Aharbinger's Weblog

Just another WordPress.com weblog

अलग- अलग उम्र की अलग-अलग लड़कियों की टोलियां

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 2, 2009

कुछ समय है लिख सकता हूं…दिमाग का घोड़ा दौड़ रहा..शोले के गब्बर सिंह के घोड़े की तरह…वेसे वसंती के घोड़े के नाम धन्नु था..घोड़ों ने इनसान को गति प्रदान की है…इनसान को हवा से बात करने की अदा है…मशीनी युग आज भी होर्स पावर जैसे शब्दे मेजरमेंट के इकाई बने हुये हैं।
नगालैंड की घाटियों से निकल कर शहर में पटका खाने के बाद सबकुछ जुदा -जुदा सा लग रहा था…कमरे में बंद होकर पंखा की हवा खाने से शरीर में शरीर में अकड़ने होती थी…और लोटने के लिये कहीं मिट्टी का टिला भी नहीं था…नगालैंड में लकड़ी के मकान में रहता था…वह मकान जमीन से पांच फीट ऊपर था…लकड़ी के मोटे-मोटे पाये पर खड़ा था…और अक्सर जंगली सुअर रात बिताते थे…उनकी गुर्राहट को सुनते हुये सोने की आदत थी…पहाड़ी जिंदगी बैखौफ होती है, जबकि मैदानी इलाके के गली मोहल्लों में चिपचिपाहटत होती है..हर स्तर पर।
शाम को दरबे से निकल कर छत पर जाने की इजाजत थी…एक ही मकान में पच्चीस तीस परिवार रहते थे…वह मकान उस मोहल्ले के जमींदार का था…एक बदरंग शरीर वाला मुंशी सभी लोगों से हर महीने किराय वसुलने आता था, एक उबड़ खाबड़ साइकिल से।शाम को विभिन्न तरह के दो पाये छत पर या तो मंडलियों में बैठते थे या फिर छत पर टहलते हुये इधर उधर की बातें किया कहते थे…कपड़े उठाते, गेंहूं बटोरते, आम के बुआम को फेरते हुये महिलायें भी एक दूसरे में मजे लेते हुये छत पर इधर उधर दौड़ती रहती थी…अलग- अलग उम्र की अलग-अलग लड़कियों की टोलियां अपने अपने तरीके से व्यस्त रहती थी…छोटी छोकरियां कित कित खेलती थी, जबकि बड़ी छोकरियां छुआ छुत….और उनसे भी बड़ी छोकरियां ग्रुप में बैठकर अंतराक्षी के नाम पर अपने सुरीले सुर का जादू बिखेरती रहती थी…सबकुछ एक नया टेस्ट जैसा था….एक रक्षात्मक दूरी बनाकर सबकुछ को समझने की कोशिश कर रहा था…यह नागालैंड की घाटियों में खेले गये युद्ध के संस्कार से ओतप्रोत था…कहीं भी रहो तो लोगों से सुराक्षत्मक दूरी बनाकर रहो…जंग का पहला पाठ यही है….नगालैंड की घाटियों में सैनिकों की टोलियों से अक्सर मुलाकात होती थी….सैनिकों की एक टुकड़ी तो मेरे गर के बगल में ही डेरा डाले हुये थी…एक मुछैल सैनिक मुझे अक्सर अपनी पीठ की सवारी करता था…और मेरे हाथ में हथियार थमा देता था….खेल खेल में उन हथियारों से मैं उस पर निशाना साधता था….और जोर जोर से हंसता था…कभी कभी अपने मन मुताबिक काम भी ले लेता था…जैसे अपने हाकिम की गाड़ी उसे पसंद नहीं थी…मेरी हाथ में पत्थर थमा कर बोला था…उस गाड़ी की सारी लाइटें तोड़ डालों….और मैंने पलक झपते ही तोड़ दिये थे….शहर में रंग बिरंगे लोगों की यह नई बस्ती में तत्काल दीवानगी तक पहुंचाने वाली कोई बात नहीं थी….सबकुछ पीचपीचा था…..मुझे तो घाटियों में खोने का चस्का था…जिंदा पत्थरों को आपस में टकरा कर उनसे छिटकरने वाली चिंगारी को देखने और उसके बारुदी गंधों को नथूने में खींचने की आदत थी…वाकई में वह एक नशा था….