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गजल

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on November 1, 2009

यूं कितने बेजान ये पत्थर
लेकिन अब इंसान ये पत्थर !

मोम सा गलने की कोशिश में
रहते हैं हलकान ये पत्थर।

टकरा कर शीशा न तोड़े
क्या इतने नादान ये पत्थर !

अपनी चोटों से क्यों इतना
रहते हैं अनजान ये पत्थर ?

इसके उसके जीवन के हैं
स्थायी मेहमान ये पत्थर।

(संदीप नाथ की यह गजल “दर्पण अब भी अंधा है” संग्रह से।)

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8 Responses to “गजल”

  1. lajawaab है पूरी ग़ज़ल ……… बहुर ही अछे शेर हैं ……..

  2. M VERMA said

    यूं कितने बेजान ये पत्थरलेकिन अब इंसान ये पत्थर !सब कुछ तो कह दिया इस अकेले शेर नेसभी शेर बहुत सुन्दर

  3. उम्दा ग़ज़ल…..बेहतरीन ग़ज़ल !___बधाई !

  4. एक बेहतरीन ग़ज़ल . सही है आज का इंसान, इंसान कहाँ रहा . पत्थर मानिंद हो गया है . पत्थर तो फिर भी कभी नींव का और कभी मील का पत्थरहोते हैं. इंसानियत अब रही कंहाँ ?

  5. बहुत उम्दा ग़ज़ल है जी पढ़वाने के लिए शुक्रिया

  6. यूं कितने बेजान ये पत्थरलेकिन अब इंसान ये पत्थर !आप की गजल के एक एक शव्द से सहमत हुं, बहुत सुंदर.धन्यवाद

  7. Morteza said

    "In the name of God"Hello users,Please visit my website and link it:bahayiatbibaha.blogfa.com(Thank you)

  8. khoobsoorat gazal hai.dhanyavaad.

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