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सत्मेव जयते!!!!….लेकिन सच से कोई मरता है तो ?

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 22, 2009

पल्लवी की मौत की खबर फेसबुक पर दिखी। पुरी खबर को पढ़ा। खबर में लिखा था कि आगरा की रहने वाली पल्लवी ने सच का सामना में रुपा गांगुली वाला एपिसोड देखने के बाद आत्महत्या कर लिया। पूरे खबर को पढ़ कर यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने बाद ही आतमहत्या किया है या नहीं। खबरों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के संदर्भ में पल्लवी का मामला मुझे एक गंभीर मामला लग रहा था। इसलिये इस खबर को और जानने के लिए मैंने नेट पर इधर-उधर सर्च करना शुरु कर दिया। नेट पर पल्लवी से संबंधित जितने भी खबर थे, सब की हेडिंग में इस बात का जिक्र था कि पल्लवी ने सच का सामना देखने के बाद आत्महत्या के लिए कदम उठाया। किसी कार्यक्रम को देखकर जब लोग मनोवैज्ञानिक तौर पर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित होते हैं तो जनहित में उस कार्यक्रम पर सवाल उठना जरूरी है।
इस घटना से संबंधित दो तथ्यों से स्थापित हो रहा है कि पल्लवी आत्महत्या करने के कगार पर सच का सामना में रूप गांगुली को देखने और सुनने के बाद पहुंची। अपने सुसाइड नोट में उसने लिखा है कि एक अच्छी मां, और अच्छी पत्नी नहीं बन सकी। खबरों के मुताबिक इसी तरह की बात रुपा गांगुली ने भी इस कार्यक्रम में कहा था। पल्लनी ने अपने सुसाइड खत में यह नहीं कहा है कि वह आत्महत्या सच का सामना देखने के बाद कर रही है, और सामान्यतौर पर वह एसा लिख भी नहीं सकती थी। पल्लवी महेंद्र नाम के किसी व्यक्ति के साथ रह रही थी। महेंद्र का कहना है कि सच का सामना में रुपा गांगुली वाला एपिसोड देखने के बाद वह डिप्रेशन में चली गई थी। पल्लवी का सुसाइड खत और महेंद्र के बयान सच का सामना के औचित्य को कठघड़े में करने के लिए काफी है।
डिप्रेशन के कई स्टेज होते हैं। यदि इनका सही समय पर पता चल जाये तो विधिवत इलाज करके व्यक्ति को डिप्रेशन से निकाला जा सकता है। डिप्रेशन एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। अपने जीवन की व्यक्तिगत उलझनों के कारण पल्लवी पहले से ही डिप्रेशन में थी। अब वह डिप्रेशन के किस स्टेज में थी, इस संबंध में कोई खबर नहीं लिखी गई है। यह भी पता लगाने की कोशिश नहीं की गई है कि वह अपने डिप्रेशन का इलाज किसी मानसिक चिकित्सक से करा रही थी या नहीं। लेकिन इतना तय है कि वह डिप्रेशन में थी। और जब सच का सामना में पैसों का लालच देकर रुपा गांगुली को अपने जीवन से संबंधित कुछ कट्टू निजी स्मृतियों को याद करने के लिये कुरेदा गया तो इसका सीधा रिफ्लेक्शन पल्लवी पर हुया। वह सीधे डिप्रेशन के उस स्टेज में पहुंच गई जहां उसे अपना जीवन निरर्थक लगने लगा।
