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पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -4

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on October 29, 2009

तिरुअनन्तपुरम में अब कुछ खास नहीं बचा था इसलिए हमने सोचा कि हमें अब आगे चल देना चाहिए। दिल्ली में बैठे- बैठे हमने जो योजना बनाई थी उसके मुताबिक हम तिरुअनन्त पुरम में एक रात रुकने वाले थे। इसी योजना के अनुसार हमने 23 सितम्बर के लिए मदुराई पैसेन्जर में सीटें आरक्षित करवा ली थीं। यहां का सारा आवश्यक भ्रमण पूरा हो गया था और अब वहां केवल वे ही स्थान थे जो यूं ही समय बिताने के लिए देखे जा सकते थे, हमें काफी कुछ घूमना था इसलिए निर्णय लिया कि अगले दिन का आरक्षण निरस्त करवा कर आज ही इसी गाड़ी से मदुराई चल दें। वहां की गाड़ियों में भीड़ कम होती है और कोई खास परेशानी होने वाली नहीं थी।

स्वामी पद्मनाभ मंदिर से लौटकर सर्वप्रथम हमने आरक्षण निरस्त कराया । त्रिवेन्द्रम स्टेशन का आरक्षण कार्यालय हमें दिल्ली के सभी आरक्षण कार्यालयों से अच्छा और सुव्यवस्थ्ति लगा। स्वचालित मशीन से टोकन लीजिए और अपनी बारी की प्रतीक्षा कीजिए, लाइन में लगने की कोई आवश्यकता ही नही। एक डिस्प्ले बोर्ड पर आपका नंबर आ जाएगा और आपका काउंटर नंबर भी प्रर्दशित हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था तो राजधानी दिल्ली में भी नहीं है जहां कि भारत सरकार का रेल मंत्रालय स्थित है। खैर, आरक्षण निरस्त करवा कर हम वापस आए । मदुरै पैसेन्जर सवा आठ बजे की थी । स्टेशन पर स्थित आई आर सी टी सी के रेस्तरां में हमने खाना खाया। यह इस दृष्टि से प्रशंसनीय है कि यहां खाद्य पदार्थ अच्छा और तार्किक दर पर मिलता है।हालांकि मुख्य उपलब्धता दक्षिण भारतीय व्यंजनो की ही होती है पर यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। अपना सामान क्लोक रूम से वापस लिया और गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करने लगे।

यहां हम एक बड़े संकट में फंसते- फंसते बचे! दरअसल हमने आरक्षण तो निरस्त ही करवा दिया था और अब हमें सामान्य दर्जे में सफर करना था , टिकट भी हमने ले ही लिया था। त्रिवेन्द्रम से मदुरै लगभग 300 किमी है और इस पैसेन्जर गाड़ी का किराया मात्र 41/- है। मेरे मित्र ने सुझाव दिया कि ट्रेन आ जाए तो हम लोग पहले सीटें ले लें और बाद में पत्नी और बच्चों को लिवा लाएं। सुझाव मुझे तो बहुत अच्छा नहीं लगा, एक साथ ही सवार हो लें तो अच्छा हो किन्तु दबे मन से सुझाव मैंने भी मान लिया। ट्रेन आई, जोरों की बारिश हो रही थी। भाषाई समस्या के कारण यह भी ज्ञात नहीं हुआ कि गाड़ी आएगी किधर से और सामान्य डिब्बे लगते किधर हैं ? गाड़ी आई तो हम दोनों एक तरफ दौड़े , उधर डिब्बे भरे हुए थे। लिहाजा हमें दूसरी ओर जाना पड़ा। सीटें खाली मिल गई तो सन्तोष हुआ। अपने साथ मैं बेटी को भी ले गया था। ऊपर की कई सीटें हमें आसानी से मिल गई थीं । बेटी और मित्र को सीटों की रक्षा का दायित्व सौंपकर मैं बाकी सदस्यों को लिवाने पहुँचा और बमुश्किल चला ही था कि गाड़ी चल पड़ी ! हमारा अनुमान था कि स्टेशन बड़ा है और ट्रेन देर तक रुकेगी । रात का वक्त और सुदूर अनजान देश ! अब क्या करें, मैं तो पिछले डिब्बे में चढ़ भी जाता किन्तु महिलाओं और बच्चों का क्या करें ? इस सारी घबराहट के बीच अब बस मोबाइल का ही सहारा थोड़ी सी ऑक्सीजन दे रहा था, भगवान का शुक्र कि मित्र बेटी को लेकर जल्दबाजी का परिचय देते हुए उतर गए थे और खिड़की से गाड़ी के अन्दर झांक रहे थे- इस आशंका से कि कहीं हम लोग पीछे के किसी कंपार्टमेन्ट में चढ़ न गए हों। इस बीच बेटी ने मुझे देख लिया और हम सभी एक दूसरे को एक साथ देखकर जैसे विश्वास करने की कोशिश कर रहे हों कि हम वास्तव में पुनः साथ हैं।

