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Archive for July, 2009

आत्मीयता की त्रासदी :बेघर हुए अलाव

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 27, 2009

परिवर्तन,क्षरण ,ह्रास या स्खलन प्रकृति के नियम हैं और प्रकृति में ऐसा होना सहज और स्वाभाविक होता है किन्तु यही प्रक्रिया जब समाज में होने शुरू हो जाती है तो वह समूची मानव जाति के लिए घातक हो जाती है मानवीय मूल्यों से विचलन, अपनी ही संस्कृति के उपहास और आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम शायद बहुत आगे निकल गए हैं परिवर्तन की लहर आई है और सर्वत्र विकास ही दिख रहा है विकास गांवों का भी हुआ है किन्तु विकास के रासायनिक उर्वरक ने मिट्टी की अपनी गंध छीन ली है उस हवा में अब वह अपनत्व नहीं है जो हर रीतेपन को सहज ही भर लेता था भारत के गांव थे ही संस्कृति एवं परम्परा के पोषक! भोजपुरी भाषी क्षेत्र के गांव तो सदैव ही ऐसे थे जहां निर्धनता के कीचड़ मे आदर्श एवं आत्मीयता के कमल खिलते रहे अब ये गांव आत्मीयता का विचलन देख रहे हैं, समृद्ध परम्पराएं टूट रही हैं और अपनी संस्कृति से जुड़े लोगों के मन में टीस पैदा हो रही है। संभवतः ऐसी ही टीस की उपज है ओम धीरज का नवगीत संग्रह-“बेघर हुए अलाव”

संवेदनशीलता ही कवि पूंजी होती है गांव के अपनत्व ,मिट्टी के मोह,और परम्पराओं के प्रति ओम धीरज काफी संवेदनशील हैं। पूरे संग्रह में वे इसी की तलाश करते दिखते हैं ये बात अलग है कि उस गांव की हवा में आत्मीयता की वह गंध नहीं है जिसके वे आदती रह चुके हैं उनकी व्याकुलता पहले ही नवगीत “आओ चलें बाहर कहीं” में स्पष्ट झलकती है। बड़ा चुभता सा प्रश्न उठाया है-

बच्चियों पर /की गई मर्दानगी को देख / वक्त भी अब

ताली बजाता किन्नरों सा

इस नुकीले दंश को/कब तलक और क्यों सहें,

इस प्रश्न पर यहां सर कोई धुनता नहीं

aur कवियों ने भी गांव के बिगड़े हालात को अपनी कविता का विषय बनाया है परन्तु उनमें और ओम धीरज में एक बड़ा अन्तर है जहां दूसरे कवियों ने इन विद्रूपताओं से हास्य पैदा किया है वहीं ओम धीरज ने एक सोच ,एक संवेदना पैदा की है ये हास्य नहीं ,हमारे चिन्तन एवं मनन के विषय हैं

पाउच के /बल पर बनते परधान हैं

काम की जगह / बनी / जाति ही महान है

लोकतंत्र बिक रहा आज/ बिन भाव के

गांव की जीवन शैली ही आपसी प्रेम और सौहार्द की प्रतीक रही हैखान-पान ,अलाव और दरवाजों की बैठक गांव की एकता -आत्मीयता के ताने -बाने थेये ताने बाने अब टूट रहे हैं अलाव गांव की विशिष्टता के रूप में जाने जाते थेयहां आपसी समझौते,भविष्य के सपने , हास परिहास और संवेदनाएं स्थायी रूप से स्थान पाते रहे हैं आज उनके लिए कोई स्थान नहीं अब ये बेघर हो रहे हैइसी तथ्य को रेखांकित करता है नवगीत -गांव बेगांव एक बानगी देखिए-

सिकुड़े आंगन/बांच रहे अब

मौन धूप की भाषा……

चौपालों से नाता/टूटे बेघर आज / अलाव हो गए।
कुछ परम्पराएं बड़ी पुरानी हैंइक्कीसवीं सदी की सोच से निरर्थक भी सकती हैं पर उनमें एकता का पुट था उन लुप्त परम्पराओं और उनके पालन में आने वाली समस्याओं को कवि ने हृदय से समझा है-

अर्थी के बांस नहीं/चढ़ पाते कांधे

पीपल के पेड़ नहीं / घंट कहां बांधे ?

गीतों -नवगीतों में प्रायः प्रेम का प्रवाह होता है, शृंगार का कोई पक्ष होता है या फिर अनगढ़ सी कोई कल्पना “ बेघर हुए अलाव ” में नंगे सत्य को बड़े सहज किन्तु कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया हैबड़ी से बड़ी विडम्बना को ओम धीरज ने एकदम छोटी किन्तु सार्थक प्रस्तुति दी है-

दरिया की/ लहरों का

बदला मिजाज है

कागज की/ नावों पर

बहता समाज है

—————-

मन में / है मूरत

अनगढ़ तराशे

पानी में /ढूंढें है / सुख के बताशे

ऐसे /मरीजों का मर्ज लाइलाज है

कवि का गांव भोजपुरी भाषी क्षेत्र में है भोजपुरी के शब्द अपने साथ हार्दिक अभिव्यक्ति लेकर प्रस्फुटित होते हैं। लगता है कि ये शब्द नहीं, अपितु एक व्यापक भाव के संक्षिप्त रूप हों इन शब्दों का प्रयोग कवि ने इतनी सहजता से किया है कि वे गीतों को रस प्रदान करते हुए दिखते हैं इनके प्रयोग देखिए-“फटहे से पन्ने पर”,“फींच”,“अन्हराया”,“कांटकूस,घिरिर-घिरिर”,“सुकवा तारा,कथरी”,“बिहान” आदि

निःसंदेह गांव का मिजाज बदला है किन्तु अभी भी कवि के हृदय में गांव के लिए बहुत स्नेह है। अभी भी कवि का गांव शहर से अच्छा है और वह अभी भी वह पुरानी गंध तलाश लेता है- आंगन /ओसारे में/ रहठा की /आग है

पक रहा/ भदेली में / भदईं का/ भात है

सनई के टुन्से से/ बन रहे सलोने की

नथुने में भर आई / सरसोई गंध है

कचरस , आलू-निमोना,बतरस ,पकरस और खोइया की आंच तले बनने वाले भात में कुछ वैसी ही गंध है जो शायद John कीट्स के सेन्सुअसनेस में होगी

“मुंह में मीठी /गारी लेकर/ गाल /फुलाए

भौजाई से / देवर की मनुहारी लेकर” का दृष्य भी किसी प्रेमलोक का ही है सुन्दरताएं अभी भी शेष हैं-

मकई के पौधे को/ सोह रहीं नारियां

कजरी की/ धुन में/ रोप रहीं क्यारियां

मत पूछो /भाव इन / मांसल/ भराव के….

और इसीलिए सौंदर्य अभी जीवित है ओम धीरज का यह संग्रह बहुत से दायरों को तोड़कर बाहर निकलता है ऐसे अनेक नवगीत हैं जो वैश्विक अनुभूति के गीत हैंतमाम विचलनों को खुलकर चुनौती दी गई है

टूट रहे/रिश्तों नातों पर

जाति धर्म के जज्बातों पर

तुम विग्रह विच्छेद लिखो,

पर हम तो

सन्धि समास लिखेंगे

मेरे लिए यह संभवतः पहला संग्रह था जिसके शब्दों से गुजरते हुए मुझे लगा कि अभिधा में भी इतनी शक्ति होती है संग्रह के अधिकाँश गीत लक्षणा और व्यंजना में बोलते है किन्तु इस संग्रह में अभिधा की बात ही कुछ और है सारतः ओम धीरज का यह संग्रह अपने आप में दर्द, सौन्दर्य, जिजीविषा और पुनरुत्थान का एक सुन्दर सम्मिश्रण हैयह एक शुभ संकेत है और आत्मीयता को निमन्त्रण देता हुआ हिन्दी साहित्य की एक आवश्यकता है

पुस्तक – बेघर हुए अलाव ( नवगीत संग्रह )

कवि – ओम धीरज पृष्ठ -१२८, मूल्य – 150/-

प्रकाशक-अस्मिता प्रकाशन,185-ए, नया बैरहना, इलाहाबाद -०३

समीक्षक – हरी शंकर राढ़ी

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वो कौन ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 22, 2009

हरीश के घर से जब निकला तो अँधेरा होने को था । उसने समझाया कि मेरी मोटर साइकिल के व्हील ख़राब है अतः सुबह निकलूँ । फ़िर मार्गो की जानकारी भी मुझे ठीक से नहीं है, भटक जाऊंगा । लेकिन मैं नहीं माना, ‘ लाइफ का रियल मज़ा तो थोड़ा सा भटक जाने में ही है । जो होगा देखा जाएगा ।’ मैनें व्हील चेक करने की दृष्टि से लापरवाहीपूर्वक एक लात गाड़ी में जमा दी ।

चेविन्गुम का एक टुकडा मुंह में डाला और मोटर – साइकिल का कान उमेंठ दिया । निकलते- निकलते हरीश शायद भाभी के बारे मैं ज़ोर -ज़ोर से चींख कर कुछ बताना चाहता था लेकिन मोटर – साइकिल की आवाज़ में कुछ समझ न सका । मैं आगे निकल गया था और गाड़ी फर्राटे भर रही थी ।

सरपट भागते हुए काफी देर हो गई थी । घड़ी में झाँका, रात्री के बारह बज रहे थे । काली नागिन सी रोड घाटी प्रारम्भ होनें की सूचना दे रही थी । रोड के किनारे खडे मील के सफ़ेद पत्थर पर ‘घाटी प्रारम्भ 55 कि.मी.’ स्पष्ट देखाई देता था ।

रात स्याह हो चली थी । लगता था राक्षसि बादलों ने चाँद को ज़बरन छिपा रखा हो । दूर कहीं रहस्यमयी संतूर बज रहा था । मैं चोंका ! क्या मोटर – साइकिल का एफ़ एम ऑन हो गया ? मैनें गाड़ी का एरिअल चेक किया । घड़ी को आंखों के करीब ले गया, ‘रात के 2 बजे तो प्रसारण बंद हो जाता है ?

