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अथातो जूता जिज्ञासा-31

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on April 24, 2009

तो अब बात उस खड़ाऊं की जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी थी और जिसकी पहचान अब आप भूल गए हैं, या फिर पहचान कर भी उससे अनजान बने हुए हैं. यह भी हो सकता है कि आप उसे पहचान कर भी अनजान बने हों. इसकी एक वजह तो आपका आलस्य हो सकता है और दूसरी आपमें इच्छाशक्ति की भयावह कमी भी. अपनी इसी कमज़ोरी की वजह से आप तब वाह-वाह तो कर रहे हैं जब दूसरे लोग उल्टे-सीधे जूते परम माननीयों पर फेंक रहे हैं, लेकिन ख़ुद अपने हाथों में मौजूद खड़ाऊं का उपयोग करने से बच रहे हैं. मुझे मालूम है कि आप वह जूता भी नहीं चला सकेंगे. आख़िर आप बुद्धिजीवी हैं. बुद्धिजीवी कोई ऐसा-वैसा काम थोड़े करता है. असल बुद्धिजीवी तो सारा तूफ़ान चाय की एक प्याली में उठाता है और चाय के साथ ही उसे थमने के लिए मजबूर भी कर देता है.

आजकल तो चाय की प्याली की भी ज़रूरत नहीं है. आज का बुद्धिजीवी तो एक ब्लॉग बनाता है और ब्लॉगे पे बेमतलब का बखेड़ा खड़ा कर देता है. ब्लॉग पर ही वह ख़ुश हो लेता है और ब्लॉग पर ही नाराज हो लेता है. कभी इस बात पर तो कभी उस बात पर. कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई गाली क्यों नहीं देता है. कभी इस बात पर कि कोई ऐसी गाली क्यों देता है और कभी इस बात पर कि कोई वैसी गाली क्यों देता है. बड़े से बड़ा बखेड़ा खड़ा करने के लिए भी उसे कहीं दूर नहीं जाना पड़ता है. वह घर बैठे अपने पीसी या लैपटॉप पर ही सब कुछ कर लेता है. आम तौर पर कमेंट के बक्से में और बहुत हुआ तो एक पोस्ट मार के. कलिए ग़नीमत है, कम से कम इसकी बात दुनिया के विभिन्न कोनों में बैठे सौ-पचास लोगों तक जाती तो है, पहले तो बहुत बड़े-बड़े कवि और विद्वान विचारक लोग 15 बाई 18 के कमरे में ही सोफे पर बैठ के बहुत बड़ी-बड़ी गोष्ठियां कर लेते थे. घर में बैठी उनकी बीवी को पता नहीं चलता था, लेकिन पड़ोसी को पता नहीं चलता था, लेकिन 100 कॉपी छपने वाली पत्रिका में और लेखक संघ के कार्रवाई रजिस्टर में ऐतिहासिक क्रांति की ऐसी-तैसी हो चुकी होती थी. थोड़े दिनों में ऐसे ही लोग जनकवि घोषित कर दिए जाते थे. ये महान लोग घुरहू पर कविता लिखते थे और बेचारे घुरहू को कभी पता ही नहीं चल पाता था. अगर पता चल भी गया तो वह यह तो कभी समझ ही नहीं पाता था कि उसके बारे में यह जो लिखा गया है, उसका मतलब क्या है.

असल बुद्धिजीवी तो है ही वही जो ड्राइंग रूम में बैठे-बैठे फ्रांस की रक्त क्रांति से लेकर बोल्शेविक और 1857 तक सब कुछ कर देता है और बच्चे के एडमिशन के लिए बिना किसी रसीद के 50 हज़ार का डोनेशन भी दे आता है. वह 30 रुपये किलो आलू भी ख़रीद लेता है, 60 रुपये किलो दाल भी ख़रीद लेता है, ट्रेन में एक बर्थ के लिए टीटीई को दो-तीन सौ रुपये एक्स्ट्रा भी दे देता है और मन मसोस कर ब्लैक में गैस का सिलिंडर भी ले लेता है. यह अलग बात है कि यह सब करते हुए वह झींकता भी रहता है. हर बार वह गाली देता है – व्यवस्था को, व्यवस्था के कर्णधारों को, भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने वाली आम जनता को, यहां तक कि देश को भी. वह सबको भ्रष्ट और निकम्मा बताता है. और मामूली असुविधाओं से बचने के लिए भ्रष्टाचार के सामने नतमस्तक भी हुआ रहता है. वह शोषण के ख़िलाफ़ बात भी करता है और दमन को बर्दाश्त भी करता है.

