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Archive for April, 2009

मुल्ला और इंसाफ़

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 30, 2009

इधर बहुत दिनों से मुल्ला नसरुद्दीन की बड़ी याद आ रही है. मित्रों से निजी बातचीत के क्रम में उनका जिक्र भी अकसर होता रहा है. पढ़ता भी ख़ूब रहा हूं, गाहे-बगाहे जब भी मुल्ला के बारे में जो कुछ भी मिल गया. पर उधर जूते ने ऐसा परेशान कर रखा था कि मुल्ला को इयत्ता पर याद करने का मौक़ा ही नहीं मिल सका. आज एक ख़ास वजह से उनकी याद आई. एक बात आपसे पहले ही कर लूं कि मुल्ला से जुड़े इस वाक़ये को किसी अन्यथा अर्थ में न लें. कहा यह जाता है कि यह एक चुटकुला है, लिहाजा बेहतर होगा कि आप भी इसे एक चुटकुले के ही तौर पर लें. अगर किसी से इसका कोई साम्य हो जाता है तो उसे बस संयोग ही मानें.

तो हुआ यह कि मुल्ला एक बार कहीं जा रहे थे, तब तक सज्जन दौड़ते-दौड़ते आए और उन्हें एक चाटा मार दिया. ज़ाहिर है, मुल्ला को बुरा लगना ही चाहिए था तो लगा भी. लेकिन इसके पहले कि मुल्ला उन्हें कुछ कहते, वह मुल्ला से माफ़ी मांगने लगे. उनका कहना था कि असल में उन्होंने मुल्ला को मुल्ला समझ कर तो चाटा मारा ही नहीं. हुआ यह कि मुल्ला को आते देख दूर से वह किसी और को समझ बैठे थे और इसी धोखे में उन्होंने चाटा मार दिया. पर मुल्ला तो मुल्ला ठहरे. उनकी नाराज़गी कम नहीं हुई. उन्होंने उन सज्जन की कॉलर पकड़ी और उन्हें घसीटते हुए पहुंच गए शहरक़ाज़ी की अदालत में. क़ाज़ी को पूरा वाक़या बताया. तो क़ाज़ी ने कहा, ‘भाई मुल्ला साहब, आप बदले में इन्हें एक चाटा मारें.’
लेकिन मुल्ला इस न्याय से भी संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने कहा, ‘क़ाज़ी साहब देखिए, इन महोदय ने 20 आदमियों के बीच मेरी इंसल्ट की है. सों ये मामला इतने से निपटने वाला नहीं है.’
‘तो, आख़िर आप क्या चाहते हैं?’ क़ाज़ी ने पूछा.
‘इनकी इस हरकत से मेरी इज़्ज़त का जो नुकसान हुआ है आख़िर उसका क्या होगा?’ मुल्ला ने सवाल उठाया.
शहरक़ाज़ी समझदार थे और मुल्ला को जानते भी थे. लिहाजा मामला जल्द से जल्द रफ़ा-दफ़ा करने के इरादे से उन्होंने मुल्जिम पर एक स्वर्णमुद्रा का दंड लगाया और कहा कि वह अभी अदालत के सामने ही मुल्ला को इस रकम का भुगतान करे. बेचारा वह तुरंत भुगतान करने की हैसियत में था नहीं. सो उसने थोड़ा मौक़ा चाहा. यह कहकर कि हुज़ूर अभी मैं स्वर्णमुद्रा लेकर आपकी ख़िदमत में हाज़िर होता हूं, वह अदालत से बाहर चला गया और देर तक नहीं लौटा. जब और इंतज़ार करना मुल्ला के लिए नामुमकिन हो गया तो वह अपनी जगह से उठे. शहरक़ाज़ी की गद्दी के पास पहुंचे और उनसे मुखातिब हुए, ‘अब क़ाज़ी साहब ऐसा है कि मुझे कहीं जाना है, ज़रूरी काम से. लिहाजा मैं इससे अधिक देर तक इंतज़ार तो कर नहीं सकता. अब ऐसा करिएगा कि जब वह आए तो रकम उससे आप वसूल लीजिएगा और तब तक ये रसीद मैं आपको काटकर दिए जा रहा हूं.’ और लगा दिया एक झन्नाटेदार तमाचा. फिर चलते बने.

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दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 29, 2009

पुस्तक समीक्षा

दास्तान- ए- बेदिल दिल्ली
संभवतः बहुत कम ही साहित्यप्रेमियों को इस बात की जानकारी होगी कि लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार द्रोणवीर कोहली , पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में प्रकाशित होने वाली अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुग में ‘ बुनियाद अली ’ के छद्म नाम से एक स्तंभ लिखा करते थे , जिसका शीर्षक था – बेदिल दिल्ली। धर्मयुग पत्रिका के सर्वाधिक पढे जाने वाले और चर्चित स्तंभों में सम्मिलित बेदिल दिल्ली के अन्तर्गत लिखे गए उन्हीं लेखों को संकलित कर पुस्तकाकार में किताबघर प्रकाशन ने हाल में ही प्रकाशित किया है । कहने की जरूरत नहीं कि पुस्तक में संकलित सभी 52 लेख ऐतिहासिक महत्व के हैं।
इनके माध्यम से लेखक ने तत्कालीन दिल्ली की सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक दशाओं का चित्रण पूरी प्रामाणिकता के साथ किया है। दिल्ली स्थित सरकारी महकमों में फैला भ्रष्टाचार हो या सामाजिक स्तर पर पसरी संवेदनहीनता, साहित्यिक गलियारों में होने वाली आपसी टाँग खिचाई हो या फिर राजनीतिक मठाधीशों की छद्म सदाचारिता , हर जगह व्याप्त विसंगति को उकेर कर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए बुनियाद अली मुस्तैद नजर आते हैं।
लेखक ने पुस्तक में संकलित लेखों को विषयानुसार तीन वर्गों में विभाजित कर दिया है। ‘ये गलियाँ औ’ चैबरे’ वर्ग में संकलित लेखों में मुख्यतः तत्कालीन दिल्ली के शासन, प्रशासन, सत्ता और संसद से लेकर सड़क पर टाट बिछाकर बरसाती के नीचे रहने वाले आम आदमी के जीवन से जुड़ी सच्चाइयों की पड़ताल की गई है। मिसाल के तौर पर ‘कायदे-कानून’ लेख में वे चुटीले अंदाज में कहते हैं-‘‘सारे नियम और कायदे-कानून असल में लोगों की सुख-सुविधा के लिए बनाए जाते हैं। मगर सरकारी दतरों में जिस तरह इसका मलीदा बनाया जाता है, यह देखने, समझने और भुगतने की चीज है।’’ इसी तर्ज़ पर ‘प्रशासन कितना चुस्त’ लेख में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लिए गए प्रतीकात्मक पत्र के जरिए उन्होंने (यानी बुनियाद अली ने) प्रशासनिक स्तर के कदम-कदम पर पसरी अनियमितताओं को पूरी बेबाकी से बयान किया है। इस वर्ग में संकलित अधिकांश लेख व्यंग्यात्मक शैली और हल्के-फुल्के लहज़े में ही लिखे गए हैं, लेकिन इनके साथ ही कुछ लेखों (जैसे-‘दिल्ली के जामुन’ और ‘सरकारी अस्पताल’) में तरल मानवीय संवेदनाओं को भी पूरी पारदर्शिता के साथ शब्दबद्ध किया गया है।
पुस्तक में समाविष्ट दूसरे वर्ग ‘साहित्य वाद-संवाद’ में संकलित कुल ग्यारह लेखों में साहित्यिक गोष्ठियों, लेखक संघों और अकादमियों से जुड़े नेपथ्य की वास्तविकताओं को रोचक शैली में लिखा गया है। विशेष रूप् से ‘टी-हाउस, काॅफी हाउस’ शीर्षक लेख में बुनियाद अली ने, उस दौर में वहाँ होने वाली (शीर्षस्थ साहित्यकारों की) अड्डेबाजियों और उनकी बेलौस अदाओं का आँखों देखा हाल बड़े ही दिलचस्प अंदाज में बयान किया है।
इसी क्रम में पुस्तक के तीसरे वर्ग ‘इतस्ततः’ में सम्मिलित किए गए लेखों में बुनियाद अली ने देश के सर्वोच्च पद पर आसीन अति विशिष्ट व्यक्ति के (राष्ट्र भाषा हिंदी के प्रति) अनुचित व्यवहार से लेकर अदने स्तर के सरकारी मुलाजिमों के भीतर पूरी तरह जम चुकी क़ाहिली और संवेदनहीनता को रेखांकित किया है।
प्रत्येक लेख में कहीं संस्मरण, कहीं कहानी, कभी गंभीर निबंध तो कभी रिपोर्ताज जैसी भिन्न-भिन्न विधागत शैलियों का समावेश, बुनियाद अली ने इतनी खूबसूरती से किया है कि आज भी इन्हें पढ़ने पर ज़रा-सी भी बोझिलता का अहसास नहीं होता। कहा जा सकता है कि-‘धर्मयुग’ पत्रिका के बेदिल दिल्ली स्तंभ की लोकप्रियता का एकमात्र कारण बुनियाद अली का ‘अंदाज़-ए-बयाँ’ ही था, जिसके चलते वो गंभीर से गंभीर बात भी सीधी-सरल और गुदगुदाती भाषा में कह दिया करते थे।
यद्यपि पुस्तक में संकलित सभी लेख आज से लगभग 25-30 वर्ष पहले लिखे गए थे, लेकिन उनकी रोचक भाषा शैली, कसी बुनावट, व्यंग्यात्मक लहजा और उसमें समाए आम आदमी के जीवन की दुश्वारियों का ऐसा मार्मिक चित्रण किया गया है कि जो आज भी पढ़ने पर मन में गहरा प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। इन लेखों से गुजरते हुए ये साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है कि इतने वर्ष बीतने के बाद भी इनकी प्रासंगिकता अब भी बरकरार है। दिल्ली की जिस संवेदनहीनता को लेकर बुनियाद अली, इन लेखों में चिंतित नजर आते हैं, उसके स्तर में कमी की जगह बढ़ोतरी ही होती जा रही है। यहाँ के गली-कूचों से लेकर राजपथ तक चप्पे-चप्पे पर, बेशुमार विसंगतियाँ आज भी मुँह बाए खड़ी नजर आ जाती हैं। कहना चाहिए कि बुनियाद अली की वह बे-दिल दिल्ली अब, माॅल्स और मल्टीप्लेक्सेस की चकाचैंध में अंधी और लाखों मोटरगाड़ियों के कोलाहल में बहरी भी हो गई है। शायद तभी उसे न तो हर तरफ छिटकी अव्यवस्थाएँ दिखती हैं और न ही सुनाई पड़ती हैं, आम आदमी की आवाज।
( नई दुनिया के 19 अप्रैल 09 अंक में प्रकाशित )