पथरीली पहाड़ी की ठंडी हवाएं शूल सी चुभती थीं । घुमावदार संकरे रस्ते से गुज़रते हुए, पहाडी और रहस्यमयी हो चली थी । आकाश को छूते पहाडी के शिखर, भीमकाय और भयानक चेहरों से लगते थे । अंधे मोड़ पर मोटर -साइकिल की हेड – लाइट गहरी खाई में डूब जाती थी ।

तभी मुझे दाहिने कंधे पर नर्म हथेली का दबाब महसूस हुआ ! पिछली सीट पर किसी स्त्री के बैठे होने का अहसास हुआ । रजनीगंधा के ताजे फूलों की महक हवा में तैर गई ? मेरे रोंगटे खड़े हो गए !!

मैंने अनचाहे चालाकी से मोटर -साइकिल बहक जाने का उपक्रम किया और वह मेरा नाम पुकारती हुई गहरी खाई में समां गई । ‘उफ़ बच गया ’ मैनें रहत की साँस ली । मैनें डर के मारे मोटर -साइकिल की स्पीड और बड़ा दी । तभी याद आया ….मैं तो रीमा के साथ निकला था ? तो क्या मैनें अपनी पत्नी को ही !!…नहीं ….!!! मैनें ये क्या किया ? रीमा का सलोना चेहरा उन्हीं भीमकाय पथरीले चेहरों के बीच झाँक रहा था … मैं वापस आ रहा हूँ ‘रीमा’ ।

हेड लाइट की तेज़ रोशनी में मेरे घर का बड़ा सा गेट दिखाई दे रहा था । मैं अपने घर के सामने पहुँच चुका था और उसी घाटी की और लौटना चाहता था । तभी रीमा नें गेट खोलते हुए अन्दर आनें को कहा !!

दाहिनें कंधे पर नर्म हथेली का दबाब अब भी था !!!
गेट के सामने वाटिका के बीच पीपल के झबरीले पेड़ के नीचे मुहल्ले का आवारा कुत्ता लगातार रो रहा था ।
[] राकेश ‘सोऽहं’

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तुम कविता हो

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 17, 2009

प्रिये !
तुमने तो शुरु से ही
एक कविता का जीवन
जिया है,
बस
समय, भाव एवं परिस्थितियों ने
तुम्हारा किरदार
बदल दिया है।
पहले
जब मैं अबोध था,
तुम चंचल किंतु वात्सल्य रस से भरी
बालगीत लगती थी।
धीरे- धीरे
गेयता का पुट आया तो
तुम
कवित्त, घनाक्षरी
और
सवैया लगने लगी ।
क्रमशः
तुम श्रृंगार रस में पग गई,
अन्य सभी रस गौड.हो गये
और
बाह्य साहित्य के प्रभाव में
प्यार भरी गज़ल हो गई।
एक दिन अज़ीब सी कल्पना हुई
और तुम मुझे
समस्यापूर्ति लगने लगी।
मुझे लगा
मैं कुछ भूल रहा हूं
कस्तूरी मृग की भांति
व्यर्थ ही इधर उधर
कुछ ढूंढ रहा हूं
तुम तो तुलसी की चौपाई हो,
मेरी अंतरात्मा में
गहराई तक
समाई हो।
पाश्चात्य सभ्यता का युग आया
मुझे लगा
तुम छन्दमुक्त हो गई हो,
उन्मुक्त हो गई हो ,
वर्जनाएं समाप्त हो गई हैं
तुम्हारा शास्त्रीय स्वरूप
बदल गया है
पंक्तियों का आकार
परिवर्तित हो गया है
कहीं क्षीण तो कहीं स्थूल हो गई हो,
तुममें अब वीणा का अनुनाद नहीं है
नादयंत्र की थाप है
पर इस मुक्ति के कारण
तुम प्रवहमान हो गई हो,
ताज़गी लिये चलती हो
तुम्हारा यह उन्मुक्त रूप
मैनें
प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया है
हां,शर्त यह जरूर है
कि तुम अनुभूति एवं भाव से
भरी रहना
क्योंकि मेरे लिए तुम
अभी भी एक कविता हो।

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बिना लाइन की पटरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 16, 2009

धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
पटरियों पर लोकर ट्रेन दोनों तरफ से सांप की तरह बल खाती हुई निकल रही थी। सोम, रोहन और नाथू गुमटी के पास उतर कर पटरियों के किनारे-किनारे एक ओर अंधेरे में बढ़ रहे थे। रेल्वे की बांड्री के दूसरी तरफ खड़ा एक सात मंजिला बिल्डिंग की खिड़कियों से निकलने वाली रोशनी अंधरे को धीरे-धीरे चाट रहा था। बांड्री के इस ओर कतारबद्ध तरीके से इंटों के छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थी, जिनमें खिड़कियां नहीं थी। पटरियां बैठाने वाले मजदूरों के परिवार इन्हीं कोठरियों में टिके हुये हुये थे। अंधेरे में आगे बढ़ते हुये सोम का पैर एक बड़े से पत्थर से टकराया और इसके साथ ही उसके हाथ में पड़े पोलीथीन के बैग से आपस में बोतलों के खनखनाने की आवाज अंधेरे में तेजी से फैल कर गुम हो गई।
अबे देख के….केएलपीडी करेगा क्या…, अंधेरे में संभलते हुये सोम की ओर घूरते हुये नाथू गुर्राया।
चिंता मत कर….मेरे नाक मुंह टूट जाये, लेकिन ये बोतल नहीं टूटेंगे…पोलीथीन के बैग में हाथ डालकर बोतलों को टटोलते हुये सोम ने तसल्ली दी।
कुछ चखना ले लेना चाहिये था….आगे बढ़ते हुये नाथू के मुंह से निकला।
चखना के साथ कीक नहीं मारता है….पीने का मजा सिगरेट के साथ है….रोहन ने अपनी विशेषज्ञता जाहिर की।
वो तो ठीक है, लेकिन स्वाद बदलने के लिये चखना जरूरी हो जाता है….वैसे बिना चखना के भी चलेगा….बीयर ही तो है….चखना हार्ड ड्रींक की जरूरत है…
बात करते हुये तीनों आगे बढ़ते जा रहे थे। पटरियों पर बिछाने के लिखे रखे पत्थरों के ऊंचे-ऊचे टीलों के पास पहुंचते हुये नाथू ने कहा, यहीं बैठते है।
यहां नहीं…थोड़ी और आगे…हमलोगों का असली स्थान यह है…टीलों को पार करते हुये रोहन ने कहा और और बिना लाइन की एक पटरी के पास आकर बैठ गया। हमलोग हमेशा यहीं बैठते है, इस पोल के सामने, एक पोल की तरफ इशारा करते हुये उसने कहा।
सोम बोतलों को रखकर पोल की ओर जाने लगा।
किधर जा रहे हो, बोतल कौन खोलेगा.., रोहन के शब्दों में कुछ उतवलापन था।
अभी धार मारके आता हूं, इतना कहने के साथ ही उसने अपने जींस के चैन सरका दिये।
धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
पटरियों पर लोकर ट्रेने अनवरत इधर उधर दौड़ रही थी।
……………………………………………………………
छह बोतल बिना लाइनवाली पटरियों पर इधर उधर लुढ़के हुये थे, और तीन बोतल खंभे की तरह खड़े थे।
कल मैंने खूब पी रखी थी…और रात को करीब ढाई बजे नशे में अपनी एक पुरानी गर्लफ्रेंड को फोन किया…, सिगरेट का एक जोरदार कश लगाते हुये रोहन ने कहा।
सोम और नाथू घूंट भरते हुये रोहन की ओर देख रहे थे।
वह दिल्ली में थी…मैंने कहा मैं अभी इसी वक्त तुमसे मिलना चाहता हूं…हा हा हा….पता है उसने क्या कहा…..कहा तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है…शट अप……फिर सुबह-सुबह उसका फोन आया….बोली इस तरह रात में मुझे फोन मत किया करो….वो तो अच्छा था कि कल मेरे पति मेरे साथ नहीं थे…..उसकी शादी हो गई है….मुझे पता नहीं था…अभी दो महीने पहले ही हुई है…..मैंने कहा मै इसकी गारंटी नहीं लेता कि मैं तुम्हे फोन नहीं करूंगा….
फिर वह क्या बोली, नाथू ने पूछा।
बोलती क्या, कुछ नहीं….मैंने ही फोन काट दिया….उसे छोड़कर मैंने गलती की…..मौका मिला था, लेकिन उस वक्त मैं ही आदर्शवादी था….आज अफसोस होता है….मुझे उसे छोड़ना नहीं चाहिये था…यदि मैंने उसे आटे में ले लिया होता तो आज वह मेरे साथ इस तरह से पेश नहीं आती….बोतल अपना रंग दिखा रहा था, बोलते वक्त रोहन की आंखों के सामने उस लड़की की तस्वीर तैर रही थी।
पिछले साल तो मैं अजीबो गरीब तरीके से फंसा था, सोम शुरु हो गया। रोहन और नाथू उसे खामोशी से सुनने लगे।
14 अगस्त की रात को हमदोनों हैदराबाद में एक होटल में थे। रात को दरवाजे पर दस्तक हुई। खोला तो सामने पुलिस खड़ी थी….
तेरी तो फट गई होगी, नाथू के मुंह से निकला।
अच्छे –अच्छों की फट जाती….किसी लौंडिया के साथ रात को होटल के कमरे में रहो….पुलिस दरवाजे पर खड़ी हो तो….समझ सकते हो सामने वाले पर क्या बितेगी…..अफसर कहने लगा शादी के सर्टिफिकेट दिखाओ….मैं चढ़ बैठा कि क्या शादी के बाद लोग बाहर निकलते हैं तो सर्टिफिकेट लेकर निकलते हैं….मेरी मैडम भी स्मार्ट थी….फेमिनिज्म पर पीएचडी कर रही है…वह खुद बकचोद है…..हुक्का पानी लेकर खड़ी हो गई….मैंने भी उसे बताया कि मैं एक प्रोड्कशन हाउस का मीडिया मैनेजमेंट देखता हूं….चाहो तो अभी यहां के पत्रकारों से बात करा सकता हूं….तब जाकर वह कुछ ढीला हुआ…और बोला कि कल 15 अगस्त है और वह रुटीन चेकअप कर रहा है…..परेशानी के लिए माफी चाहता है….
उस अधिकारी ने अपना काम अच्छे तरीके से किया …पूरी तरह से आश्वत होने के बाद ही वहां से टरका….तेरी तो वाट लग सकता था…..शादी कर ले…, नाथू ने कहा।
वह अभी शादी करना नहीं चाहती…..कहती है हमदोनों का संबंध एसे ही चलता रहेगा…बचपन की दोस्त है, स्कूल में साथ थी….दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला….हम दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है….उससे कई बार बोल चुका हूं….शादी कर ले…..वह तैयार नहीं है….कहती है जहां मन करे शादी कर लो….लेकिन मेरे साथ उसका संबंध बना रहेगा…..सी इज इमपोसिबल…मेरी शादी ठीक हो गई है….मेरी होने वाली बीवी मेरे पीछे पड़ी हुई है और मैं उसके पीछे…लाइफ में क्या होगा, पता नहीं….पहला प्यार है, अंतिम सांस तक निभाना तो पड़ेगा ही….
गट…गट…गट…सोम एक ही सांस में पूरी बोतल गटक गया।
……………………………………………………………

धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
बिजली से दौड़ने वाली लोकर ट्रेने मुंबई की आबादी को तेजी इधर से ऊधर फेंक रही थी। तीनों बंद ट्रैक पर बैठ कर बीयर गटके जा रहे थे। एक लंबी घूंट मारने के बाद नाथू घोड़े की तरह हिनहिनाया और फिर अपनी जेब से हथीछाप तंबाकू का पैकेट निकाल कर उसे अपनी हथेलियों पर उड़ेलते हुये बोला, साला मुझको तो जिंदगी का कोई ग्रामर ही समझ में नहीं आता….गांव में था तो दायरे छोटे थे…यहां तो पता ही नहीं चलता है कि क्या होता है…एक जाती है, दूसरी आती है….मानों लौडिया नहीं ट्रेने हैं….घर वाले बोल रहे हैं शादी कर लो…शादी के लिए पैसे चाहिये….एक बंगालन तीन महीने से साथ रह रही थी….कल पता चला कि मेरे जैसे उसके और भी कई दीवाने है….जमकर तूतू मैं मैं हो गया…मुझसे बर्दाश्त ही नहीं हुआ…साला आदमी लाख करे, लेकिन औरत करेगी तो बर्दाश्त नहीं होता है….वो मुझे गालिया देती रही और मैं उसे…चलता है लाइफ है….बगल से गुजरती हुई एक ट्रेन की आवाज नाथू के शब्दों को लील गई।
धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
तभी कुछ दूरी से एक आवाज सुनाई दी…कौन बैठा हुआ है वहां…चलो निकलो यहां से….पटरियां बिछानी है…एक आदमी कुछ मजदूरों के साथ उधर ही चला आ रहा था। बची हुई बीयर को खाली करते हुये तीनों उठे। तीनों डगमगाते हुये पटरी से बाहर निकले और फिर झूमते हुये आगे की ओर बढ़ गये। पीछे से खटर पटर की आवाज उनके कानों से टकरा रही थी….मजदूरों के हाथों के औजार चलने लगे थे।
साले सब तेजी से काम कर रहे हैं, सोम ने कहा।
अपना नेचुरल बार आज से बंद, रोहन ने कहा।
चिंता की बात नहीं है, नया ठिकाना खोज लेंगे…जैसे इसे खोजा था, नाथू ने कहा।
ठक..ठुक ठक….पीछे से मजदूरो के औजारों की आवाज आती रही।

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प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी…