और चिलम से लेकर ठर्रा और देसी विदेशी दारू गटने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उस नशे की बराबरी करना तो दूर ….ये सारे नशे उससे मीलों दूर हैं…बहरहाल, शहर की पटरी पर अपनी जिंदगी को बैठाने की नई जरूरत थी, और उस विषय में फिलासफिकाना तरीके से सोंच पाना भी मेरे लिये असंभव था….इंसान के अंदर सबसे महत्वपूर्ण चीज है उसका इंस्टिंक्ट…..और हर हर स्थान पर यही उसके साथ रहता है….दुनिया में सभी शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य इसी इंस्टिंक्ट को निखारना होना चाहिये….अक्षरों की पहचान और समय के साथ शब्दों के साथ इसकी समग्रता को समझना या समझाना तो अभ्यास का खेल है…यह मैकेनिज्म है….जिंदगी को ठोक-पीटकर चलाने के लिए बहुत सारे मैकेनिज्म का इजाद किया गया है, लेकिन जिंदगी तो अपना डग अपने स्टाइल से भरती है…नई जगह बचपन के लिए अक्सर असहज होती है…नये लोगों के साथ आप नये समीकरण में आते हैं…और इस समीकरण में आपका स्थान आपके इंस्टिक्ट से बनता है…उस वक्त आप दुनिया के सारे ज्ञान से अनभिज्ञ होते हैं…किताबी ज्ञान की तो बात ही छोड़ दिये दीजिये….वोदका में गड़गच्च होने के बाद कोनवालोव गोर्की को किताबें पढ़ते हुये देखकर बकबकाता था…अबे कीताबी कीड़े….तुम्हे प्रेम पत्र लिखना नहीं आता….नया मुहल्ला अपने आप में कुख्यात था…राज्य के सचिवालय के पीछे होने के बावजूद रात आठ बजे के बाद इस मुहल्ले में कोई भी रिक्शा वाला आने के लिए तैयार नहीं होता था…उनकी दिनभर की कमाई भी जाती थी और छूड़े लगने की भी पूरी गुंजाईश होती थी…बच्चों से लेकर बुढ़ों तक के गलेफड़े लड़ने झगड़ने के लिये फड़फड़ाते थे…उस मकान के नीचे एक भुआ वाली बुढ़िया थी…चूंकि उस मकान के पास एक पेड़ था और पेड़ पर जाड़े के दिनों में भुओं का अड्डा बन जाता था, वह पेड़ भुआ वाली बुढ़िया के जमीन के सामने था, इसलिये लोग उसे भुआ वाली बुढ़िया कहते थे…आर्शिवाद और गालियां उसके जुबान पर होती थी….नब्बे प्रतिशत गालियां और 10 प्रतिशत आर्शिवाद…कोठी का अंदर का माहौल और गली के माहौल बेसूरे संगीत से जुड़े हुये थे…अरे नटूरा वाला….इ साला चरेनिया के बेटवा…वहां के छोटे छोटे लौंडे इसी अंदाज में एक दूसरे को संबोंधित करते थे….सड़क पर पड़ी हुई सिगरेट के टुट्टियों को पीते थे….और एक दूसरे पर भूंकते और गुर्राते थे…वे लोग कुत्तों की तरह झुंड में हमला करते थे, और वो भी नियोजित तरीके से…पहली टक्कर पोसना से हुई…दर्जी की औलाद था…और बच्चों के उस गिरोह का खतरनाक लड़का समझा जाता था…उसके बारे में सब यही कहते थे कि चमरचीठ था…जिसको पकड़ लेता था उसे छोड़ता नहीं था..लंबे समय तक घर्षण करते हुये थका कर अपने सामने को पटकता था….मैं किचकिची गली से शाम के समय गुजर रहा था, पीछे से उसने एक लाता मारा…नगालैंड की घाटी में जैसे भेड़िये बच्चों पर टूटते थे, और बच्चे भेड़ियों से भिड़ते वैसे ही मैं उस से भिड़ गया…अपने दांतों और नाखूनों का उस पर खतरनाक तरीके से इस्तेमाल किया…उसके चिथड़े मेरे नाखूनों में थे…25-30 बच्चों की एक पूरी टोली मुझपर टूट पड़ी थी…
—जारी है
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: