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क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on May 30, 2009

(माइक्रो-स्टोरी)
“तू है कौन?”
“जिंदगी”
“तो यहां क्या कर रही है।?“
“तुम्हारे साथ हूं?”
“क्यों?”
“क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं।”

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12 Responses to “क्योंकि थोड़ा सा मैं भी जीना चाहती हूं”

  1. अच्छा लगा…।कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया…।

  2. nayab!nayab!nayab!

  3. वाह….सुंदर

  4. Anonymous said

    “मुझे मार कर ?””नहीं””तो””मरने न दूँगी तुम्हे मौत के बाद भी “”वो कैसे “”जिन्दा रहेगा तू मेरे संग “

  5. यह जिन्दगी के साथ वाला कौन है?

  6. बहुत ही गहन भाव.

  7. बड़ा रहस्यवादी मामला लगता है भाई। कौन क्या कह रहा है?

  8. वाह…वाह।क्या बात है..लोटे में समन्दर समाया है।

  9. muthee se aaapne dunia nikaal dee. behtareen…

  10. सार्थक लघुकथा।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  11. एक बहुत ही ख़ूबसूरत लघु कथा है . मुझे याद आ रही है एक प्रसिद्ध साहित्यकार की एक लघु कथा — 'पापा मम्मी की पींठ बहुत गोरी है .'- 'ऐसा कौन कहता है बेटा ?', पिता का माथा ठनका .- 'आप ही तो कहते हैं . '

  12. waah !!

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