-विज्ञान भूषण

पुस्तक: बुनियाद अली की बेदिल दिल्ली
लेखक: द्रोणवीर कोहली
मूल्य: 400 रुपये मात्र
पृष्ठ: 296
प्रकाशक: किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली

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चार रंग जिंदगी के

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 28, 2009

पुस्तक समीक्षा

चार रंग जिंदगी के

अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में सर्जनात्मक लेखन से जुडने वाली रचनाकार डाॅ अरुणा सीतेश ने बहुत कम समय में ही तत्कालीन कथा-लेखिकाओं के बीच अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर ली थी। उनके कथा- साहित्य के केंद्र में प्रायः स्त्री जीवन की गहन भावनाओं का मार्मिक चित्रण उपस्थित रहता है। कुछ समय पूर्व प्रकाशित कथा संकलन ‘ चार लंबी कहानियां ’ में सम्मिलित उनके द्वारा लिखी गई कहानियां जहां एक ओर नारी मन के अंतद्र्वंद्व को उजागर करती हैं तो साथ ही मानवीय मनोविज्ञान का विश्लेषण भी करती हैं।
समीक्ष्य संग्रह में संकलित पहली कहानी ‘डूबता हुआ सूरज’ एक असफल प्रेम की मार्मिक गाथा को बयान करती है। आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई यह कहानी यद्यपि चिर- परिचित कथानक पर ही आधारित है , लेकिन इसका शिल्प और मनोभावों को पूरी सशक्तता से व्यक्त करने के लिए गढे गए वाक्य विन्यास , पाठकों को बांध कर रखने में पूर्णतः सक्षम हैं।
भावुक इंसान के जीवन की मुश्किलें तब और बढ जाती हैं , जब उस पर अपने ही परिजनों और जीवन को व्यावहारिकता से देखने वालों का दबाव पडने लगता है। बुद्धिजनित तर्कों और भावजनित संवेदनाओं के दो राहे पर खडे एक ऐसे ही युवक शिशिर की दुविधाग्रस्त अंतर्दशा का सूक्ष्म विवेचन इस संग्रह की कहानी ‘ चांद भी अकेला है ’ में किया गया है। इस कहानी का अंत शिशिर के उस असाधारण निर्णय के साथ होता है , जब वह अपने सपनों और अपनी महात्वाकांक्षाओं को दफनाकर मानसिक रूप से विकलांग अपनी बहन के इलाज कराने का निश्चय कर लेता है। इसी तरह ग्रामीण परिवेश पर आधारित संग्रह की एक अन्य कहानी‘कल्लू का कल्लू’ में सवर्ण और शक्तिसम्पन्न वर्ग के द्वारा कमजोर वर्ग के उत्पीडन और इसके विरुद्ध उपजे विद्रोह को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है। यह कहानी शोषण के खिलाफ होने वाली क्रांति की जमीनी हकीकत और उसकी परिणति को सहजता के साथ हमारे समक्ष उजागर करती है। दरअसल , यह कहानी इस कडवे सच को भी स्थापित करती है कि हाशिए पर रहने वाले लोग भी केंद्र में पहुंचने पर किस तरह से हाशिए पर बचे शेष लोगों को भूल जाते हैं ?
कहा जा सकता है कि समीक्ष्य संग्रह की चारो कहानियां हमारे आस-पास के जीवन से जुडी तो हैं , ही साथ ही इनके माध्यम से बनते- बिगडते पारिवारिक और सामाजिक संदर्भेंा का भी प्रभावी चित्रण किया गया है। चार अलग – अलग विषयों पर लिखी गई ये कहानियां , वास्तव में पाठक को जिंदगी के चार रंगों से रू-ब-रू कराती हैं।

विज्ञान भूषण

पुस्तक – चार लंबी कहानियां
लेखिका- डाॅ अरुणा सीतेश
प्रकाशक- अमरसत्य प्रकाशन, नई दिल्ली
मुल्य – 150 रु मात्र

