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बिना लाइन की पटरी

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on July 16, 2009

धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
पटरियों पर लोकर ट्रेन दोनों तरफ से सांप की तरह बल खाती हुई निकल रही थी। सोम, रोहन और नाथू गुमटी के पास उतर कर पटरियों के किनारे-किनारे एक ओर अंधेरे में बढ़ रहे थे। रेल्वे की बांड्री के दूसरी तरफ खड़ा एक सात मंजिला बिल्डिंग की खिड़कियों से निकलने वाली रोशनी अंधरे को धीरे-धीरे चाट रहा था। बांड्री के इस ओर कतारबद्ध तरीके से इंटों के छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थी, जिनमें खिड़कियां नहीं थी। पटरियां बैठाने वाले मजदूरों के परिवार इन्हीं कोठरियों में टिके हुये हुये थे। अंधेरे में आगे बढ़ते हुये सोम का पैर एक बड़े से पत्थर से टकराया और इसके साथ ही उसके हाथ में पड़े पोलीथीन के बैग से आपस में बोतलों के खनखनाने की आवाज अंधेरे में तेजी से फैल कर गुम हो गई।
अबे देख के….केएलपीडी करेगा क्या…, अंधेरे में संभलते हुये सोम की ओर घूरते हुये नाथू गुर्राया।
चिंता मत कर….मेरे नाक मुंह टूट जाये, लेकिन ये बोतल नहीं टूटेंगे…पोलीथीन के बैग में हाथ डालकर बोतलों को टटोलते हुये सोम ने तसल्ली दी।
कुछ चखना ले लेना चाहिये था….आगे बढ़ते हुये नाथू के मुंह से निकला।
चखना के साथ कीक नहीं मारता है….पीने का मजा सिगरेट के साथ है….रोहन ने अपनी विशेषज्ञता जाहिर की।
वो तो ठीक है, लेकिन स्वाद बदलने के लिये चखना जरूरी हो जाता है….वैसे बिना चखना के भी चलेगा….बीयर ही तो है….चखना हार्ड ड्रींक की जरूरत है…
बात करते हुये तीनों आगे बढ़ते जा रहे थे। पटरियों पर बिछाने के लिखे रखे पत्थरों के ऊंचे-ऊचे टीलों के पास पहुंचते हुये नाथू ने कहा, यहीं बैठते है।
यहां नहीं…थोड़ी और आगे…हमलोगों का असली स्थान यह है…टीलों को पार करते हुये रोहन ने कहा और और बिना लाइन की एक पटरी के पास आकर बैठ गया। हमलोग हमेशा यहीं बैठते है, इस पोल के सामने, एक पोल की तरफ इशारा करते हुये उसने कहा।
सोम बोतलों को रखकर पोल की ओर जाने लगा।
किधर जा रहे हो, बोतल कौन खोलेगा.., रोहन के शब्दों में कुछ उतवलापन था।
अभी धार मारके आता हूं, इतना कहने के साथ ही उसने अपने जींस के चैन सरका दिये।
धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
पटरियों पर लोकर ट्रेने अनवरत इधर उधर दौड़ रही थी।
……………………………………………………………
छह बोतल बिना लाइनवाली पटरियों पर इधर उधर लुढ़के हुये थे, और तीन बोतल खंभे की तरह खड़े थे।
कल मैंने खूब पी रखी थी…और रात को करीब ढाई बजे नशे में अपनी एक पुरानी गर्लफ्रेंड को फोन किया…, सिगरेट का एक जोरदार कश लगाते हुये रोहन ने कहा।
सोम और नाथू घूंट भरते हुये रोहन की ओर देख रहे थे।
वह दिल्ली में थी…मैंने कहा मैं अभी इसी वक्त तुमसे मिलना चाहता हूं…हा हा हा….पता है उसने क्या कहा…..कहा तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है…शट अप……फिर सुबह-सुबह उसका फोन आया….बोली इस तरह रात में मुझे फोन मत किया करो….वो तो अच्छा था कि कल मेरे पति मेरे साथ नहीं थे…..उसकी शादी हो गई है….मुझे पता नहीं था…अभी दो महीने पहले ही हुई है…..मैंने कहा मै इसकी गारंटी नहीं लेता कि मैं तुम्हे फोन नहीं करूंगा….
फिर वह क्या बोली, नाथू ने पूछा।
बोलती क्या, कुछ नहीं….मैंने ही फोन काट दिया….उसे छोड़कर मैंने गलती की…..मौका मिला था, लेकिन उस वक्त मैं ही आदर्शवादी था….आज अफसोस होता है….मुझे उसे छोड़ना नहीं चाहिये था…यदि मैंने उसे आटे में ले लिया होता तो आज वह मेरे साथ इस तरह से पेश नहीं आती….बोतल अपना रंग दिखा रहा था, बोलते वक्त रोहन की आंखों के सामने उस लड़की की तस्वीर तैर रही थी।
पिछले साल तो मैं अजीबो गरीब तरीके से फंसा था, सोम शुरु हो गया। रोहन और नाथू उसे खामोशी से सुनने लगे।
14 अगस्त की रात को हमदोनों हैदराबाद में एक होटल में थे। रात को दरवाजे पर दस्तक हुई। खोला तो सामने पुलिस खड़ी थी….
तेरी तो फट गई होगी, नाथू के मुंह से निकला।
अच्छे –अच्छों की फट जाती….किसी लौंडिया के साथ रात को होटल के कमरे में रहो….पुलिस दरवाजे पर खड़ी हो तो….समझ सकते हो सामने वाले पर क्या बितेगी…..अफसर कहने लगा शादी के सर्टिफिकेट दिखाओ….मैं चढ़ बैठा कि क्या शादी के बाद लोग बाहर निकलते हैं तो सर्टिफिकेट लेकर निकलते हैं….मेरी मैडम भी स्मार्ट थी….फेमिनिज्म पर पीएचडी कर रही है…वह खुद बकचोद है…..हुक्का पानी लेकर खड़ी हो गई….मैंने भी उसे बताया कि मैं एक प्रोड्कशन हाउस का मीडिया मैनेजमेंट देखता हूं….चाहो तो अभी यहां के पत्रकारों से बात करा सकता हूं….तब जाकर वह कुछ ढीला हुआ…और बोला कि कल 15 अगस्त है और वह रुटीन चेकअप कर रहा है…..परेशानी के लिए माफी चाहता है….
उस अधिकारी ने अपना काम अच्छे तरीके से किया …पूरी तरह से आश्वत होने के बाद ही वहां से टरका….तेरी तो वाट लग सकता था…..शादी कर ले…, नाथू ने कहा।
वह अभी शादी करना नहीं चाहती…..कहती है हमदोनों का संबंध एसे ही चलता रहेगा…बचपन की दोस्त है, स्कूल में साथ थी….दोस्ती कब प्यार में बदल गई पता ही नहीं चला….हम दोनों के बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है….उससे कई बार बोल चुका हूं….शादी कर ले…..वह तैयार नहीं है….कहती है जहां मन करे शादी कर लो….लेकिन मेरे साथ उसका संबंध बना रहेगा…..सी इज इमपोसिबल…मेरी शादी ठीक हो गई है….मेरी होने वाली बीवी मेरे पीछे पड़ी हुई है और मैं उसके पीछे…लाइफ में क्या होगा, पता नहीं….पहला प्यार है, अंतिम सांस तक निभाना तो पड़ेगा ही….
गट…गट…गट…सोम एक ही सांस में पूरी बोतल गटक गया।
……………………………………………………………

धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
बिजली से दौड़ने वाली लोकर ट्रेने मुंबई की आबादी को तेजी इधर से ऊधर फेंक रही थी। तीनों बंद ट्रैक पर बैठ कर बीयर गटके जा रहे थे। एक लंबी घूंट मारने के बाद नाथू घोड़े की तरह हिनहिनाया और फिर अपनी जेब से हथीछाप तंबाकू का पैकेट निकाल कर उसे अपनी हथेलियों पर उड़ेलते हुये बोला, साला मुझको तो जिंदगी का कोई ग्रामर ही समझ में नहीं आता….गांव में था तो दायरे छोटे थे…यहां तो पता ही नहीं चलता है कि क्या होता है…एक जाती है, दूसरी आती है….मानों लौडिया नहीं ट्रेने हैं….घर वाले बोल रहे हैं शादी कर लो…शादी के लिए पैसे चाहिये….एक बंगालन तीन महीने से साथ रह रही थी….कल पता चला कि मेरे जैसे उसके और भी कई दीवाने है….जमकर तूतू मैं मैं हो गया…मुझसे बर्दाश्त ही नहीं हुआ…साला आदमी लाख करे, लेकिन औरत करेगी तो बर्दाश्त नहीं होता है….वो मुझे गालिया देती रही और मैं उसे…चलता है लाइफ है….बगल से गुजरती हुई एक ट्रेन की आवाज नाथू के शब्दों को लील गई।
धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़
तभी कुछ दूरी से एक आवाज सुनाई दी…कौन बैठा हुआ है वहां…चलो निकलो यहां से….पटरियां बिछानी है…एक आदमी कुछ मजदूरों के साथ उधर ही चला आ रहा था। बची हुई बीयर को खाली करते हुये तीनों उठे। तीनों डगमगाते हुये पटरी से बाहर निकले और फिर झूमते हुये आगे की ओर बढ़ गये। पीछे से खटर पटर की आवाज उनके कानों से टकरा रही थी….मजदूरों के हाथों के औजार चलने लगे थे।
साले सब तेजी से काम कर रहे हैं, सोम ने कहा।
अपना नेचुरल बार आज से बंद, रोहन ने कहा।
चिंता की बात नहीं है, नया ठिकाना खोज लेंगे…जैसे इसे खोजा था, नाथू ने कहा।
ठक..ठुक ठक….पीछे से मजदूरो के औजारों की आवाज आती रही।

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7 Responses to “बिना लाइन की पटरी”

  1. incitizen said

    यही जिन्दगी का सच है, कडुवा ही सही.

  2. दिलचस्प ओर बिंदास…..कहने का अंदाज भी खूब है……धड धड धड…….

  3. आपका अंदाजे बयाँ कमाल का हैं …एकदम मस्त

  4. रोचकता लिए है यह-धड धड धड……

  5. रचना मे रोचकता अन्त तक बनी रही है।आभार!

  6. धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ धड़ड़…धड़ड़..धड़ड़ …धड़ड़..धड़ड़

  7. Anonymous said

    Hi,Thank You Very Much for sharing this informative helpful article..– Health Care Tips | Health Tips | Alternative Health ArticlesNice Work Done!!Paavan

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