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बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 4, 2009

प्रेम का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि हिंसा एक सहज प्रवृति है…आपके अंदर दौड़ रही होती है, खून में। लियो तोलोस्तोव कहता है, इनसान के नसों से खून निकाल कर पानी भर दो, फिर युद्ध नहीं होंगे। सभी जीव जंतुओं में हिंसा जनन और प्रजनन का आधार है। दुनियाभर के तमाम धर्मग्रंथों की रचना मानव के अंदर व्याप्त इसी मौलिक प्रवृति की रोकथाम करने के लिए की गई है। यही कारण है कि दुनिया के तमाम धर्म ग्रन्थ शांति के उपदेशों से भरे हैं, और उनमें शांति बनाये रखने की बात कही गई है। शांति एक परिकल्पना है जबकि हिंसा प्रवृति है।
इसके बावजूद शांति के गीतों के बीच हिंसा का राग अलापने वाले महानयक चमकते हुये दिखते हैं, चाहे वह सिकन्दर हो, नेपोलियन हो, चंगेज खान हो,सम्राट अशोक हो, या फिर फ्यूरर। ये लोग इतिहास की छाती पर मजबूती से पांव रखे हुये नजर आते हैं, और उस वक्त तमाम धर्मग्रन्थ प्रलाप की मुद्रा में दिखते हैं। मजे की बात है कि सामुहिक रूप से हिंसा का काफिला शांति शांति करते हुये आगे बढ़ता है।
उस पेंटर लौंडिया को मेरी आंखों में हिंसा दिखाई देता था, जबकि उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में मैं डूबता जाता था। उसके मुंह से निकलने वाली बदबू के कारण मैं हमेशा उससे दूरी बनाये रखता था। वह चाहती थी कि मैं अपना सिर उसके गोद में रख कर उससे बाते करूं, लेकिन मुझे डर लगता था कि बातों के दौरान वह अपना मुंह मरे मुंह में घुसेड़ देगी…और उसकी मुंह की बदबू को झेलने के लिये मैं तैयार नहीं था। उसके ब्लंटकट बाल में उंगलियां फिराने की मेरी खूब इच्छा होती थी, लेकिन वह अपने बालों को छूने भी नहीं देती थी, उसे हमेशा खराब होने का डर सताता रहता था। वह गिटार सीखने जाती थी और दावा करती थी कि वह एक अच्छी पेंटर भी है।
उन दिनों मैं फ्यूरर के मीन कैफ में डूबा हुआ था। मीन कैफ का कवर पेज दिखाते हुये मैंने उससे कहा, क्या तुम हिटलर की इस तस्वीर को बना सकती हो ? दो मिनट तक वह उस तस्वीर को निहारती रही और फिर बोली, कोशिश करती हूं। यह किताब मुझे दे दो।
मैंने कहा, किताब नहीं, ऊपर का कवर पेज ले जाओ। तुम्हे तस्वीर बनानी है, न कि किताब पढ़नी है।
कुछ लोग ब्लौग पर लिखने वालों को लेकर हायतौब क्यों मचा रहे हैं….ब्लाग एक माध्यम है, अभिव्यक्ति का और उन सभी तत्वों को अपने आप में सम्मिलित किये हुये है, जिनका विकास सभ्यता के साथ होता आया है और होता रहेगा। अब यह प्रयोग से आगे निकल चुका है। इसका विस्तार गांवों में बिजली के साथ तेजी से होगा और हो रहा है ।
विकास का पैमाना यह होना चाहिये कि देश का अंतिम आदमी तक ब्लौगियर हो जाये….इसके लिये जरूरी शर्त है शिक्षा और बिजली।
बहरहाल, वह लौंडिया करीब ढेर महीने तक मुझे दिखाई भी नहीं दी…पता नहीं किस बिल में घुस गई थी। उसके मुंह से निकलने वाले दुर्गन्ध को याद करते हुये, अपने आप को मैं उसकी तरफ से डिस्ट्रैक्ट करने की कोशिश कर रहा था। जब किसी चीज को आप दिमाग से झटकते है तो वह आपको उतना ही अधिक परेशान करती है और वह आप पर बुरी तरह से हावी होते जाती है।
ढेर महीना बाद जब वह आई तो उसके हाथ में बड़े से पेपर में लिपटा हुआ कोई सामान था। उसने मुझे सामान को खोलने के लिए कहा। पेपर हटाते ही, मैं मंत्रमुग्ध रह गया….कैनवास पर हिटलर को उसने अदभुत तरीके से उतारा था…बियांड इमैजिनेशन…अपने दोनों हाथ उसके ब्लंट कट बाल में डाले और उसके होठों को चूम लिया, और वह हक्की बक्की होकर मुझे देख रही थी। स्वास्तिक के निशान पर नजर पड़ते ही, मेरी भौंवे तन गई, वह बेहूदा तरीके से बना हुआ था।
मेरे मुंह से निकला, अबे उल्लू की दूम, इस चिन्ह को भी ठीक से बनाना था…
उसने कहा, एक नहीं दो बनाई हूं…ये मैं ले जाती हूं…वो वाली दे दूंगी…मेरे पापा के एक दोस्त इसे मांग रहे थे।
मैंने कहा, इसे रहने दे, तुम्हारा भरोसा नहीं, तुम किसी को भी दे सकती हो।
किसी कहानी का क्लामेक्स कहां होता है ? क्या बिना क्लामेक्स की कहानी लिखी जा सकती है ? एक कहानी में कौन-कौन से तत्व होने चाहिये….?? कहानी और रिपोर्टिंग के ग्रामर को पूंछ पटककर पीटना चाहिये…ब्लाग आपको वहां तक छोड़ती है…या छोड़ता है (चाहे जो लिंग रख ले)…जहां तक आप जाना चाहते हैं। नेट की दुनिया लोगों को दिल और दिमाग से जोड़ रही है, वो वो भी ट्रांसनेशनल स्तर पर। मैं इसके लिग को लेकर खुद कन्फ्यूज हूं कि ब्लौग अच्छी है या ब्लौग अच्छा है। कोई मेरा यह कन्फ्यूजन कोई दूर करे, मेरे साथ साथ ब्लौग की दुनिया भी समृद्ध होगी, जिसके जो मन में कहता रहे…ब्लौग रिवोल्यूशन जिंदाबाद !!!!!!!!!!!!!!
इसने खोखले शब्दों का कलात्मक प्रयोग करने वाले संपादकों की चड्डी गिली कर दी है, कुछ तो बात होगी !! लिखने वाले काफिले में शामिल लोगों को संपादकों के सामने जलील नहीं होने दे रहा है, बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही है…यही तो अभिव्यक्ति की क्रांति का चरमोत्कर्ष है… ब्लाग रिवोल्यूशन को तो क्रांति भरी गीतों और संगीतो से सजाने की जरूरत है….दुल्हन चली, पहन चली तीन रंग की चोली…कुछ और गीत बने तो और बेहतर….धंधई से दूर लिखने और सोचने के कुछ नये नारे भी उछले…
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5 Responses to “बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही”