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अथातो जूता जिज्ञासा-32

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 26, 2009

आप कई बार देख चुके हैं और अकसर देखते ही रहते हैं कि ख़ुद को अजेय समझने वाले कई महारथी इसी खड़ाऊं के चलते धूल चाटने के लिए विवश होते हैं. यह अलग बात है कि अकसर जब आप धूल चाटने के लिए उन्हें मजबूर करते हैं तो यह काम आप जिस उद्देश्य से करते हैं, वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हर बार आप यह पाते हैं कि आप छले गए. इसकी बहुत बड़ी वजह तो यह है कि आप अकसर ‘कोउ नृप होय हमें का हानी’ वाला भाव ही रखते हैं. कभी अगर थोड़ा योगदान इस कार्य में करते भी हैं तो केवल इतना ही कि अपना खड़ाऊं चला आते हैं, बस. और वह काम भी आप पूरी सतर्कता और सम्यक ज़िम्मेदारी के साथ नहीं करते हैं. आप ख़ुद तमाशेबाज खिलाड़ियों के प्रचार तंत्र से प्रभावित होते हैं और इसी झोंक में हर बार अपने खड़ाऊं का पुण्यप्रताप बर्बाद कर आते हैं. और यह तो आप अपनी ज़िम्मेदारी समझते ही नहीं हैं कि आपके आसपास के लोगों के प्रति भी आपकी कोई ज़िम्मेदारी बनती है.
अगर आपका पड़ोसी ग़लती करता है और आप उसे ग़लती करते हुए देखते हैं तो ज़्यादा न सही पर थोड़े तो आप भी उस ग़लती के ज़िम्मेदार होते ही हैं न! बिलकुल वैसे ही जैसे अत्याचार को सहना भी एक तरह का अत्याचार है, ग़लती को देखना भी तो एक तरह की ग़लती है! अगर आप अपने पड़ोसी को ग़लती करने से बचने के लिए समझाते नहीं हैं, तो इस तरह से भी एक ग़लती ही करते हैं. वैसे अगर आप पॉश लोकेलिटी वाले हैं तो वहां कोई ग़लती अनजाने में नहीं करता. वहां ग़लती करने के पहले भी उसकी पूरी गणित लगा ली जाती है. ग़लतियां वे करते हैं जिन्हें आप कम-अक्ल मानते हैं. और वे ग़लतियां इसलिए नहीं करते कि उनका विवेक आपसे कम है, वे ग़लती सिर्फ़ इसलिए करते हैं क्योंकि वे इतने सूचनासमृद्ध नहीं हैं जितने कि आप. उनके पास इसका कोई उपाय नहीं है. आपके पास उपाय तो है और आप सूचना समृद्ध भी हैं. चाहें तो दुनिया के सच को देखने के लिए अपना एक अलग नज़रिया बना सकते हैं. पर आप वह करते नहीं हैं. क्योंकि आप एक तो अपनी सुविधाएं नहीं छोड़ सकते और दूसरे वह वर्ग जो आपको सुविधाएं उपलब्ध कराता है, उसके मानसिक रूप से भी ग़ुलाम हो गए हैं.
यह जो आपकी दिमाग़ी ग़ुलामी है, इससे छूटिए. उनके प्रचार तंत्र से आक्रांत मत होइए. यह समझिए कि उनका प्रचारतंत्र उनके फ़ायदे के लिए है, आपके फ़ायदे के लिए नहीं. वह हर हवा का रुख़ वैसे ही मोड़ने की पूरी कोशिश करते हैं, जैसे उनका फ़ायदा हो सके. अगर उनका न हो तो उनके जैसे किसी का हो जाए. सांपनाथ न सही, नागनाथ आ जाएं. नागनाथ के आने में आपको ऐसा भले लगता हो कि सांपनाथ का कोई नुकसान हुआ, पर वास्तव में सांपनाथ का कोई नुकसान होता नहीं है. यह जो झैं-झैं आपको दिखती है, वह कोई असली झैं-झैं नहीं है. असल में नागनाथ और सांपनाथ के बीच भी वही होता है जो बड़े परदे पर नायक और खलनायक के बीच होता है. ज़रा ग़ौर फ़रमाइए न, सांपनाथ का ऐसा कौन सा पारिवारिक आयोजन होता है, जिसमें नागनाथ शामिल नहीं होते हैं और नागनाथ का ऐसा कौन सा काम होता है जिसमें  सांपनाथ की शिरकत न हो?
फिर? भेद किस बात का है? असल में यह भेद नहीं, भेद का नाटक है. अगर वे ऐसा न करते तो अब तक कब के आप यह समझ गए होते कि बिना पूंजी के भी चुनाव जीता जा सकता है और ज़रूरी नहीं कि बड़ी-बड़ी पार्टियों के ही माननीयों को जिताया जाए, आप अपने बीच के ही लोगों को चुनाव लड़ा-जिता कर सारे सदनों पर अपने जैसे लोगों का कब्ज़ा बनवा चुके होते. भारत की व्यवस्था से पूंजी, परिवारवाद, क्षेत्रवाद और जाति-धर्म का खेल निबटा चुके होते. लेकिन आप अभी तक ऐसा नहीं कर सके. क्यों? क्योंकि आपके दिमाग़ में यह बात इस तरह बैठा दी गई है कि जनतंत्र में जीत धनतंत्र की ही होनी है, कि आप आज अचानक चाहें भी तो उसे अपने दिमाग़ से निकाल नहीं सकते हैं. अभी जो मैं यह कह रहा हूं, शायद आपको ऐसा लग रहा हो कि इसका दिमाग़ चल गया है.
लेकिन नहीं दोस्तों, आप अचानक कलम छोड़ कर जूता निकाल लेते हैं, तब आपकी मनःस्थिति क्या सामान्य होती है? नहीं. यह आपको इसीलिए करना पड़ता है क्योंकि कलम को आपने सिर्फ़ रोजी-रोटी से जोड़ लिया है. यह आपके भीतर एक तरह का अपराधबोध भी पैदा करता है, समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी न निभा पाने की और अपराधबोध आपको एक दिन उबलने के लिए मजबूर कर देता है. यह सिर्फ़ शोषण-दमन की पीड़ा नहीं है जो जूते के रूप में उछलती है, यह स्वयं अपनी ही आत्मा के प्रति धिक्कार की भी पीड़ा है, जो दूसरों के साथ-साथ अपने पर भी उछलती है और यह अनियंत्रित उछाल कोई सही दिशा नहीं ले सकती. इसका तो उपयोग वही अपने हित में कर लेंगे जिनके ख़िलाफ़ आप इसे उछाल रहे हैं. क्योंकि उनके पास एक सुनियोजित तंत्र है, जो हारना जानता ही नहीं. वह हर हाल में जीतने के लिए प्रतिबद्ध है. साम-दाम-दंड-भेद सब कुछ करके. दो सौ वर्षों से चली आ रही भारत की आज़ादी की लड़ाई ऐसे ही केवल बीस वर्षों में हाइजैक कर ली गई. इसके पीछे कारण कुछ और नहीं, केवल ऊर्जा का अनियंत्रित प्रवाह था.
अकसर होता यह है कि आपने कुछ लिखा और अपनी ज़िम्मेदारी पूरी मान ली. अपने पाठक को शंकाएं उठाने और तर्क़ करने का तो आप कोई मौक़ा देते ही नहीं. उसे वह मौक़ा दीजिए. यह मौक़ा उसे भी दें जो आपका पाठक-दर्शक या श्रोता नहीं है. जो किसी का भी पाठक होने लायक तक नहीं है. थोड़ा निकलिए दीन-दुनिया में. मिलिए ऐसे लोगों से जिनसे मिलना आपको ज़रा निम्न कोटि का काम लगता है. अगर आप एक दिन में एक व्यक्ति से भी आमने-सामने का संपर्क करेंगे तो यह न सोचें कि वह संपर्क केवल एक ही व्यक्ति तक सीमित रहेगा. याद रखें, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी.  यह रास्ता थोड़ा लंबा ज़रूर है, पर अंतहीन नहीं है. और ख़याल रखें, ज़िन्दगी का कोई शॉर्टकट नहीं होता. शॉर्टकट तो हमेशा मौत का ही होता है. अगर शॉर्टकट के फेर में पड़ेंगे तो फिर से वही जलालत झेलनी होगी. लड़ाई हाइजैक हो जाएगी. सिर्फ़ चेहरे बदल जाएंगे, व्यवस्था वही बनी रहेगी.
इसलिए कहीं भी अकेले-अकेले जूते चलाने की ग़लती न करें. अगर दुनिया के मजदूर-किसान यानी असली फोर्थग्रेडिए इकट्ठे नहीं हो सकते तो कोई बात नहीं, पर कम से कम भारत के तो सारे चिरकुट एक हो जाएं. चुनाव का समय भी वस्तुतः देश के सारे चिरकुटों की सोच की एकता प्रकट करने का एक मौक़ा होता है. यह क्यों भूलते हैं कि 19वीं सदी के आरंभ तक इस देश का आम आदमी चुनाव के बारे में जानता भी नहीं था. और तब जब उसे इसके बारे में पता भी चला तो माननीयों के चयन में उसकी भागीदारी नहीं थी. सिर्फ़ माननीय ही चुनते थे माननीयों को. लेकिन अब माननीयों को वह सिर्फ़ चुन ही नहीं रहा है, उनकी मजबूरी बन चुका है. यह काम कोई एक दिन में नहीं हुआ है. क़रीब सवा सौ साल लगे हैं इतिहास को बदलने में. यह कोई एनसीआरटी की किताब वाला इतिहास नहीं था, जिसे च्विंगम चबाते-चबाते जब चाहे बदल दिया जाए. यह असली इतिहास है. इसके बदलने में कई बार हज़ार-हज़ार साल भी लग जाते हैं.
जानकारी का अधिकार अभी तक आपके पास नहीं था, पर अब है. यह आपको मिल सके इसके लिए कितना संघर्ष करना पड़ा, यह आप जानते ही हैं. थोड़े दिन और संघर्ष के लिए तैयार रहिए, आपको इन जिन्नों को वापस उसी बोतल मे भेजने का अधिकार भी मिलने वाला है. अभी यह विकल्प भी आपके सामने आने वाला है कि जो लोग मैदान में दिख रहे हैं उनमें अगर आपको कोई पसन्द नहीं है तो आप यह भी ईवीएम में दर्ज करा आएंगे. टीएन शेषन ने अगर यह सोचा होता कि भारत की चुनाव प्रक्रिया को बदलना अकेले उनके बस की बात नहीं है तो क्या होता? क्या आज यह सोचा जा सकता था कि बिना बूथ कैप्चरिंग के भी चुनाव हो सकता है. लेकिन नहीं उन्होंने आलोचनाओं को बर्दाश्त करते हुए अपनी ख़ब्त को ज़िन्दा रखा और आज यह संभव हो गया. ऐसे ही एक दिन नागनाथ-सांपनाथ से मुक्ति भी संभव दिखेगी. वह भी शांतिपूर्वक. लेकिन ऐसा तभी संभव होगा जब आप उतावली में न आएं. इस दुनिया को धीरे-धीरे बदलने की कोशिश करें. इसके पहले कि बड़े बदलाव के लिए कोई प्रभावी कदम उठाएं चेतना के अधिकतम दिये जला लें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो आपकी कुर्बानी भी वैसे ही हाइजैक हो जाएगी जैसे मंगल पान्डे, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ां, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ सान्याल और उधम सिंह की कुर्बानी हाइजैक हो गई. या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तरह आप ख़ुद ही हाइजैक कर लिए जाएंगे.