बारिश अभी भी जोरों से हो रही थी। राहत की सांस लेने और अपनी गल्ती एवं परिस्थिति की समीक्षा करने के बाद आगे के कार्यक्रम पर विचार करना शुरू किया । पूछताछ की तो पता चला कि अगली गाड़ी सुबह पौने चार बजे है। अर्थात लगभग 6 घंटे तक प्रतीक्षा ! बस में जाने के लिए न तो बच्चे तैयार और बारिश की वजह से बाहर निकलने और बस अड्डे तक जाने की गुंजाइश । वैसे 300 किमी की बस यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार मैं भी नहीं था। अब या तो हम प्रतीक्षा करें -यहीं रेलवे के विश्रामालय में या होटल की तलाश करें । होटल के लिए भी बाहर जाना ही होता , अतः हमने मन मारकर यहीं रुकने का निर्णय किया और अगली ट्रेन जो प्रातः पौने चार बजे की थी ,की प्रतीक्षा करने का विकल्प स्वीकार कर लिया।

विश्रामालय में ही आसन लगा। मित्र सपरिवार निद्रानिमग्न हो गए। कोशिश मैंने भी की किन्तु सफलता नहीं मिली। घंटे भर लोट-पोट , अंडस -मंडस करता रहा , फिर हार मानकर बैठ गया। वैसे भी यात्रा में मैं कम सामान और कम भोजन के फार्मूले पर चलता हूँ और सुखी महसूस करता हूँ ।बहरहाल, रात निकलती गई और गाड़ी के आने का समय हो गया। सबको जगाया और चेन्नई एगमोर एक्सप्रेस में हम सवार हो गए।तुलनात्मक रूप से इसमें भीड़ थी । चूंकि हम इन बातों को स्वीकार कर के सवार हुए थे इसलिए कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई।आगे गाड़ी खाली होती गई और हमें आराम करने की जगह भी मिलती गई।

सुबह नौ-दस बजे तक हम थोड़ा आश्वस्त हो चुके थे और स्थानीय प्रकृति,टोपोग्राफी और भौगोलिक दृश्यों का आनन्द लेने लग गए थे। जो कुछ दक्षिणी पठार के विषय में किताबों में पढा था वह देख रहा था। वहां की मिट्टी और बनस्पतियां हमारे अध्ययन की केन्द्र में थीं । साथ चल रहे यात्रियों का ढंग, भोजन एवं तौर तरीका हमारे लिए आकर्षण था। ज्यादातर यात्री साथ में इडली और चटनी लेकर आए थे और मौका पाते ही चट करने में लग जाते थे । भाग्यवश कुछ सहयात्री ऐसे थे जो थोड़ी बहुत अंगरेजी समझ ले रहे थे । उनसे ही हम कुछ-कुछ जानकारी पा जा रहे थे।