निसंदेह उस समय सारी दुनिया अपनी गति में चल रही थी। लेकिन ठीक उसी समय पल्लवी के दिमाग में अपने वजूद को खत्म करने का जद्दोजहद भी चल रहा था। हो सकता है यह जद्दोजहद उसके दिमाग में बहुत पहले से चल रहा हो, लेकिन सच का सामना ने उसे जद्दोजहद से निकल कर सीधे आत्महत्या करने के निर्णय तक पहुंचा दिया। पल्लवी के लिए सच का सामना ने उद्दीपक का काम किया है।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि सच का सामना को लोग पसंद कर रहे हैं। एक झूठ पकड़ने वाली मशीन के सामने लोगों को बैठा कर उनके निजी जिंदगी को कूरेदा जा रहा है। हर व्यक्ति के निजी जीवन के अपने अनुभव और सच्चाईयां होती हैं। पैसों का लालच देकर उन्हें हौट सीट पर बैठाया जा रहा है और फिर एसे सवाल पूछे रहे हैं,जिनका सीधा संबंध उनके निजी अतीत और मनोविज्ञान से है। और पूछे गये सवालों के जवाब का इफेक्ट पल्लवी की मौत के रूप में सामने आ रहा है। अब प्रश्न उठता है कि जब लोग किसी कार्यक्रम को देखकर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं तो उस कार्यक्रम का औचित्य क्या है ? एसे सच का औचित्य क्या है, जो लोगों के दिमाग को नकारात्मक दिशा में सक्रिय कर रहे हैं?
जनहित में किसी भी कार्यक्रम का मूल्यांकन उसकी लोकप्रियता और रेवेन्यू एकत्र करने की उसकी क्षमता से होता है। सच का सामना इन दोनों मापदंडों पर ठीक जा रहा है। इसकी मार्केटिंग स्ट्रेजी भी उम्दा है, और शायद प्रस्तुतिकरण भी। लेकिन इफेक्ट के स्तर पर यह कार्यक्रम लोगों के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है। पल्लवी की मौत से हो सकता है इस कार्यक्रम की लोकप्रियता में थोड़ा उछाल आये, लेकिन पल्लवी की तरह की दो चार और लोगों ने आत्महत्या कर लिया तो क्या होगा।
इसके पहले शक्तिमान सीरियल को लेकर भी कुछ इसी तरह का इफेक्ट बच्चों में देखने को मिला था। बच्चे शक्तिमान की तरह ही गोल-गोल नाचते हुये हवा में उड़ने की कोशिश करते हुये यहां वहां से छलांग लगा रहे थे। इसके बाद बच्चों में शक्तिमान के इफेक्ट को रोकने के लिए मुकेश खन्ना को बार-बार अपील करना पड़ा था। यहां तक कि कार्यक्रम के पहले ही वह शक्तिमान के ड्रेस में आते थे और बच्चों को समझाते थे कि वह शक्तिमान जैसी हरकतें नहीं करे।
सच का सामना बच्चों पर नहीं, बड़ों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। शक्तिमान में तो बच्चे अति उत्साह में आकर शक्तिमान की तरह नकल कर रहे थे, लेकिन सच का सामना तो बड़ों के दिमाग में कुलबुलाने वाले नकारात्मक किटाणुओं सक्रिय कर रहा है। शक्तिमान का प्रभाव आत्मघाती था, लेकिन दिमाग को नकारात्मक दिशा में नहीं ढकेलता था। वह बच्चों के दिमाग को फैन्टसी की दुनिया में ले जाता था। लेकिन सच का सामना बड़ों में अवसाद को और बढ़ा रहा है।
फेसबुक पर पल्लवी के खबर पर मैंने अपनी प्रतिक्रया में सच का सामना का मूल्यांकन इफेक्ट के आधार पर करते हुये इसे जनहित में रोके जाने की बात कही थी। इसमें लोगों के लालच का फायदा उठाकर उनके जीवन को उघाड़ा जा रहा है। हौट सीट पर बैठने के लिए किसी को फोर्स नहीं किया जा रहा है, लेकिन यहां पर बैठाने के लिए भरपूर चारा डाला जा रहा है। आज दोबारा जब फेसबुक खोला तो वहां पर से मेरी प्रतिक्रिया वाली पल्लवी की खबर गायब थी, शायद डिलिट कमांड मार दिया गया। अपनी प्रतिक्रिया को वहां न पाकर मैं इसे फिर से लिखने के लिए प्रेरित हुया हूं। अपनी प्रतिक्रिया को फेसबुक पर डिलिट करने के लिए अपने फेसबुक के उस साथी को कोटि कोटि धन्यवाद देता हूं। सत्मेव जयते!!!!….लेकिन सच से कोई मरता है तो ?
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14 Responses to “सत्मेव जयते!!!!….लेकिन सच से कोई मरता है तो ?”