इसके विपरीत, चेतना का एक दिया अगर आप जलाएंगे तो वह अपने जैसे हज़ार दिये जला देगा. उन हज़ार दियों से हज़ार हज़ार दिये जल जाएंगे. फिर जो जूतम-पैजार शुरू होगी, वह चाहे किसी भी रूप में हो, उसे रोकना या हाइजैक कर पाना किसी माननीय के बस की बात नहीं होगी.  आख़िर एक न एक दिन तो नासमझी इस दुनिया से विदा होनी ही है, तो आज से ही हम इस महायज्ञ में हिस्सेदार क्यों न हो जाएं. बस अपने संपर्क में आने वाले हर शख़्स को यह समझाने की ज़रूरत है कि एक बोतल, एक कम्बल, एक सौ रुपये के लिए अगर आज तुमने अपने पास का खड़ाऊं बर्बाद कर दिया, झूठे असंभव किस्म के प्रलोभनों में अगर आज तुम फंस गए, तो उम्र भर तुम्हें इसकी क़ीमत चुकानी पड़ेगी. जाति-धर्म-क्षेत्र-भाषा के जाल में फंसने जैसा महापाप अगर आज तुमने किया तो इसका प्रायश्चित तुम्हारी कई पीढ़ियों को करना पड़ेगा. इसलिए सिर्फ़ इस पाप से बचो. निकालो अपना-अपना खड़ाऊं और दे मारो उन माननीयों के मुंह पर जो आज तक तुम्हें भांति-भांति की निरर्थक बातों से बहकाते रहे हैं. मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखा कर जलालत की भेंट देते रहे हैं.  तो भाई, अब ताक क्या रहे हैं निकालिए और दे मारिए अपना खड़ाऊं-जूता-चप्पल-चट्टी … जो कुछ भी है…..पर ज़रा देख के .. ज़रा ध्यान से..  एक साथ .. एक तरफ़… ताकि असर हो. ऐसा कि ……

(दोस्तों अथातो जूता जिज्ञासा की तो यह इति है, पर मुझे पूरा विश्वास है कि जूता कथा अब शुरू होगी और उसे लिखेंगे आप…. अपने-अपने ………………..

अथातो जूता जिज्ञासा-31

ओम क्रांति: क्रांति: क्रांति: ओम

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अथातो जूता जिज्ञासा-31

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 24, 2009

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है.

आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि कोई ऐसी गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई वैसी गाली क्यों देता है. बड़े से बड़ा बखेड़ा खड़ा करने के लिए भी उसे कहीं दूर नहीं जाना पड़ता है. वह घर बैठे अपने पीसी या लैपटॉप पर ही सब कुछ कर लेता है. आम तौर पर कमेंट के बक्से में और बहुत हुआ तो एक पोस्ट मार के. कलिए ग़नीमत है, कम से कम इसकी बात दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे सौ-पचास लोगों तक जाती तो है, पहले तो बहुत बड़े-बड़े कवि और विद्वान विचारक लोग 15 बाई 18 के कमरे में ही सोफे पर बैठ के बहुत बड़ी-बड़ी गोष्ठियां कर लेते थे. घर में बैठी उनकी बीवी को पता नहीं चलता था, लेकिन पड़ोसी को पता नहीं चलता था, लेकिन 100 कॉपी छपने वाली पत्रिका में और लेखक संघ के कार्रवाई रजिस्टर में ऐतिहासिक क्रांति की ऐसी-तैसी हो चुकी होती थी. थोड़े दिनों में ऐसे ही लोग जनकवि घोषित कर दिए जाते थे. ये महान लोग घुरहू पर कविता लिखते थे और बेचारे घुरहू को कभी पता ही नहीं चल पाता था. अगर पता चल भी गया तो वह यह तो कभी समझ ही नहीं पाता था कि उसके बारे में यह जो लिखा गया है, उसका मतलब क्या है.

असल बुद्धिजीवी तो है ही वही जो ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे फ्रांस की रक्त क्रांति से लेकर बोल्शेविक और 1857 तक सब कुछ कर देता है और बच्चे के एडमिशन के लिए बिना किसी रसीद के 50 हज़ार का डोनेशन भी दे आता है. वह 30 रुपये किलो आलू भी ख़रीद लेता है, 60 रुपये किलो दाल भी ख़रीद लेता है, ट्रेन में एक बर्थ के लिए टीटीई को दो-तीन सौ रुपये एक्स्ट्रा भी दे देता है और मन मसोस कर ब्लैक में गैस का सिलिंडर भी ले लेता है. यह अलग बात है कि यह सब करते हुए वह झींकता भी रहता है. हर बार वह गाली देता है – व्यवस्था को, व्यवस्था के कर्णधारों को, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने वाली आम जनता को, यहां तक कि देश को भी. वह सबको भ्रष्ट और निकम्मा बताता है. और मामूली असुविधाओं से बचने के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक भी हुआ रहता है. वह शोषण के ख़िलाफ़ बात भी करता है और दमन को बर्दाश्त भी करता है.

असल बुद्धिजीवी वह है जो पहले परिवारवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होने की बात करता है और इसके ख़ात्मे के लिए साम्प्रदायिक ताक़तों के साथ ले लेता है. पहले वह तोप सौदे में घोटाले की बात करता है और उसके सबूत जेब में रखता है. इस वादे के साथ कि अभी नहीं, पहले प्रधानमंत्री बनाओ, तब दिखाउंगा. गोया सुबूत न हुआ, दुलहिन का मुंह हो गया कि घुंघटा तभी उठेगा…. और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सचिवालय के कब्रिस्तान से मंडल का जिन्न निकाल देता है. वह जिन्न ठहरा भारतीय जिन्न. हनुमान जी से प्रेरणा ले लेता है. लेकिन हनुमान जी तो लंका जलाए थे, वह भारत ही जलाने लगता है.

इसके बाद बुद्धिजीवियों की दूसरी जमात कमंडल उठा लेती है और घूमने लगती है पूरा देस. चिल्ला-चिल्ला के .. राम लला हम आएंगे… आदि-आदि. अरे भाई जब आना होगा आना. लेकिन नहीं वे केवल चिल्लाते हैं और रामलला के पास तो नहीं लेकिन चीखते-चीखते एक दिन सत्ता में ज़रूर पहुंच जाते हैं. लेकिन ना, तब एक बार फिर मामला गड़्बड़ा जाता है. अब परिवारवाद के बजाय सांप्रदायिक ताक़तों का उभार रोकने की ज़रूरत महसूस होने लगती है. रोकी जाती है और समर्थन की पूरी धारा बदल जाती है. देश में प्रगतिशील विचारधारा की स्थापना की जाती है उसी परिवारवाद के एक बेज़ुबान पोषक तत्व को सत्ता का मठाधीश बनाकर. जो सिर्फ़ राजकुमार के लिए राजदंड बचाए रखने के अलावा और कुछ भी नहीं करता. कोई नए तरह का नहीं, यह बिलकुल बर्बर किस्म का सामंतवाद है मित्रों. इसे पहचानिए. नागनाथ और सांपनाथ का यह खेल बन्द करना अब अनिवार्य हो गया है. और यक़ीन मानिए, यह बन्द होगा, उसी खड़ाऊं से जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी है. बशर्ते आप उसकी पवित्रता को समझें, उसकी अनिवार्यता को महसूस करें और जानें उसकी ताक़त को. उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएं जो आपको यह बता रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला है. आपको ऐसा बताने के पीछे उनका बड़ा गहरा स्वार्थ है. उन्होंने सीधे-सादे अनपढ़ और गंवार लोगों को सुला रखा है दारू या मामूली लालच के नशे में. उनके परम पवित्र और अनमोल खड़ाऊं वे ख़रीद लेते हैं सौ-पचास रुपये में और आपको सुला देते हैं आलस्य और हताश के नशे में. आपकी खड़ाऊं वे बेकार कर देते हैं आपके आलसीपने की प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाकर. वे हर वर्ग की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं. लेकिन याद रखें उनके सारे कमीनेपन की सारी ताक़त सिर्फ़ तब तक है जब तक कि आप अपने खड़ाऊं की ताक़त पहचान नहीं जाते और इसकी पवित्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते. खड़ाऊं को तो अब आप पहचान ही चुके हैं!