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 14, 2009

शब्द अपने संकेत और ध्वनि खो देते हैं,
रश्मियों का उभरना भी बंद हो जाता है…
विरोधाभाषी शंकायें एक दूसरे की हत्या
करते हुये समाप्त होते जाती हैं…
आंखों के सामने बहुत कुछ दौड़ता है
लेकिन दिखाई नहीं देता……
बाहर का शोर अंदर नहीं आता
………………सब कुछ सपाट।
पता ही नहीं चलता…शून्य में मैं हूं
या मुझमें शून्य है….
मीलों आगे निकलने के बाद अहसास
होता है मंजिल के पीछे छूटने का….
और फिर मंजिल भी अपने अर्थ खो देता है…
मंजिल सफर का शर्त नहीं हो सकता…
इस रहस्य को मैं गहराई से समझता हूं,
अनजाने रास्तों पर भटकने
की बात ही कुछ और है…
कोलंबस के सफर की तरह…उनमुक्त और बेफिक्र…,
शून्य के परे तुम उभरती हो,
एक दबी सी मुस्कान के साथ…
खाली कैनवास पर रंग खुद चटकने लगते हैं…
तुम एक रहस्मयी धुन में गुनगुनाती हो…
और खींच ले जाती हो मुझे ओस में लिपटे एक तैरते द्वीप पर…
रात सफर में हो तो सुबह आ ही जाती है….
प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी…

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क्यों न रोएँ ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 13, 2009

शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ?
कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद नमक रोटी ! धीरे-धीरे नमक पर भी गाज गिरने लगी है । खुला नमक प्रतिबन्धित हो गया है। हानिकारक होता है ! घेंघा की बीमारी हो जाती है। हमें आपके स्वास्थ्य की चिन्ता है। आपको आयोडीन नमक खाना ही होगा, वरना आपके बच्चे मन्दबुद्धि पैदा होंगे। आयोडीन नमक पैकेट बन्द मिलता है । यह बात अलग है कि इस नमक पर बेचारे को दिहाड़ी का दस प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। अब बेचारा नमक भी कहां से लाए? प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग याद आता है- नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या ?
विडम्बना तो यह है कि हमें उसके इस जीवन से भी जलन है। लाखों का टैक्स चोरी करने वाला “सभ्य ” नागरिक भी परेशान है, उसे मजदूर का “सुख चैन” देखा नहीं जाता- हमसे तो अच्छा मजदूर ही है,कल की चिन्ता नहीं। दाल रोटी खाकर चैन से सोता तो है! चलो भाई , नहीं खाएगा दाल रोटी।
सरकार बहुत सक्रिय है। उसने नरेगा( रोजगार गारंटी अधिनियम) बना दिया है। अब सारा हिन्दुस्तान सुखी होगा, सबको रोजगार जो मिल गया! फिर भी लोगों को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है जबकि इसका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है।सारे सूचकांक नीचे गिरे पड़े हैं। रेपो रेट भी घट गया है। मुद्रास्फीति गिरकर कहां गई, पता ही नहीं लग रहा! अभी जून के आखिरी सप्ताह में महंगाई दर शून्य से भी नीचे चली गई थी और आप कह रहे हैं कि महंगाई बढ़ रही है ?पब्लिक झूठ बोलती है। उसे सब कुछ फ्री चाहिए। हमारा थर्मामीटर नहीं बता रहा कि आपको बुखार है तो कैसे मान लें ? आपका शरीर तप रहा हो तो आप जानें। आप रो नहीं रहे, आप नखरे कर रहे हैं। आप निराशावादी लगते हैं।
बड़े लोग हमेशा से कल्याण में लगे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, आयोडीन से आप की सेहत सुधारी ,आपके लिए इन्होंने और भी कल्याणकारी काम किया। आपको याद न हो,ये बात अलग है । आपको भूलता भी तो बहुत जल्दी है! जहां आयोडीन खिलाकर आपको घेंघा से मुक्ति दिलाई और आपका बुद्धिवर्धन किया, वहीं कॅन्डोम की बिक्री बढ़ाकर आपको एड्स से बचाकर नया जीवन दिया। एड्स अच्छा आया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कॅन्डोम अपने देश में आया ।बच्चा बच्चा एड्स के बारे में जान गया है।खुल के जियो, खुल के बात करो , खुल के यूज करो।रब जाने कब जरूरत पड़ जाए। उपलब्धता की गारंटी बढ़ा दी गई है। हर सार्वजनिक शौचालय पर जोश स्पॉट है। हमेशा जोश में रहो!
ददुआ को मारने में भले ही बावन घंटे लग जाएं, रणवीर सिंह (देहरादून इंकाउंटर मामले का शिकार ) को मार गिराने में बावन मिनट भी नहीं लगते!इसमें हमारा प्रषासन बड़ा तेज है।अब गाजियाबाद के उस परिवार के आँसू देखकर भी हमें नहीं रोना चाहिए।ऐसी छोटी मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूं ,एक बड़े नेता ने कहा था।
इसी से एक बात और याद आई। हमारे राज्य हमारी निजी सम्पत्ति हैं।बिना हमारे वीजा के आप यहां कैसे आ गए ? वह भी घूमने फिरने नहीं, नौकरी करने ?
जैसे तैसे जी भी रहे थे,पर ये टीवी न्यूज चैनल वाले जीने नहीं देते । डराते रहते हैं। पता नहीं कहां कहां से खबर जुटाते रहते हैं। जिसे घी समझ के खा लेते थे और बलवान होने का भ्रम पालकर खुश हो लेते थे, उसे इन्होंने यूरिया और सर्फ का अवलेह सिद्ध कर दिया, दूध को पेण्ट का उत्पाद साबित कर दिया। हमने भी अच्छा धंधा अपना लिया है। मैं आपको नकली घी दूध बेच दूं , आप मुझे नकली दवाई बेच देना। हिसाब बराबर! पर वो बेचारा गरीब क्या बेचेगा ? हाँ, याद आया, उसके पास गुरदा है। वो अपना गुरदा बेच देगा। दो चार दिन के लिए ये वाली दाल और पैकेट वाला नमक तो मिल ही जाएगा !रोएगा तो कौन सी नई बात ? और वह है किस लिए ?
अभी तो और भी समस्याएं हैं।हमें यौन शिक्षा लागू करनी है। बिजली पानी मिले न मिले , गे कल्चर वालों को सुविधाएं उपलब्ध करवानी है। अमेरिका की बराबरी करनी है हमें। एम जे की मौत पर मरने वालों को ढांढस बधाना है। वे भी तो बेचारे रो रो के लार बार हुए जा रहे हैं। आपको तो बस महंगाई और व्यवस्था की पड़ी है!
मैंने बहुत सोचा कि न रोऊँ इन हालात पर। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हालात रोने के नहीं हैं ।सोचता हूँ काश! हम इन मुद्दों पर एक बूंद आंसू बहा सकते!