  1. wakai sach ka samna kai baar khatarnak ho jata h

  2. पैसो की लालच में "सच के सामने में" लोग खुलासे तो कर देते है और बाद में उन्हें आत्मग्लानी तो होती होगी फिर आत्महत्या जैसे कदम भी उठाये जा सकते है .

  3. माले मुफ्त दिले बेरहम के कायल दर्शक मुफ्त के कारण टेलिविज़न पर घटिया सीरियल देख कर प्रभावित होते हैं और गलत क़दम उठा लेते हैं.अब जागरूक दर्शक की आवश्यकता है .एक प्रेरणाप्रद लेख.

  4. भावुकता मै, पेसो के लिये, टी वी के लालच मै लोग जो बात किसी को नही बताते वो यहां बक देते है फ़िर पछताते है,नतीजा… ऎसे कार्यकर्म बन्द होने चाहिये, यह कार्य कर्म विदेशो की नकल कर के बनाये जाते है, जब कि हमारे ओर विदेशो के कलचर मै दिन रात का फ़र्क है… विदेशो मै जो होता है जरुर नही दुसरे देश मै भी वेसा ही हो.. ओर इस का नतीजा देखने वालो को भुगतना पडता है, ओर उस से देख कर कई अपने आप को वेसा ही गिरा हुआ महसुस करते है ओर फ़िर सोचे समझ बिना गलत कदम ऊठा लेते है.धन्यवाद

  5. जितना सच का सामना करना था किया जा चुका है अब एक ही तरह के सेक्स आदि से सम्बन्धित सवाल ऊब पैदा करने लगते है और लगता है यह सब कूक्ड स्टोरी है । क्या पता ? आगे पता चले यह सब रिहर्सल करवाया जाता था ,सम्वाद लिखे जाते थे , एक निर्देशक होता था वगैरह वगैरह , भई पैसे मिले तो घर के लोगों द्वारा अभिनय करने मे क्या हर्ज़ है । लेकिन कुछ भी हो कीसी की जान पर बन आये यह तो नही होना चाहिये यह अफसोस जनक है

  6. सवाल यह है कि ऐसा सच और उसका सामना किस काम का जिसकी कोई सामाजिक उपयोगिता ही न हो. अगर सच का सामना करवाना ही है तो उन नेताओं और भ्रष्ट अधिकारियों से क्यों नहीं करवाया जाता जिन्होंने जनता की गाढ़ी कमाई की करोड़ों रुपये स्विस बैंकों मे जमा कर रखे हैं. जिनके चलते दाल 90 और चीनी 45 रुपये किलो बिक रही है? बहुत सारे लोग भूखों मरने के लिए मजबूर हैं? उनको तो ये अपने चैनल पर लाने में पूरी तरह विफल हैं.

  7. पोस्ट से बहुत कुछ सीखने को मिला।धन्यवाद!

  8. ईष्टदेव जी आपने सामाजिक उपयोगिता की बात है, जो इन प्रोग्राम बनाने वाले लोगो को या तो समझ में नहीं आता है या फिर नोटो की हवस में समझना ही नहीं चाहते हैं। स्वीस बैंकों में रुपये जमा करने वाले लोग इसमें क्यों बैठेंगे भला…उनके पास जरूरत से ज्याद रुपये हैं…और इसमें लोगों रुपये कमाने का लालच देकर उनसे निजी सवाल पूछा जाता है जिसका सामाजिक उपयोगिता के संदर्भ में कोई तूक नहीं है

  9. मैंने तो इस कार्यक्रम या ऐसे ही सभी फूहड़ कार्यक्रमों को आरम्भ से ही नकार दिया है.लेकिन बड़ा ही अफ़सोस होता है जब ऐसे कार्यक्रमों से लोगों को इस तरह प्रभावित होते ,अनुकरण करते और अपने प्राण तक hatne की चेष्टा करते देखती सुनती हूँ….ऐसे कार्यक्रमों को सिरे से नकार कर ही निर्माता दिग्दर्शकों के दुष्प्रयासों को ध्वस्त किया जा सकता है.