  1. विकास का पैमाना यह होना चाहिये कि देश का अंतिम आदमी तक ब्लौगियर हो जाये….इसके लिये जरूरी शर्त है शिक्षा और बिजली। बिलकुल सही. लेकिन छूटकर लिखना कई बार लेखन को दिशाहीन कर देता है. उससे बचने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

  2. मेरा भी सवाल यही है ?

  3. बिलकुल सही लिखा, भारत के सारे नेता ब्लॊगियर हो जाये, देश मै घटोलो की संख्या आधी रह जयेगी, ओर इन्हे टिपण्णीयो की बिमारी लगा दो तो इन के पास समय ही नही होगा , हेरा फ़ेरी करने के लिये… फ़िर देश खुब तर्क्की करेगा…….बहुत सुंदर लिखा.धन्यवाद

  4. Anonymous said

    १)”प्रेम का पाठ पढ़ाया जाता है, जबकि हिंसा एक सहज प्रवृति है…सभी जीव जंतुओं में हिंसा जनन और प्रजनन का आधार है। ,,,दुनियाभर के तमाम धर्मग्रंथों की रचना मानव के अंदर व्याप्त इसी मौलिक प्रवृति की रोकथाम करने के लिए की गई है”बस इसी के चलते तो हम जानवर इतने विकसित हुए और मनुष्य कहलाने लगे . यही बात तो है जो मनुष्यों को जानवरों से अलग करती रही है वरना हम भी जंगलों में खुलकर प्रजनन और वर्चस्व की नग्न हिंसा में लगे रहते . २)”इसने खोखले शब्दों का कलात्मक प्रयोग करने वाले संपादकों की चड्डी गिली कर दी है, कुछ तो बात होगी !! लिखने वाले काफिले में शामिल लोगों को संपादकों के सामने जलील नहीं होने दे रहा है, बेबाक लेखनी दावपेच का शिकार नहीं हो रही है…यही तो अभिव्यक्ति की क्रांति का चरमोत्कर्ष है… ब्लाग रिवोल्यूशन को तो क्रांति भरी गीतों और संगीतो से सजाने की जरूरत है….दुल्हन चली, पहन चली तीन रंग की चोली…कुछ और गीत बने तो और बेहतर….धंधई से दूर लिखने और सोचने के कुछ नये नारे भी उछले…”सचमुच खबरे बनाने वाले देशी-विदेशी मुनाफाखोरों ने चौथे खम्भे में भी घुन लगाना शुरू कर दिया है ,अब हमारा लोकतंत्र बस एकमात्र सुप्रीम-कोर्ट नुमा थेथर की छड़ी के सहारे टिका है .ये गया तो …ब्लॉग पर कुछ भी अधपका भले मिले पर ख़बरों की redlight एरिया सा आत्म्विक्रय नहीं है . जी नून-भात और खेसारी के दाल खाने वाली स्वेदित जनता को ब्लॉग से जोड़ना और फुर्सत निकलवाना कठिन चुनौती है पर इस दुनिया में असंभव नाम की चीज़ तो कुछ होती ही नहीं.

  5. इस बिना क्लाइमेक्स की कहानी में हमें कुछ शानदार ज्ञान सूत्र भी हाथ लगा गए जैसे की मसलन ये….विकास का पैमाना यह होना चाहिये कि देश का अंतिम आदमी तक ब्लौगियर हो जाये….इसके लिये जरूरी शर्त है शिक्षा और बिजली।

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