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एक श्रद्धांजलि उन्हें भी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 8, 2009

कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को!
खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए।
जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किया। सुना कि उनका घर बहुत बड़ा था-नेवरलैण्ड।ऐसी लैण्ड आगे कभी नहीं- नेवर! झील से लेकर चिड़ियाघर तक अन्दर ही। क्या पता कब किस जानवर की जरूरत पड़ जाए!मन कब बच्चा-बच्चा खेलने लग जाए या किस जानवर से प्रेमप्रसंग का शौक चढ़ बैठे!क्या चमत्कारी काया थी ? नाचीज के समझ में कुछ आया ही नहीं।चेहरा-मोहरा देखकर लिंगभेद होता ही नहीं था। पता नहीं लोग होमोसेक्सुअल होने का आरोप कैसे लगा देते थे? लोगों का क्या, अनाप सनाप बकते ही रहते हैं।
अब समस्या तो इस नाचीज के दिमाग की है। कुछ समझ ही नहीं आता ।अब अपने समझ में यही नहीं आया कि क्या उस महंगे ताबूत में पंचभूत काया का जैविक क्षरण सामान्य विधि से अलग होगा? होगा तो समय कम लगेगा या ज्यादा?
उनके वस्त्रालंकार की तो बात करना ही बेमानी है।पता नहीं क्या-क्या पहने, क्या-क्या खाए! आवष्यकतानुसार चेहरा-मोहरा भी बदला।प्लास्टिक सर्जरी भी कराई, कभी मम्मी बने तो कभी पापा! ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। पैसे को उन्होंने पैसा समझा ही नहीं। इतने फकीर थे कि करोड़ों डालर के कर्ज में डूब गए। यह सब देखकर विदर्भ के किसानों की सोच पर मुझे बड़ी चिढ़ आई। छोटे से कर्जे पर नासमझ आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें भी पोजिटिव होने का गुण उनसे सीखना चाहिए। पर वे ऊँची बातें सोचते ही नहीं!
वे बड़े फनकार थे।संगीत को उन्होंने बड़ी इज्जत दिलाई। शास्त्रीय संगीत से पॉप संगीत में शिफ्ट करने में उनकी उच्चतम भूमिका है। वस्तुतः युवा पीढ़ी को संगीत से जोड़ने का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया जाना चाहिए। आप से ही प्रभावित होकर अपने आर्यावर्त में अंगरेजी गाने का वर्चस्व बढ़ा और हमारा समाज ऊँचा हुआ। वैसे नाचीज ने भी अंगरेजी में एम .ए। किया था और अपने जमाने में अँखफोड़ पढ़ाकू था। इतना अँखफोड़ कि यूनिवर्सिटी में भी गर्लफ्रेण्ड बनाने का टाइम नहीं मिला परन्तु अंगरेजी गाने आज तक पूरी तरह समझ में नहीं आए।
उनके नृत्यकौशल की तो बात ही निराली थी।जब वे स्टार्ट हो जाएं तो जेनेरेटर भी मात खा जाए,करेंट लग जाए या फिर मिर्गी का रोगी भी शरमा जाए। क्या पद संचालन था!भाव भंगिमा की तो जनाब बात ही मत करिए। शरीर का हर जोड़ अलग -अलग दिखने लग जाए और पता लग जाए कि किस अंग का वाइब्रेशन अधिकतम कितना हो सकता है। उनके कंपन के अंकन के लिए कोई यन्त्र बना ही नहीं। सारे सीज्मोग्राफ और ई.सी.जी. फेल!
अब वे नहीं रहे। पता नहीं क्या होगा उस फन का, उस विरासत का? पर , एक भरोसा है उनके पीछे चलने वाली पीढ़ी पर। जिसके इतने फैन,इतने फोलोवर है कि आत्महत्या तक कर लें, उनके कुछ योग्य चेले तो होंगे ही! संभालेंगे उनकी विरासत। हमें क्या ? हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!