चरैवेति-चरैवेति…..   

अथातो जूता जिज्ञासा-30

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अथातो जूता जिज्ञासा-30

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 23, 2009

यक़ीन मानें आम जनता जो  जूता चला रही है, असल में वह जूता है ही नहीं. यह तो वह खड़ाऊं है जो भगवान राम ने दिया था भरत भाई को. भरत भाई ने यह खड़ाऊं अपने लिए नहीं लिया था, उन्होंने यह खड़ाऊं लिया था आम जनता के लिए. इसीलिए उनके समय में उस खड़ाऊं का इस्तेमाल उनके मंत्रियों, अफ़सरों और निजी सुरक्षाकर्मियों ने नहीं किया. यही वजह थी जो ख़ुद भरत राजधानी के बाहर कुटी बना कर रहते रहे और वहां से राजकाज चलाते रहे. जनता की व्याकुलता की वजह इस दौरान राम की अनुपस्थिति भले रही हो, पर शासन या व्यवस्था में किसी तरह की कोई कमी कतई नहीं थी. और सबसे बड़ी बात तो यह कि अधिकारों के उस खड़ाऊं में भरत के लिए कोई रस भी नहीं था. उनकी रुचि अगर थी तो उस ज़िम्मेदारी में जो राम की अनुपस्थिति के कारण उन पर आ पड़ी थी.

जबकि अब के शासकों की रुचि अपनी ओढ़ी हुई ज़िम्मेदारी में कभी ग़लती से भी दिख जाए तो यह एक असामान्य बात मानी जाती है. क्योंकि सामान्यतया उनकी कुल रुचि केवल उस अधिकार में है जो उन्होंने जनता को बहला-फुसला कर या डरा-धमका कर अपने ही जैसे अपने प्रतिद्वन्द्वियों से छीना है. नतीजा यह है कि आपके जनप्रिय नेताओं के बंगलों के बिजली-पानी-टेलीफोन जैसी सुविधाओं के बिल ही हर महीने लाखों में होते हैं. यह सब कहीं और से नहीं, आपकी ही जेब से आता है. हवाई सैर, अपनी ही नहीं बाल-बच्चों की अय्याशी का इंतज़ाम, पांचसितारा जीवनशैली के ख़र्चे … आदि सब आपकी ही जेब से निकलते हैं.  इस पर ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत इसलिए नहीं है क्योंकि यह सब आप जान चुके हैं.

क्या आज के राजनेता उतनी ही आसानी से खड़ाऊं लौटा देने वाले हैं, जितनी आसानी से भरत ने लौटा दिया था? भरत ने जिस खड़ाऊं को ख़ुद अपने सिर पर रखा, वह आज के राजनेताओं के गुर्गों के पैरों में है और उसका इस्तेमाल आम जनता यानी आपको रौंदने के लिए किया जा रहा है.   बहुत दिनों बाद इस बात को जनता ने समझ लिया है और इसीलिए अब वह इस खड़ाऊं के इस्तेमाल के लिए बेचैन हो उठी है. उसने देख लिया है कि अपने लिए छोड़ी गई खड़ाऊं का सदुपयोग जब तक वह स्वयं नहीं करेगी तब तक उसका प्रयोग उसके ही सिर पर होता रहेगा. कभी महंगाई के रूप में, तो कभी छोटी-छोटी रोज़मर्रा इस्तेमाल की चीज़ों की अनुपलब्धता और कभी भ्रष्टाचार के रूप में. इसीलिए अब  उसे जहां कहीं भी मौक़ा मिल रहा है और जैसे ही वह ज़रा सा भी साहस जुटा पा रही है, तुरंत खड़ाऊं उठा रही है और दे दनादन शुरू हो जा रही है, अपने परम प्रिय नेताओं पर.

लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता है बेचैनी में बड़ा जोश होता है. वह आज के इस नए जनता जनार्दन में भी साफ़ तौर पर दिखाई पड़ रहा है. अपने यहां कहावत है – बहुत जोश में लोग होश खो बैठते हैं. यह सही है कि किसी व्यक्ति पर जूता फेंकना उसके प्रति प्रबल विरोध जताने का एक प्रतीकात्मक तरीक़ा है, लेकिन अगर हमें प्रतीकात्मक विरोध ही जताना है, यानी अपनी नाराज़गी ही व्यक्त करनी है तो उसके और भी बहुत तरीक़े हैं. जूता फेंकना इसका इकलौता तरीक़ा नहीं है और न जूता इसका असली रूप ही है. अभी जगह-जगह जूते फेंकने की जो यह हड़बड़ी दिखाई दे रही है, इसकी असली वजह आपको अपने असली खड़ाऊं की सही पहचान न होना है. तो आप अपना हक़ हासिल कर सकें इसके लिए सबसे पहली ज़रूरत यह है कि आप अपने खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान करें. यह जानें कि वह खड़ाऊं कौन सा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए. सच-सच बताइए, क्या आप सचमुच जानना चाहते हैं कि वह खड़ाऊं कौन सा है, कैसा है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जाना चाहिए? तो बने रहिए इयत्ता के साथ और अपने उस परम पवित्र खड़ाऊं की ठीक-ठीक पहचान के लिए इंतज़ार करिए इस अथातो जूता जिज्ञासा की अगली कड़ी का.

अथातो जूता जिज्ञासा-29

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अथातो जूता जिज्ञासा-29

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 22, 2009

इन समानधर्माओं में सबसे पहला नाम आता है इराकी पत्रकार मुंतजिर अल ज़ैदी का, जिन्होंने ख़ुद को दुनिया सबसे ताक़तवर समझने वाले महापुरुष जॉर्ज बुश पर जूतास्त्र का इस्तेमाल किया. इसकी आवश्यकता कितने दिनों से महसूस की जा रही थी और कितने लोगों के मन में यह हसरत थी, यह बात  आप केवल इतने से ही समझ सकते हैं कि यह जूता चलते ही दुनिया भर में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. भले ही कुछ लोगों ने दिखावे के तौर पर शिष्टाचारवश इसकी भर्त्सना की हो, पर अंतर्मन उनका भी प्रसन्न हुआ. बहुत लोगों ने तो साफ़ तौर पर ख़ुशी जताई. गोया करना तो वे ख़ुद यह चाहते थे, पर कर नहीं सके. या तो उन्हें मौक़ा नहीं मिला या फिर वे इतनी हिम्मत नहीं जुटा सके. सोचिए उस जूते की जिसकी क़ीमत चलते ही हज़ारों से करोड़ों में पहुंच गई.

असल में ज़ैदी ने यह बात समझ ली थी कि अब अख़बार तोप-तलवार के मुकाबले के लिए नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़े के लिए निकाले जाते हैं. उन्होंने देख लिया था कि अख़बार में बहुत दिनों तक लिख-लिख कर, टीवी पर बहुत दिनों तक चिल्ला-चिल्ला कर बहुतेरे पत्रकार तो थक गए. मर-खप गए और कुछ नहीं हुआ. वह समझ गए थे कि कलम में अब वह ताक़त नहीं रही कि इंकलाब ला सके. इंकलाब की बात करने वाली कलमें भी अब सिर्फ़ पद-प्रतिष्ठा और पुरस्कार बनाने में लग गई हैं. कलमें अब कलमें नहीं रहीं, वे मजदूरी का औजार हो गई हैं. इससे भी नीचे गिर कर कई कलमें तो दलाली का हथियार हो गई हैं. ऐसी कलम को बहुत दिनों तक घिस-घिस कर निब और काग़ज़ बर्बाद करने से क्या फ़ायदा. तो बेहतर है कि इसकी जगह जूता ही चलाया जाए.