मदुरै पहुंचाने में इस गाड़ी ने लगभग सात घंटे लिया । मदुरै तमिलनाडु का एक बड़ा रेलवे जंक्शन है । यहां से उत्तर भारत, दक्षिण के कई बडे नगरों, रामेश्वरम एवं कन्या कुमारी जैसी जगहों के लिए गाड़ियां मिलती है। यह दक्षिण भारत की एक प्रकार से सांस्कृतिक राजधानी है।अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति एवं सिल्क उद्योग के लिए यह भारत में ही नहीं अपितु विदेशों तक मे विख्यात है ।

हम यहां लगभग 11बजे दिन में पंहुचे थे और थके हुए थे। हमारी प्राथमिकता थी यथाशीघ्र होटल लेना , नहा धोकर तरोताजा होना और फिर मीनाक्षी मंदिर का दर्शन करना। स्टेशन से बाहर आए तो ऑटो और टैक्सी वालों ने हमें धरा। दक्षिण भारत के दिल्ली स्थित एक मित्र ने सुझाया था कि परिवार स्टेशन पर ही छोड़कर पहले होटल तलाश लेना फिर परिवार ले जाना। साथ वाले मित्र का भी कुछ ऐसा विचार था । पर, मैं कुछ रात की घटना से और कुछ थकान से इस विचार से सहमत नहीं हुआ। एक साथ ही चलते है। जो भी सस्ता महंगा पड़ेगा , देखा जाएगा! एक बार कमरा ढूंढ़ो, फिर परिवार लेने आओ। ना भाई ना। और यह जानते हुए भी कि ऑटो वालों का कमीशन बंधा होता है, इनके साथ जाने से कमरा कमीशन जोड़कर ही मिलता है, हमने उन्हीं के साथ जाना उचित समझा। शायद यह भी एक परिस्थिति ही होती है कि आदमी जानते हुए भी ठगे जाने को तैयार होता है!

इस बार कोई भी पोंगापंथ अभी तक सामने नहीं आया। थोड़ा बहुत पोंगा मैं ही साबित हुआ। हां, मंदिर में ले चलूंगा तो पोंगापंथ जरूर दिखाऊंगा। यात्रा अभी जारी है…………

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4 Responses to “पोंगापंथ अप टु कन्याकुमारी -4”

  1. पल पल का विवरण -मुझे अपनी सपरिवार यात्रा याद अ रही है जो मैंने इसी रूट पर किया था -अब भाई ट्रेन आने और रुकने पर दूर से परिवार लाने का घोंचू आईडिया किसका था ? साथ ही रहना था न ??

  2. बहुत सुंदर लिखा आप ने, लेकिन हमेशा परिवार के संग रहो, चलिये आप को भी पता चल गया, बहुत सुंदर ्विवरण किया आप ने अपनी इस सुंदर यात्रा का धन्यवाद

  3. एैसा लगा रहा कि आपके साथ-साथ मैं भी दक्षिण भारत की यात्रा कर रहा हूं…बहुत खूब….अगली किश्त का इंतजार रहेगा.

  4. वस्तुतः यात्रा का यह अंश किसी भी प्रकार कोई विशिष्ट नहीं था सिवाय उस गलती के पहले सीटें घेर लें. इस विचार से, जैसा कि मैने पहले ही उल्लेख कर दिया है, सहमत नहीं था किंतु कहीं ना कहीं मित्र की बात भी मान लेने की मानसिकता थी या सम्बन्धों का लोकतंत्र था. यात्रा करना मेरा सबसे प्रिय शौक है और अब तक अपनी अनेक यात्राएं अपनी योजना और जिज्ञासा के कारण सफलतापूर्वक कर चुका हूँ. पर इंसान हूँ, कभी – कभी गलती हो ही जाती है. हाँ, सीखने के लिए कुछ न कुछ दे जाती है. अगला अंक इससे रोचक है. यथाशीघ्र ही कोशिश करूँगा. भाटिया साहब का विशेष आभार- ब्लॉग पर पुनः आने और टिप्पणी करने के लिए.

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