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Listened your silent eyes

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 7, 2009

Breaking the transparent falsehood,
Your golden silence lead me to a flight of fancy;
You emerged as a new thought,
Laying all night on your speechless bed.

A ray of dark light opened the lock of pound,
I too gaze in your eyes without sound.
I entered into the temple kissing the door,
Had imagined it a lot before.

Your face was as blank as unwritten verse
I could not get it was boon or curse.
When I was deep in the cave under mountains,
Drink some water, feeling the fountain.

I searched it deep all around
You too were bound to get its sound.
My honest toil went in vain,
I did it again and again.

flooded in confusion, shame, remorse and despair
I listened your silent eyes…Oh! I was not there!!!!

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अनकही खामोशियां

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 5, 2009

अपने अक्ष पर घुमती हुई पृथ्वी कभी स्थिर हो सकती है….? फिर मैं कैसे……..??
मैं तो घूमता रहा और थकता रहा…..
अनकही खामोशियों में तुम थी…
नींद मर्ज है…यह कहकर तुने मुझे सुला दिया……
कई छोटे छोटे अनु-सपने आते-जाते रहे…
मैं नींद में बेशुध रहा…गहरी नींद…अति गहरी…
न जाने कब सपनों ने भी आना छोड़ दिया…..
नर्म मुलायम नींद में डूबते हुये अंतिम नींद तक सोया….सारी थकान जाती रही…
सुबह बारिश के झोंके पृथ्वी पर बरस रही थी…
बादल के गुच्छे मूड में थे…बस बरसे जा रहे थे…
आंख खुलने से पहले तुमने कुछ कहा…फिर ओझल हो गई….
रात की दुपहरिया में खजुराहो पीछे छूट गया था…
अनकही खामोशियों से गुजरते हुये…मैं इनमें अर्थ तलाशता रहा…
अर्ध चेतना में तो तुम भी थी…और मैं भी…
बेहतर होता बिना मंजिल के भटकना….या फिर पूर्ण चेतना में होना…..
अनकही खामोशियों में क्या था…..? कोई ठहरी हुई सी चीज….या फिर ठहराव के नीचे कोई बहती हुई सी चीज….??
पृथ्वी के साथ तुम भी मेरी आंखों में घुम रही हो…….अनकही खामोशियों की तरह।

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अनवरत तलाश

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 4, 2009

मीलों आगे चलते हुये अनवरत तलाश
…अंधरे पथ को टटोलने की कोशिश…मंजिल का पता नहीं…सुबह कोसों दूर।
बादलों से घिरा आससान, रिमझिम बूंदे,
फिजा में फैली हुई धरती की सोंधी महक,
घने वृक्ष के तले लुप्त होती चेतना,
रहस्यों के कोहरे को चीर कर बढ़ते मेरे कदम।
घुमावदार पर्वत की नमी, उससे टकराकर लौटती खुद की सांस,
अतल गहराई और उसमें उतरने की अदम्य इच्छा…चेतन पर अचेतन का कब्जा।
बौने होते अब तक के सींचे गये विचार,
उभरें पर्वतों के उस ओर देखने की कोशिश
…व्यर्थ…!व्यर्थ…!!व्यर्थ…!!!अंधेरे में पसरी मौन आवाज,
सुरमई गहराईयों में डूबना….बस डूबते ही जाना….
नमी के साथ कल-कल की आवाज,
रहस्मय अंधकार के उस पार उफनती नदी का अहसास।
शिराओं को नर्म स्पर्श करते हुये आगे बढ़ना
एक छोटी सी आवेग भरी धारा….
दूसरी..तीसरी…चौथी….फिर अनवरत निर्मल प्रवाह।
थकान से चूर मस्तिष्क और तपता हुआ शरीर
रोक देती है मुझे एक निश्चित बिंदू पर,
निर्झर के उदगम की ओर नहीं बढ़ पाना
असर्मथता ही तो है…
कहीं इस अनवरत तलाश में मैं खुद न खो जाऊं !!!!!!!

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