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आकृतियां (कहानी)

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on September 25, 2009

आलोक नंदन
आसमान में काफी ऊंचाई पर मंडराते हुये चीलों के झूंड पर उसकी नजरे टिकी हुई थी, दिमाग के परतों के तह में अचिन्हित प्रतिबंबों के रूप में कई आकृतियां एक दूसरे से उलझते हुये जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने की कोशिश कर रही थी। नजरें जितनी दूर तक जा रही थी, दिमाग की परतें उतनी ही गहराई से खुलती जा रही थी।
आकृतियों ने एक पतली सी तीखी नाक नक्शे काली लड़की का वजूद अख्तियार किया। एक बंद कमरे में पिछले तीन घंटे से वह कैलकुलस के सवालों को हल कर रहा था, अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई, फिर हौले से दरवाजा खुला। अपने बांह में कुछ कपड़े समेटे हुये कमरे में दाखिल हुई थी और मुस्कराते हुये कहा था, “मेरे घर के नल में पानी नहीं आ रहा है, तुम कहो तो तुम्हारे बाथरूम में स्नान कर लूं।”
“लेकिन अभी मेरे यहां कोई नहीं है’’, कलम को उस कापी के ऊपर पटकते हुये थोड़ी खीज में वह बोला था, जिस पर कैलकुलस के एक सवाल को वह आधा हल कर चुका था।
“कोई बात नहीं, मैं नहा के चली जाऊँगी”, यह बोलते हुये वह काली लड़की कमरे से सटे हुये बाथरुम की ओर चली गई थी। बाथरूम के अंदर से शरीर पर पानी उड़ेलने और गुनगुनाने की आवाज आती रही और वह आधा हल किये हुये सवाल पर बेतरतीब तरह से कलम चलाता जा रहा था। पियर्स साबुन की खुश्बू फेंफड़े के अंदर दूर तक धंसती जा रही थी। अपने भींगे बालों को तौलियों में समेटते हुये बाहर निकलते हुये उस काली लड़की ने कहा था, “तुम बुद्धू हो,”। और फिर खिलखिलाते हुये चली गई थी। कैलकुलस के सवालों को धड़ाधड़ हल करने वाला उसका दिमाग कई दिनों तक लड़की खिलखिलाहट और उसके शब्दों में उलझा रहा था।
दूर आसमान में चीलों के झूंड वृताकार गति में एक लय और ताल के साथ उड़ान भर रहे थे। बीच-बीच में कोई चील अपने पंखों को एक दो बार हिला डूला देता था।
अपने घर के सामने खुले छत पर जाड़े की गुनगुनाती धूम में तल्लीनता के साथ पढ़ती हुई गोल चेहरे वाली उस गोरी लड़की की आकृति ऊभरी, जो उससे उम्र में बहुत बड़ी थी। उसके कहने पर शहर के एक प्रसिद्ध नाटककार के लिए वह सरकारी कैंटिन से थोक भाव में रसगुल्ले खरीद कर ले जाता था। इन रसगुल्लों को ले जाने के लिए वह अपने बड़े भाई की साइकिल की चाभी उसे दे दिया करती थी। मुस्कान के साथ उस गोरी लड़की के आग्रह और साइकिल चलाने के लोभ के कारण वह अक्सर उस नाटककार के लिए रसगुल्ले लेकर जाया करता था। एक दिन वह अपने अपने परिवार के साथ शहर के बाहर किसी की शादी में गई थी। कुछ दिन के बाद खबर आई थी की वह जलकर मर गई। इसके बाद यह खबर उड़ी की उसे जलाकर मार दिया था। वर्षों वह लड़की उसके सपनों में आती रही थी…कुछ कहना चाहती थी,लेकिन क्या ?
दोनों पंखों को समेटकर एक चील ने नीचे की ओर गोता लगाया और फिर अपने पंख फैला कर घेरा को तोड़ते हुये एक नई दिशा में उड़ान भरने लगा। उसकी नजरें उसी चील का अनुसरण करने लगी, और इसके साथ ही मस्तिष्क के एक अन्य परत में हरकत हुई।
