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थ्री फिफ्टीन (कहानी)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 24, 2009

आलोक नंदन
बाहर के लौंडे कैंपस के अंदर रंगदारी करने आ ही जाते थे। सभी झूंड में होते थे, इसलिए उनसे कोई उलझता -नहीं था। किसी की भी साइकिल को छिन लेना और लप्पड़ थप्पड़ कर देना उनके लिए मामूली बात thi, सिगरेट के छल्ले उड़ाने जैसा।
श्रेया पूरे कालेज की माल थी, चुपके-चुपके हर कोई उसको अपने सपनों की हीरोईन समझता था। कुछ ज्यादा बोलने वाले लौंडे ग्रुपबाजी में बैठकर आपस में ही श्रेया की खूब ऐसी तैसी करते थे, उसके नाकों में पड़ी नथ से लेकर उसके रूमाल तक की चर्चा होती थी। अब ये लौंडों की औकात पर निर्भर करता था कि कौन क्या बोलता है। उनकी बातों को सुनकर एसा लगता था कि कोका पंडित से लेकर कालीदास तक श्रेया के मामले में फेल हो जाते।
प्रैक्टिकल रूम में हाथों में दस्तानों के साथ जार लिये लौंडों की बातें श्रेया की रेटिना से शुरू होकर कहां-कहां घूमती थी कोई नहीं जानता था।
भोलुआ बाहरी था, लेकिन छूरा और गोली चलाने का उसका हिस्ट्री रिपोर्ट अंदर के प्रैक्टिकल से लेकर स्पोर्ट्स तक के लौंडों पर भारी पड़ता था। यदि गलती से वह किसी क्लास में घुस जाता था तो प्रोफेसर और लड़के यही सोचते थे कि कैसे जल्दी क्लास खत्म हो। और गलती से भोलुआ को प्रोफेसर की कोई बात समझ में नई आती थी तो वो सकता था कि क्लास अगले तीन चार घंटे तक चलता रहे। उसके कमर में हमेशा दो थ्री फिफ्टीन की देसी पिस्तौल होती थी, जिसमें एक बार में सिर्फ एक ही गोली लोड की जा सकती थी। पूरे इलाके को पता होता था कि उसके कमर में समान (देसी पिस्तौल) लगा रहता है।
राशि को भी बकबक करने की आदत थी, एक बार शुरु हो जाता था तो पता नहीं कहां से कहां पहुंच जाता था। उसके दोस्तों ने कहा, साला तूम इतना बकर बकर करता है, कोई बैनर बनाके बक बक कर…नहीं तो कोई बैनर के नीचे बक बक कर…..। एक बार वह एक बैनर के नीचे बक बक करने गया था और रौ में बोलता चला गया, बैनर बना के समाज का ठेका उठाने वाले जितने भी लोग वही सारी समस्याओं की जड़ है। बैनरों को हटा दो और समाज को स्वतंत्ररूप से शिक्षित करो और होने दो…फिर सबकुछ ठीक हो जाएगा। मिर्ची तो बहुत लोगों को लगी थी लेकिन ऊपर से सब ने उसकी तारीफ की थी। और बाद में कई बैनर वाले कह रहे थे कि हमारी बैनर में आ जाओ, मिलकर काम करेंगे। लेकिन वह अपनी धुन पर अपनी ही चाल में चलता था।
उस सुबह बलुअरिया मार लिया था, वो भी आधा लबनी….टेनिस कोर्ट में चौकड़ी लगी हुई थी। सभी लौंडे इधर उधर लेटें हुये थे, कोर्ट से दूर। बलुअरिया के नशे में वो पिंगल मार गया था, कि आज श्रेया को प्रोपेज करने जा रहा है। पूरा कालेज इंतजार कर रहा था कि अब आगे क्या होने वाला है। सामने से श्रेया आती हुई दिखाई दी, और वो आगे बढ़ गया, प्रपोज करने के मूड में हालांकि उसकी हवा खराब थी।
श्रेया के सामने आते ही उसके मूंह से निकला, हमलोग एक बोलने वाला प्रोग्राम रख रहे हैं उसमें आपको इनवाइट कर रहे हैं, अभी कार्ड नहीं है लेकिन जल्द ही कार्ड भी दे देंगे… …थैंक्यू….। श्रेया को समझने का मौका दिये बिना वह उसका हाथ लपक लिया और मिलाकर चलता बना। सबकुछ पलक झपकते हुआ। सभी लौंडे देख रहे थे। उसके जाते ही सभी लौंडो के बीच में दिन भर उड़ाता रहा कि उसने कैसे प्रोपोज किया, और उड़ते हुये यह खबर भोलुओ के कानों में पड़ गई। और कुछ देर के बाद इसके कानों में भी कि भोलुओ उसे पिस्तौल के खोज रहा है।