यह सिर्फ़ संयोग नहीं है कि उनका जूता ज़ोरदार ढंग से चल गया. असल में इस जूते ने चलते ही उन तमाम मजबूरों-मजलूमों को आवाज़ दी जो सीनियर और जूनियर दोनों बुश लोगों के ज़माने में बेतरह कुचले गए. यही वजह थी जो इस जूते ने चलते ही अपनी वो क़ीमत बनाई जो हर तरह से ऐतिहासिक थी. इतिहास में कभी कोई जूता चलने के बाद उतनी क़ीमत में नहीं बिका होगा, जितनी क़ीमत में वह जूता बिका. भगवान रामचन्द्र के उस खड़ाऊं की भी कोई प्रतिमा कहीं नहीं बनाई गई, जिसने भरत जी की जगह 14 वर्षों तक अयोध्या का राजकाज संभाला.  मैंने हाल ही में कहीं पढ़ा था कि किसी जगह उस जूते की प्रतिमा स्थापित की गई है और बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए, अगर आने वाले दिनों में उसकी पूजा शुरू कर दी जाए.

वैसे भी ऐसे जूते की पूजा क्यों न की जाए, जो बहुत बेजुबानों को आवाज़ दे और बहुत लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने. मसलन देखिए न, उस जूते ने कितने और लोगों को तो प्रेरित किया जूते ही चलाने के लिए. लन्दन में चीन के प्रधानमंत्री पर जूता चला, भारत में गृहमंत्री पर जूता चला और इसके बाद यह जूता केवल पत्रकारों तक सीमित नहीं रहा. कलम छोड़कर जूते को हथियार बनाने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं रहे. पत्रकारों के बाद पहले तो इसे उन्हीं पार्टी कार्यकर्ताओं ने अपना हथियार बनाया जो अब तक अपने-अपने नेताओं के आश्वासनों पर जीते आ रहे थे आम जनता की तरह, पर आख़िरकार महसूस कर लिया कि नेताजी के आश्वासन तो नेताजी से भी बड़े झूठ निकले. तो पहले उन्होंने जूता चलाया. फिर आम जनता, जो बेचारी बहुत दिनों से जूता चलाने का साहस बटोर रही थी, पर घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों और नाना प्रकार के दबावों के कारण वह ऐसा कर नहीं पा रही थी, उसने भी जूता उठा लिया.

जब तक पत्रकार जूता उठा रहे थे, या पार्टियों के कार्यकर्ता जूते चला रहे थे, तब तक बात और थी. लेकिन भाई अब यह जो जूता बेचारी आम जनता ने उठा लिया है, वह कोई साधारण जूता नहीं है. इस जूते के पीछे बड़े-बड़े गुन छिपे हुए हैं. इसके पीछे पूरा इतिहास है. आम जनता ने जूता उठाने के पहले जूतावादी संस्कृति का पूरा-पूरा अनुशीलन किया है. उसने जूते की बनावट, उसकी उपयोगिता और उसके धर्म को ठीक से समझा है. सही मायने में कहें तो सच तो यह है कि उसने जूता संस्कृति का सम्यक अनुशीलन किया है. तब जा कर वह इस निष्कर्ष तक पहुंची है कि भाई अब तो जूता जी को ही उठाना पड़ेगा. जनता का यह जूता वही जूता नहीं है, जो अब तक उसी पर चलता रहा है. यह जूता सत्ता के जूते से बहुत भिन्न है. और एक बात और, इस जूते के चलने का तो यह सिर्फ़ श्रीगणेश है. यह इसकी इति नहीं है. यह जूता एक न एक दिन तो चलेगा ही यह बात बहुत पहले से सुनिश्चित थी, लेकिन अब यह रुकेगा कब यह तय कर पाना अभी बहुत मुश्किल है.

आगे-आगे देखिए होता है क्या…..

अथातो जूता जिज्ञासा-28

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अथातो जूता जिज्ञासा-28

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 21, 2009

और अब बात आधुनिक भारत में जूता चिंतन की. निराला जी से थोड़े पहले उनके ही धातृ शहर इलाहाबाद में हुए एक अकबर इलाहाबादी साहब. अपने ज़माने के बहुत उम्दा शायरों में गिने जाते हैं वह और अगर क़रीने से देखा जाए तो बिलकुल आधुनिक सन्दर्भों में जूता चिंतन की शुरुआत ज़नाब अकबर इलाहाबादी साहब से ही होती है. यह अलग बात है कि उनके पूर्वजों को जूते चलाने का भी शौक़ रहा हो, पर जहां तक मैं जानता हूं, अकबर साहब के शौक़ सिर्फ़ जूते पहनने तक ही सीमित थे. उन्होंने कभी भी जूते चलाने में किसी तरह की हिस्सेदारी नहीं की. ख़ास कर जूते बनाने का शौक़ तो उनके पूर्वजों को भी नहीं था. इसके बावजूद पढ़े-लिखे लोगों के बीच जूते पर केन्द्रित उनका एक जुमला अत्यंत लोकप्रिय है. जब भी कोई ऐसी-वैसी बात होती है, भाई लोग उन्हें फट से कोट कर देते हैं. जूते पर केन्द्रित उनका शेर है :

बूट डासन ने बनाया मैंने एक मज़्मूं लिखा

मुल्क में मज़्मूं न फैला और जूता चल पड़ा.

ख़ुद मुझे भी यह शेर बेहद पसन्द है. पर इस शेर के साथ एक दिक्कत है. इस दिक्कत की वजह शायद यह है कि शिल्प के स्तर पर वह ज़रूर थोड़े-बहुत पश्चिमी मानसिकता से प्रभावित रहे होंगे. जहां साहित्य के उम्दा होने की बुनियादी शर्त उसके दुखांत होने को माना जाता है.  जहां यथार्थ के नाम पर हताशावादी स्वर ही प्रमुख है. यह आशा तक नहीं छोड़ी जाती कि शायद आगे के लोग ही कोई रास्ता निकाल सकें. शायद इसीलिए उन्हें शिक़ायत हुई जूते से. बिलकुल वैसे ही जैसे हार जाने के बाद एक नेताजी को शिक़ायत हुई जनता से. पहले तो विशुद्ध भारतीयता की बात करके सत्ता में आई उनकी पार्टी ने पांच साल तक सत्ता सुख ले लेने के बाद यह तय किया कि ये अंट-शंट टाइप के अनपढ़-देहाती कार्यकर्ताओं से पिंड छुड़ाया जाए और इनकी जगह स्मार्ट टाइप के इंग्लिश स्पीकिंग ब्रैंड मैनेजरों को लाया जाए. फिर उनकी ही सलाह पर उन्होंने एलेक्शन की कैम्पेनिंग की. यहां तक कि नारे भी उनके ही सुझावों के अनुसार बने. लेकिन चुनाव का रिज़ल्ट आने के बाद पता चला कि जनता तो फील गुड और इंडिया शाइनिंग का मतलब ही नहीं समझ सकी. तब बेचारे खिसिया कर कहे कि काम करने वाली सरकार इस देश की जनता को नहीं चाहिए.

शायद यही वजह है कि इस बार महंगाई चरम पर होने के बावजूद उनकी पार्टी ने चुनाव के दौरान एक बार भूल कर भी महंगाई का जिक्र नहीं किया. शायद उन्होंने तय कर लिया है कि आगे अगर सत्ता में आए भी तो महंगाई-वहंगाई जैसे फ़ालतू के मुद्दों पर कोई काम नहीं करेंगे. यह अलग बात है कि इसके पहले भी उन्होंने आम जनता के लिए क्या किया, यह गिना पाना ख़ुद उनके लिए ही मुश्किल है. हालांकि वह कौन है जिसने उनके राजकाज में गुड फील किया और किधर की इंडिया शाइन करते हुए दिखी, इसे आम भारतीय नहीं जानता.