  10. इस तरह के कार्यक्रमों को, जिससे लोग आत्महत्या को प्रेरित हों, बंद कर देना ही उचित है. वैसे भी इनको इतनी गंभीरता से क्यूँ ले लेते हैं लोग.

  11. Gautam said

    समाज को अवसादित करने करने वाले टीवी कार्यक्रमों की एक समीक्षा हो जाये तो बेहतर होगा…..यह आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा घिनौना चेहरा है….पैसों दो और उनसे उनका सच पूछो….यह मीडिया की आत्महत्या है, पल्लवी का नहीं……अवसाद भरे लोगों के अवसादों को उठाकर समाज फैलाने का क्या मतलब है ?….सच तो बहुत कुछ है तो क्या आप उसे दिखा दोगे….नहीं….खुद को रेग्यूलेट तो करना ही होगा….. सच दिखाने की सीमा क्या है……

  12. इस तरह के कार्यक्रमों में भाग लेने से पहले भी लोगों को सोचना चाहिए। भला आप जाएं ही वहां क्यों, जहां आपका सत्य आपको ही छलनी कर दे?वैज्ञानिक दृ‍ष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को उन्नति पथ पर ले जाएं।

  13. काव्या जी , विश्व आर्थिक मंदी ने लोगों के सोचने की क्षमता को कमजोर कर दिया है….पैसा है तभी जीवन आगे चलेगा…दुनिया इस बेसिक लाइन पर खड़ी हो गई है….इस तरह के कार्यक्रमों आदमी सोंच कर के नहीं आता है बल्कि पैसे की लालच उसे खींच लाती है यहं पर…और इसके लिए पैसा फेंका जा रहा है….और अपनी जरू रतों के लिए त्रस्त लोग इसमें पैसा के लिेए आ रहे हैं….यह विश्व आर्थिक मंदी से उपजे नवीन परिस्थिति में इनसान की आत्मा को दोहन है…सत्य से छलनी होने से गुरेज नहीं होना चाहिए….लेकिन देखना है कि जिस सत्य से आप छलनी हो रहे हैं या फिर किये जा रहे हैं उस सत्य का औचित्य क्या है। सुकरात विष पीता है, सत्य के लिए। लेकिन वह सत्य जनहित से जुड़ा हुआ है। बुद्ध अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर भिक्षुक बनता है, सत्य की तलाश में। उसका सत्य वैश्विक हित से जुड़ा हुआ है….लेकिन सच का सामना का सच क्या है….जनहित और वैश्विक हित में तो यह नहीं दिख रहा है…इस कार्यक्रम में एक बाप के सामने उसकी बेटी से पूछा जाता है कि क्या उसने अपनी बेटी के उम्र की किसी लड़की के साथ सेक्स किया है। और बाप जवाब देता हैं हा….ठीक है वह सच बोल रहा है….लेकिन इस सच का जनहित में कोई औचित्य है …नहीं है….हां यह सच उस बेटी के मन में अवसाद पैदा करेगा….और उसकी उम्र की तमाम बेटियां जो इस सच को देख रही होती हैं उनके मन भी गाहे बगाहे अपने पिता के संबंध में यह सवाल उठ सकता है…इस तरह से मनोवैकज्ञानिक तौर पर लोगों के दिमाग मे सामूहिक विकृति उत्पन्न किया जा रहा है…

  14. अफसोस जनक!!!

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