ओर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं कुछ दिनों में लोग पत्तों से तन धकेंगे उसके बाद हवा से ! रंगीले नीले-फिल्म समीक्षकों , मसालाचट्टन दर्शकों और सुमार्गदर्शक फिल्मकारों की यही निष्ठा रही तो और कहीं आये या न आये फिल्म उद्योग में काफी पारदर्शिता आ जायेगी .संदेशप्रद वस्तुनिष्ठ सारगर्भित फिल्म पसंद करने वाले विचारशील लोगों का ज़माना लद चुका,यह ज़माना नंगे होकर जानवरों की हर क्षेत्र में श्रेष्टता की बराबरी करने का है ,अब ….. सेक्सी मसाले और कानफाडू तुकबंदी के बैशाखी पर खड़े छिछले-विचारगर्भित फिल्मों की दुनिया में आपका स्वागत है ……welcome

  10. चलिए… अच्छा किए जो बता दिए। अब इस फिल्म को देखने की योजना कैन्सिल कर देता हूँ। धन्यवाद।

  11. manoria said

    सार्थक समालोचना बधाई

  12. अरे, ये क्या, अथातो जूता जिज्ञासा समाप्त। इतने दिनों से उसकी चर्चा थी, अब कुछ अधूरा अधूरा सा लग रहा है।

  13. समाप्त नहीं हुआ है सर! जूताकार ज़रा थक गया है. आराम फ़रमा रहा है. सक्रिय होते ही पुनः आपकी सेवा में हाजिर होगा.

  14. Anonymous said

    पता नहीं क्यों कभी कभी आभाष होता है कि तृतीय विश्व युद्ध का मैदान तैयार हो रहा है और हम उसके काफी करीब है .और सारे लक्षण शारीर तोड़ कर रख देने वाले सोवीयतिया रोग के लगने लगे हैं समय पर इलाज़ ना हुआ तो हम तो गए . अजीब बात है न सांस्कृत्यायन id जी आजकल कलम ,मनुष्यहन्ता बैरेलों से पहले ही हांफने लगती है . अर्थ्लिप्सित गणिकाओं एवं गृहभेदिनों के कारण अधर्मी अंधधर्मयोद्धा सेंधमारी कर हमारे ही गृह में हमारे समक्ष हमारी जननी के चीरहरण का दुस्साहस कर रहे हों , और हमारा पराक्रम थककर चैन से सो रहा हो, हताश करता है . जैसा की स्वंत्रता संग्राम में हुआ था, किसी क्रान्तिअनुष्ठान का श्रीगणेश ही स्वयं की आहुति और क्रान्तिगीतों के मंत्रोच्चार से होता है ..पता नहीं आजकल के लेखिनियों की पनीली स्याहियां आमजन को क्रान्तिओन्मत्त कर देने वाले गीत लिख पाएंगी की नहीं .निश्चित कवि प्रदीप के गीतों में कमाल का वशीभूत कर देने का सामर्थ्य था 😉

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