वैसे भी आम भारतीय यह बात कैसे जान सकता है! बेचारा वह तो रहता है भारत में और इधर बात होती है इंडिया की. पूरी तरह भारत में ही रहने वाले और उसमें ही रचे-बसे आम आदमी को इंडिया कैसे दिखे? वैसे यह सच है कि भारत के ही किसी कोने में इंडिया भी है, पर यह जो इंडिया है उसमें मुश्किल से 20 परसेंट लोग ही रहते हैं. वही इसे जानते हैं और वही इसे समझते हैं. इस इंडिया में होने वाली जो चमक-दमक है, वह भारत वालों को बस दूर से  ही दिखाई देती है और भारत वाले इसे देखते भी बड़ी हसरत से हैं. उसके सुख भारत वालों के लिए किसी रहस्यलोक से कम नहीं हैं. ठीक इसी तरह इंडिया वालों के लिए भारत के दुख भी कोई रुचि लेने लायक चीज़ नहीं हैं. वे समझ ही नहीं पाते कि ये भूख और ग़रीबी कौन सी चीज़ हैं और बेकारी क्यों होती है. उनके लिए यह समझना लगभग असंभव है कि महंगाई से परेशान होने की ज़रूरत क्या है. भाई जो चीज़ एक साल पहले 10 रुपये की मिलती थी, वह सौ रुपये की हो गई, तो इसमें परेशान होने जैसी क्या बात है? निकालो जेब से 100 रुपये और ले लो. सबसे मुश्किल और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि भारत वालों के भेजे में यह आसान सी बात घुसती ही नहीं है.

बहरहाल, कुछ ऐसी ही दिक्कत अकबर इलाहाबादी साहब के साथ भी हुई लगती है. अब सोचिए मज़्मूं कैसे चलेगा? उसके पास कोई हाथ-पैर तो होते नहीं और चलने के लिए पैर बहुत ज़रूरी हैं. तो जब मज़्मूं के पास पैर होते ही नहीं तो वह चलेगा कैसे? तो जाहिर सी बात है कि मज़्मूं चलने के लिए लिखे ही नहीं जाते. बल्कि इसे बाद के हिन्दी के आलोचकों-कवियों ने ज़्यादा अच्छी तरह समझा. वे उसे मज़्मूं मानते ही नहीं जो चल निकले. आज हिन्दी में मज़्मूं वही माना जाता है जिस पर लोकप्रियता का आरोप न लगाया जा सके. इस आरोप से किसी भी मज़्मूं को बचाने की शर्त यह है कि उसे ऐसे लिखा जाए कि वह किसी की समझ में ही न आ सके. इसके बावजूद यह ध्यान भी रखा जाता है कि कोई यह न कह सके कि भाई आपका तो मज़्मूं जो है, वो अपंग है. तो इसके लिए मज़्मूं को ये कवि-लेखक-आलोचक लोग आपस में ही एक से दूसरे की गोद में उठाते हुए इसके चल रहे होने का थोड़ा सा भ्रम बनाए रखते हैं. वैसे ही जैसे माताएं शिशुओं को अपनी गोद में उठाए हुए ख़ुद चलती रहती हैं और मंजिल पर पहुंच जाने के बाद शिशु ये दावा कर लेते हैं कि वे चले.

इसके ठीक विपरीत जूता या अकबर साहब के शब्दों में कहें तो बूट बनाया ही जाता है चलने के लिए. आप चाहें तो यूं भी कह सकते हैं कि बूट बनाया जाता है पैरों के लिए और पैर होते हैं चलने के लिए. अब जो चीज़ पैरों का रक्षा कवच बन कर चल सकती है, वह हाथों में हो तो भी चलेगी ही. क्योंकि चलन उसकी फितरत है. एक और मार्के की बात इसमें यह भी है कि यह रक्षा उसी की करती है जिसके पास होती है. मतलब यह कि जो इसे चलाता है. यह उसकी मर्जी पर निर्भर है कि वह इसे कैसे चलाए. चाहे तो पैरों से और चाहे तो हाथों से चला ले. बस इसी बात को कालांतर में अकबर साहब के कुछ समानधर्माओं ने समझ लिया और वे शुरू हो गए.

अथातो जूता जिज्ञासा-27

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अथातो जूता जिज्ञासा-27

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 20, 2009

अब मध्यकाल से निकल कर अगर आधुनिक काल में आएं और जूतोन्मुखी रचनाधर्मिता की बात करें तो चचा ग़ालिब का नाम सबसे पहले लेने का मन करता है. एक तो सूफ़ियाना स्वभाव (तमाम तरह के दुराग्रहों को टाटा बाय-बाय वह पहले ही कह चुके थे) और दूसरे दुनियादारी की भी बेहतर समझ (ख़रीदारी कर के नहीं सिर्फ़ गज़रते हुए देखा था उन्होंने दुनिया के बाज़ार को), सच पूछिए तो दुनिया की हक़ीक़त ऐसा ही आदमी क़ायदे से जान पाता है. जूते की इस सर्वव्यापकता और सर्व शक्तिसम्पन्नता को उन्होंने बड़े क़ायदे से समझा और साथ ही  उसे शहद में भिगोने की कला भी उन्हें आती है. ऐसा लगता है कि रैदास और तुलसी द्वारा क़ायम की गई परंपरा को उन्होंने ही ठीक से समझा और इन दोनों को वह साथ लेकर आगे बढ़े. कभी-कभी तो उनके यहां सूर भी दिखाई दे जाते हैं.

यह शायद सूर का, या कि सूफ़ी संतों का ही असर है जो वह भी ख़ुदा से दोस्ती के ही क्रम को आगे बढ़ाते हैं, यह कहते हुए – या तो मुझे मस्जिद में बैठकर पीने दे, या फिर वो जगह बता जहां पर ख़ुदा न हो. और ग़ालिब भी एक को मार कर दूसरे को छोड़ने वाले छद्म धर्मनिरपेक्षतावादी नहीं हैं. वह भी अपने दूसरे पैर का जूता निकालते हैं, बिलकुल कबीर और रैदास की तरह. जब वह कहते हैं :

ईमां मुझे रोके है तो खेंचे है मुझे कुफ्र

काबा मेरे पीछे है, कलीसा मेरे आगे.

तब उनका मतलब बिलकुल साफ़ है.

दूसरे तो दूसरे, यहां तक कि वे ख़ुद को भी नहीं छोड़ते हैं. उनकी ही एक ग़ज़ल का शेर है:

बने है शह का मुसाहिब फिरे है इतराता

वगरना शहर में ग़ालिब की आबरू क्या है.

उनके बाद भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी ख़ूब जूते उछाले. ‘क्यों सखि साजन नहि अंगरेज?’ जैसे सवाल उठा कर वह ग़ुलामी की भारतीय मानसिकता पर जूते ही तो उछालते रहे हैं. सद अफ़सोस हमें ज़रा सी भी शर्म आज तक नहीं अंग्रेज तो चले गए और कहने को लोकतंत्र भी आ गया, पर आज तक हम न तो लोकतंत्र अपना सके और अंग्रेजियत से ही मुक्त हो सके. निराला ने भी बहुत जूते चलाए और वह भी चुन-चुन कर उन लोगों पर जिन पर उस वक़्त जूते चलाने की हिम्मत करना बहुत बड़ी बात थी. ‘अबे सुन बे गुलाब’ और ‘बापू यदि तुम मुर्गी खाते होते’ उनकी इसी कोटि की रचनाएं हैं. वैसे सुनते तो यह हैं कि तुलसीदास पर भी जूते चलाते थे, पर यह काम वह कोई द्वेषवश नहीं, बल्कि श्रद्धावश करते थे. मैंने सुना कि वे सचमुच के जूते तुलसी की तस्वीर पर चलाते थे. एक-दो नहीं, सैकड़ों जूते बरसा देते थे. तब तक चलाते ही रहते थे वे जूते तुलसी पर, जब तक कि ख़ुद थक कर लस्त-पस्त नहीं हो जाते थे.

एक बार किसी आलोचक ने उन्हें यह करते देख लिया तो पूछा कि ऐसा आप क्यों करते हैं. उनका शफ्फाक जवाब था- भाई इसने कुछ छोड़ा ही नहीं हमारे लिखने के लिए. अब हम लिखें क्या?  हालांकि उन्होंने हिंदी साहित्य को ऐसा बहुत कुछ दिया जिसके लिए हिन्दी साहित्य ख़ुद को ऋणी मानता रहे, पर वे उम्र भर यही मानते रहे कि उनका अवदान तुलसी के सामने धेले का भी नहीं है. अब सोचता हूं तो मुझे लगता है कि निराला जूतेबाज चाहे जितने भी बड़े रहे हों, पर कवि वे निश्चित रूप से बहुत छोटे रहे होंगे. क्योंकि आजकल कई तो ऐसे कवि ख़ुद को तुलसी क्या वाल्मीकि से भी बड़ा रचनाकार मानते हैं, जिन्होंने अभी कुल तीन-चार दिन पहले ही लिखना शुरू किया है. मुझे लगता है कि निराला जी को ज़रूर सीख लेनी चाहिए थी भारत के ऐसे होनहार कवियों से.