पंद्रह दिन तक डर से घर में पड़ा रहा। जिस दिन पहुंचा उसी दिन सभागार में कोई बोलने का कार्यक्रम चल रहा था। हौल में घूसते ही उसको बोलने के लिए वाली सूची में सभी लौंडो ने डलवा दिया। मंच पर चढ़ने के कुछ देर बाद उसकी नजर तीसरे रो में बैठी श्रेया और पांचवे रो में बैठे भोलुओ पर पड़ी….उसके मुंह से निकला….ले लोटा…यह समान लगाये हुये होगा…..अब उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, उसने मन ही मन कहा, हे भगवान कृष्ण बचा ले….और फिर माइक के सामने शुरु हो गया, दुनिया में एसा कौन भाई है जो अपनी बहन से कहेगा तू किसी के साथ भाग जा….लेकिन कृष्ण ने कहा था। क्या आज के समय कृष्ण जैसा कोई कर सकता है। क्या मैं अपनी बहन को कह सकता हूं कि वह किसी के साथ भाग जाये, क्या आप यह अपनी बहन से कह सकते हैं। बोलने के दौरान उसकी नजर भोलुआ पर ही थी, और भोलुआ की उस पर। आज कृष्ण जैसे भाइयों की जरूरत है जो अपनी बहन को समझे और उनके जीवन को खुशहाल बनाये।
सभा खत्म हुई तो वह बाहर निकला। एक लौंडा उसके पास आया और बोला, भोलुआ बुलइतै हथुन, चलअ।
उसके मूंह से निकला, लेकिन उनका पास त समान रहता है, हम न जायब…….कहीं उड़ा देलन त….आज पंद्रह दिन बाद तो कालेज अइली हे, ईहां से सीधे ऊपरे चल जाई का ? हम न जायब….
लौंडा बोला, भोलुआ भईया खुश हथुन, चलआ. बड़ी मुश्किल से वह समझा पाया कि जब तक वह भोलुआ के थ्री नटा को देख नहीं लेता तब तक उनका दर्शन कैसे कर सकता है। थोड़ी देर बाद भोलुआ का थ्रीनटा लेके वही लौंडा वहां खड़ा था। राशि ने उसके हाथ से पिस्तौल लेकर उसे खोला और नली से गोली बाहर निकालकर पाकेट में रख लिया। थोड़ी देर के बाद कैंपस के एक कोने में वह भोलुआ के सामने खड़ा था। उसकी ऊपर की सांसे ऊपर और नीचे की सांसे नीचे लटकी हुई थी। उसको देखते ही भोलुआ ने कहा, अरे राशि भाई तु तो बहुत ही बढ़िया बोल ह…आज तो एकदम हिला देलअ…कोई दिक्कत न न हव….कुछ होतव त बतइह….मन गद गद कर देल…भोलुआ को वाकई में खुश पाकर उसकी हवा ठीक हुई।
उसने पिस्तौल निकाल कर भोलुआ को देते हुये कहा, इ ल….ई तोरे पास ठीक रह तव……
अरे आज यही खुशी में तोरा सलामी देवे के मन करी थे…इतना कहने के साथ भोलुआ ने पिस्तौल में गोली भरा और नली को आसमान की ओर करके घोड़ा दबा दिया। धमाके की आवाज से कैंपस में हड़कंप मच गया। सभी लौंडो के बीच हल्ला हो गया कि भोलुआ ने राशि का पोस्टमार्टम कर दिया।
यह खबर कैंटिन में बैठी श्रेया के कानों भी पड़ी और वह भी भागती हुई उस स्थान पर पहुंची जहां पर भोलुआ ने हवा में गोली चलाई थी। भोलुआ श्रेया को देखकर भौचक था। और राशि के समझ में भी नहीं आ रहा था कि अभी-अभी क्या हुआ है, और क्या होने वाला है। इसके पहले कि श्रेया कुछ कह पाती भोलुआ के मुंह से निकला, तू राशि भाई से आई लव कह हहू ??? कोई बात न हई खूब कर….राशि भाई के बात हम समझ गईली हे….कौन भाई अपन बहिन से कहत कि ऊ भाग जाये…तू हमर बहिन रहतल हल त हम यही कहती हल…
थ्री नटा को अपनी कमर में खोसकर वह राशि के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कराते हुये आगे बढ़ गया।
(समाप्त)
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7 Responses to “थ्री फिफ्टीन (कहानी)”

  1. कहानी अच्छी है..लेकिन शब्दों में भद्रता की कमी है… इनका सत्र सभ्य होने पर कहानी अधिक पूर्ण लगेगी

  2. बहुत बढिया

  3. सुनील जी इसमें मैं उन्ही शब्दों का इस्तेमाल किया हूं जो इस कहानी के परिवेश में बोली जाती थी….मुझे लगा कि जो चीज जैसी थी उसे उसी रूप में रखू…फिर भी बहुत भद्र रहा हूं….वैसे आपकी शिकायत सिर माथे पर….

  4. कथा बढ़िया रही!

  5. कुश said

    कहानी की डिमांड के अनुसार मुझे शब्द ठीक लगे.. ऐसी कहानिया मुझे आकर्षित भी करती है.. मैंने भी कुछ लिखा था जिसमे ऐसे ही कुछ किरदार थे नाम था छम्मक छल्लो..आपकी कहानी पसंद आई

  6. ज़ोरदार कहानी है.

  7. लेट आने के लिए मुआफी …….पर अंतरजाल पे ऐसी कहानिया पढना बड़ा सकूं देता है …ग्रेट मेन!!

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