असल बुद्धिजीवी वह है जो पहले परिवारवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होने की बात करता है और इसके ख़ात्मे के लिए साम्प्रदायिक ताक़तों के साथ ले लेता है. पहले वह तोप सौदे में घोटाले की बात करता है और उसके सबूत जेब में रखता है. इस वादे के साथ कि अभी नहीं, पहले प्रधानमंत्री बनाओ, तब दिखाउंगा. गोया सुबूत न हुआ, दुलहिन का मुंह हो गया कि घुंघटा तभी उठेगा…. और प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सचिवालय के कब्रिस्तान से मंडल का जिन्न निकाल देता है. वह जिन्न ठहरा भारतीय जिन्न. हनुमान जी से प्रेरणा ले लेता है. लेकिन हनुमान जी तो लंका जलाए थे, वह भारत ही जलाने लगता है.

इसके बाद बुद्धिजीवियों की दूसरी जमात कमंडल उठा लेती है और घूमने लगती है पूरा देस. चिल्ला-चिल्ला के .. राम लला हम आएंगे… आदि-आदि. अरे भाई जब आना होगा आना. लेकिन नहीं वे केवल चिल्लाते हैं और रामलला के पास तो नहीं लेकिन चीखते-चीखते एक दिन सत्ता में ज़रूर पहुंच जाते हैं. लेकिन ना, तब एक बार फिर मामला गड़्बड़ा जाता है. अब परिवारवाद के बजाय सांप्रदायिक ताक़तों का उभार रोकने की ज़रूरत महसूस होने लगती है. रोकी जाती है और समर्थन की पूरी धारा बदल जाती है. देश में प्रगतिशील विचारधारा की स्थापना की जाती है उसी परिवारवाद के एक बेज़ुबान पोषक तत्व को सत्ता का मठाधीश बनाकर. जो सिर्फ़ राजकुमार के लिए राजदंड बचाए रखने के अलावा और कुछ भी नहीं करता. कोई नए तरह का नहीं, यह बिलकुल बर्बर किस्म का सामंतवाद है मित्रों. इसे पहचानिए. नागनाथ और सांपनाथ का यह खेल बन्द करना अब अनिवार्य हो गया है. और यक़ीन मानिए, यह बन्द होगा, उसी खड़ाऊं से जो भगवान राम ने आपके लिए छोड़ी है. बशर्ते आप उसकी पवित्रता को समझें, उसकी अनिवार्यता को महसूस करें और जानें उसकी ताक़त को. उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के बहकावे में न आएं जो आपको यह बता रहे हैं कि इससे कुछ नहीं होने वाला है. आपको ऐसा बताने के पीछे उनका बड़ा गहरा स्वार्थ है. उन्होंने सीधे-सादे अनपढ़ और गंवार लोगों को सुला रखा है दारू या मामूली लालच के नशे में. उनके परम पवित्र और अनमोल खड़ाऊं वे ख़रीद लेते हैं सौ-पचास रुपये में और आपको सुला देते हैं आलस्य और हताश के नशे में. आपकी खड़ाऊं वे बेकार कर देते हैं आपके आलसीपने की प्रवृत्ति का फ़ायदा उठाकर. वे हर वर्ग की कमज़ोरियों का फ़ायदा उठाते हैं और अपना उल्लू सीधा करते हैं. लेकिन याद रखें उनके सारे कमीनेपन की सारी ताक़त सिर्फ़ तब तक है जब तक कि आप अपने खड़ाऊं की ताक़त पहचान नहीं जाते और इसकी पवित्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते. खड़ाऊं को तो अब आप पहचान ही चुके हैं!

चरैवेति-चरैवेति…..   