थका भी हूं अभी मै नहीं….

अथातो जूता जिज्ञासा-26

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अथातो जूता जिज्ञासा-26

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 19, 2009

यह तो आप जानते ही हैं कि भरत भाई ने भगवान राम की पनही यानी कि खड़ाऊं यहीं मांग ली थी. यह कह कर आपके नाम पर ही राजकाज चलाएंगे. भगवान राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊं उतार के दे दी और फिर पूछा तक नहीं कि भाई भरत क्या कर रहे हो तुम मेरे खड़ाऊं का? अगर वह आज के ज़माने के लोकतांत्रिक सम्राट होते तो ज़रा सोचिए कि क्या वे कभी ऐसा कर सकते थे? नहीं न! तब तो वे ऐसा करते कि अपने जब चलते वन के लिए तभी अपने किसी भरोसेमन्द अफ़सर या पार्टी कार्यकर्ता को प्रधानमंत्री बना देते. छांट-छूंट के किसी ऐसे अफ़सर को जो ख़ुद को कभी इस लायक ही नहीं समझता कि वह देश चलाए. आख़िर तक यही कहता रहता कि भाई देखो! देश चलाने का मौक़ा मेरे हाथ लगा तो यह साहब की कृपा है.

वह निरंतर महाराज और युवराज के प्रति वफ़ादार अफ़सर की तरह सरकार और राजकाज चलाता रहता. अगर कभी विपक्ष या देशी-विदेशी मीडिया का दबाव पड़्ता तो वनवासी साहब के निर्देशानुसार कह देता कि भाई देखो! ऐसा कुछ नहीं है कि मैं कठपुतली हूं. बस तुम यह जान लो कि मैं सरकार अपने ढंग से चला रहा हूं और अपनी मर्ज़ी से भी. यह अलग बात है कि किसी भी मौक़े पर वह सम्राट और युवराज के प्रति अपनी वफ़ादारी जताने से चूकता भी नहीं. क्योंकि यह तो उसे मालूम ही होता कि खड़ाऊं उसके पैर में नहीं, सिर पर है और उसकी चाभी उसके पास नहीं बल्कि साहब के पास है. इसके बाद  जैसे ही उसे आदेश मिलता प्रधानमंत्री की कुर्सी ख़ाली करके चल देता एक किनारे. क्योंकि यह तो उसे पता ही है – साहब से सब होत है, बन्दे ते कछु नाहिं. साहब जब चाहेंगे उसे किसी संस्थान का चेयरमैन बना देंगे और उसके खाने-पीने और रुतबे का जुगाड़ बना रहेगा ऐसे ही.

पर भगवान राम चूक गए. उन्होने राजकाज एक योग्य व्यक्ति को सौंप दिया और वह भी पूरे 14 साल के लिए. नतीजा क्या हुआ? इसके बाद पूरे 14 साल तक  वह सिर्फ राजसत्ता ही नहीं, खड़ाऊं से भी वंचित रहे. नतीजा क्या हुआ कि बेचारे भूल ही गए खड़ाऊं का उपयोग तक करना. 14 साल के वनवास के बाद जब वह दुबारा अयोध्या लौटे और भरत भाई ने पूरी ईमानदारी से उन्हें उनका राजकाज लौटाया तो वह एकदम आम जनता जैसा ही व्यवहार करते नज़र आए. तो बेचारे मिलने के बाद भी झेल नहीं पाए राजदंड और आख़िरकार फिरसे उसे हनुमान जी सौंप कर चलते बने. बोल दिया कि भाई देखो, अब यह सब तुम्हीं संभालो. अपने राम तो चले.

पर हनुमान जी भला कबके खड़ाऊं पहनने और इस्तेमाल करने वाले. इस पेड़ से उस पेड़ तक, और भारत से श्रीलंका तक सीधे उछल-कूद जाने वाले को खड़ाऊं की क्या ज़रूरत? तो वे तो जितने दिन चला सके मुगदड़ से राजकाज चलाते रहे. खड़ाऊं का तो उन्होंने इस्तेमाल ही नहीं किया. उसी खड़ाऊं पर इस घोर कलिकाल में नज़र पड़ी लोकतंत्र के कुछ सम्राटों की तो उन्होंने तुरंत आन्दोलन खड़ा कर दिया. आगे की तो कहानी आप जानते ही हैं.

आज मैं सोचता हूं तो लगता है कि अगर भगवान ने अपनी खड़ाऊं न दी होती और उसके इस्तेमाल के वह आदी बने रहे होते तो क्या यह दिन हमें यानी कि भारत की आम जनता को देखने पड़ते? बिलकुल नहीं. अब भगवान राम तो हुए त्रेता में और इसके बाद आया द्वापर. द्वापर में हुआ महाभारत और वह किस कारण से हुआ वह भी जानते ही हैं. ग़ौर करिएगा कि महाभारत के दौरान भी जो सबसे बड़े योद्धा जी थे, श्रीमान अर्जुन जी, वह जूतवे नहीं उठा रहे थे. युद्ध के मैदान में जाके लग सबको पहचानने कि वह रहे हमारे चाचाजी, वह मौसा जी, वह मामा जी और वह दादा जी. अब बताइए हम कैसे और किसके ऊपर जूता चलाएं. तब सारथी भगवान कृष्ण को उनके ऊपर ज्ञान का जूता चलाना पड़ा. बताना पड़ा कि देखो ये तो सब पहले से ही मरे हुए हैं. तुम कौन होते हो मारने वाले. मारने और बनाने वाला तो कोई दूसरा है. वो तो सामने आता ही नहीं है, और सब मर जाते हैं. पार्टी हाईकमान की तरह. तुमको तो सिर्फ़ जूता हाथ में उठाना ही है. बाक़ी इनका टर्म तो पहले ही बीत चुका है. तब जाके उन्होने जूता उठाया और युद्ध जीता.

लेकिन सद अफ़सोस कि वह भी अच्छे जूतेबाज नहीं थे. उनका जूता भी बहुत दिन चल नही पाया. थोड़े ही दिनों भी वह भी भाग गए हिमालय. इसलिए कलियुग में फिर चाणक्य महराज को बनाना पड़ा एक जूतेबाज चन्द्रगुप्त. चन्द्रगुप्त ने टक्कर लिया कई लोगों से उसी जूते के दम पर चला दिया अपना सिक्का. जब तक उनका जूता चला तब तक देश में थोड़ा अमन-चैन रहा. बन्द हुआ तो फिर जयचन्द जैसे लोग आ गए और विदेश से बुला-बुला के आक्रांता ले आए. चलता रहा संघर्ष. आख़िरकार जब पब्लिक और राजपरिवारों सब पर अंग्रेजों का जूता चलने लगा तो मजबूरन फिर कुछ लोगों को जूता उठाना पड़ा. तब जाके देश स्वतंत्र हुआ. इस तरह अगर देखा जाए तो पूरा इतिहास किसका है भाई? विचारों का? ना. आविष्कारों का? ना. नीति का? ना. धर्म का? ना. आपके ही क्या, दुनिया के पूरे के पूरे इतिहास पर छाया हुआ है सिर्फ़ जूता. अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाए कि इतिहास तो जूते से लिखा गया है. यक़ीन न हो देख लीजिए, आज भी जिसके हाथ में सत्ता का जूता होता है, वह जैसे चाहता है वैसे इतिहास को मोड़ लेता है. जब चाहता है किताबें और किताबों के सारे तथ्य बदल देता है. वह जब चाहता है राम के होने से इनकार कर देता है और जब चाहे हर्षद मेहता को महान बता सकता है. वह जब तक चाहे जॉर्ज पंचम के प्रशस्ति गान का गायन पूरे देश से पूरे सम्मान के साथ करवाता रहे और अंग्रेजी को हिन्दुस्तान के राजकाज की भाषा बनाए रखे.

अथातो जूता जिज्ञासा-25

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