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खुद को खोना ही पड़ेगा

Posted by Isht Deo Sankrityaayan on January 22, 2010

लंबे समय से ब्लाग पर न आ पाने के लिए माफी चाहता हूं। दरअसल, हमारे चाहने भर से कुछ नहीं होता। इसके पहले जब मैंने अपनी गजल पोस्ट की थी, उस पर आपने बहुत सी उत्साहजनक टिप्पणियां देकर मुझे अच्छा लिखने को प्रेरित किया था। आज जो गजल पेश कर रहा हूं, यह किस मनोदशा में लिखी गई, यह नहीं जानता। हां, यहां निराशा हमें आशा की ओर ले जाते हुए नहीं दिखती…?-

अब तो हमको दूर तक कोई खुशी दिखती नहीं
जिंदा रहकर भी कहीं भी जिंदगी दिखती नहीं

हर किसी चेहरे पे हमको दूसरा चेहरा दिखा
एक भी चेहरे के पीछे रोशनी दिखती नहीं

जिनको आंखों का दिखा ही सच लगे, मासूम हैं
बेबसी झकझोर देती है, कभी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार पाने के लिए
देखिए, मिलकर समंदर से नदी दिखती नहीं

खुद को खोना ही पड़ेगा प्यार देने के लिए
आंख ही सबकुछ दिखाती है, अजी दिखती नहीं।

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2 Responses to “खुद को खोना ही पड़ेगा”

  1. sanjeev said

    अब तो हमको दूर तक कोई खुशी दिखती नहीं…laekin is kavita ko pad kar mai kah sakta hun ki abhi bhi kam se kam ek चेहरे के पीछे रोशनी दिखती hai hame, aur wo chehara aap ka hai janab jisne hame bhi roushni dikhayi hai.aap akele nahi hain…..aapke pichhe humare jaise log hamesha hain.shubhkaamnaayein ! ! !

  2. उम्दा है , बधाई

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