अथातो जूता जिज्ञासा-30

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10 Responses to “अथातो जूता जिज्ञासा-31”

  1. ऐसे बुद्धिजीवियों के सर पर ही तो खन्दौउ बजनी चाहिए तभी इनके बुद्धि की बत्ती जलेगी ,इस देश का सत्यानाश इन्ही तथाकथित बुध्ही जीवियों के द्वारा अधिक हुआ है

  2. सुस्वागतम!!जूता पुराण जिन्दाबाद।अब तो जूता ही चेतना जगायेगा।

  3. भाई, मैंने सात समंदर पार वालों के हाथों अपनी गैरत बेचकर और सभी जाने-पहचाने लोगों को धोखे में रखकर एक इंर्पोटेड खड़ाऊं खरीदी है। अब आप बताइये कि इसे पहनूं, दिखाऊं, इतराऊं या गुलेता बनाऊं? हम तो असुविधा के आदि थे, सदियों-सदियों से असुविधा में रहते आये थे, हम इतने आरामपोश हुए तो कैसे ?

  4. असल बुद्धिजीवी तो वही हैं…नाक पर चश्मा चढ़ाते इस्तीफा देते फिरते थे….मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा…वित्तमंत्री पद से इस्तीफा…रक्षामंत्री पद से इस्तीफा…प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा…कुछ दिन और रहते तो इस्तीफा मंत्री के पद से इस्तीफा दे डालते. उनके जितना बड़ा बुद्धिजीवी मिलना बहुत मुश्किल है. कुछ स्ट्रगलर बुद्धिजीवी सुबह-सुबह उठकर उनकी तस्वीर को प्रणाम करते है.आज होते तो चुनावों के बाद **पहुंचा पिसान लगाने पहुँच जाते. कोई न भी बुलाता तो भी पहुँच जाते. अनशन वगैरह जैसे कर्मों को नया आयाम दे रहे होते. अरुंधती राय को लीची और मेधा पाटकर को आम दे रहे होते. खडाऊं का उपयोग उनके समय से ही शुरू हो जाना चाहिए था. लेकिन कोई बात नहीं. कहेन कबीर जाइ द बहीजबसे चेता तबसे सही **पंहुचा पिसान का मतलब मेल से भेज देंगे. बहुत एक्सप्लेन करना पड़ेगा.

  5. जूता पुराण की जय हो।———-TSALIIM. -SBAI-

  6. जारी रखिये सर जी इस आनंद दायक अथातो जूता जिज्ञासा को .

  7. नमस्कार, इसे आप हमारी टिप्पणी समझें या फिर स्वार्थ। यह एक रचनात्मक ब्लाग शब्दकार के लिए किया जा रहा प्रचार है। इस बहाने आपकी लेखन क्षमता से भी परिचित हो सके। हम आपसे आशा करते हैं कि आप इस बात को अन्यथा नहीं लेंगे कि हमने आपकी पोस्ट पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की। आपसे अनुरोध है कि आप एक बार रचनात्मक ब्लाग शब्दकार को देखे। यदि आपको ऐसा लगे कि इस ब्लाग में अपनी रचनायें प्रकाशित कर सहयोग प्रदान करना चाहिए तो आप अवश्य ही रचनायें प्रेषित करें। आपके ऐसा करने से हमें असीम प्रसन्नता होगी तथा जो कदम अकेले उठाया है उसे आप सब लोगों का सहयोग मिलने से बल मिलेगा साथ ही हमें भी प्रोत्साहन प्राप्त होगा। रचनायें आप shabdkar@gmail.com पर भेजिएगा। सहयोग करने के लिए अग्रिम आभार। कुमारेन्द्र सिंह सेंगर शब्दकार रायटोक्रेट कुमारेन्द्र

  8. “ये महान लोग घुरहू पर कविता लिखते थे और बेचारे घुरहू को कभी पता ही नहीं चल पाता था. अगर पता चल भी गया तो वह यह तो कभी समझ ही नहीं पाता था कि उसके बारे में यह जो लिखा गया है, उसका मतलब क्या है…”कितना सही लिखा है आपने!!!इस जूते के बहाने चरचा के असीमित आकाश की जिन ऊँचाइयों तक आप ले जाते हैं, वो अद्‍भुत है…

  9. लेकिन याद रखें उनके सारे कमीनेपन की सारी ताक़त सिर्फ़ तब तक है जब तक कि आप अपने खड़ाऊं की ताक़त पहचान नहीं जाते और इसकी पवित्रता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध नहीं होते—-यह तो महत्वपूर्ण बात है और मनन को बाध्य करती है।

  10. जूता पुराण तो ठीक मगर आपकी कविताएँ किस ब्लॉग पर हैं? रंगाश्रम में बस एक ही कविता सुनी मैंने .वैसे आपने ब्लागरों की बड़ी फजीहत कर दी सच भी तो है

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