“राब्सपीयर एक दयालु जज था, अपनी डायरी में लिखता है, किसी भी चोर बदमाश के खिलाफ सजा सुनाने हुये मेरा दिल रोता है। वही राब्सपीयर फ्रांस में जैकोबिन क्ल्ब की कमान संभालते हुये गिलोटिन का सूत्रधार बनता है, और हत्याओं का दौर शुरु हो जाता है। एक दयालु जज पूरे फ्रांस को बचाने के लिए एक खौफनाक शासक के रूप में तब्दील जो जाता है,” एक अधनंगे प्रोफेसर की आवाज उसके कानों में गुंजने लगी, और उसकी भद्दी सी आकृति मानसिक पटल पर उभर आई। एक चौड़े चेहरे वाले युवक की आकृति तेजी से प्रोफेसर की आकृति को धक्का देते हुये सामने आती है, और उसकी ऊंची आवाज गूंज उठती है, “जिंदगी की मौलिक जरूरतों को भी मैं पूरा नहीं कर पा रहा हूं। दस बाई दस के एक कमरे में मैं तीन लोगों के साथ रहता हूं। घर वाले पांच साल से पड़े हुये हैं कि शादी कर लो, अब खुद का खर्चा तो चल नहीं रहा है, ऊपर से बीवी ले आऊ? पता नहीं अपनी जिंदगी इतनी कठिन क्यों है, लेकिन मैं हारा नहीं हूं, बहुत धैर्य है मेरे अँदर, जरूर प्रकृति ने मेरे बारे में कुछ अजूबा सोच रखा होगा, फिलहाल तो सफरिंग का दौर है। मैं फिल्म बनाना चाहता हूं, फिल्म…”
उसके हटने के पहले ही एक महिला की अस्त पस्त आकृति हौले से सामने आती है और मद्धिम स्वर में कहती है, “तुम्हे प्यार करना नहीं आता। तुम कभी नही समझ सकते कि एक औरत कैसा प्यार चाहती है। तुम सोचते ज्यादा हो, दिल नाम की चीज तुम्हारे अंदर नहीं है। प्यार दिल से किया जाता है, दिमाग से नहीं।”
अकेला उड़ता हुया चील एक आवारा बादल को चीरते हुये उसके अंदर समा गया । और फिर उसे एक झटके में बादलों की ओट से बात करने वाला बिना आकृति वाले मूसा के ईश्वर का अहसास हुआ था। फराओ के सम्राज्य से भूखे नंगे निकलने वाले एक बड़े काफिले की पदचाप सुनाई देने लगी, नया झरना, नई जमीन और नये कुएं का वादा…फिर लुट-खसोट, चित्कार और कत्लेआम..ओह, क्या ईश्वर की भी अलग-अलग जाति है…और एक जाति का ईश्वर दूसरी जाति को नष्ट करने की शक्ति देता है। फिर भरी दोपहरी में हाथ में जलता हुआ लालटेन लेकर लोगों से सवाल करता हुआ एक आकृति, “कहां है ईश्वर है, दिन में लालटेन की रोशनी में मैं उसे खोज रहा हूं।”
बादलों को भेद कर वह अकेला चील दूसरी ओर निकला। विकृत आंखों वाले एक हांफते हुये हिरण कि आकृति दूसरे पटल पर तैरने लगी, फिर छम छम कर दौड़ते हुये मोर।…….मुझे नीला रंग बहुत पसंद है, बड़ी-बड़ी नीली आंखों वाली एक लड़की आवाज उसके कानों में गूंजी। एक सवाल छटक कर इधर से उधर हुआ, तूम ?… तुम मेरे अंदर बैठी थी और मैं तुम्हे यहां वहां खोज रहा था ? लड़की खिलखिला उठी…तुम भी तो मेरे अँदर बैठे रहे….
चील आसमान में लंबा घेरा बनाते हुये फिर आपस अपनी झूंड में आ मिला। और अचेतन में धंसी सारी आकृतियों ने घेरे का रूप ले लिया………हौले से उसने अपनी आंखे बंद कर ली…और परतो का अंतर खत्म हो गया…चीलों के झूंड और अंदर की आकृतियां आपस में उलझने लगे…..और नींद की चादर में वह सिमटता चला गया।
समाप्त
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5 Responses to “आकृतियां (कहानी)”

  1. इस सुन्दर कथा के लिए आलोक नन्दन जी को बधाई!

  2. डाक्टर साहब, आप लगातार मेरी लेखनी को न सिर्फ पढ़ रहे हैं बल्कि अपनी प्रतिक्रिया देते आ रहे हैं। आपकी बधाई को मैं तहे दिल से स्वीकार करता हूं, बस आप यूं ही पढ़ते रहेंगे लिखने का मेरा हौसला बना रहेगा.

  3. वाह, क्या बात है!आकृतियाँ मन के उद्‌गारों का प्रतिबिम्ब साबित हो रही हैं। आपकी कहानी सफल रही। बधाई।

  4. जीवन के सत्य को उकेरती कहानी। बधाई।दुर्गापूजा एवं दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएँ।-Zakir Ali ‘Rajnish’ { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  5. सुंदर ताना-बाना.. अच्छी लगी यह कहानीहैपी ब्लॉगिंग

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